DIL KI BAAT

words falling straight from the heart

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sd vajpayee


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मांग की पूर्ति नहीं कर पा रहा गीता प्रेस

Posted On: 16 Apr, 2012  
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कैसे कहें, मेरा यूपी महान है?

Posted On: 20 Mar, 2012  
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11 साल का अनशन, देश विचार करे !

Posted On: 17 Mar, 2012  
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‘ऊपर’ का सीएम कब तक?

Posted On: 16 Mar, 2012  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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मेरा साया !

Posted On: 19 Oct, 2011  
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क्या राष्ट्रवाद संकीर्णता है ?

Posted On: 12 Oct, 2011  
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सपा का प्रर्दशन और डीआइजी का पराक्रम !

Posted On: 10 Mar, 2011  
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जब महादेवी जी महा कवि की याद में रो पडीं!

Posted On: 27 Feb, 2011  
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‘ मैं कविता का राष्‍ट्रपति हूं ‘ !

Posted On: 17 Feb, 2011  
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दो गज जमीं भी न मिली कूए यार में !

Posted On: 12 Dec, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

ID号:6732 角色名:萱萱灬我的建议/想法: ⎤ Ã¨ÂƒÂ½Ã¤Â¸ÂÃ¨ÂƒÂ½Ã¥Â¼Â€Ã©Â€ÂšÃ§ÂŽÂ©Ã¥Â®Â¶Ã¤Â¸ÂŽÃ§ÂŽÂ©Ã¥Â®Â¶Ã¤Â¹Â‹Ã©Â—´çš„ú¤æ˜“:RMB玩家可以购买商城的物品卖给非RMB玩家,非RMB玩家通过用金钱与RMB玩家购买,简单地说就是商城物品通过玩家丑金钱的交易。 这样既可以增加玩家之间的互动性又能促进商城的销量。 ②增加定时的活动副本,副本战斗可以选着玩家每人出一直宠物 组成一对 进行挑战. ③增强聊天工具,游戏里的聊天系统不完善,很多玩家都玩着幻想精灵却用着其他的工具在聊天灬 ④开设师徒,结婚和结拜的系统,比如师徒关系可以增加战斗力,婚姻关系可以双方给出一只宠物进行互动性的精灵孵化,结拜的话暂时没想到 呵呵。

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محمد عطية قال:ان شاء الله هاطلب الهاتف بالطلب المبسق اول مايكون متاح على امازون او اى متجر Ø™ªÃ„كارونى مش قادر اصبر شهر ونص ولا شهرين على ماينزل عندنا فى الدول العربية وياعالم الاسعار هاتبقى كام وانا شوفت ليه سعر على موقع شقيق انه هاينزل السعودية بسعر 2000 ريال سعودى على الله كله ربنا يسهل

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सर, मुझे केवल इतना बता दीजिये की क्या मोह्ह्म्मद साहेब ने कहा था कि निरपराध जानवरों को मरकर खा जाओ उनको अपने त्योहारों के नाम पर काट डालो और बना कर पुरे परिवार समेत खा जाओ. उनके भी तो दर्द होता ही होगा न यह तो स्वाभाविक ही है . और दूसरा अपना माँ बहन पर ही गलत निगाह रखो क्या यही सिखाया था उन्होंने ???? आप मेरे इन दोनों प्रश्नों का उत्तर दीजिये फिर मै आपको बताऊंगा कि सत्य क्या है इस इस्लाम के पीछे आपने जो लिखा है वह सर्वथा सत्य हो सकता है किन्तु मेरे प्रश्नों के उत्तर मिलने के बाद मै सोचूंगा कि वो बात आपको बताऊँ या फिर आप विश्वास नहीं करेंगे तो न ही बताऊँ मै इंतजार कर रहा हूँ ???????????????????????

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( भारत देश - वसंत ऋतू वार्ता ) "ठहरो ऋतुराज ! यहीं ठहरो ! " दिन याद तुम्हे वह हैं या नहीं , जब मैं तुमको अपनाता रहा हर बार तुम्हारे शुभागम में , खुश हो खुशियाँ मैं मनाता रहा तुम थे रणधीर , महारथी मैं, बन सारथी हुक्म बजाता रहा जब आये तभी ऋतुराज तुम्हे , सर आँखों पे मै बिठलाता रहा खुद देख रहे हो मेरी दशा , अब क्या दुःख दर्द सुनाऊँ तुम्हे मुहं बंद है, हाथ ओऊ पावँ बंधे , दिल खोल के कैसे दिखलाऊँ तुम्हे हम स्वागत आपका कैसे करें , कुछ आज यहाँ अजीब ही ढंग है अब आपस में ही है मेल नहीं, अरु भाइयों भाइयों में ही छिड़ी जंग है कहीं कोई शिकार अनीति का है, कोई दीनता के दुःख से हुआ तंग है वह रोली नहीं, अबीर की झोली नहीं, अनुराग नहीं, वह राग नहीं " ठहरो ऋतुराज १ यहीं ठहरो ! हम तो तुमको अपनाएंगे ही,.......................................... कुछ पत्र ओऊ पुष्प जो पास में हैं, उन्हें सारथी भेंट चढ़ाएंगे ही, यदि आज यहाँ बिगड़े दिन हैं, तो बने दिन भी कभी आयेंगे ही "ठहरो ऋतुराज ! यहीं ठहरो !" वार्ता संकलन : श्री सूर्य नारायण दीक्षित कलकत्ता 90621 82990 7890660797

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मुझे लगता है कि ये जो राजनेता होते हैं ये सिर्फ वादे करना ही जानते हैं उसे पूरा करना ही नहीं चाहते हैं य यूं कहें कि ये जान कर अपना वादा पूरा नहीं करना करते हैं। सर आप ने जिस गंाव की व्याख्या की है वह उन्नाव जिले में आता है और उन्नाव जिले से कंाग्रेस की अन्नू टंडन संासद हैं। लखनऊ और कानपुर के बीच में यह जिला भी पड़ता है जो कि विकास से कोसो दूर है। मेरी समझ से ये राजनेता अगर इन गावों का विकास कर देंगे तो अगली बार के चुनाव में किस बात पर वोट मंाग करेंगे। ये राजनेता सिर्फ अपने भविष्य के चिंता करते हैं पर इन्हें ये नहीं पता है कि इनकी पहचान देश से हैं। आज का समय कुछ और मांग कर रहा है आज के समय में जो जैसा दिखता है वो वैसा ही समझा जाता है। पर अधिकंाश राजनेता इस बात से अनजान है तभी तो वो सिर्फ खुद के बारे में सोचते हैं। भारत को एक गरीब देश कहा जाता है पर असल कुछ और ही है भारत के पास इतना धन है जिसका हिसाब लगापाना आसान काम नहीं यह धन काले धन रुप में विदेशाी बैंको में जमा है और वही पैसा एफआईआई के रुप में वापस भारत में आता है और यह निवेश भी भारतीय पूंजीपतियों के माघ्यम से किया जा रहा है।

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के द्वारा: sd vajpayee sd vajpayee

पूवौत्‍तर के राज्‍यों में नक्‍सलवाद तो नहीं, उग्रवाद  जरूर बडी समस्‍या है। असम, मणिपुर , मिजोरम, न्रगालैंड और त्रिपुरा में एक दर्जन से अधिक उग्रवादी संगठन दशकों से सक्रिय हैं। केन्‍द्र सरकार भी इससे निपटने को जमीनी स्‍तर पर गंभीर नहीं दिखती। अशांत क्षेत्रों को लंबे समय तक के लिए सेना के हवाले करने के परिणाम प्राय: अपेक्षित नहीं होते और स्‍थानीय लोगों का विश्‍वास  और उठता जाता है। अफ्सा लागू रहे या नहीं  इस बारे में राष्‍टी्य स्‍तर पर भले प्रभावी बहस-मंथन नहीं हआ, लेकिन पूर्वोत्‍तर में में इस पर बराबर चर्चा होती रही है। वहां के अधिकांश लोग इस कानूनको हटाने के ही पक्षधर हैं। देश का हर नागरिक समान है। अन्‍ना हजारे के आगे हिल और आंदोलन के लिए दिल्‍ली पहुंचने पर स्‍वामी रामदेव के आगे एयरपोर्ट पर बिछ जाने वाली भारत सरकार को 11 साल से अनशतरत इरोम चानू शर्मिला के बारे में भी गंभीरता से  विचार करना चाहिए।

के द्वारा: sd vajpayee sd vajpayee

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उत्तराखंड की राजनीति चली रही उथल पुथल कांग्रेस के लिए शुभ संकेत नहीं हंै। ये तो सभी जानते हैं केंद्र में कांग्रेस बैसाखी के दम पर अपनी सरकार चला रही है और उत्तर प्रदेश में करारी हार ने कांग्रेस को और लाचार कर दिया है। उत्तराखंड में कांग्रेस के आला कमान ने अपना फरमान जारी करते हुए विजय बहुगुणा को उत्तराखंड का मुख्य मंत्री नियुक्त कर दिया या यूं कहें कि कांग्रेस ने विधायको का हक मार लिया। वैसे तो विधायको का दल ही अपना मंत्री चुनता है और वही मुख्य मंत्री की कुर्सी पर बैठता है। कांग्रेस ने विधायको की इच्छाओं को दर किनार करते हुए विजय बहुगुणा को मुख्य मंत्राी तो बना दिया जिसके साथ उसे अपनी ही पार्टी के कार्यकरताओं की नाराजगी का सामना करना पढ रहा है। आलाकमान के इस फैसले ने पार्टी के दिग्गज नेताओं को खुद के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया है।

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Nationalism is a political ideology that involves a strong identification of a group of individuals with a political entity defined in national terms, i.e. a nation. In the 'modernist' image of the nation, it is nationalism that creates national identity. There are various definitions for what constitutes a nation, however, which leads to several different strands of nationalism. It can be a belief that citizenship in a state should be limited to one ethnic, cultural or identity group, or that multinationality in a single state should necessarily comprise the right to express and exercise national identity even by minorities. It can also include the belief that the state is of primary importance, or the belief that one state is naturally superior to all other states. It is also used to describe a movement to establish or protect a 'homeland' (usually an autonomous state) for an ethnic group. In some cases the identification of a national culture is combined with a negative view of other races or cultures. In the Indian context of the modern era, nationalism is both narrow as well as liberal. The Indian National Congress has always been in the forefront of the battle against those forces that seek to divide and fragment our society. The Indian National Congress has always been the bulwark against the four "isms" that threaten to tear our country apart -- communalism of all kinds, linguistic chauvinism, regional parochialism and casteism. At the national level, the BJP has sought to position itself as the main political rival of the Indian National Congress. The Indian National Congress rejects this presumptuous posturing since the BJP is simply not present in large parts of our country. Even so, the contest between the Indian National Congress and the BJP is not just a fight between two political parties. It is, in essence, a clash between two competing visions of Indian nationalism, between two competing visions of what India should be. The Indian National Congress's secular and liberal nationalism has an equal place for each and every Indian. It is an inclusive vision. The BJP's narrow and communal nationalism denies equality and equal rights to large sections of our people. It is an exclusionary doctrine. The Indian National Congress's secular and liberal nationalism is founded on a celebration of India's many diversities. The BJP's narrow and communal nationalism rejects many of these diversities and seeks to impose an artificial uniformity on our people.

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सर प्रणाम ! अत्यधिक विलम्ब से पहुंच पाने के लिये हार्दिक खेद है । राष्ट्रवाद के सापेक्ष आपके 'दिल की बात' पढ़कर अच्छा लगा । काफ़ी दिनों बाद किसी भी बहाने आपकी लेखनशैली में चिरपरिचित भक्तिभाव से परिपूर्ण 'दर्शन' का दर्शन करना नसीब हुआ, यही बहुत है । राष्ट्रवाद पर आपका विस्तारित पक्ष प्रभावित करता है, परन्तु उस गोष्ठी में प्रो. श्रीवास्तव जी ने कथित 'राष्ट्रीयता' के पक्ष में अपना जो दृष्टिकोण प्रस्तुत किया था, उसका विवरण जाने बिना समीक्षात्मक टिप्पणी कर पाना संभव नहीं हो पा रहा है । हमारे हिसाब से तो दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक हेड तो दूसरा टेल । राष्ट्रीयता यदि एक कहानी है, तो राष्ट्रवाद उसका औपन्यासिक स्वरूप है । यह अवश्य सही लगता है कि राष्ट्रीयता की सीमाएं एक परिधि के भीतर सीमित हैं, जैसे कोई डोमेस्टिक एयरलाइन्स । जबकि राष्ट्रवाद को समझ पाने के लिये कदाचित पासपोर्ट और वीजा के साथ अन्तर्राष्ट्रीय उड़ान भरकर सात समन्दर पार तक की यात्रा करने की आवश्यकता पड़ेगी । बहरहाल, इसपर आप से बात किये बिना मैं कुछ विशेष कह पाने में खुद को सक्षम नहीं पा रहा हूं । धमाकेदार वापसी के लिये बधाई । सप्ताह का ब्लागर बनना आपके लिये कोई ऐसी उपलब्धि नहीं है, जिसपर अलग से बधाई दी जाय । आभार !

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कुछ तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवी हमेशा भारतीय राष्ट्र वाद पर हमला करने का कोई अवसर नही चूकते. आज राष्ट्र वाद के स्थान पर यदि राष्ट्रीयता शब्द का प्रयोग भी कर ले तो भी उनका हमला रुकने वाला नही. उनका लक्ष्य भारतीयता पर चोट करना था और रहेगा. आज समय आ गया है की इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार हो की क्या नागरिकता और राष्ट्रीयता एक ही अवधारणा है या ये दो भिन्न चीज़े है. क्यो बंगला देश पाकिस्तान से अलग हुआ? क्यो जर्मनी एक हो गये? क्यो रूस और चीन कम्युनिस्ट होते हुए भी एक राष्ट्र नही हो गये? आख़िर इंग्लिश भाषा मे कंट्री और नेशन अलग-अलग शब्द क्यो है? क्या दोनो का आशय एक ही है? उर्दू के मुल्क और वतन शब्द क्या समाणार्थी है? इन प्रश्नो के उत्तर मे ही समाधान छुपा है. देश का दुर्भाग्य ये रहा की नेहरू के ज़माने से ही अकादमिक संस्थाओ पर वांम पंथियो का

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माननीय वाजपेयी जी, लेख अत्यंत ही सारगर्भित है। भारतीय व हिन्दु वास्तव में समानार्थक हैं परन्तु हिन्दु संज्ञा को धर्म से जोड़ने के कारण इस शब्द का राष्ट्रीयता के बोधक के रूप में महत्व समाप्त हो जाता है। अन्यथा भारतीय मुसलमानों को भी खाड़ी के मुस्लिम देशों में हिन्दु मुसलमान ही कहा जाता था। हिन्दु शब्द को किसी पूजा पद्धति से जोड़ने के कारण ही भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा कई लोगों को संकुचित प्रतीत होती है। अन्यथा तो जिस प्रकार कोई हिन्दु जिस प्रकार शिव, दुर्गा व विष्णु की उपासना या नास्तिकता में विश्वास रखते हुए भी हिन्दु रह सकता है उसी प्रकार मुहम्मद पैगंबर या यीशु की शिक्षा मानने वाले हिन्दु को अहिन्दु कहलाने की क्या आवश्यकता है। लेकिन धरमांतरण के नाम पर राष्ट्रांतरण को बढावा देने वाली शक्तियां तथा सुप्त हिन्दु समाज के कारण शायद ही यह अंतर्विरोध मिट सके।

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आदरनीय बाजपेयी जी,सादर अभिवादन और मंच पर पुनरागमन पर स्वागत.राष्ट्रवाद की अवधारणा को न स्वीकारने से क्या राष्ट्रवाद समाप्त हो सकता है.आपने सही कहा है,राष्ट्रवाद एक व्यापक आस्था है.जो भौगौलिक सीमाओं ,सांस्कृतिक व सामजिक विरासतों के प्रति विद्यमान होती है,सीमा पर लड़ते जवान,खिलाड़ी, जिनको आप पहिचानते भी नहीं के प्रति एक जुड़ाव की भावना,विदेश में रहने पर किसी भारतीय को खोजना,जिससे आपकी भाषा ,रहन -सहन .,वेश भूषा कुछ भी समान नहीं होता आखिर क्या दर्शाता है?यही भावना है जिसके कारण लाख कमियों के बाद भी अपने राष्ट्र से हम जुड़े हैं, और जब जब यह भावना समाप्त होती है तो देश के टुकड़े करती है और मेरे विचार से जिसमें यह भावना नहीं है,वह ह्रदय नहीं पत्थर है.और वो किसी भी क्षेत्र में कितना भी महान हो उसके प्रति कम से कम मेरे ह्रदय में सम्मान नहीं . और आज लेखकों की प्रवृत्ति प्राय यही परिलक्षित होती है कि लेखन कुछ भिन्न हो तो अधिक चर्चित होता है,चाहे वह राष्ट्र के विरुद्ध,या किसी धर्मग्रंथ के विरुद्ध.

के द्वारा: nishamittal nishamittal

आदरणीय वाजपई जी, आपने लेख में गंभीर प्रयास किया और विश्वास भी यही है कि यह प्रयास हिन्दू धर्म के प्रति श्रद्धा का ही प्रतिफल है| आप आयु में मेरे पिता तुल्य हैं अतः २१ बर्ष की अल्पायु में आपसे तर्क करना संस्कारों के विरुद्ध होगा किन्तु विनम्रता से क्षमा चाहता हूँ क्योंकि विषय धर्म से सम्बंधित है अतः मैं यह विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि आपने विद्वानों विचारकों व दार्शनिकों का कितना भी अद्धयन क्यों न किया हो किन्तु आप सनातन धर्म के मूल ग्रंथों की गहराई व विस्तार से अभी तक दूर हैं| आपके लेख में स्वयं के विचारों में ही कई स्थानों पर विरोधाभास है जिसका यहाँ पर उल्लेख करने की आवश्यकता मैं नहीं समझता किन्तु हिन्दू शब्द की आर्वाचीनता के आपके दावे पर पुनर्विचार के लिए के लिए लिंक दे रहा हूँ| www.tripathivasudev.jagranjunction.com "हिन्दू होने का अर्थ" यद्यपि यह लेख मैंने लेख के roop में पर्याप्त विस्तार से नहीं लिखा था वरन fb पर आप जैसे एक शंकालु सज्जन को उत्तर देने के लिए टिप्पड़ी की थी जिसका विस्तार होने से यहाँ डाल दिया| कई उदाहरण छूट जाने के बाद भी आशा है आपको पुनर्विचार के लिए पर्याप्त सामग्री मिल जाएगी.

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1सपा नेतृत्‍व को विचार करने की आवश्‍यकता है कि माया सरकार के खिलाफ उसका आह्वान पार्टी के लोगों से बाहर क्‍यों नहीं निकल पाया ? उससे जन सामान्‍य क्‍यों नहीं जुडा ? क्‍यों वह पार्टी का ही कार्यक्रम हो कर रह गया ? यह मायावती सरकार की जन स्‍वीकार्यता है या फिर सपा नेतृत्‍व की विश्‍वासहीनता ? - आदरणीय बाजपेई जी सादर प्रणाम । आपने उपरोक्त बहुत उचित प्रश्न उठाया है । इसके बहुत से कारण हैं । जनता क्यों सपा के आंदोलनों में सहभागी नहीं बनती है कुछ कारण तो एक दम साफ देखने को मिलते हैं । 1. सपा एक परिवार की पार्टी है । शिवपाल, रामगोपाल, मुलायम, अखिलेश, धर्मेन्द्र यादव इत्यादि । माई -मुस्लिम, यादव गठजोड़ इनकी सत्ता के काम्बिनेशन रहे हैं । सत्ता में आने के बाद यह सिर्फ यादवों की और यादवों के लिये सरकार हो जाती है । 2. सन 2004 में आई बी की रिपोर्ट थी कि इस पार्टी को मिडिलईस्ट से चंदे आते हैं और देने वाले अधिक्तर वे लोग हैं जो अलकायदा और लश्कर को भी चंदा देते हैं । उनका मकसद सिमि जैसे आतंकी संगठन को राजनैतिक संरक्षण देना होता है । 3. उ0 प्र0 की जनता ने इन्हीं सपाईयों द्वारा माननीय उच्च न्यायालय और दैनिक जागरण और अमर उजाला पर किया गया हल्ला बोल भी देखा है । इस हल्ला बोल के पहले हाई कोर्ट में सीआरपीएफ नहीं रहती थी । भारत में पहली बार किसी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने माननीय जजेज़ के चैम्बर में घुस कर तोड़फोड़ की थी । ये वही लोग हैं जिन्होंने दैनिक जागरण और अमर उजाला की प्रतियॉं बहुत से शहरों में जला दी थीं । एक साथ लोकतंत्र के दो स्तंभों पर हथियार समेत जोरदार हमला इन्हीं सपाईयों ने किया था । 4. यूपीए प्रथम सरकार के लिये संसद में बहुमत खरीदने के लिये सपाई रेवती रमण सिंह और अमर सिंह ने जो खेल खेला था उसका सीधा प्रसारण पूरे देश ने देखा था और आज विकीलीक्स ने उसकी भी पुष्टि करदी है । 5. ये वो सत्ता के दल्ले हैं जिन्होंने लोकतंत्र के इतिहास में सबसे घिनौना खेल खेला था और आज जब डीएमके के साथ कांग्रेस के सम्बन्ध बिगड़ने लगे तब ये फिर दलाली के लिये आगे आ गये । 6. अमर सिंह की टेलिफोन टेप की सीडी लगभग हर मीडिया पर्सन के पास होगी । जिन्होंने उन 25-30 टेलिफोन टेप को सुना होगा वो इतिहास के सबसे बड़े दल्ले का खिताब किसी और व्यक्ति को नहीं देना चाहेंगे। 7. गिलानी और मुलायम सिंह में कोयी फर्क जनता नहीं देखती है । एक ने कश्मीर में युवाओं को पैसे देकर भारत की पैरामिलेट्री फोर्स के ऊपर पत्थर फैंकवाये थे तो दूसरे ने निहत्थे कारसेवकों पर मुसलिम वोट के लिये गोलियॉं चलवाई थीं । 8. लखनऊ में गेस्टहाउस काण्ड में मायावती को नंगा करके अपमानित करने के बाद उसको जला कर मार डालने की पूरी कोशिश सपाईयों ने विधायक अतीक अहमद के नेतृत्व में की थी वो तो भाजपा के एक विधायक ने खिड़की तोड़ कर उसकी जान बचा ली नहीं तो मायावती तो कब की जला कर मार दी गयी थीं । औरत कभी अपना अपमान नहीं भूलती है । ऐसे सपाईयों को कौन मानव मानेगा और कौन उनके मानवाधिकार की बात सोचेगा जो अपने ही हिंदू भाईयों के हत्यारे हैं, लोकतंत्र में जिनकी कोयी आस्था न हो, जो बिकने के लिये सदैव तैयार रहते हैं, जिनके आई एस आई से खुले तौर पर सम्बन्ध हों । छोड़िये भी बाजपेई जी नेताओं पापियों को । आज तो विकीलीक्स ने अडवाणी को भी लपेट लिया । यह सब एक ही थाली के चट्टेबट्टे हैं । होली की आपको हार्दिक शुभकामनाएं ।

के द्वारा: kmmishra kmmishra

अपनी खैर मनाएं अंजली जी. आप लोगों से राम राज्य का वादा किया गया था, सोनिया के रोम राज्य में रहते आप लोगों को लज्जा क्यों नहीं आती? ईमाम आप को गाली देता है. स्वयं दास है और आप की आजादी छीनता है. क्या आप को नहीं मालूम कि संविधान ने आप को आजादी का वचन दिया है? ईमामों को दंडित करने के स्थान पर सोनिया ईमामों को वेतन दिलवा रही है. वह भी सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से! (एआईआर, एस सी १९९३, २०८६). जज शीघ्र ही कुमारी माताओं को इनाम देने का आदेश पारित करेंगे. संयुक्त राष्ट्र संघ इसका कानून पहले ही बना चुका है. [मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा. अनुच्छेद २५(२)]. जजों ने मानवता के हत्यारों जेहोवा व अल्लाह को ईश्वर घोषित कर रखा है. कुरान व बाइबल को धर्मपुस्तक घोषित कर रखा है. ईमाम के लिए आप काफ़िर हैं. इस्लाम है तो काफ़िर नही. हम आप के लिए लड़ रहें हैं और आप लोग अपने सर्वनाश की जड़ मस्जिदों और ईमामों को बचाने के लिए हमें प्रताडित कर रहे हैं. ईश्वर से डरिये.

के द्वारा:

आदरणीय वाजपेई जी सादर अभिवादन मेने आपकी रचना पड़ी पड़कर अच्छा लगा और लगना भी चाहिए था क्यों की जिस तरह से शब्द पिरोयेगे गए वह प्रशंशा के काबिल थे इस मामले में भी प्रगति हो रही है कुछ लोग आज भी सत्ता के इर्द गिर्द मडरा कर हित साधन कर ही रहे है पर जो लोग सही सोच लेकर सूरदास की परम्परा अपनाए हुए है "कहा मोको सीकरी से काम" वह आज भी दुखी है और रहेंगे क्यों की आज भी शोषण तो हो ही रहा है. असमान आर्थिक स्थिति का लोग सामना कर ही रहे है और फिर भी साहित्य से जुड़े है और अपना योग दान कर ही रहे है वह बात और है की उनका योग दान सत्ता के हित साधन में ज्यादा और साहित्य में कम कर है. पैसा यहाँ भी बोलता है कुछ लोग जो मीडिया और प्रमुख समाचार पत्रों से जुड़े है उनका हित साधन हो रहा है नई पीडी भी चाहती है की उनके जैसा बना जाए पर दूरियां है वह तो रहेगी उसको सत्ता के गलियारे भर नहीं नहीं पायेगे. फिर भी अच्छा लिखा उसके लिए मुबारकबाद और रचनाये प्रतीक्षित रहेंगी..........? पुनः बधाई.

के द्वारा:

  प्रिय भाई शाही जी,  एक सब से बडी गडबडी राजनैतिक हितों के लिए नौकर शाही का दुरुपयोग है।आईएएस-आईपीएस वाले तो पार्टी कार्यकर्ताओं से बढ कर काम करते हैं। पिछली बार मुलायम जब जोडतोड से मुख्‍यमंत्री बने थे तो उनके समर्थक अफसरों ने ही सबसे बडी भूमिका निभायी थी। बरेली के एक डीआइजी तो बसपा के एक विधायक को उसके घर से धमका कर उठवा कर अपने साथ लखनऊ लेकर गए थे। सपा में शामिल होने के एवज में उस विधायक को राज्‍य मंत्री का दर्जा दिया गया था। जो दारोगा विधायक को घर से लेकर आया था वह जब तक सपा की सरकार रही अपनी पसंद के थाने का इंचार्ज बना रहा। एक गुप्‍ता डीआइजी ने भ्रष्‍टाचार के एक मामले एक थानेदार के खिलाफ कार्रवाई कर दी तो यादव सभा के कुछ लोगों ने डीआइजी की उनके दफ्तर में ही भारी बेइज्‍जती कर दी थी और वह अपमान का घूंट पी कर रह गए थे। अब ये अधिकारी मायावती के लिए नाच रहे हैं।

के द्वारा:

 बिल्‍कुल निशा जी, राजनैतिक शक्ति प्रर्दशन के लिए होने वाले कथित आंदोलनों जिन में जनजीवन ठप किया जाए और सार्वजनिक सम्‍पत्तियों को क्षति पहुंचाई जाए या कानून-ब्‍यवस्‍था अपने हाथ में ले ली जाए ,पर पूरी सख्‍ती से रोक लगायी जानी चाहिए। विरोध प्रर्दशन के लोक तांत्रिक और विधि सम्‍मत तरीकों की ही अनुमति होनी चाहिए। इसके साथ ही यह भी महत्‍वपूर्ण है कि विरोध के स्‍वर उठाने वालों से कैसे निपटा जाए। लखनऊ के डीआइजी ने जो किया वह मानवीय गरिमा का हनन है। पोस्‍ट के साथ दी मात्र तीन फोटो से ही यह सहज अनुमान होता डीआइजी ने कैसा निरंकुश आचरण किया।इस अधिकारी को दंडित कर मुख्‍यमंत्री मायावती जन मानस में अपनी प्रशासनिक सोच का अच्‍छा संदेश दे सकती हैं।

के द्वारा:

पराक्रम जताने और दिखाने का अवसर मिलता ही कब है. किसका क्या काम है , किसकी क्या ज़िम्मेदारी है, पद की क्या गरिमा है, यह सब अब बेमानी हो गया है. कर्तव्य निष्ठा और व्यक्तिनिष्ठा में वरीयता किसे दिया जाय, पूछता कौन है, बताता कौन है. जो भी गड्ड मड्ड दिखाई देता है उसके लिए ज़िम्मेदार और भी है. बीजेपी और कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश को कभी सपा तो कभी बसपा के हवाले छोड़ा, राव और अटल चैन की बंसी बजाने में लगे रहे और प्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी कमज़ोर होती गई.बीस साल हालत यही रही. आज जो सामने है वह कांग्रेस और बीजेपी की देन हैं. दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां है, दोनों की जवाबदेही भी बड़ी है. एक पर भ्रष्टाचार को न रोक पाने की जवाबदेही है तो दूसरे पर भी यदुरप्पा को पोसने का आरोप है. इस भंवर जाल से देश और दोनों निकलेंगे, आइये ऐसी कामना करें.

के द्वारा: krishna gopal sinha krishna gopal sinha

बाजपेई जी, सादर प्रणाम आपका लेख पढ़ा और लेख पढ़कर मैं दुविधा मैं हूँ कि क्या मैं आपके लेख से सहमत हूँ या असहमत ! मैं आपकी इस बात से पूर्णता सहमत हूँ कि DIG साहब ने जिस बर्बरता का प्रदर्शन किया है लोकतंत्र मैं उसकी कहीं जगह नहीं है ! अब बात आती है सपा के प्रदर्शन की, तो उसके बारे मैं मैं ये कहना चाहता हूँ चूँकि मैं उत्तर प्रदेश का वासी हूँ और सपा का शासन मैंने देखा है और उनके सताए हुए आम लोगों मैं से कुछ को तो मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ कि किस प्रकार से उनकी संपत्ति पर कब्जे किये गए ! ऐसे लोग कुशासन के लिए प्रदर्शन करते हैं ये सोच का ही मुझे हंसी आती है ! आपने खुद ही अपने लेख मैं ये प्रश्न उठाया है कि ये आन्दोलन सपा का अकेले होकर क्यों रह गया और पार्टियाँ या आम इंसान इससे क्यों नहीं जुड़ा ! उसकी वजह यही है कि सारे लोग और पार्टीयाँ सपा के चरित्र से अच्छी तरह वाकिफ है, और कोई भी इस भुलावे मैं नहीं है कि ये आन्दोलन आम जन के लिए है बल्कि ये सिर्फ सपा का अपने डूबता जहाज को बचाने और संगठन को एकत्रित कर अगले चुनाव कि तैय्यारी भर है, और उत्तरप्रदेश की जनता नेताओं कम से कम सपा के नेताओं की ऐसी किसी भी मुहिम से दूर ही रहना चाहेगी ऐसी मेरी व्यक्तिगत राय है !

के द्वारा: allrounder allrounder

 धन्‍यवाद भाई श्री रमेश जी,  दर असल उत्‍तर प्रदेश ऐसे निर्वात से गुजर रहा है जहां जनता नहीं सिर्फ सत्‍ता महत्‍वपूर्ण हो कर रह गयी है। चार पांच नसीमुद्दीनों-शशांक शेखरों और इतने ही नौकरशाहों से घिरीं मुख्‍यमंत्री जन सामान्‍य से पूरी तरह से कट चुकी हैं। वह देखती हैं और वही सोचती हैं जो इस घेरे के कलाकार उन्‍हें दिखाते-सोचाते हैं। मुलायम सिंह यादव को जब सत्‍ता में होने का अवसर मिलता है तो उनकी सरकार एक जाति की सरकार हो कर रह जाती है। उस जाति का एक पुलिस सिपाही भी अपने विभाग के आइजी पर भारी पडता है। सपा सरकार जाति विशेष की ही सरकार के रूप में कार्य करती है। और यह यह स्थिति निरंकुशता की हद तक होती है। इसी लिए उनकी जन सामान्‍य में विश्‍वसनीयता नहीं बन पा रही। जातियों के गुणा भाग के खेल में आम आदमी, विकास और कानून-व्‍यवस्‍था के मुद्दे नेपथ्‍य में चले गए हैं।

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मायावती सिर्फ कांग्रेस के गलत नीतियों का नतीजा है.....सिर्फ गाँधी के नाम का दुरूपयोग करके ५० साल तक सत्ता मे रहे और समाज के कमजोर लोगो के लिए कुछ भी नहीं किया और सारी निष्ठां गाँधी परिवार के लिए दिखाई.....और लोगो को मुर्ख बनाया ...इसीलिए राज ठाकरे , बाला ठाकरे , जयललिता , करूणानिधि , ममता , मायावती, मुलायम और अजित सिंह (सबसे बड़ा सत्ता का लालची इंसान ) जैसे लोग मूर्ख लोग सत्ता मे आये......और यह लोग भी वही मूर्खता कर कर रहे है जो कांग्रेस ६० सालो से कर रही है......अगर कांग्रेस ने देश का शासन बिना किसी भेद भाव के किया होता तो आज हम एक विकसित देश होते.....और दुनिया के सामने सर उठा कर खड़े होते.......हर किसी भी नयी रोड , इमारत आदि का नाम सिर्फ गाँधी के नाम से रखा गया....इसीसलिए लोग भी सत्ता मे आने के बाद वही कर रहे है जो कांग्रेस ६० सालो से कर रही है.....

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आदरणीय बाजपेयी जी , सादर अभिवादन कुछ व्यक्तिगत व्यस्ततावश मंच पर ८-१०दिन तक अनुपस्थित थी इसलिए आपके इस लेख पर थोड़ा देर से पहुँच पाई | महाप्राण निराला जी के जीवन साहित्य के बारे में आपके पिछले लेख में काफी कुछ पढ़ा था अब इस लेख में भी आपने बहुत ही महत्त्वपूर्ण व चर्चित प्रसंगों के बारे में उल्लेख किया है सही में निराला जी हिन्दी जगत में ' निराले ' ही थे इतना महान व्यक्तित्त्व सांसारिक माया मोह से बिलकुल विरक्त उनके जीवन प्रसंगों के बारे में विस्तार से बताने के लिए हार्दिक धन्यवाद ! आपके लेख पढने की बहुत उत्सुकता रहती है आशा है जल्दी ही कुछ अच्छा सारगर्भित पढने को मिलेगा....एक बार पुनः धन्यवाद !

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 आत्‍मीय गोपाल जी,  वयस में छोटे-बडे होने का बहुत अर्थ नहीं, और अक्‍सर बिल्‍कुल नहीं, होता है। कुछ अपवादों को छोड दें तो कम उम्र वालों ने ही बडे काम किये हैं। पौराणिक पात्रों राम और कृष्‍ण ने भी कम उम्र में अपनी क्षमताओं का डंका बजाया था। भगवान गौतम बुद्ध, भगवान महावीर, दोनों 28-30 में महा पुरुषार्थ को निकल पडे थे। भगवान ईशा मसीह तो महज 30 वर्ष्‍ा की आयु में 'ईश्‍वर पुत्र' के रूप में माने जाने लगे थे और 33 की उम्र में क्रूसीफाइ हो गए थे। स्‍वामी राम कृश्‍ण परमहंस, स्‍वामी विवेकानंद, स्‍वामी राम तीर्थ, स्‍वामी दया नंद सरस्‍वती समेत कितने ही नाम हैं जो कम उम्र ही ज्ञान पुंज थे। संसार में अपने ज्ञान-वैभव का लोहा मनवा कर आदि शंकराचार्य 32-33 साल में महाप्रयाण कर गए। अमर शहीद चंद्र शेखर आजाद और शहीदए आजम भगत सिंह जैसे क्रांति प्रेमियों ने कम उम्र में देश की आजादी की नींव रखी थी।निराला जी ने भी कम उम्र में ही नाम कर लिया था। भाई जी ,आर्शिवाद देने के योग्‍य नहीं हूं। आपको हृदय से लगा रहा हूं।

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निराला की वर दे वीणा वादिनी कविता से 11 वीं कक्षा में रुबरू हुआ। यह कविता मुझे इसलिए पसंद थी कि मैं इसे अच्‍छी तरह गा लेता था। कई बार कालेज की प्रार्थना सभा में मैने इसे गाया भी था। निराला तभी से मेरे प्रिय कवियों में एक हो गये। इंटर के बाद सन 1978 में जब इलाहाबाद बीए करने गया तो एडमीशन के बाद पहला कदम नागबासुकि, दारागंज में पड़ा। जहां मैने कल्‍पना में निराला को जिया। तब महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, रामकुमार वर्मा, जगदीश गुप्‍त सभी थे। कुछ गोष्ठियों में इन्‍हें सुनने का अवसर भी मिला। निराला की चर्चा भी गाहे बगाहे आ ही जाती थी। मगर कोई तस्‍वीर इससे मेरे दिमाग में नहीं बनी। अलबत्‍ता एजी आपिफस में काम करने वाले मेरे फूफा से उनके कुछ रोचक संस्‍मरण अवश्‍य सुनने को मिले। फूफा जी वर्ष 1960-61 में इलाहाबाद विवि में भूगोल और अर्थशास्‍त्र के छात्र थे। संयोग से दारागंज के इलाके में ही कमरा लेकर रहते थे। उसी दुकान पर वे भी चाय पानी करते थे जहां निराला जलेबी और राबड़ी जीमते थे। उनके बताये मुताबिक हलवाई का रोज का हिसाब नहीं होता था। न हलवाई पैसा मांगता था न कविवर देते थे। एकबारगी कभी पैसे हो गये तो अधिकतम 50 रुपये दे दिया। एक बार कई महीने हो गये कविवर ने कोई सुनगुन ही नहीं ली। हिम्‍मत कर हलवाई के लड़के ने जिसकी उम्र 20-22 साल रही होगी। बकाया का जिक्र कर दिया। जिक्र क्‍या किया तूफान आ गया। कविवर ने जलेबी का दोना फेक दिया, लड़के का कालर पकड़ा और दो चार चांटे भी जड़ दिये। लड़के ने भी जबान दराजी की। कह ही दिया बकाया है तो मांगेंगे नहीं। कविवर ने कहा मैं तो नहीं पूछता कि मैने तुम्‍हारे पास कितना जमा किया। इस घटना के बाद फुफा जी तो अन्‍य छात्रों के साथ सरक लिये। लेकिन बाद में पता चला कि दो घंटे बाद कविवर दुकान में आये लड़के को बुलाया और कहा कि बुरा मत मानना मैने गलत किया ऐसा करना नहीं चाहिए था। हलवाई महोदय भी जब लौटकर कहीं से आये और उन्‍हें घटना पता चली तो अपने लड़के को बुरा भला कहा। इस घटना के बाद कुछ दिन निराला दुकान पर नहीं आये। हलवाई उनके कमरे पर गया और कहा पण्डित जी बुरा न मानिये लड़के ने गलती की आप दुकान पर आना बंद मत कीजिए। इसके बाद निराला उस दुकान पर तभी गये जब बकाया चुका दिया।

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बाजपेयी जी, महाशिवरात्रि पर आदि गुरु रूप शिव को नमन के साथ संवाद आगे बढाते हुए... जीवन में बहुत कुछ होता है...यदि उस को अपनी पूरी निष्ठा के साथ, पूरे पराक्रम के साथ जियें तब हमारी विवशता के साथ साथ जगत की एकाकारता भी प्रकट होने लगती है... दिखता है कि कहीं कुछ अलग सा सम्बन्ध है..., व्यक्ति का जगत से, जीवन के युग्मों का दर्शन होने लगता है, धूप छाँव, हार जीत, इत्यादि, एक मंद स्मित की क्षमता उत्पन्न होती है... फिर सही कहा आपने, त्यागे तो क्या ... अहम अपना... और उससे बड़ा है भी क्या जिसके त्याग से ब्रह्म साकार होता है... ऐसे में यदि प्रवाह के स्वीकार रूप में सहनशीलता हो उस सबके के प्रति जो हो रहा है जीवन में अनायास ही , तब , निश्चय ही दृष्टि उत्तपन्न हो जाती है संसार के पार जाने की...अन्यथा यह आदिहीन जन्मों की यात्रा मुक्ति की यात्रा प्रारंभ न होने तक अंतहीन भी लगती है ... पुनः एक सुंदर संवाद के लिए आभार सहित...महाशिवरात्रि का आनंद आ गया...

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    राजीव जी, आभारी हूं आपके आत्‍मीय उत्‍तर के लिए। हां मिल जाती है स्‍वतंत्रता .... से विचार करने का नया आधार मिलता है। जहां तक मैं समझ पा रहा हूं ''पूरी गहराई से जीते हुए'' का संबंध स्‍व के या अनुभूतियों के विस्‍तार से है। यहां उद्यम-पराक्रम आ जाता है। मैं इसी निष्‍‍कर्ष-बिंदु पर आ टिका हूं कि अपना वश नहीं चलता। आपने वश में , अपने को इकाई के रूप में महसूस करने पर, कुछ भी नहीं होता। प्रतीक्षा-विवश होने के अतिरिक्‍त कुछ नहीं कर सकता। वहां पुरुषार्थ कौशल की गति नहीं है। शायद इसी विवश भाव होने के चलते दिशा-मंजिल नहीं पा रहा।  त्‍यागने के लिए हमारे पास एक अहं के अलावा होता ही क्‍या है ?  परतुत्र जन्‍मों की अनंत धारा को अजस्र भी तो कह सकते हैं?

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   भाई राजीव जी,  प्रयाग से आप का जुडाव जान अच्‍छा लगा। प्रयाग-प्रेमी मैं भी हूं । गृह जिले फतेहपुर से इंटर के बाद इलाहाबाद विश्‍व विद्यालय में एडमीशन लिया था। व्‍यवस्थित बचपन से ही नहीं रहा। इस लिए इलाहाबाद में भटकाव में ही 5- 6 साल कट गए। वहां से अपने गांव असोथर चला गया। गांव- गरीबी, जातिवाद-शोषण, पिछडापन ,पुलिस की लूट, राजनीति करीब से देखा। प्रयाग रहते लिखता तो नहीं था, वैसे अधि‍क लिख नहीं पाता हूं, लेकिन साधु-संन्‍यासियों और साहित्‍यकारों-लेखकों की गणेश परिक्रमा खूब करता था। इस लिए इन्‍हें देखने-जानने के सुअवसर खूब मिले। बाद में जब नौकरी करने की मजबूरी आयी तो इलाहाबाद में ही किसी अखबार-पत्रिका में करने की अभिलाषा थी। काल -विपाक देखिए कि कोलकता, गुवाहाटी, कानपुर, बरेली , हल्‍द्वानी(नैनीताल) और गोरखपुर  पर चहेता प्रयाग नहीं मिला। बंधे-बने रास्‍तों से न चलने की वजह कमोबेश जीवन के हर क्षेत्र को देख लिया है और अब ठहराव की ओर हूं। आपकी ''मशीनों को स्वचालित बनाने के बाद मनुष्य की स्वतंत्रता बड़ी अनूठी लगती है !'' बात बडी अर्थपूर्ण लगी। लगता है वस्‍तुत: क्‍या मनुष्‍य कभी स्‍वतंत्रता-नभ का अनुभव कर पाता है ? शायद हम स्‍वतंत्रता की तडफडाहट में परतंत्रता ओढे रह जाते हैं। प्राय: समाज बडा क्षुद्र स्‍वार्थी और क्रूर लगता है। निराला को यही अधिक देखने को मिला। उनके उन्‍नाव ने भी जीवन काल में उन्‍हें यही तो दिया। बाद में कालेज-पार्क वगैरह के नामकरण से क्‍या होता है। प्रयाग साहित्‍यकारों- लेखकों का तीर्थ रहा है। वहां तो निराला पर कुछ ठोस होना ही चाहिए।

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 प्रीति जी,  निराला अपने क्रांतिदर्शी विचारों की दृष्टि से कबीर के अधिक निकट थे। जन्‍मना बडे फकीर   थे। उनका जीवन देखिए। बचपन मां की स्‍नेह-छाया से वंचित।पढाई छूटी जहां जन्‍मे-बढे वह मिदिनापुर छूटा। 16 साल में शादी हुई। चार साल बाद ही दो छोटे बच्‍चों को छोड प्रियतमा पत्‍नी का मर्मांतक विछोह हो गया। जाति-समाज के कन्‍नौजिये और संपादक ठुकराते तो प्रकाशक मजबूरी का फायदा उठा चूसते रहे। बेटी का विचित्र ब्‍याह अलग बडी कहानी है। शदी के दो बाद ही बेटी का निधन। अभाव में उसका इलाज न करा पाने की पीडा। युवावस्‍था में विधुर होने के बावजूद पुर्नविवाह न करने का संकल्‍प। स्‍वाभाविक सेक्‍स-फ्रस्‍टेशन। इस सबके बावजूद सुविधा के लिए संस्‍कारों से समझौते न करना। हार न मानना। राष्‍ट्चेता होने का धर्म निभाना। इनके बावजूद दूसरा महत्‍वपूर्ण पक्ष है उनका अध्‍यात्‍म साधक होना। उन्‍हों ने विधिवत योग साधना की थी। हनुमान भक्‍त थे और श्री राम को तुलसी की तरह सहज समीप पाते थे।

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धन्‍यवाद बृजेश जी, निराला जी वेदांत और योग दर्शन में निष्‍णात थे। यद्यपि उन्‍हों विधिवत यौगिक साधना की थी लेकिन भक्ति में उनकी अधिक आस्‍था थी। गोस्‍वामी तुलसी दास की तरह उन्‍हों भक्ति को ही अधिक महत्‍व दिया। 'राम की शक्ति पूजा' से यह स्‍प्‍ष्‍ट है। निराला को नजदीक से जानने वालों के अनुसार निराला ने संन्‍यासियों से गेरुए वस्‍त्र धारण कर कुछ वर्षों तक दक्षिणेश्‍वर काली मंदिर में रहे थे।  वह स्‍वयं को भगवान राम कृष्‍ण परम हंस का प्रजापुत्र और नया विवेकानंद भी कहने लगे थे।  कुंडलिनी उत्‍थापन क्रिया में असावधानीवश वह साधना के पहुंचे हुए स्‍तर से च्‍युत हो गए थो। उनकी सीजोफ्रीनिया्( मन: विक्षेप) की सी स्थिति के लिए यही उत्‍तरदायी था।  कहा जाता है कि योग साधना में कुछ कमी हुई तो लेने के देने पड जाते हैं। शक्तिपात से साधक असामान्‍य हो जाता है।

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बाजपेयी जी, एक छोटे से बालक के रूप में आया था प्रयाग.... फिर बहुत कुछ सीखा वहां. सरस्वती घाट पर सुबह सवेरे बैठ कई रचनाएं लिखीं और किले की यमुना के पानी में झुकी दीवार पर बैठ चिलबिल भी खाए. धर्म की पहली व्याख्या माघ मेले में ही सुनी ... बहुत पावन है वह धरती...अब दूर हूँ तो ज्यादा महसूस होता है . प्रयाग से कानपुर, और कानपुर से विभिन्न स्थानों पर होता हुआ आजकल बड़ौदा में हूँ... तकनीकी कार्य करता हूँ, पर लेखन मेरी जीवनी शक्ति है, मशीनों को स्वचालित बनाने के बाद मनुष्य की स्वतंत्रता बड़ी अनूठी लगती है ! ... कुछ दिनों पूर्व उन्नाव गया था एक कवि सम्मलेन में...निराला को याद करने वाले वरिष्ठ कवियों से मिलने का सौभाग्य मिला...एक अलग तरह कवि लोग...फक्कड़, मस्त - वृद्ध, युवा - मिले उन्नाव में...वह कार्यक्रम भी एक सड़क के किनारे मैदान में शामियाना लगा कर किया गया था, लोगों की भीड़ पंडाल के बाहर सड़क पर भी जमा थी...देर रात और फिर सुबह ४ बजे तक साहित्य प्रवाहित होता रहा निराला के उन्नाव में ...तो निश्चय ही निराला की एक झलक मिली वहां भी ....

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आदरणीय सर, सादर प्रणाम। जब महादेवी जी महा कवि की याद में रो पडीं आपका लेख मनोयोग से पढने के बाद मैने महसूस किया कि महाप्राण को याद करने और उनसे जुडे संस्‍मरणों को जन जन में पहुंचाने का इससे बेहतर तरीका कुछ हो ही नहीं सकता। आपके के इस लेख को पढने के बाद पाठक के मन में न केवल हिन्‍दी साहित्‍य की इस महान विभूति के प्रति श्रद़धा पैदा होगी बल्कि ऐसा प्रयास लोगों में साहित्‍य के प्रति अनुराग पैदा होगा, जो बेहतर समाज निर्माण के लिए सबसे ज्‍यादा जरूरी है। बचपन से ही साहित्‍यलेखन और पठन पाठन की अभिरुचि की वजह से मेरे जिज्ञासु मन में भी छायावादी कविता की इस महान विभूति के प्रति काफी लगाव पैदा हो गया था। निराला साहित्‍य को पढने के बाद मुझे यही लगा कि कबीर के बाद हिन्‍दी साहित्‍य में जनकवि कहलाने के लायक सिर्फ निराला जी ही थे। संवेदना के धरातल पर निराला जी से नजदीकी ही थी कि सन 1971 में आकाशवाणी लखनउ की तरफ से इलाहाबाद में आयोजित बाल कवि सम्‍मेलन में मैने भाग इस लिए लिया कि वहां मुझे महादेवी वर्मा जी से मिलने का अवसर मिलेगा। यह हमारा सौभाग्‍य था कि उस कार्यक्रम का उद़घाटन महादेवी जी से ही कराया गया। मंच पर उनके उद़बोधन के दौरान उनसे निराला जी के बारे में संस्‍मरण सुनाने का आग्रह किया गया तो वे कुछ देर तक चुप्‍पी साधे शून्‍य में निहारती रह गयीं। इसके उपरान्‍त उन्‍होंने जो संस्‍मरण सुनाया उसे मेरे जैसा व्‍यक्ति अपनी वैचारिक थाती मानता है। बकौल महादेवी वर्मा- राखी के त्‍यौहार पर निराला जी राखी बंधवाने मेरे घर जरूर आते थे। रिक्‍शे से उतरकर बाहरी दरवाजे की कुण्‍डी खटखटाने पर मै दरवाजा खोलती तो वे तुरन्‍त मुझसे दो रूपया मांगते और उसके बाद ही उनका मेरे घर में प्रवेश होता था। एक बार मैने उनसे हिम्‍मत करके पूछ लिया कि भइया आप दो रुपया ही क्‍यों मांगते हैं, उन्‍होंने जवाब दिया कि एक रुपया रिक्‍शे वाले को देने के लिए और राखी बंधवाने के बाद एक रुपया तुम्‍हें देने के लिए। महादेवी वर्मा की आवाज इतना सुनाते- सुनाते हिचकियों में तब्‍दील हो गयी।

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 भाई राजीव जी, आप भी प्रयागी रहें हैं जान कर अच्‍छा लगा। निराला जी प्रखर राष्‍ट्वादी और सशक्‍त स्‍वतंत्र भारत के हिमायती थे। भाषा के रूप में हिंदुस्‍तानी के नहीं अपितु ऐसी शुद्ध हिंदी के समर्थक थे जिसकी जडें संस्‍कृत के समीप हों। हां, बैशवारी, अवधी, भोजपुरी और अन्‍य देशज शब्‍द उन्‍हें उदारता से स्‍वीकार्य थे। निराला बंगाल में पैदा हुए-बढे। पैतृक जिले उन्‍नाव में रहे। फिर कलकत्‍ता में रहे और प्रयाग में जमे।  गोस्‍वामी तुलसी दास की तरह समन्‍वयवादी थे। राम की शक्ति पूजा में उनकी प्रस्‍तुत साधना प्रक्रिया में सगुण,  निगुर्ण, शैव, शाक्‍त और वैष्‍णव सभी मतों का सम्मिलन है। कम से कम इलाहाबाद में ते उनके नाम पर पीठ वगैरह बननी चाहिए। महादेवी जी को भी उसमें जोडा जा सकता है। कृपया ‍स्‍मरित चित्रों को जोडने का कष्‍ट करें ।अनुग्रहीत हूंगा।

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 प्रिय भाई शाही जी,  निराला जी संबंधी पिछले लेख '' मैं कविता का राष्‍टपति हूं'' पर आपकी अनुग्रही-प्रतिक्रिया पर अवकाश पर जाने की वजह से जवाब नहीं दे पाया था। मुझे विश्‍वास था कि आप इसका अन्‍यथा नहीं लेंगे।   निराला जी को अमूमन लोग एक बडे और औघड कवि के रूप में ही देखते हैं। निश्चित रूप से कवि के रूप में उनका फलक आकाशी है। लेकिन, इससे भी महत्‍वपूर्ण उनके ब्‍यक्तित्‍व का महाप्राणी पक्ष है। महापौरूषी निरला कैसे एक साथ नियति-भाग्‍य और सामाजिक कुरुढियों से टकराते हैं और कैसे वह काव्‍य चेतना से राष्‍ट्वादी हुंकार भरते हैं, यह जानना जरूरी है। देश के वर्तमान परिदृश्‍य में इसका सम्‍यक प्रसार विशेष रूप से समीचीन है। ऐसे आख्‍यान जनचेतना बनाने में सहायक होते हैं। आप देखिए कि निराला महात्‍मा गांधी की अहिंसात्‍मक नीतियों को कतई पसंद नहीं करते ।वह बाल गंगाधर तिलक की गर्मदली नितियों के सर्मथक थे। आवश्‍यकता पडने पर अंग्रेजों के बल प्रयोग करने के पक्षधर थे। स्‍वयं कसरत-कुश्‍ती प्रेमी थे और विवेकानंद की तरह युवकों को बलिष्‍ठ बनने को कहते रहते थे। उन्‍हों ने गांधी जी की नीतियों को समझने के लिए उनसे मुलाकात भी की थी लेकिन सहमत नहीं हो पाये। बल्कि आजादी आंदोलन के गांधी-तरीके से वह चिढने के स्‍तर तक असहमत थे। इसके बावजूद वह गांधी की खुली आलोचना करने से बचते थे। निराला गुरुदेव टैगोर से बहुत प्रभावित थे लेकिन टैगोर ने स्‍वदेशी वगैरह की नीतियों को लेकर गांधी जी की खिंचाई की तो निराला ने चरखा को स्‍वदेशी का सबसे बडा प्रतीक बताते हुए टैगोर पर हमला बोल दिया।   आपने सही कहा कि आज का माहौल बिल्‍कुल भिन्‍न है। निराला -कबीर जैसे लोग सदियों में होते हैं। और, सदैव प्रासंगिक बने रहते हैं।

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वाजपेयी सर, प्रणाम! महाकवि निराला जी के लिये महामानव का अलंकरण ही सटीक होगा । आपकी प्रबुद्ध लेखनी के माध्यम से उनके जीवन के ऐसे पहलुओं और वृत्तांत से अवगत होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, जो कदाचित उनकी स्मृति में औपचारिकतावश जन्म और पुण्यतिथियों में लिखे-बोले जाने वाले अभिलेख तथा गोष्ठियों के माध्यम से एक साथ प्राप्त हो पाना संभव नहीं है । भारतेन्दु हरिश्चंद सहित कुछ अन्य साहित्य पुरुषों के मध्य भारतीय इतिहास में युग प्रवर्त्तक कवि कहलाने का अधिकार यदि किसी को है, तो वह निराला ही हो सकते हैं । निराला जी यदि कवींद्र रवींद्र नाथ ठाकुर सरीखे सुविधा सम्पन्न परिवार से रहे होते, तो संभवत: उनका मखौल उड़ाने का दुस्साहस भी बुद्धिजीवी समाज नहीं कर पाता । सच ही कहा है कि भगवान भी पजावे के उसी खंड से ईंट उखाड़ते हैं, जहां से ईंटें पहले से ही उखड़ी हुई हों । अभावों के बीच भी कभी अपने आत्मसम्मान से समझौता न करने वाले महाकवि निराला को शत शत नमन ।

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 मुनीश जी,  तीसरा  'परिमल'  का यह गीत भी अवश्‍य पढिए । इससे पता है कि निराला कितने बडे साधक-दार्शनिक थे। लगता है वेदांत -सूत्रों की उन्‍हे सहज अनुभूति हुई हो-     मन बुद्धि और अहंकार का लय प्रलय है    ब्‍यष्टि और संमष्टि में नहीं भेद   भेद उपजाता है भ्रम, माया जिसे कहते हैं  जिस प्रकाश के बल से सौर ब्रहृमांड  को उदभासमान देखते हो  उससे नहीं वंचित एक भी मनुष्‍य भाई  ब्‍यष्टि और समष्टि में समाया वही एक रूप   चिदघन आनंदकंद आती जिज्ञासा जिज्ञासु के मन में जब भ्रम से बच भागने की इच्‍छा जब होती है चेतावनी जब देती चेतना कि छोडो खेल जागता हे जीव तब योग सीखता है वह योगियों के साथ रह स्‍थूल से वह सूक्ष्‍म, सूक्ष्‍मातिसूक्ष्‍म हो जाता है  मन बुद्धि अहंकार से लडता है जब  समर में भी दिन दूनी शक्ति उसे मिलती है  क्रम क्रम से देखता हे अपने ही भीतर वह  सूर्य चंद्र ग्रह तारे और अनगिनत ब्रह्मांड भाव  देखता है स्‍पष्‍ट तब  उसके अहंकार में है समाया जीव जग  होता है निश्‍चय ज्ञान, ब्‍यष्टि तो समष्टि से अभिन्‍न है  देखता है स्रष्टि स्थित प्रलय का कारण कार्य भी है वही   उसकी ही इच्‍छा रचना चातुर्य में , पालन संहार में  अस्‍तु भाई वे हैं सब प्रकृति के गुण  सच है- तब प्रकृति उसे सर्वशक्ति देती है  भ्रष्‍ट सिद्धियां, वह सर्वशक्तिमान होता है  इसे भी जब छोडता है वह  पार करता रेखा जब समष्टि अहंकार की  चढता है सप्‍तम सोपान पर  पगलय तभी होती है, मिलता वह अपने सच्चिदानंद घन रूप से ।    

के द्वारा: sd vajpayee sd vajpayee

 आद. श्री खुराना जी,  आप ने सही कहा कि आजकल की राजनीति  अच्‍छे लोगों का ख्‍याल नहीं रखती। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्‍य में ऐसी प्रत्‍याशा भी नहीं होनी चाहिए। हां, समाज के समझदार तब‍के से ऐसी पहल न होना जरूर दुखद है। हम प्रभावी कडी बन यदि अपनी गौरवमयी संस्‍कृति ,महापुरुषों, कवियों, कलाकारों, दार्शनिकों,संतों, मनीषियों से अगली पीढियों को जोड जाते हैं, तो देश-समाज के प्रति अपनी कर्तव्‍य-भूमिका का निर्वहन कर जाते हैं। निश्चित रूप से निराला गोस्‍वामी तुलसी दास जी के बाद हिंदी के सबसे चमकीले सितारे हैं। उनके साहित्‍य और जीवन दर्शन को सीमित साहित्यिक दायरे से निकाल जन से जोडने की जरूरत है।

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बॉजपेय़ी जी य़ह भी देख लीजिय़े-भरम दूर होजायेगे- -------भारतवर्ष को प्राचीन ऋषियों ने "हिन्दुस्थान" नाम दिया था जिसका अपभ्रंश "हिन्दुस्तान" है। "बृहस्पति आगम" के अनुसार: हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥ अर्थात, हिमालय से प्रारम्भ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है। ------हिमालय के प्रथम अक्षर "हि" एवं इन्दु का अन्तिम अक्षर "न्दु", इन दोनों अक्षरों को मिलाकर शब्द बना "हिन्दु" और यह भूभाग हिन्दुस्थान कहलाया। हिन्दू शब्द उस समय धर्म की बजाय राष्ट्रीयता के रुप में प्रयुक्त होता विदेशियों ने इस शब्द को धर्म के सन्दर्भ में प्रयोग करना शुरु कर दिया। ----शब्द कल्पद्रुम : जो कि लगभग दूसरी शताब्दी में रचित है ,में मन्त्र है............. "हीनं दुष्यति इतिहिंदू जाती विशेष:" अर्थात हीन कर्म का त्याग करने वाले को हिंदू कहते है।

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आदरणीय वाजपेयी जी गनपत के साथ जो कुछ हुआ वह ज्यादा highlight नहीं हुआ, वह आम आदमी ठहरा . महाराष्ट्र में addl collector के साथ जो जघन्य काण्ड हुआ सारी दुनिया अवगत हो गयी हर तरफ से भर्त्सना हो रही है , मामला बड़े अधिकारी का है, यद्यपि न्याय मिलेगा इसमें संदेह है. गनपत के बारे में लिखने वाले कम हैं पर आवाज बुलंद है तो दूर तलक जाएगी और जिनके कान बहरे हैं उनको भी कार्यवाई करनी होगी बात सिर्फ एक गनपत की नहीं , समाज और व्यवस्था में लगे कोढ़ की है, हम कब तक झूठे आडम्बरों तक धर्म और संस्कारों को परिभाषित करते रहेंगे , हम कब समझेंगे की कर्म ही धर्म है, मानव का मानव के प्रति , मानव का पशुओं के प्रति, समाज के प्रति, देश के प्रति, स्टुडेंट्स का teachers के प्रति, नेता मंत्रिओं अधिकारिओं का जनता और देश के प्रति, कर्म की यूं तो परिसीमा काफी व्यापक है पर संछेप में मेरा अल्प ज्ञान यही कहता है इंसान अपने हर रिश्ते को इमानदारी और निष्ठा से निभाए तो उसका धर्म पूरा हो अत है. यानी धर्म का मतलब है कर्म, ना की आडम्बर . आपके अगले लेख का इंतज़ार है,

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नमस्कार वाजपेयी जी एकता में अनेकता और अहिंसा जैसा की आपने बोला है की हिन्दू धर्म में नहीं बल्कि यह भारत भूमि में थी तो आपको बता दू की ये चीजे कोई फसल नहीं है की इस भूमि पर ये अपने आप उग आई बल्कि ये तो हमारे धर्मं की विचारधारा है और रही बात मूर्तिपूजा की तो इस बात पर बहस करना ही बेकार है क्यूंकि हम जब भी किसी की आराधना करते है या पूजा करते है तो हमारे मन में उस भगवन या उस महान शक्ति की एक तस्वीर हमारे मन में जरुर रहती है और उसे ही कोई अदृश्य रख कर पूजा करना पसंद करता है तो कोई मूर्ति बना कर अगर कोई ये कहे की मूर्ति पूजा बेकार है नहीं करना चाहिए तो मै तो कहूँगा की पूजा या इबादत करना ही बेकार है आखिर मूर्ति पूजा की बात हम आज के समाज में कैसे उठा सकते है सभी अपनी अपनी भावनाओ और रिवाजो के साथ रहने के लिए आजाद है और इस सवाल पर की मूर्ति पूजा जायज है या नहीं सवाल करने वाला तो अपने अज्ञानता को प्रदर्शित कर रहा है आखिर हम मध्य युगीन समाज में अचानक ही कैसे जा सकते है अगर कुछ बुरा लगे तो हमें क्षमा कीजियेगा नमस्कार

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असहमति के साथ ही लेख का सहभागी बनने के लिए आभारी हूं श्री अक्षय कुमार ओझा जी। आपने अच्छे से अपनी अभिब्यक्ति । विचार भिन्नता हो सकती है। एक पक्ष मैं ने रखा दूसरा आपने। एक बात है कि हिंदू शब्द संस्कृत में है ही नहीं, न ही संस्कृत के किसी प्राचीन ग्रंथ में फिर ‘हिंसायाम् दूयते स हिंदू‘ की बात कहां से आ गयी! दूसरे , वैदिक ग्रंथों में मूर्तिपूजा नहीं थीद्व यह भी सही है स्वामी दयानंद सरस्वती ने वेदों के आधार पर ही मूर्तिपूजा पर हमले किये थे। हिंदू एकता में अनेकता के लिए नहीं भारत भूमि इस के लिए विख्यात है। यह गुण भारत की माटी का है! हिंदू का इतिहास ही अर्वाचीन है। आज ही इसी जंक्षन पर श्री अद्वितीय1967 जी की एक पोस्ट ‘हिंदुत्व धर्म नहीं‘ आयी है। इसे भी देखिएगा

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वाजपेयी जी सादर प्रणाम आपने जो लेख यहाँ लिखी है उससे मै बिलकुल भी सहमत नहीं हु | चूँकि हिन्दू धरम के साथ सबसे बड़ा येही दुर्भाग्य रहा है की इसके अनुयायी ही इसके साथ वो काम करते है जो की एक बिधर्मी को करना चाहिए | आपको समझना चाहिए की हिन्दू धरम वो धरम नहीं है जिसमे किसी को मजबूर किया जाये की आप ये करो आप वो करो ये भी इसलिए की हिन्दू धर्मं एक धर्मं है ना की धर्मं का साम्राज्यवादी रूप हम हिन्दू अपने अनेकता में एकता के लिए बिख्यात है हिंसायाम दूयते या सा हिन्दु \" हम अहिंसा और शांति के राही है हमें भला क्यों ये जरुरत आन पड़ी की हम सबको ये कहते फिरे की आप भी वही करो जो बाकि हिन्दू करते है खैर इसमें भी आपका और हमारा दोष नहीं है हम तो वही बोलेंगे न जो हमें पढाया जायेगा हमारे इतिहास को तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता है जैसे की आर्यों का मूल निवास भारत न होकर यूरोप था और सनातन धर्म कभी मूर्तिपूजक था ही नहीं कई सज्जन के मुह से तो मैंने ये भी सुना है की ये पुराना इस्लाम धर्मं है लेकिन ये सब सुनने के बाद ये गर्व होता है की आखिर क्यों सभी किसी न किसी बहाने हमारे साथ जुडा रहने चाहते है | पुराने ज़माने में जब की किसी भी राजपरिवार का धर्मं ही पुरे राज्य का धर्मं होता था उस समय भी यहाँ कोई बाध्यता नहीं थी की आप वही धर्मं पालन करे जो हम कर रहे है और हमारी इसी उदारता को हमारी कमजोरी समझ ली जाती है आप दुनिया के किसी भी धर्मग्रंथ को या धर्मं सिदान्त को ले लीजिये और वो हमारे वेद ग्रंथो की ही कॉपी लगेगी लेकिन वो वक्त कब आएगा जब हम दुसरो के इतिहास छोड़ कर कुछ अपने ग्रंथो से भी सिख लेंगे वैसे आप बहुत अनुभवी और ज्ञानी है और मै तो अभी अपने जीवन के पहले पड़ाव में हूँ अगर कुछ गलती हो गयी हो तो कृपया माफ़ कीजियेगा नमस्ते

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 जी, सही है, सनातन धर्म में मूर्ति पूजा नहीं थी। गीता भी मूर्ति पूजक या बहु देव-देवियों की पूजा की समर्थक नहीं है। सनातन धर्म एकेश्‍वरवाद, परम सत्‍ता एक है, उसका कोई समकक्ष या साझीदार नहीं है, की विचारधारा का जनक और पोषक है। और तो और , तमाम  देवी-देवताओं को समेटे हुए गोस्‍वामी तुलसी दास जी की राम चरित मानस भी पूर्णत: एकेश्‍वरवादी है। हर समूह का अपना देवता-देवी है, यह कहना सही नहीं है। कई लोग एक निराकार ईश्‍वर, कई अमूर्तिपूजक एक साकार ईश्‍वर और कई लोग साकार-निराकार दोनों को मानते हैं। विभिन्‍न देवी-देवता परा शक्तियों की प्रतीक तो हें लेकिन परमेश्‍वर या ब्रह्म की समानार्थी नहीं। राम-कृष्‍ण दो सत्‍तायें नहीं , प्रत्‍युत एक ही सर्वोच्‍च्‍ा सत्‍ता के नाम-रूप हैं।

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 प्रिय भाई श्री मुनीश जी,  आपका कथन सत्‍य है कि नाम बदल देने प्रश्‍नगत बातों पर क्‍या फर्क जाएगा। यह भ सही है कि मेरे सनातन धर्म के नाम के प्रति अति आग्रह दिखाने से कोई नाम परिवर्तन नहीं हो जाएगा। लेकिन, संभव कि कुछ लोग इन अंतर्विरोधों -हिंदुओं में ही एक वाम पंथी हिंदू धर्म को दक्षिणपंथी व प्रतिक्रियावादी कहते हुए अलग राह पकडता दिखता है ,और साधु-संत सनातन धर्म के जयकारे करवाते हैं- पर शायद कुद सकारात्‍मक विचार करें। यदि ऐसा होता है तो निश्चित रूप से अपने धर्म स्‍वरूप को और प्रखर बनाने में सहायक होगा। मतभेद हो सकते हैं और कुछ भाइयों के तीखे मतभेद दिखे भी हैं, लेकिन ब्‍यक्तिगत रूप से मुझे सनातन धर्म अधिक सहज, स्‍वीकार्य, व्‍यापक और उदात्‍त लगता है। एक बडी मान्‍यता वाले मंदिर में एक अग्रणी कथावाचक के प्रवचन कार्यक्रम में पिछले माह जाने मुझे सुअवसर मिला। वहां कुछ साधु-संन्‍यासी भी थे। 'सनातन धर्म की जय हो' यही जयकारा हुआ। इसके पहले भी कई बडे धार्मिक आयोजनों में जाना हुआ है ,वहां भी 'सनातन धर्म' का उदघोष ही सुनता रहा। इसी से लिखने का विचार आया। हां, प्रासंगकिता धर्म की तो आज भी है और आगे भी रहेगी। आपने मेरे लिए एक साथ कई विशेषण लगा दिये हैं। मेरा अनुरोध है कि एक बार पुन: लेख तटस्‍थ दृष्टि डाल लें और जो असंगत -अतिरेक लगे उसका दोष परिष्‍कार कर दें।

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आदरणीय परम श्रद्धेय वाजपेयी जी मैं इस विषय की गहराई में नहीं जाना चाहता की \'हिन्दू धर्म\' शब्द मुखोटा है अथवा नहीं. आपकी बात मान भी ली जाए (हालाँकि मैं मिश्राजी से ज्यादा सहमत हूँ ) तो क्या हिन्दू धर्म के अध्यात्मिक विचार में अंतर आ जाएगा उसकी अवधारणा बदल जायेगी, मैं आपके लेख की अंतिम पंक्ति पर आता हूँ अंतर्विरोधों को मिटाने के लिए हमें इस शब्द से मुक्ति पानी चाहिए की नहीं....... क्या india \'भारत\' शब्द का मुखोटा है यदि हाँ तो क्या इसको वापस भारत कर देने से इतिहास बदल जाएगा......भ्रष्टाचार कम हो जाएगा, क्या बम्बई का नाम मुंबई कर देने से वहां कुछ फर्क पड़ा. (मैं सिर्फ शब्दों के विषय में लिख रहा हूँ धर्म के विषय में नहीं) जो अंतर्विरोध जनमानस के मन में हैं वो किसी धर्म के नाम बदल देने से कैसे दूर हो जायेंगे (मैं नाम बदलने का जिक्र इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि आपने इस शब्द को शाब्दिक दासता कहा है, इसका मतलब जो अंतर्विरोध हैं वो शब्दों के हेर-फेर से ठीक हो जाने चाहिए.) वास्तव मैं अल्पबुद्धि इस लेख का आशय नहीं समझ पाया हूँ की ये क्यों लिखा गया है? ये समझाने के लिए की \'हिन्दू धर्म\' शब्द कहाँ से शुरू हुआ या ये बताने के लिए की इस शाब्दिक दास्तावाले शब्द को बदलकर कोई नया नाम या वाही पुराना नाम दे दिया जाए.......?

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आदरणीय श्री श्रीनिवास जी, गहन बेचारगी समर्पण की आवश्‍यक आधार -भूमि है। जब लगे कि मेरे किये धरे कुछ नहीं होगा। उद्यम-पराक्रम की परम तत्‍व तक कोई पहुंच नहीं है, तब बेचारगी ही उसका फलित होती है। लेकिन केवल इस बेचारगी से ही कोई काम नहीं बनने वाला। बेचारगी घनीभूत हो, सनम से मिलन की, मालिक से सामीप्‍य की, परमेश्‍वर के दर्शन की, परम रहस्‍य की गुत्‍थी सुलझाने की , सत्‍य के साक्षात्‍कार की द्वंदातीत हो एकाकार होने की उद्दाम प्‍यास और उत्‍कट तडप बढे और ''उसकी कृपा'' भी हो जाए तब काम बने। गीता में भगवान कहते हैं- अनन्‍याश्चिन्‍तयन्‍तो मां ये जना: पर्युपासते, तेषां नित्‍याभियुक्‍तानां योगक्षेम वहाम्‍यहम। जो अनन्‍य भक्‍त भली भांति मेरा चिंतन करते हुए मेरी भली भांति उपासना करते हैं, मुझ में निरंतर लगे हुए उन भक्‍तों का योग(अप्राप्‍त की प्राप्ति) ,क्षेम(प्राप्ति की रक्षा) मैं वहन करता हूं। बेचारगी के बिना उन्‍मुखता नहीं होगी, उत्‍कटता के बिना अनन्‍य समर्पण -एक निष्‍ठा या एक बुद्धि नहीं होगी और इस सब के बावजूद बिना उसकी कृपा के स्‍थैर्य नहीं रहे्गा। मैं गोस्‍वामी तुलसी दास जी को महान दार्शनिक-संत मानता हूं जो तमाम साधन-चिंतन करते हुए '' पायउं परम विश्राम'' कहने की अवस्‍था तक पहुंचे। वह भगवान शंकर के मुखारविंद से कहलाते हैं- उमा कहउं में अनुभव अपना ,सच हरि भ्‍ाजन जगत सब सपना। सो नर इंद्रजाल नहिं भूला , जा पर होइ सो नट अनुकूला। कुछ अन्‍य प्रसंगों के कथन - नट मरकट इव सबहि नचावत , राम खगेस बेद अस गावत। नट इव कपट चरित कर नाना , सदा स्‍वतंत्र एक भगवाना। चरित रामके सगुन भवानी ,‍ तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी। अस विचारि जे तग्‍य विरागी, रामहिं भजहिं तर्क सब त्‍यागी। देखिए इन सब में बेचारगी ही दिखती है। जब वहां तक बुद्धि-वाणी और इंद्रियों के बल की पहुंच ही नहीं है, तो बेचारगी ही आएगी। स्‍वीकार भाव पर आकर रुक गए- इसका तात्‍पर्य नहीं समझ पा रहा हूं। कुछ और सपष्‍ट करने का अनुग्रह करें। अभी उस नट की पूरी कृपा नहीं हुई इस लिए मामला रुका पडा है- ऐसा भी कहा जा सकता है। 1- पदार्थ शून्‍य की ही प्रतिक्रियात्‍मक अभिब्‍यक्ति ? हां, ऐसा कह सकते हैं। यह भी कह सकते हैं कि पदार्थ प्रकृति की स्‍वाभाविक अभिव्‍यक्‍त है। शून्‍य ही ब्रह्म या ब्रह्म ही शून्‍य है। ब्रह्म शून्‍य अवस्‍था से 'एकोहंबहुष्‍यामि' विचार -विकार से एक से अनंत रूपों में परिवर्तित-स्रजित होता है। जड और चेतन में। ब्रह्म अपनी प्रकृति से चेतन - जड दोनों है। जड यानी पदार्थ भी ब्रह्मोत्‍पन्‍न होने से शून्‍य की अभिब्‍यक्ति है और चेतन भी। यानी प्रकृति भी और पुरुष भी। उक औपनिषिदिक कथन है- एकाकी न रम्‍यते। अकेले मन नहीं लगा तो वह अनेकों-अनंत रूपों में प्रगट हो खेल खेलने लगा। 2- उदासीनता भी सापेक्ष रूप से निष्क्रियता नहीं है? उदासीनता में क्रियता रहती है। कर्तत्‍व और संगता का भी पूरी तरह अभाव नहीं होता। उदासीनता में कर्म और कर्मफल के गुण-स्‍वरूप को तो हम जानते हैं , लेकिन विशेष आकर्षक - अभीष्‍ट न लगने से उसमें हमारी रुचि नहीं होती। 3-शरीर सीमित होकर ही असीम को प्रतिष्ठित करता है। नहीं, शरीर भी सीमित है और 'असीम' भी सीमित है। असीम और ससीम(सीमित) दोनों हैं। शरीर भी आकाश तत्‍व से जुडा होने से मूलत: असीम ही है। प्रकृति का अंश है। असीम ससीम भी होता है। दर अस्‍ल , असीम-ससीम दो आंखों का दृष्टि भेद है। द्वंद है,द्वैत है जो होता नहीं केवल भासता है। असीम शरीर में ही नहीं प्रतिष्ठित होता, उस असीम में सीमित यानी शरीर भी प्रतिष्ठित-व्‍याप्‍त रहता है। बाल कृष्‍ण के प्रसंग का एकश्‍लोक याद नहीं आ रहा। भावार्थ है- हे सखी ! आज मैंने बडा कौतुक देखा। अनंत ब्रह्म नंद के आंगन में धूलधूसरित नाच रहा था। यह असीम का कैसा मोहक ससीमत्‍व है ! 4- जो मुझे जिस दृष्टि से देखेगा, मैं उसे वैसा ही दिखाई दूंगा, तो भगवान स्‍वयं की नहीं मनुष्‍य के दृष्टि की क्षमता की बात कर रहे हैं। वो जो देखना चाहता है, उसे वही दिखाई देता है। गीता में मुझे ऐसा प्रसंग नहीं याद पडता । एक यह है कि - ये यथा मां प्रपद्यन्‍ते तांस्‍तथैव भजा‍म्‍यहम मम वर्त्‍मानुवर्तन्‍ते मनुष्‍या: पार्थ सर्वश:। जो भक्‍त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं , मैं उन्‍हें उसी प्रकार आश्रय देता हूं , क्‍यों कि सब मनुष्‍य सब प्रकार से मेरे मार्ग का अनुसरण करते हैं। भक्‍त भगवान की जिस भाव से, जिस संबंध से, जिस प्रकार शरण लेता है, भगवान भी उसे उसी भाव, उस संबंध से , उसी प्रकार से आश्रय देते हैं। इस से इतर किसी अन्‍य प्रसंग से आपका तात्‍पर्य है तो कृपया स्‍पष्‍ट करने का अनुग्रह करें ,अच्‍छा लगेगा। रामायण में रा विवाह के समय एक अति रुचिकर प्रसंग आता है। धनुष यज्ञ को सजे मंच पर सब राजा-महराजाओं के विराजने के बाद अंत में ऋषिवर के साथ राम -लक्ष्‍मण पधारते हैं। सबने उन्‍हें अपनी मन-भावना के अनुसार देखा। भगवान सब को एक से नहीं दिखे।( एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ, तेहि तस देखेउ कोसल राऊ)। जिन्‍ह के रही भावना जैसी , प्रभु मूरत देखी तिन्‍ह तैसी। देखहिं रूप महारन धीरा ,मनहु वीर रस धरे सरीरा । डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी, मनहु भयनक मूरति भारी। रहे असुर छल छोनित बेसा, तिन्‍ह प्रभु प्रगट काल सम देखा। पुरबासिन्‍ह देखेउ दोउ भाई, नर भूषन लोचन सुखदायी। अब दो बातें हैं। मनुष्‍य जो देखना चाहता है उसे वही दिखायी देता है , यह भी सही है। और , जो , जितना , जब ,जैसे वह नट दिखा देता है, वह उतना , वैसे ,तब दिखता है। यह हमारी सामर्थ्‍य में नहीं है कि हम जब, जैसे , जितना, जैसे चाहें देख लें।जगत यानी पदार्थ भी पूर्णत: चाक्षुष नहीं है। वह (नट - पता नहीं क्‍यों यह शब्‍द मुझे बहुत प्‍यारा लगता है) दिखता तो है,पर टुकडों में। हवा के झोंकों में, पानी के प्रवाह में, अग्नि के ताप में,आंधी,तूफान,बारिश , सूखा में,धरती -आकाश में, सूरज, चांद ,सितारों में , बीज के अंकुर बन कर निकलने में,बच्‍चों-बूढों ख्‍ अपाहिज-असक्‍तों में , नवयौवनाओं में। लेकिन समग्रता में नहीं दिखता। टुकडों में दिखने से पकड में नहीं आता, टिकता नहीं। समपूर्णता में चाक्षुष साता नहीं। सम्‍पूर्णता में दिखेगा तो फिर कुछ और नहीं दिखेगा। इसी लिए भगवान को अर्जुन को दिव्‍य नेत्र देने पडे थे। आंसिक विराट रूप देख कर ही माता कौशल्‍या डर गयीं थीं। काक भुशुंडि जी के यह कहने अर्थ तो है ही - निज अनुभव अब कहउं खगेसा , बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा। राम कृपा बिनु सुनु खगराई, जानि न जाइ राम प्रभुताई। जाने बिनु होइ परतीती , बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती। और , प्रीति बिना नहिं भगति दृढाई.....( याद नहीं आ रही)। फि वही बेचारगी।

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भाई श्री शाही जी,  कहा गया है - बुद्धिर्यस्‍य बलं तस्‍य निर्बुद्धेस्‍तु कुतोबलम् । बुद्धिमान के पास बुद्धि का बल होता है, निर्बुद्धि के पास कैसा बल?  भाव-भावुकता वाले को आप जैसे लौहपुरुष सहायक बनते हैं। आलोचनाओं से विचलन की बात नहीं है। आलोचनायें तो प्रशंसा से अधिक आत्‍म विकाश में सहायक होती हैं। शायद इसी वजह से तुलसी बाबा ने कहा होगा- निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय । प्रहस्‍त ने भी ठकुर सोहाती से सावधान रहने को अपने पिता लंकाधिपति से कहा था-  प्रिय वानी जे सुनहिं जे कहहीं, अइसे नर निकाय जग अहहीं। वचन परम हित सुनत कठोरे, सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे।  आप की बात पर एक प्रसंग याद आ गया। वर्ष 76-77 में इलाहाबाद में मैं बीए का छात्र था। एक साहित्‍य-समागम में पं.हजारी प्रसाद द्विवेदी, महा देवी जी , पंत जी पृभति हिंदी के कई शीर्षस्‍थ साहित्‍यकार थे। मैंने सबसे आटोग्राफ लिये। इला चंद्र जोशी जी ने पहले मेरा नाम पूछा। फिर लिखा- शंभु दयाल जी, सदैव शंभु ही बनें रहें रुद्र प्रलंयकर न बनें ....। आप ने बहुत कुछ कह दिया है। हृदय से ऋणी महशूस करता हूं।

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 प्रिय भाई श्री मुन्‍ना जी ,   आपकी यह अभिव्‍यक्ति   हमारी धर्मिक -सामाजिक विसंगतियों  का यथार्थ बता रही है-''जो गलतिय हमारे आपके पूर्वजो ने की वही अज की पीरी कर रही है होने को तो राम लीला मैदान में सभाए हो रही है क्या फायदा इन सब बातो से. देश में एक गफूर ही नहीं लाखो करोरो गफूर है लेकिन इन तरह के व्यव्हार से ही कोइ गनपत नहीं बनना चाहता है हम कब सुधरे गे''  यह भी कैसी विडंबना है कि हम ईश्‍वर को प्रेम करने के दावे करते दिखते-दिखाते हैं, लेकिन ईश्‍वर की सर्वश्रेष्‍ठ ,और कदाचिद सर्वप्रिय भी, रचना इंसान को नहीं प्रेम करते। किसी गीत की लाइन है-  मिलना है भगवान से तो मिल पहले इंसान से। हिंदू धर्म बुरा नहीं है, मैं आपकी इस बात पूरी तरह सहमत हूं। बल्कि मैं  तो मानता हूं कोई धर्म बुरा नहीं है, सभी अच्‍छे हैं। अच्‍छे-बुरे तो उसके मानने वाले होते हैं।

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सर एक बात और यहां पर कहना चाहूंगा, उसको ज़रा मेरे दृष्टिकोण से समझेंगे तो बेहतर होगा । मान लीजिये आपके आलेखों का कोई आलोचक नहीं होता, सभी मेरी और कुछ और पाठकों की भांति मात्र एकसुर में आपकी दृष्टि और लेखनकला की प्रशंसा के पुल ही बांधने वाले रहे होते, तो क्या इस अवस्था में पहुंचने के बाद आपने जो यह बहुमूल्य अनुभव बटोरे हैं, बटोर पाते ? शायद नहीं । आलोचनाएं हमें वह शिक्षा दे जाती हैं, जो प्रशस्तियों से उपलब्ध हो पाना शायद कभी संभव नहीं होता । प्रशस्तियों के आधिक्य से विद्वद्जनों के दंभी हो जाने का खतरा रहता है, जो धरातल से जुड़े रहने में बाधा उत्पन्न करता है । धरातल छूटा, तो मौलिकता भी साथ छोड़ने लगती है । आलोचनाओं के दर्द ने ही आपका गनपत की वास्तविक पीड़ा से साक्षात्कार कराया । मुझे लग रहा है कि फ़िर आपको समझाने वाले अंदाज़ में लिख रहा हूं, जो आप जैसे विद्वान के लिये मेरी धृष्टता के समान है, परन्तु फ़िर भी निवेदन करूंगा कि इसे उद्गारों के तौर पर ही लें । संत न छोड़े संतई, कोटिक मिलैं असंत वाले भाव में ही रहें, और आप रहते भी हैं । यह भी नहीं भूलना चाहिये कि संतई या संतों की रचनाशीलता एक सतत प्रक्रिया है, जबकि आलोचना हमेशा क्षणभंगुर और सीजनल होती है । संत के भीतर से उसके लिये आवश्यक सकारात्मक ऊर्जा स्वत:स्फ़ूर्त उत्पन्न होती है, जबकि विरोध में जीने के लिये नकारात्मक ऊर्जा चाहिये, जिसके पैदा होने के लिये भी परिस्थितियों पर निर्भर रहना पड़ता है । जैसे आतंकवाद को खुद को जीवित रखने के लिये आतंकवादी वारदात को अंजाम देना आवश्यक है, वैसे ही विरोध में जीने के लिये भी आतंकवादी घटना का घटित होना एक अनिवार्य आवश्यकता है । बिना ऐसी घटना के विरोध का मुद्दा कहां से प्राप्त होगा? प्रकारांतर से कहा जाय तो आतंकवाद और प्रतिक्रियावाद दोनों एक ही नाव के सवार हैं । कौन मरा, इससे न तो आतंकवादी को कुछ लेना देना होता है, न ही प्रतिक्रियावादी को । लेकिन किसी का मरना दोनों के लिये ऊर्जा का काम अवश्य करता है । आपको अपना मन छोटा किये बिना अध्ययन में रत रहना चाहिये, और यथाशीघ्र समाज को जोड़ने वाली अपनी कृतियों के साथ वापस आना चाहिये । साधुवाद ।

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 प्रिय श्री अमित जी,  यह जीवन चक्र कैसे चकर घन्‍नी कटाता रहता है कि हम कभी अगली यात्रा के लिए तैयारी ही नहीं कर पाते। पूरी उम्र अच्‍छा-बुरा सब भोगने के बाद भी इस मायावी संसार से जी नहीं भरता-  सिर कम्‍पयों पग डगमगे नैन ज्‍योति हीन  कहो नानक एहि बिधि भई तऊ न हरि रस लीन।  एक दिन ऐसा होएगा कोउ कोऊ का नाहि  घर की नारी को कह तन की नारी जाहि।   शरीर की नाडी भी छूट जाएगी।  कहता हूं कहि जात हौं , कहूं बजाय ढोल  तीनों लोकों की सम्‍पत्ति दे कर भी कोई एक श्‍वास भी नहीं बढवा सकता। जब परवाना आ गया तो जाना ही है। कोई ताकत एक पलभी नहीं रोक सकती। कबरी दास जी यह ढोल बजा बजा कर कह गए। इसी लिए उन्‍हों ने यह भी कहा- कबीर सो धन संचिये जो आगे के होय सीस चढाए गाठरी जात न देखा कोय। स्‍वांसा खाली जात है , तीन लोक का मोल

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 प्रिय श्‍यामेन्‍द्र भाई, इलाहाबाद के नगीना से परिचय करा तुमने एक धर्म-ध्‍वजी के बारे मे ही नहीं बताया है प्रत्‍युत धर्म के मर्म से भी परिचय कराया है। दर अस्‍ल,धर्म या ईश्‍वर-भक्ति में सेवा और उसमें भी नि: काम सेवा, जिस में बदले में अपने लिए कुछ चाहत -अपेक्षा न हो , का सर्वोपरि महत्‍व है। सेवा से जो सुख स्‍वमेव मिलता है उस की भी आकंाक्षा नहीं करनी है। अन्‍यथा गीता के अनुसार वह सत्‍व गुणी सुख भी बांधने वाला हो जाता है। .... सत्‍वं निर्मलत्‍वत्‍प्रकाशकमनामयम्  , सुख्‍ा संगेनबध्‍नाति ज्ञानसंगेन चानघ।     सत्‍व गुण निर्मल होने के कारण प्रकाशक और निर्विकार है। लेकिन वह सुख आसक्ति और ज्ञान की आसक्ति से देही को बांधता है।   गुरु ग्रंथ साहब  -  सेवा करत होवै निहकामी , तिस को प्रापत होवै स्‍वामी।  जिसने निष्‍काम सेवा के सूत्र को मजबूती से पकड लिया मानो वह भवसागर पार करने नाव पर सवार हो गया।

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बाजपेयी जी हिन्‍दू और हिन्‍दुत्‍व को लेकर आपकी चिन्‍ताएं जायज हैं। हिन्‍दू और हिन्‍दुत्‍व को लेकर बढती साम्‍प्रदायिक और राजनीतिक कट़टरता ने आपके मन में हिन्‍दू शब्‍द को लेकर ढेर सारे प्रश्‍न पैदा किए हैं। एक सच्‍चे हिन्‍दू को इन प्रश्‍नों पर गौर भी करना चाहिए। जहां तक मैं समझता हूं हिन्‍दुत्‍व एक ऐसा जीवन दर्शन है जिसमें मानवता सर्वोपर‍ि है। एक बात और समझने की है कि आर्यों ने हिन्‍दू धर्म और सभ्‍यता की खोज नहीं की बल्कि केवल एक शब्‍द के जरिए उसे पहचानने-समझने की कोशिश की। अपनी भाषाई व्‍यंजना में इसके लिए जिस शब्‍द का उन्‍होंने प्रयोग किया वही शब्‍द हिन्‍दू धर्म के नाम से जाना गया। मतलब यह कि आर्यों से पहले भी यह धर्म और जीवन दर्शन था। दुनिया के तमाम धर्मों और सम्‍प्रदायों का इतिहास पढिए तो उनके उदय का एक निश्चित कालखंड समझ में आ जाएगा लेकिन हिन्‍दू धर्म के उदय के बारे में शायद ही ऐसा कोई निश्चित मत मिले। हम आज जिस हिन्‍दू और हिन्‍दुत्‍व को लेकर सवाल खडे कर रहे हैं वह राजनीतिक नेताओं और सन्‍तों-महंतों में मडराती राजनीति महत्‍वाकांक्षाओं की अभिव्‍यक्ति का हिन्‍दुत्‍व है। हिन्‍दुत्‍व तो एक ऐसा उदार जीवन दर्शन है जिसमें सभी का सम्‍मान है। हिन्‍दू और हिन्‍दुत्‍व को देखना है तो आम जनजीवन में देखिए‍। यह राजनीतिक महंत्‍वाकांक्षाओं में जकडे मठों-मंदिरों और तथाकथित संतो-महंतों में शायद ही मिले । -संजय मिश्र

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 निशा जी, आपका लेखन सोद्दोश्‍य होता है, समाज के लिए कुछ विचारणीय संदेश लिए होता होता है। इस लिए अपनी मन्‍यता के अनुसार उसे मैं धर्म-कार्य ही मानता हूं। और,इसी लिए मैं उससे स्‍वयं को जोडे रहने का प्रयास  करता था। अभी बहुत दुर्बलतायें हैं ..निंदा-स्‍तुति उभय सम.... का 'विमल विवेक ' जाग्रत नहीं है। अपना भावोच्‍छवास नियंत्रित नहीं कर सका , ब्‍यक्‍त कर गया , इसके लिए खेद है। प्रतिक्रिया के नाम पर प्रतिक्रिया की अपेक्षा कदापि नहीं रहती। मेरे बहुत से परिचित तो जानते ही नहीं कि मैं इस बीच लिख भी रहा हूं। वैचारिक समर्थन की भी आकांक्षा नहीं रहती, क्‍यों कि उससे अभीष्‍ट पूर्ति नहीं होती। यह जरूर रहता कि उस पर, विचारणीय लगे तो , उस पर सार्थक बात हो ।मैं लेखन गति में कुशल नहीं हूं। विचार भी तात्‍कालिक नहीं, अर्से से चिंतित हैं।एक पोस्‍ट लिखने में कई कई दिन लग जाते थे। मैं इलाहाबाद में दर्शन का छात्र रहा हूं और उसके बाद अधिकांशत: यायावरी और प्राय: लीक से हट कर चलता रहा हूं। बिना निहित भावों को समझे कोई भाई दौड पडता है तो अच्‍छा तो नहीं लगता था। विस्मित में केवल आपकी त्‍वरित प्रतिक्रया से ही हुआ था।

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 प्रिय भाई श्री रमेश जी, आप की हृदय स्‍पर्शी प्रतिक्रिया से आपकी भावनाओं को महशूश कर सकता हूं। मैं यह तो नहीं कह सकता कि मेरे ''विचारो की ज्ञान गंगा ने '' कितना लाभ दिया है, हां यह जरूर है कि आप सब से मैं बहुत लाभान्वित हुआ। साहित्‍य और धर्म एक दूसरे के पूरक हैं,आपके इस मत से मेरी कुछ भिनन राय है। मैं  मानता हूं धर्म स्‍वयं में सम्‍पूर्ण है उसका कोई पूरक नही है। धर्म पुरुषार्थ चाष्‍तुट्य का पहला और सर्वर प्रमुख अंग है। पुरुषार्थ का कोई पूरक नहीं होता उसका अंग या सहायक तो हो सकता है। यही साहित्‍य के साथ है। साहित्‍य धर्म का एक सजातीय अंग है। सत् साहित्‍य सृजन( जो आप करते हैं) और उसका पठन-पाठन ये धर्म के अंग हैं। करणीय हैं। इस तरह कह सकते हैं कि धर्म रत हैं।साहित्‍य मानवता का हित करता है ,आपकी यह बात पूर्णत: सही है लेकिन धर्म साहित्‍य को भी संभालता है , उसका भी हित करता है।  आपसे , शाही जी से यावज्‍जीवन के संबंध बन गए हैं।

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सर प्रणाम, इलाहाबाद में एक व्‍यक्ति है नगीना। ज्‍यादा पढा-लिखा नहीं है लेकिन उसने दुनिया देखकर इंसानियत का पाठ ही पढा। अपने नाम के अनुरूप ही वह समाज का नगीना है। चाय की दुकान चलाता है। लेकिन इंसानियत की स्थिति यह है कि लावारिस लाशों, गरीब-अनाथ लोगों के स्‍वर्गवासी परिजनों के पार्थिव शरीर की अंतिम क्रिया कराना ही उसका पहला और आखिरी धर्म है। मरने के बाद जिस शरीर को अपने परिजन तक जल्‍द-जल्‍द से दूर कर देना चाहते हैं, उसे वह कई बार अकेले ही लेकर घाट तक गया है। वह भी सबकुछ अपने खर्च पर। इसमे वह यह नहीं देखता कि मरने वाला हिंदू था या मुस्लिम या ि‍फर सिख-इसाई। उसे यह कार्य करके असीम सुख की प्राप्ति होती है। पता नहीं उसने कभी गीता पढी है या नहीं लेकिन उसका दर्शन कुछ ऐसा है - यह शरीर भगवान ने समाज सेवा के लिए दिया है, इसलिए निस्‍वार्थ भाव से सेवा करता जा रहा हूं, इसमें मेरा क्‍या लगता है, भगवान ने जो दिया है, उसे यहीं खर्च करना है, मैं जो कमा रहा हूं, उसे अपने जीते जी अपने हाथ से अच्‍छे कामों में खर्च कर दे रहा हूं। इस शख्‍स के उल्‍लेख का उद़्देश्‍य सिर्फ इतना है कि लोग कम से कम मरे हुए इंसान की लाश पर तो धर्म की राजनीति न करें। आखिर उन्‍हें भी तो ईश्‍वर-अल्‍लाह के दरबार में जाकर जवाब देना है। ि‍फलहाल मुझे जानकार आश्‍चर्य हुआ कि आप विश्राम लेना चाह रहे हें। मैं नहीं समझता कि आपको अपनी लेखनी को विराम देने की जरूरत है। बल्कि मेरे विचार से इसे और विस्‍तार देने की जरूरत है।

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 प्रिय श्री डा. सत्‍येन्‍द्र सिंह जी,  गनपत उर्फ गफूर की मृत्‍यु पर धर्म के नाम पर हुए व्‍यवहार पर प्रतिक्रिया निश्चित रूप से आत्‍म मंथन को प्रेरित करेगी। लेकिन गफूर के साथ हुए व्‍यवहार के लिए एक वर्ग नहीं दोनों वर्ग के लाग दोषी हैं। दोनों ने धर्म के नाम पर अधर्म किया। अपने बीवी-बेटे के पास जाना गफूर की मजबूर थी। कैंसर पीडित बुजुर्ग, कहीं से सहारे की उममीद न दिखी , तो क्‍या करता। असली धर्म का पालन तो मेरी नजर में उसकी बीवी-बच्‍चों ने ही किया । इससे यह भी साफ होता है धर्म जाति की तरह ही सुरक्षा कवच भी बनता है। आम आदमी आत्मिक विकास यात्रा से अधिक सुरक्षा -सहारा पाने के लिए धर्म-संठगनों या गिरोहो से जुडता है।  व्‍यावहारिक-सामाजिक जीवन के लिए धर्म पालनउ संबंधी आपके सुझाव पालन किए जाने योग्‍य हैं। सभी रास्‍ते एक ही परमेश्‍वर के पास जाते हैं , इस लिए आपका कहना सही है कोई कैसे उपासना करता है, ईश्‍वर को कोई फर्क नही ंपडता। मैं इसे धर्म के संदर्भ में कहूंगा कि इश्‍वर को इससे कोई फर्क नहीं पडता कि कोई किस धर्म का है। रावण ब्‍यक्ति के रूप में देखें तो घ्रणास्‍पद नहीं है। वेद-वेदांग, रस-छंद - अलंकार, महान पराक्रमी, बेजोड योद्धा, ज्ञानी-आराधक , पुरुषोचित क्‍या नहीं था पुलसत्‍य -पौत्र में। पराक्रम देखिए- एक बार कुबेर पहिं धावा, पुष्‍पक जान जीत लै आवा। यह पुष्‍क यान आधुनिक अमेरिकी एयर फोर्स -1( जिसके बारे में श्री आरएन शाही जी ने कुछ दिन पूर्व लिखा था) कहीं अधिक सुरक्षित -सुविधाजनक था। ऐश्‍वर्य देखिए पूरा नगर ही सोने का। प्रताप-दबदबा देखिए - बेद पढैं नित बिधि नित्‍य , संभु सभीत पुजावन जाहीं। मारे डर के ब्रह्मा रोज उसके यहां वेद पाठ करने और शंकर पुजवाने जाने जाते थे। आध्‍यात्मिक साधना की भाषा में रावण एक प्रतीक मोहांकार का। ब्‍यक्ति कितना पराक्रमी, ज्ञानी-ध्‍यानी और कुलीन वगैरह हो ईश्‍वा को नहीं पा सकता है। वह जगत विजयी हो सकता है, पर काल को नहीं जीत सकता। परम असीम के समक्ष वह ससीम ही रहेगा। ज्ञान-पराक्रम जन्‍य अहंकार उसमें सभी बुराइयों-ब्‍याधियों की जड मोह पैदा कर देते हैं और फिर वह प्रमादी- करसि पान सोवसि दिन राती- हो जाता है।   मैंने जैनाचार्य संत आचार्य महा प्रज्ञ जी के प्रवचन में सुनाओ था कि दान मुख्‍यत: चार प्रकार का होता है- विद्या-शिक्षा या ज्ञान दान, स्‍वास्‍थ्‍य दान (जो आप मुख्‍य रूप से कर रहे हैं), अननदान और अभय दान। आपने जो सवाल छोडा है कि वह किस धर्म का है , इस पर मेरा कहना है कि सनातन का। सनातन धर्म में इस्‍लाम भी है और क्रिस्चियनिटी भी।  आपने मुझे बडा संबल दिया है , आगे भी देते रहेंगे , इस आकांक्षा के साथ-  शंभू दयाल वाजपेयी

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आदरणीय वाजपेयी सर, प्रणाम! मुझे लग रहा है कि आपके अवकाश पर जाने की बात को आपके प्रेमीजन कुछ अधिक भावुकता के साथ लेते हुए इसे किसी स्थाई विछोह के रूप में देख रहे हैं, जो सही नहीं है । मैं तो मात्र इस अवकाश को आपकी मानस-शुद्धि यात्रा के प्रथम चरण की समाप्ति भर मान रहा हूं, और निश्चित रूप से यही सही भी है । सबने आप में सन्मार्ग के एक दूत का साक्षात्कार किया है, और रामदूत रहे हों या कोई भी पीर पैगम्बर, उन्होंने कभी भी दुनियावी अवरोधों के समक्ष न तो कभी घुटने टेके हैं, और न ही कभी टेकेंगे । कारण कि उनकी यात्रा के सोपान ऊपर से निश्चित होते हैं, और उसके अनुसार ही संपन्न भी होते रहे हैं । मुझे आशा ही नहीं, बल्कि विश्वास है, कि अवकाश में संचित की गई शक्तियों और अध्ययन की देदीप्यमान ऊर्जा से सराबोर आपकी लेखनी गनपत बनकर जल्दी ही पुन: प्रकट होगी, तथा अपने अगले चरणों के अभियान को कुछ और निर्लिप्त भाव से अंजाम देगी । आमीन!

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आदरणीय वाजपेयी सर !! आप का मंच से जाना हम लोगो के लिए सही ज्ञान का एक दरवाज़ा बंद होने के ही सामान है !! अगर आप देखेंगे तो तथाकथित ज्ञानी तो आप को हर तरफ मिल जायेगे परन्तु वास्तविक और सही ज्ञान बहुत कम लोगो को हासिल होता है !! कुरान में ऐसा इल्म (ज्ञान) हासिल करने को कहा गया है जो नफा (फायदा) पहुचाये !! खुद को , परिवार को, समाज को और देश को !! ऐसे ज्ञान से क्या फायदा जो दुसरो की कमिया बखान करे और समाज को तोड़े और नफरत फैलाये !! बहरहाल दुनिया है और हर तरह के लोग है ,, हर तरह की सोच है !! आपसी मतभेद होने से सोच विकसित होती है पर हमे इन मतभेदों को मनभेद नहीं बनाना चाहिए !! इंसानियत जब अपने कमाल पर पहुचती है तो दुनियावी मतभेद, ईर्षा, जलन हसद, दुसरो को कम समझना, किसी धर्म को नीचा दिखाना यह सब भावनाए मन से निकल जाती है और इन भावनो के निकलने के बाद ही अल्लाह / इश्वर का सच्चा प्रेम मन में दाखिल होता है, धर्म की सही समझ आती है !! जिस तरह हम अपनी बेहद कीमती चीज़ हमेशा किसी साफ़ जगह और बहुत देख भाल कर रखते है उस ही तरह ऊपरवाला भी सच्चा ज्ञान केवल उस ही को देते है जिसका मन और जिसका दिल हर तरह के विकारो के / बुराइयो से पाक होता है आप के लेखो का इंतज़ार रहता था और आगे भी रहेगा !! उम्मीद है की ऊपरवाले ने आप को जो नाफा देने वाला इल्म बख्शा है उस से समाज का मार्गदर्शन होता रहे गा !! और मुझे आप का स्नेह मिलता रहेगा,, जागरण के माध्यम से जो रिश्ता बना है वह हमेशा कायम रहेगा !! राशिद

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परम आदरणीय भाई जी पोस्ट को पढ़ते ही आप[के स्नेह से सिक्क्त मन भावो से नियंत्रण खो बैठा और सवेदना आखो से झरने लगी |dharm और साहित्य एक दुसरे के पूरक है dharm से सहित्य को प्रेरणा मिलती है व साहित्य से धर्म की व्याख्या होती है धर्म धारण स्वाभाविक है साहित्य मानवता व समाज का हित करता है इस लिए धर्म व साहित्य दोनों की सर्थाताकता मानव के सुधर व नियंत्रण की है भाई जी जीवन संग्राम में सत्य के पक्ष में संघर्ष करना लाभ प्रद व हजारो असत्त्यो पर भरी है राम न जाते हरिन संग, सिय न रावन साथ जो रहीम भावी कतहु, होत आपने हाथ | [मैं एतदर्थ सब का आभारी – ऋणी हूं। ईश्‍वरानुकंपा से ही ऐसा होता है।] आपका कथन बिलकुल सत्य है हमारे प्रारब्ध से आपके विचारो की ज्ञान गंगा ने लाभ दिया है [ ‘बुद्धि जीवियों’ की दुनिया मुझ अज्ञ को अपना और उग्र रूप न दिखाएगी। ढाई माह पहले ‘चलें धर्म की ओर !’ से शुरू हुआ } अतः "अब रहीम मुस्किल पड़ी गाढे दौऊ काम , सांचे से तो जग नहीं झूठे मिले न राम " का सुमिरन कर विचारो व स्नेह की कृपा करते रहे

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आदरणीय बाजपाई जी जैसा की मैंने प्रारंभिक टिपण्णी में ही कहा था क़ि धर्म और धर्म ध्वजवाहक तो कबके जा चुके अब हम केवल कबीलाई जिंदगी जी रहे हैं उसी का एक उदहारण है आपका ये उद्धहरण, साइन बाबा को साक्षात् इश्वर के दूत के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले इस समाज में गफूर या गनपत के पार्थिव शरीर के साथ हुआ ये व्यवहार समझ के परे है ,हाँ इतना समझ में आता है क़ि गफूर साहेब जीवन के अंतिम छड़ों में अपाने परिवार के साथ थे और उनके परिवार जन इस्लामिक परम्पराओं के अबुसार उनका अंतिम संस्कार करना चाहते थे जो तथाकथित ठेकेदारों ने न होने दिया , गफूर को इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था क़ि मृत्यु उपरान्त वो जलाये गए या दफनाये गए , हाँ समाज का ये दुर्दांत रवैया एक सवाल जरूर छोड़ता है , जिसपर आत्म मंथन जरूरी है . आपके प्रत्येक पोस्ट ने एक ज्वलंत प्रश्न छोड़ा है समाज के सामने , यदि इस पर हुआ आत्म मंथन आत्म्स्लाघा और आलोचना तक ही सिमट कर रह गया , वो भी केवल कंप्यूटर पर , तो आपका मकसद पूरा नहीं हो पायेगा . धर्म का पतन देखिये क़ि धर्म समाज को दिशा देने , एवं स्वस्थ व्यवस्था देने से आगे बढ़ कर व्यवसाय का स्वरुप बन गया है , यदि कोई अच्छा गायक है , और थोडा सा वाक्चातुर तो निश्चित रूपसे थोडा सा ही प्रयास करने से , चंनेल्स के माध्यम से , बहुत बड़ा धर्म गुरु बन सकता है, लोग शाश्त्र में लिखित ब्रह्म वाकया क़ि शाश्त्रही सबसे बड़ा गुरु है, तथाकथ्थित धर्मगुरुओं के पीछे किस तरह भाग रहे हैं , बताने क़ी जरूरत नहीं है , कोई नाग बाबा कोई नागिन बाबा, .और बहुत से नाम मैं इसलिए नहीं लिखना चाहता क़ी लोगों के विश्वास पर चोट पहुंचेगी और उन्हें दुःख होगा . धर्म के दो स्वरुप हैं एक व्यक्तिगत---उसकी कृपा पाने का मार्ग , उसमे आत्मसात हो सत्य पथ पर आसन्न हो ,आत्मा -परमात्मा के सुखद मिलन का मार्ग, जो पूजा, ध्यान , नमाज , इबादत या प्रयेर से मिलता है . दूसरा सामाजिक रूप - जो समाज को व्यवस्थित प्रकार से चलने के लिए ,सामाजिक नियमों का प्रतिपादन करता है . किन्तु दोनों को एक दूसरे से प्रथक करना भी बहुत दुष्कर कार्य है क्यूंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है . दोनों ही भाग एक दूसरे से प्रथक होते हुए भी एक दूसरे से प्रथक नहीं किये जा सकते . धर्म का व्यक्तिगत रूप इसलिए महत्वपूर्ण है क़ी येही एक व्यक्ति के व्यक्तिगत संस्कार एवं उसके अंतर्मन का मार्ग विकसित करता है , और इस भाग को परिपक्व करने में सहायक होते हैं माता पिता एवं परिवार के संस्कार . अपवाद स्वरुप पुलस्त्य मुनि के परिवार में रावन का जन्म भी हो सकता है , लेकिन ये अपवाद ही है . यदि मैं अपनी बात कहूँ तो धर्म एक पारिवारिक और सामाजिक संस्कार के अतितिक्त और कुछ भी नहीं है , इसीलिये सनातन धर्मी के एहन पैदा हुए व्यक्ति के संस्कार सनातनी, मुस्लिम परिवार में पैदा हुआ व्यक्ति इस्लामिक , एवं इसाई , सिख , जैन बोध इत्यादि मत को मानने वाले व्यक्ति के घर में पैदा हुआ व्यक्ति उसी संस्कार या समाज का कहलाता है . एक व्यक्ति सत्य मार्ग पर चलता है ऊपरवाले में यकीन रखता है दान देता है धर्म से भटके लोगों को धर्म पर चलने के लिए प्रोत्साहित करता है ज्ञानार्जन के लिए अध्ययन करता है मुझे सभी विद्वान् विभिन्न धर्मों के धर्मब्लाम्बी उसका धर्म बताएं?????????????? जहाँ तक धर्म के नाम पर या धर्म दूतों के नाम पर समानता असमानता पर क्रिया प्रतिक्रिया का प्रश्न है , वो भी उसी प्रकार है क़ी मेरे माता पिता ही दुनियां में सबसे श्रेष्ठ माता पिता हैं , प्रत्येक मनुष्य का मस्तिष्क जिस प्रकार से और जितना सोच पाता है , वोह अपने wavelenghth क़ी समानता वाले मष्तिष्क वाले सामान विचारों वाले व्यक्ति को पाकर मुदित होता है और प्रत्येक व्यक्ति ये इच्छा रखता है क़ी बहुमत ये कहे क़ी हाँ आप ठीक कह रहे हैं , ये भी एक वैचारिक विकार ही है , क्यूंकि बहुत से लोग इसलिए हाँ करदेते हैं क़ी छोडो क्यूँ बेकार में किसी का दिल दुखाया जाए . यदि हमारी हाँ से अमुक व्यक्ति को आत्म संतुष्टि मिलती है तो हमारा क्या जाता है . अगर मुझसे आप धर्म क़ी अवधारणा पूछें तो मेरा अपना उत्तर होगा क़ी भारतवर्ष का कानून ही भारत का धर्म है , और प्रत्येक नागरिक को इसका पालन करना चाहिए , व्यक्तिगत रूप से वोह किसी भी प्रकार से ईश्वर क़ी आराधना करे , इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. कानून भी वोही कहता है जो धर्म का सामजिक स्वरुप कहता है . धर्म के नाम पर कंठ्फाद शोर पर प्रतिबन्ध होना चाहिए . कोई भी धार्मिक जुलूस जिससे क़ी शांति भंग क़ी आशंका हो और महान अधार्मिक कृत्य मनुष्य हत्या क़ी आशंका हो , प्रतिबंधित होना चाहिए . देश में एक सामान क़ानून का सख्ती से पालन होना चाहिए, भ्रस्ताचारियों और दुराचारियों का स्थान केवल और केवल जेल होना चाहिए . क्षमा प्रार्थी हूँ यदि कुछ अनावश्यक कह दिया हो तो ,मेरी टिपनियाँ आपको निश्चित ही कई स्थान पर अछि नहीं लगी होंगीं किन्तु आपके आदेशानुसार मैंने अपनी अल्प्बुध्हिअनुसार जो भी उचित लगा , बिना भय रखने का प्रयास किया , आ[पने अपने ब्लॉग के माध्यम से जो लड़ाई शुरू क़ी है उसे आगे बढ़ाएं,क्यूंकि आपका का उद्देश्य अच्छा है , मुझसे जितनी आहिति संभव हो पायेगी देने का प्रयास करूँगा और हाँ प्रश्न पुनः छोड़ रहा हूँ -- एक व्यक्ति सत्य मार्ग पर चलता है ऊपरवाले में यकीन रखता है दान देता है धर्म से भटके लोगों को धर्म पर चलने के लिए प्रोत्साहित करता है ज्ञानार्जन के लिए अध्ययन करता है मुझे सभी विद्वान् विभिन्न धर्मों के धर्मब्लाम्बी उसका धर्म बताएं?????????????? :) धन्यबाद सदैव शुभाकांक्षी डॉ. satyendra

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आदरनीय बाजपाई जी ! नमस्कार ! अगर आप और गहन मनन करके फिर आने का वायदा कर रहे हैं तो अच्छा है | आप ke ब्लोग्स कितने ज्ञानवर्धक और सामयिक हैं ये प्रत्यक्ष है और प्रत्यक्षम किम प्रमाणं | हर बात से हर इंसान सहमत हो पाता तो दुनिया मे एक ही धरम होता लेकिन बौधिक दर्जे पर दुनिया बहुत नीचे होती | ज्ञान तारक वितरक से ही बर्धता है | अगर गाडी बनाने वाले को कोई ये नहीं कहते के तुने तो मौत का सामान बना लिया अगर आगे से कोई और आएगा तो ये गाडी उसे रौंदते हुए निकल जाएगी | तो शायद वोह गाडी में ब्रेक का इंतजाम तभी करता जब कुछ हादसे करने के बाद जिन्दा रह जाता | इस लिए आलोचना करने वालों ने तो करनी ही है उनकी ज़रूरत भी है | आपके हर पोस्ट ऊँचे दर्जे की और उच्त्तम , ज्वलंत मुद्दों को छूने वाली रही है | गनपत उर्फ़ गफूर जी के जाने का उतना अफ़सोस नहीं है जितना उन लोगों की मानसिकता का है जो युगों बाद भी ये न समझ पाए के मृत शरीर का कोई मजहब नहीं होता | मेरा आपसे निवेदन है के अगर जाना ज़रूरी ही है तो जल्दी आयेगा | और मेरा ये भी मानना है के आपके आने से हम सब को और समाज को नई दिशा मिलेगी | गनपत जी के मार्मिक निधन और निधन के बाद समाज की गैरजिम्मेदारी से मुझे बड़ा सदमा लगा | संवेदना के आलावा हम कर भी क्या सकते हैं | पर उनके लिए मैं जरूर प्रार्थना करूँगा | और उन के लिए भी जिन सबको सम्मति दे भगवान् | बहुत बहुत धन्यवाद |

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ब्रह्म और ईश्वर में क्या सम्बन्ध है? इसमें हिन्दू दर्शनों की सोच अलग अलग है। अद्वैत वेदान्त के अनुसार जब मानव ब्रह्म को अपने मन से जानने की कोशिश करता है, तब ब्रह्म ईश्वर हो जाता है, क्योंकि मानव माया नाम की एक जादुई शक्ति के वश मे रहता है। अर्थात जब माया के आइने में ब्रह्म की छाया पड़ती है, तो ब्रह्म का प्रतिबिम्ब हमें ईश्वर के रूप में दिखायी पड़ता है। ईश्वर अपनी इसी जादुई शक्ति "माया" से विश्व की सृष्टि करता है और उसपर शासन करता है। हालाँकि ईश्वर एक नकारात्मक शक्ति के साथ है, लेकिन माया उसपर अपना कुप्रभाव नहीं डाल पाती है, जैसे एक जादूगर अपने ही जादू से अचंम्भित नहीं होता है। माया ईश्वर की दासी है, परन्तु हम जीवों की स्वामिनी है। वैसे तो ईश्वर रूपहीन है, पर माया की वजह से वो हमें कई देवताओं के रूप में प्रतीत हो सकता है। इसके विपरीत वैष्णव मतों और दर्शनों में माना जाता है कि ईश्वर और ब्रह्म में कोई फ़र्क नहीं है--और विष्णु (या कृष्ण) ही ईश्वर हैं। न्याय, वैषेशिक और योग दर्शनों के अनुसार ईश्वर एक परम और सर्वोच्च आत्मा है, जो चैतन्य से युक्त है और विश्व का सृष्टा और शासक है

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आदरणीय रमेश जी , मैंने प्रथम पोस्ट में भी कहा है की ब्रह्मिन बंधुओं से अपेक्षा है की वे समाज के पुनुरोध्हार का कार्य आगे आकर करें क्यूंकि ब्रह्मिन आज भी हमारे समाज में पूज्यनीय है और विद्वान् भी , कर्म आधारित वर्ण व्यवस्ता जन्म आधारित व्यवस्था में कब परिपर्तित हुयी और क्यूँ ? इसका भी तो आत्ममंथन करना होगा. कब सूत जी महाराज शुक या तोता बन गए और क्यूँ? समाज को क्यूँ येर नहीं बताया गया शुक सुधासागर का सार बताते उए की शुक मतलब जो तोते की तरह मीठा बोले , तोता महाराज नहीं :P और सूत जी जिन्होंने ऋषि पराशर और रजा परीखित का संवाद शुक सुधासागर में लिखा , वो प्रकांड पंडित कौन थे? कहीं कुछ भूल तो हुयी है न? यदि हाँ तो किसने की और उसे सुधरेगा कौन? वैदक धर्म में उत्पन्न हुयी वर्ण व्यवस्था , अश्प्रश्यता, और आडम्बर के कारन ही और पंथों एवं मार्गों की उत्पत्ति हुयी , ये सत्य नहीं है क्या? आपसे आग्रह है की मेरी बातों को व्यक्तिगत न लेकर , वृहत समाज के प्रश्न की तरह लें, न तो मेरा कोई पोस्ट न ही टिपण्णी , कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है मैं एहन वोही लिख रहा हूँ जो शाश्त्रों के अध्ययन और समाज में व्याप्त कुरूतियों के कारन हुए बिघटन, भारतीय संस्कृत की गुलामी , और भारत भूमि के हजारों हजार साल हुए उत्पीडन से मैंने महसूस किया धन्यवाद

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प्रिय  भाई मिश्र जी,    रिश्‍ता तो मैं भी अनुभूत करता हूं। इसी के चलते अकेले आपसे अपेक्षा की थी। मैं ने कभी -कहीं विद्वान-दावा नहीं किया। विश्‍वास मानिये मेरा अध्‍ययन भी बहुत सीमित है ।अब तो और सीमित है। धर्म-चेतना या अंत: चेतना के लिए किताबी अध्‍ययन को मैं बहुत उपयोगी नहीं मानता।  कभी साहित्‍य पढता था, तभी श्री लाल शुक्‍ल का \'राग दरबारी \' भी पढा था। मैं इलाहाबाद विश्‍व विद्यालय में पढते समय आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, महादेवी जी, इला चंद्र जोशी समेत कई मूर्धन्‍य साहित्‍यकारों का दर्शन -सौभग्‍य भी मिला था। तमाम साधु- संतों के साथ के इर्द गिर्द भी खूब घूमा हूं।  मैं सिर्फ अपने मन की बात लिखता रहा हूं। कोई शास्‍त्रीय स्‍थापना जैसा उद्देश्‍य भी नहीं था। इस लेख में ऐसा ही था। मेरा मानना है असहमत होने पर तार्किक ढंग से अपनी बात रखनी चाहिए न कि उन्‍मादी स्‍वरों में हम यह साबित करने की कोशिश करें कि जो हम कह रहे हैं वही सत्‍य है , वही धर्म है। किसी का विशाल अध्‍ययन- पांडित्‍य हो सकता है, लेकिन विनम्रता पूर्वक निवेदन करना चाहता हूं कि धर्म क्‍या है, यह मुझे आपके संदर्भित लेख से समझने की आवश्‍यकता नहीं है।  पुन: मूल मुद्दे पर आते हुए अपनी अवधारणा स्‍पष्‍ट करना चाहता हूं कि धर्म का अंतश्‍चेतना से अधिक संबंध है, तर्क-शास्‍त्रार्थ के आग्रह-दुराग्रहों से कम।  आचार्य महावीर प्रसाद ,द्विवेदी जी ने हिंदी भाषा को एक स्‍वरूप दिया है। उनके प्रति मैं श्रद्धावनत हूं, लेकिन प्रमाण उन्‍हें मानेंगे या श्रीमदभागवत गीता को। गीता में भगवान श्री कृष्‍ण कहते हें-  ब्राह्मणो हि प्रतिष्‍ठाहममृतस्‍य अव्‍ययश्‍च शास्‍वतस्‍य च धर्मस्‍य सुखैस्‍यैकांतिकस्‍य च।  क्‍यों कि ब्रह्म का, अविनाशी अमृत का और शास्‍वत धर्म का और ऐकांतिक सुख का आश्रय मैं ही हूं। शास्‍वत यानी सनातन धर्म , जो अनादि और अनंत है। भ्‍ागवान कहते हैं कि सनातन धर्म का आधार मैं हूं और मेरा आधार सनातन धर्म है। तात्‍पर्य यह कि सनातन धर्म और मैं ये दो नहीं प्रत्‍युत एक ही हैं। सनातन धर्म मेरा ही स्‍वरूप है।  सनातन धर्म किसी मनुश्‍य द्वारा चलाया गया नहीं है। अर्थात यह किसी मनुष्‍य के दिमाग की उपज नहीं है। अन्‍य सभी धर्म अर्वाचीन हैं यह तो विभिन्‍न ऋषियों द्वारा किया गया अन्‍वेषण है, योज है। खोज उसी की होती है, जो पहले से मौजूद हो। सनातन धर्म ईश्‍वर का स्‍वरूप है। जब इसका ह्रास होता है तो भगवान इसकी रक्षा करने और संस्‍थापना ( यदा यदा ही धर्मस्‍य ग्‍लार्निभवति भारत संस्‍थपनार्थाय ....) के लिए अवतार लेते हैं। मैं मानता हूं कि सनातन धर्म में बौद्ध-जैन सब शामिल हैं।

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Hinduism, a religious tradition of Indian origin, comprising the beliefs and practices of Hindus. The word Hindu is derived from the river Sindhu, or Indus. Hindu was primarily a geographical term that referred to India or to a region of India (near the Sindhu) as long ago as the 6th century bc. The word Hinduism is an English word of more recent origin. Hinduism entered the English language in the early 19th century to describe the beliefs and practices of those residents of India who had not converted to Islam or Christianity and did not practice Judaism or Zoroastrianism. In the case of most religions, beliefs and practices come first, and those who subscribe to them are acknowledged as followers. In the case of the Hindu tradition, however, the acknowledgment of Hindus came first, and their beliefs and practices constitute the contents of the religion. Hindus themselves prefer to use the Sanskrit term sanātana dharma for their religious tradition. Sanātana dharma is often translated into English as “eternal tradition” or “eternal religion” but the translation of dharma as “tradition” or “religion” gives an extremely limited, even mistaken, sense of the word. Dharma has many meanings in Sanskrit, the sacred language of Hindu scripture, including “moral order,” “duty,” and “right action.” The Hindu tradition encourages Hindus to seek spiritual and moral truth wherever it might be found, while acknowledging that no creed can contain such truth in its fullness and that each individual must realize this truth through his or her own systematic effort. Our experience, our reason, and our dialogue with others—especially with enlightened individuals—provide various means of testing our understanding of spiritual and moral truth. And Hindu scripture, based on the insights of Hindu sages and seers, serves primarily as a guidebook. But ultimately truth comes to us through direct consciousness of the divine or the ultimate reality. In other religions this ultimate reality is known as God. Hindus refer to it by many names, but the most common name is Brahman.

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आदरणीय बाजपेई जी सादर प्रणाम । आपको परेशान करूं या अपमानित करूं ऐसा मेरा कभी अभिप्राय नहीं रहा । आप बुजुर्ग हैं और ज्ञानगंगा के इस प्रवाह में आपसे बहुत कुछ सीखने, जानने को मिला है । तर्क, वितर्क, भाषा में कभी कभी तल्खी भी आ जाती है लेकिन यकीन मानिये इतने दिनों से आपसे संवाद करते करते कल जब आपकी इस पोस्ट पर दूसरे टिप्पणीकारों की असंयमित टिप्पणियों को पढ़ा तो मन में एक ईर्ष्या और क्रोध की भावना कुछ देर के लिये पैदा हुयी कि बाजपेई जी का विरोध करने का हक सिर्फ मेरा है । इतने दिनों से आपसे संवाद करते करते एक रिश्ता से बन गया है जिसमें प्रेम और श्रद्धा सम्मिलित है । आपने अगर ”रागदरबारी“ उपन्यास पढ़ा हो तो उसमें एक अध्याय छोटे पहलवान और उनके पिता कुसहर प्रसाद की लड़ाई और पंचों के समक्ष उनके मुकद्दमें पर है । अंत में छोटे पहलवान को पंचों द्वारा कुसहर प्रसाद की बेईज्जती करना नागवार गुजरता है और वह पंचों को गरियाते हुये अपने पिता के साथ घर वापस लौटते हैं । कुछ ऐसी ही स्थिति मेरी भी कल थी । . मनोज जी से मेरी कल वार्ता हुयी, वो भी दुखी थे कि आप उनके लेख और मेरी टिप्पणी की वजह से दुखी थे । हमारा अभिप्राय ऐसा कदापि नहीं था बल्कि हम दोनों का अभिप्राय ऐसे तथ्यों को सामने रखना था जिससे यह सिद्ध हो सके कि हिंदू शब्द मुखौटा नहीं है बल्कि यह हमारी संस्कृति और प्राचीन साहित्य मे बहुत पहले से प्रयोग होता आ रहा है । मनोज जी का लेख आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की पुस्तक ”साहित्य अमृत“ पर आधारित है । यह सारे तर्क आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने तकरीबन आज से 70 - 80 वर्ष पूर्व दिये थे । . मनोज जी से मेरी वार्ता होती रहती है । मैंने देखा है कि उनका वेद, उपनिषद, मानस, गीता, कुरान, हदीस और दूसरे धर्मगं्रथों पर उच्चकोटि का अध्ययन है । बस वे कविहृदय होने के कारण जोश में जल्द आ जाते हैं । अगर कोयी उनसे टिक कर तर्क करे तो मेरा मानना है कि मनोज जी अगले के अधिक्तर प्रश्नों के उत्तर दे देंगे । धर्मगं्रथों पर उनका अध्ययन गजब का है । . सादर आपका

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[पवार कट के बाद पढ़े ] को पढने का सुयोग मिल रहा था, संभाषण का अवसर आज आया है आप की विद्द्वत्ता के समक्ष मै स्वान्तः सुखाय कविता लिखने वाला कहा ठहरुगा ? पर आप के विवेकी व्यक्तितव को जानकर कुछ प्रयास भर कर रहा हु यह तो आपने भी कहा है की वेद पाठ करने का अधिकारी है ,डाक्टर साहब अतीत काल से ब्राम्हण त्यागमयी जीवन वित कर भी वेद और विद्द्या से समाज का हित कर रहा है तुलसी दास जी ने राम चरित मानस को प्रारंभ करते हुए लिखा है \"बंदयु प्रथम महीसुर चरना , मोह जनित संसय सब हरना , भारतीय जीवन चर्या में गो ,ब्राम्हण ,वेद ,सती ,सत्यवादी, निर्लोभी और दानशील का महत्त्व इस लिए है की इन्ही सात पर धरती टिकी है .फिर गो द्विज धेनु देव हितकारी , कृपा सिन्धु मानुष तनु धारी , गो विप्र और वेद जीवन चर्या के आधार है \" गावो विप्राश्च वेदाश्च कुल्मेक्म द्विधा कृतम, एकतो वर्तते मंत्रो हविरेक्त्र तिष्ठति ,

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  भाई अश्‍वनी जी,   अत्‍यंत सार गर्भित- संतुलित  और कलात्‍मक प्रतिक्रिया से आनंदित ही हुआ। कलात्‍मक इस अर्थों में कि हर वाक्‍य हर और अधिकांश शब्‍द एक विशेष निहितार्थ समेटे हुए हैं। मानव बनना देवत्‍व से कहीं अधिक दुष्‍कर व  श्रेय होता है। ऐसा मानता हूं ,  इस यात्रा में कितना मानव बन पाया हूं यह अलग बात है । आप ने सही ही समझा। लेखक भी अपने प्रिय अनुज ही हैं और उन्‍होंने मेरे मान-अपमान के लिए नहीं प्रत्‍यावेश में ही लिखा है । जो भी हो उनकी अभिब्‍यक्ति का मैंने अपने लेख के साथ पूरा सम्‍मान दिया है।  आपकी प्रति-प्रतिक्रिया को हृदय से स्‍वीकार करते हुए अपनी पोस्‍ट के संदर्भ को आगे बढाते हुए आप से भी इन अंतर्विरोधों के बारे में विचार करने का अनुरोध करता हूं।  \'हिंदुओं\' में ही बडा वर्ग अपनी सेकुलर छवि को चमकदार बनाए रखने के लिए हिंदुत्‍व से सायास दूरी और नियोजित घ्रणा भाव दिखाता है। वह हिंदुत्‍व का मतलब दक्षिणपंथी और घोर प्रतिक्रियावादी होना  ही मानता है। आज तमाम पढेलिखे और बुद्धिजीवी हिंदू नाम पर नाक भौ सिकोडते दिखते हैं। राजनीतिक नेता ही नहीं बडे लेखक भी। वे ऐसे दिखते दिखाते हैं मानो वाम होना प्रगतिशीलता की निशानी है। आधुनिक दिखने की अघोषित होड और हडबडी में ये वामपोषक व कथित  प्रगतिशील लोग धर्म के बारे में बात ही करने सुनने को तैयार नहीं होते। वर्तमान लेखन में धर्म या देवी देवता , या अवतार भी कितनी जगह पाते हैं ? वे प्राय: बहिष्‍कृत हैं। यह वर्ग हिंदुत्‍व को दक्षिणपंथ प्रतिक्रियावादी और जड जीवन पद्धति के रूप देखता है। हम कहते रहें गाल बजा बजा कर कि हिंदुत्‍व बडी उदात्‍त और प्रगतिशील अनादि विचारणारा है। सब धर्म-दर्शन इसी से निकले हैं। हजारों साल पहले वाम मार्गी दर्शन व साधना पद्धति भी इसी में रही है। 19वीं सदी में मूर्तिपूजा पर सर्वाधिक तार्किक व सश्‍क्‍त हमले कर के भी महर्षि दया नंद सरस्‍वती और आर्य समाज वाले हिंदू धर्म के अंग-स्‍तम्‍भ बने रहे। यह सब हिंदू किंवा सनातन धर्म की ऐसी समर्थ धारा के चलते संभव हुआ जिसके किनारे दक्षिण और वामपंथी थे।

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प्रिय भाई मिश्रा जी ,सत्येन्द्र जी, एवं समस्त ब्लॉगर बन्धुओं ,,शब्द को विवादित कैसे बनाया जाता है इस पर एकाधिकार केवल और केवल आदरणीय वाजपेयी जी का ही है ,,गद्य में अगर वीर रस समाहित हो जाए तो वह न ही वीभत्स होता है और न ही उससे किसी का अपमान होता है,, और आदरणीय वाजपेयी जी तो मानव से देवत्व की तरफ अग्रसर हो चुके हैं मुझे नही लगता मानव रूपी देव का वीर रस सिंचित शब्दों से अपमान हुआ (मेरी मजम्‍मत करने के लिए ही है) यह शब्द शायद आदरणीय वाजपेयी जी ने आवेश में लिख दिया होगा,, देवताओं को भी यदा कदा क्रोध आ ही जाता है ,,वैसे मेरी तुच्छ समझ के अनुसार पदार्थ /विचार /विषय का नाम चाहे जो भी हो मूल मे वह जो है वही रहता है,,वैसे भी हिन्दू या सनातन या वैदिक धर्म जो भी कहें न जाने कितने हिंसक ,वैचारिक हमलों को आत्मसात करकर आज भी अपना स्वरूप कायम रखने में सक्षम है ,,ऐसी न जाने कितनी हवाएं आ कर गुजर गईं और गुजरती रहेंगी ,,......जय भारत

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हिन्दू धर्म में कोई एक अकेले सिद्धान्तों का समूह नहीं है जिसे सभी हिन्दुओं को मानना ज़रूरी है। ये तो धर्म से ज़्यादा एक जीवन का मार्ग है। हिन्दुओं का कोई केन्द्रीय चर्च या धर्मसंगठन नहीं है, और न ही कोई "पोप"। इसके अन्तर्गत कई मत और सम्प्रदाय आते हैं, और सभी को बराबर श्रद्धा दी जाती है। धर्मग्रन्थ भी कई हैं। फ़िर भी, वो मुख्य सिद्धान्त, जो ज़्यादातर हिन्दू मानते हैं, हैं इन सब में विश्वास : धर्म (वैश्विक क़ानून), कर्म (और उसके फल), पुनर्जन्म का सांसारिक चक्र, मोक्ष (सांसारिक बन्धनों से मुक्ति--जिसके कई रास्ते हो सकते हैं), और बेशक, ईश्वर। हिन्दू धर्म स्वर्ग और नरक को अस्थायी मानता है। हिन्दू धर्म के अनुसार संसार के सभी प्राणियों में आत्मा होती है। मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो इस लोक में पाप और पुण्य, दोनो कर्म भोग सकता है, और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। हिन्दू धर्म में चार मुख्य सम्प्रदाय हैं : वैष्णव (जो विष्णु को परमेश्वर मानते हैं), शैव (जो शिव को परमेश्वर मानते हैं), शाक्त (जो देवी को परमशक्ति मानते हैं) और स्मार्त (जो परमेश्वर के विभिन्न रूपों को एक ही समान मानते हैं)। लेकिन ज्यादातर हिन्दू स्वयं को किसी भी सम्प्रदाय में वर्गीकृत नहीं करते हैं। प्राचीनकाल और मध्यकाल में शैव, शाक्त और वैष्णव आपस में लड़ते रहते थे. जिन्हें मध्यकाल के संतों ने समन्वित करने की सफल कोशिश की और सभी संप्रदायों को परस्पर आश्रित बताया. संक्षेप में, हिन्‍दुत्‍व के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं-हिन्दू-धर्म हिन्दू-कौन?-- गोषु भक्तिर्भवेद्यस्य प्रणवे च दृढ़ा मतिः। पुनर्जन्मनि विश्वासः स वै हिन्दुरिति स्मृतः।। अर्थात-- गोमाता में जिसकी भक्ति हो, प्रणव जिसका पूज्य मन्त्र हो, पुनर्जन्म में जिसका विश्वास हो--वही हिन्दू है। मेरुतन्त्र ३३ प्रकरण के अनुसार ' हीनं दूषयति स हिन्दु ' अर्थात जो हीन ( हीनता या नीचता ) को दूषित समझता है (उसका त्याग करता है) वह हिन्दु है। लोकमान्य तिलक के अनुसार- असिन्धोः सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारतभूमिका। पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरिति स्मृतः।। अर्थात्- सिन्धु नदी के उद्गम-स्थान से लेकर सिन्धु (हिन्द महासागर) तक सम्पूर्ण भारत भूमि जिसकी पितृभू (अथवा मातृ भूमि) तथा पुण्यभू ( पवित्र भूमि) है, ( और उसका धर्म हिन्दुत्व है ) वह हिन्दु कहलाता है। हिन्दु शब्द मूलतः फा़रसी है इसका अर्थ उन भारतीयों से है जो भारतवर्ष के प्राचीन ग्रन्थों, वेदों, पुराणों में वर्णित भारतवर्ष की सीमा के मूल एवं पैदायसी प्राचीन निवासी हैं। कालिका पुराण, मेदनी कोष आदि के आधार पर वर्तमान हिन्दू ला के मूलभूत आधारों के अनुसार वेदप्रतिपादित रीति से वैदिक धर्म में विश्वास रखने वाला हिन्दू है। यद्यपि कुछ लोग कई संस्कृति के मिश्रित रूप को ही भारतीय संस्कृति मानते है, जबकि ऐसा नही है। जिस संस्कृति या धर्म की उत्पत्ती एवं विकास भारत भूमि पर नहीं हुआ है, वह धर्म या संस्कृति भारतीय ( हिन्दू ) कैसे हो सकती है।

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आदरणीय रमेश बाजपाई जी प्रारंभ में एक ही वेड था एक ही वर्ण प्रदाव वेद- हंस वर्ण फिर वेदों का विभाजन हुआ यजुर, ऋग , साम , अथर्व वेदानुसार, कार्य के हिसाब से , और ज्ञान के अनुसार प्राणियों के वर्गों का विभाजन हुआ , और ये कहा गया की सभी प्राणी अपनी योग्यतानुसार वेद मार्ग पर चलते हुए इश्वर की आराधना करते हुए , जीवन व्यतीत करें . वोह वेद मार्ग पर चलें , इसका तात्पर्य ये है की वो भी शाह्स्त्र अध्ययन के अधिकारी थे . कर्मानुसार बहुत से ब्रह्मिन और खत्रिय सूद्र हुए और बहुत से शूद्र ब्रह्मिन, एहन तक की सुख सुधासागर , या भगवत जैसा ग्रन्थ लिखने वाले परम आदरणीय सूतजी भी जन्म से शूद्र ही थे लेकिन कर्मानुसार ब्राह्मिन कहलाये फिर ब्रह्मिन कब से अति महँ हुए और शूद्र कबसे अश्प्रश्य खात्यिया कब से द्वितीय ???? और वैश्य कब से तृतीय ये तो प्रकांड पंडित ही बता सकते हैं और इसका सनातनी समाज पर क्या दुस्प्रभाव हुआ इसका आकलन भी हमसबको मिल कर ही करना है

के द्वारा: satyendrasingh satyendrasingh

  प्रिय श्री मिश्र जी,   आपकी प्रतिक्रियानुग्रह के लिए धन्‍यवाद। मुझे आपसे अपेक्षा थी कि मेरे लेख में उल्‍लेखित बिंदुओं पर अपनी निष्‍पक्ष राय देंगे। लेकिन आपने तो किसी की राय ही मुझ पर लाद दी। कम से कम आप ने इसकी भाषा पर तो गौर कर लिया होता। मैं किसी के खंडन मंडन में नहीं लिखता और असहमत होने पर  भी लेखन -मर्यादाओं में ही सीमित प्रतिक्रिया ब्‍यक्‍त करता हूं। सब को अपना अपना बुद्धि-ज्ञान मुबारक। मुझे अधकचरा - अज्ञानी ही रहने दें।  पुनश्‍च, जब आप ने अयाचित \'लेख \'\'( जो मेरी मजम्‍मत करने के लिए ही है) संदर्भित कर ही दिया है तो गुण-दोष का विवेचन करने का विनम्र अनुरोध मैं इस ब्‍लाग को देखने-पढने वाले सुधी पाठकों से ही कर रहा है। जनता जनार्दन ही फैसला करे। सप्रेम

के द्वारा:

आदरणीय बाजपेई सादर प्रणाम । आपके इस लेख से मैं काफी हद तक सहमत हूं । आपने इस लेख में पूर्व में हमारे द्वारा कही गयी बातों को भी स्वीकार किया है भले ही संदर्भ दूसरा लिया हो । लेख में दी गयी तमाम बातें हम पहले भी दूसरी जगह पढ़ते आये हैं । तमाम लोगों ने इस लेख पर जो आपत्ति की है वह हिंदू शब्द को मुखौटा कहने के कारण की हैं । . इधर मनोज मंयक जी ने हिंदू शब्द प्रचीन भारतीय साहित्य में कहां कहां प्रयोग किया गया है , अपने एक लेख में स्पष्ट किया है । मैं यहां पर उनका पूरा लेख ही डाल रहा हूं । इस लेख को पढ़ने के पहले जैसा आप सोचते थे मैं भी कुछ हद तक सोचता था लेकिन इसको पढ़ने के बाद शायद मेरी तरह आपके विचार भी बदल जायें । सादर आपका . . यदि आप हिंदू, हिन्दुधर्म की रक्षा नहीं करेंगे तो कौन करेगा? यदि भारत माँ की संताने ही उसके धर्म का पालन न करेंगी तो उसे कौन बचायेगा?केवल भारत ही भारत को बचा सकता है| भारत और हिंदू धर्म एक है|हिंदू धर्म के अभाव में भारत का कोई भविष्य नहीं है|हिंदू धर्म, भारत की कब्र में चला जायेगा|तब भारत पुराशास्त्रियों और पुरातत्वज्ञों का विषय मात्र रह जायेगा और तब भारत न तो देशभक्ति वाला देश रह जायेगा और न एक राष्ट्र| श्रीमती बासंती देवी (डा.एनी बेसेंट ) - यह आर एस एस के विचार नहीं हैं|हिंदू जागरण मंच ने इसे नहीं कहा|किसी हिंदू आतंकवादी को ऐसा कहते मैंने नहीं सुना|आचार्य गिरिराज किशोर, प्रवीन तोगड़िया,अशोक सिंघल या योगी आदित्यनाथ ने पुरातत्व संग्रहालय वाली भाषा बोली है की नहीं यह मैं नहीं जानता|यह भाषण तो एक ऐसे हिंदू आतंकवादी ने बोला है जिसका जन्म १ अक्टूबर १८४७ को लन्दन में हुआ|१८८२ तक वह एक ईसाई रहीं|१८८९ तक उनके दार्शनिक विचारों का परिपक्वन होता रहा,इसी वर्ष उन्होंने अपने आपको थियोसोफिस्ट घोषित किया|उन्होंने १८९३ में हिंदू शब्द का मुखौटा पहना|७ जुलाई १८९८ को सेन्ट्रल सनातन कालेज नहीं सेंट्रल हिंदू कालेज की स्थापना की, जो आगे चलकर प्रातः स्मरणीय महामना मदन मोहन मालवीय जी द्वारा स्थापित कशी हिंदू विश्वविद्यालय का आधार बना|डॉ. एनी बेसेंट को भी शब्दों का निरुक्तिक विन्यास करना आता था|- - जब डॉ. अफीज मोहम्मद सैयद ने ब्रिटिश एनसाइक्लोपीडिया में लिखा ” विश्वबंधुत्व और जगंमैत्री की भावनाओं से परिश्रुत होने पर भी श्रीमती बेसेंट को वेदों और ऋषियों के देश भारत से,गौरवपूर्ण अतीत के अधिकारों पर अब दुर्दिन में फंसे और चारों ओर से निन्दित भारत माता की संतान से विशेष प्रेम था| तब उन्होंने हिंदुत्व को ही संबोधित किया| - प्रत्येक देश का अपना एक राष्ट्रिय चरित्र होता है|मनोविज्ञान में इस पर व्यापक शोध हुए हैं|जो बात एक संस्कृति में सत्य है, वह दूसरी संस्कृति पर थोपना न सिर्फ हास्यास्पद है वरन आत्महंता है| मिस्त्र और मेसोपोटामिया ने पुरे विश्व को रिलीजन दिया, यूनान ने ब्यूटी दिया,रोम ने ला दिया,इरान ने प्योरिटी दिया,चल्दिया ने साइंस दिया और भारत ने धर्म| मैं अपने पहले के ब्लॉग “धर्म क्या है’ में इस विषय पर पहले ही लिख चूका हूँ|फिर भी पता नहीं क्यों जो लोग न तो पन्ने पलट कर देखना चाहते हैं और न ही संदर्भो को समझना चाहते हैं, न जाने लिखवास की किस अन्तःप्रेरणा के वशीभूत होकर बिना किसी सन्दर्भ,उद्धरण और साक्ष्य के प्रस्तुत किये ही वैचारिक विकृति के प्रतीक संशय ग्रस्त लेखन में ही अपने वृद्ध पौरुष का मिथ्या प्रदर्शन करते नहीं अघाते| - कहा जाता है की अंग्रेजों ने इंदु अथवा सिंधु को इंडो कहा और यह इंडियन हो गया| अरबों ने सिंधु को हिंदू कहा और यह हिन्दुस्थान हो गया| इंडियन ओशेन अथवा हिंद महासागर भी तो हिंदू ही है| अब यह संशय होगा की अगर हिंदू शब्द हिंदुओं की देन होती तो वेदों में इसका उल्लेख क्यों नहीं है? पुराणों में तो होना ही चाहिए| वेदों में आर्य है, अनार्य है, दस्यु है, दास है, ब्राम्हण है, क्षत्रिय है, वैश्य है, राजा है, शुद्र है तो हिंदू क्यों नहीं? अरे भैया आपने गीता पढ़ी है? त्रैगुण्यविषया वेदाः, निःस्त्रैगुन्यों भवार्जुन अर्थात वेद सत्व, रज और तम की ही चर्चा करते हैं, अर्जुन तू इससे परे हो जा| फिर वेदों में निः स्त्रैगुन्यता का प्रतीक यह शब्द हिंदू आता कहाँ से? आपने बृहस्पति आगम पढ़ी है? चलिए मैं उसका एक श्लोक बताता हूँ…….हिमालयात समारभ्य यावत इंदु सरोवरम|तं देव निर्मितं देशं हिन्दुस्थानाम प्रचक्षते|| अर्थात हिमालय से प्रारंभ होकर इंदु सरोवर (हिंद महासागर) तक यह देवताओं द्वारा निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है| कम से कम बृहस्पति आगम तो तब ही लिख दिया गया था जब इस्लाम का कहीं अता पता भी नहीं था और ईसा मूसा तो अपने अस्तित्व में भी नहीं आये थे| अगर आपकी मान्यता के मुताबिक हिंदू एक फारसी शब्द है और फारसी में समस्त भारतीय स का ह हो जाता है तो सरस्वती हरह्वती क्यों नहीं हुई? समरकंद हमरकन्द क्यों नहीं हुआ? सीता की हिता क्यों नहीं कहा गया? सावित्री को हवित्री क्यों नहीं कहते?शायद को हायद क्यों नहीं कहा जाता? सारे जहाँ से अच्छा को हारे जहाँ से अच्छा क्यों नहीं कहते? साला को हाला क्यों नहीं कहा जाता? सूफी को हूफी क्यों नहीं कहते? सिलसिला को हिलहिला क्यों नहीं कहा जाता? सफा को हफ़ा क्यों नहीं कहा जाता? शमशुद्दीन को हम्हुद्दीन क्यों नहीं कहते? इल्तुतमिश को इल्तुत्मिह् काहे को नहीं नहीं कहा जाता और तो और ईरानियों का पौराणिक वंश भी अफरा सियाब की जगह अफरा हियाब होना चाहिए था| ऐसा तो होता नहीं की भाषागत अक्षमता की वजह से किसी शब्द को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया जाए और शेष शब्दों में मनचाहा परिवर्तन कर दिया जाए| निरुक्त की दृष्टि से भी मातृ का मदर और मैटर होना तो आसान है किन्तु सिंधु का हिंदू हो जाना सिरे से ही गलत है|बीच के बिंदु को छोड़कर शेष दोनों अक्षर पूरी तरह से परिवर्तित हो जाएँ, यह कहाँ से संभव है? - सनातन धर्म, वैदिक धर्म, आर्य धर्म, ब्राम्हण धर्म, आर्ष धर्म, आर्यत्व, हिंदुत्व, मानवता इत्यादि इसके पर्यायवाची हैं जो हिंदू नामक एक व्यापक शब्द में इसी भांति समाहित हैं जैसे शर्बत में शक्कर और जल| बौद्ध, जैन, आर्य, अनार्य, सिख, वैष्णव, शाक्त, शैव, गाणपत्य, तंत्रागम इत्यादि हिंदू रूपी विशाल वट वृक्ष की शाखा – प्रशाखाएं हैं| गर्व से कहो की हम हिंदू हैं किसी हिंदूवादी संगठन द्वारा आविष्कृत नया नारा नहीं है बल्कि सम्पूर्ण विश्व में भारत की अप्रतिम सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक स्वामी विवेकानंद की सिंह गर्जना है| इंडोनेशिया में हिंदू को हिंदू आगम कहा जाता है| - यं वैदिकाः मंत्रदृशः पुराणा इन्द्रं, यमं मातरिश्वानमाहुः| वेदान्तिनो निर्वचनीय मेकं, यं ब्रम्ह शब्देन विनिर्दिशंती | शास्तेती केचित, कतिचित कुमारः, स्वामिति, मातेति, पितेती भक्त्या| बुद्ध्स्तथार्ह्न्नीति बौद्ध जैनः, सत श्री अकालेती च सिक्ख सन्तः| यं प्रार्थयन्ते जग्दिशितारं| स एक एव प्रभुरद्वितीयः| - अर्थात मन्त्रदृष्टा ऋषियों ने वेदों और पुराणों में जिन्हें इंद्र, यम, अर्यमा और अश्विनी कह कर पुकारा है, वेदान्तियों ने जिस अनिर्वचनीय को ब्रम्ह नामक शब्द से निर्दिष्ट किया है| शास्ता, कुमार, माता, पिता और स्वामिभक्ति के रूप में हम जिस परम तत्व को पूजते हैं बौद्धों ने जिन्हें बुद्ध और जैनियों ने जिन्हें अर्हत कह कर पुकारा है| सिख संतों ने जिस परमात्मा को सत् श्री अकाल का संबोधन दिया है, वह हिंदुओं का जगदीश्वर एक ही है| - हिंदू शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य अमृत में एक बड़ा ही विचारोत्तेजक लेख लिखा है|आचार्य जी के अनुसार ”फारसी में हिंदू शब्द यद्यपि रुढ हो गया है तथापि यह उस भाषा का नहीं है|लोगों का ख्याल की फारसी का हिंदू शब्द संस्कृत सिंधु का अपभ्रंश है, वह लोगों का केवल भ्रम है|ऐसे अनेक शब्द हैं,जो भिन्न-भिन्न भाषाओँ में एक ही रूप में पाये जाते हैं|यहाँ तक की उनका अर्थ भी कहीं कहीं एक ही है; पर वे सब भिन्न भिन्न धातुओं से निकले हैं|” फारसी में हिंदू शब्द का अर्थ है चोर, डाकू, रहजन, गुलाम, काला, काफ़िर इत्यादि|क्या एक ऐसा शब्द जिसमें स्पष्ट रूप से अपमान परिलक्षित होता हो कोई जाति बडे ही गौरव के साथ अपना लेगी और जबकि इससे स्पष्ट रूप से उसकी पहचान जुडी हो| नहीं कदापि नहीं, और क्या अब तक इस तथ्य से हमारे पूर्व पुरुष अनजान रहे होंगे,ऐसा भी नहीं है|अब प्रशन यह उठता है की आखिर हिंदू शब्द का सर्वाधिक प्राचीन उल्लेख किस ग्रन्थ में मिलता है और वहाँ उसका अर्थ क्या है? हिंदू शब्द का सर्वाधिक पुराना उल्लेख अग्निपूजक आर्यों के पवित्रतम ग्रन्थ जेंदावस्ता में मिलता है? क्यों वेदों में क्यों नहीं? क्योंकि अग्निपूजक आर्य और इन्द्र्पुजक आर्य एक ही आर्य जाती की दो शाखाएं थी|इस्लामिक बर्बरता का सबसे पहला निशाना यही बना|अग्निपूजक आर्यों की पूरी प्रजाति ही नष्ट कर दी गयी|उनके पवित्रतम ग्रन्थ का चतुर्थांश भी नहीं बचा| जेंदावस्ता और वेद में ९० फीसदी समानता है, कुरान और वेद में २ फीसदी| वस्तुतः जेंदावस्ता और वेद लगभग समकालीन माने जा सकते हैं| ईसाईयों के अनुसार “बाइबिल” का पुराना भाग ईसा मसीह से भी पांच हजार साल पुराना है|our zendavesta is as anciat as the creation;it is as old as the sun or the moon.इसी जेंदावेस्ता में हनद नाम का एक शब्द मिलता है और हिन्दव नाम के एक पहाड़ का भी वर्णन मिलता है| जेंदावेस्ता का यह हनद ही आज का हिंदू और हिन्दव हिंदुकुश नाम की पहाड़ी है| अब प्रश्न यह उठता है की जब पारसी और वर्तमान हिंदू दोनों ही आर्य फिर उन्हें पारसी और हमें हनद क्यों कहा गया? स्पष्ट है भौगोलिक आधार पर भिन्नता प्रदर्शित करने के लिए| अब इस पारसी/हिब्रू हनद या हिंदू का अर्थ भी समझ लीजिए| इसका अर्थ होता है विक्रम, गौरव, विभव, प्रजा, शक्ति प्रभाव इत्यादि|यह अर्थ न तो अपमानजनक है और न ही अश्लील| इसी लिए हिंदुओं ने इसे अपने प्रत्येक परवर्ती ग्रंथो में भारत,सनातन,आर्य इत्यादि के पर्यायवाची के रूप में ज्यों का त्यों स्वीकार किया है| - एतत्देशप्रसुतस्य सकाशादाग्रजन्म:| स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन, पृथिव्याः सर्वमानवा:|| - अर्थात इस प्रकार देश में उत्पन्न होने वाले, अपने पहले के लोगों से शिक्षा ग्रहण करें|पृथ्वी क्व समस्त मानव अपने अपने चरित्र से इस लोक को शिक्षा प्रदान करें|यह हिंदुत्व का आदर्श है | - त्यजेदेकं कुलस्यार्थे,ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत| ग्रामं जनपदस्यार्थे, आत्मार्थे पृथ्वीं त्यजेत || - अर्थात कुल के लिए स्वयं का, ग्राम के लिए कुल का,जनपद के लिए ग्राम का और मानवता के लिए पृथ्वी तक का परित्याग कर दे| इस तरह का उपदेश हिंदुओं को परंपरा से प्राप्त है|- - यूँ तो कहने को बहुत से लोग अपने आपको धरती पुत्र कहते मिल जायेंगे किन्तु माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः अर्थात धरती माता है और हम पृथ्वी के पुत्र हैं का स्पष्ट उद्घोष करने के कारण वास्तव में हिंदू ही समाजवादी धरतीपुत्र कहलाने का वास्तविक अधिकारी है| हिंदू नमक शब्द पर भ्रम का वातावरण सृजित करने वाले तथाकथित छद्म (अ)बुद्धिजीवी प्राणी हिंदू शब्द के कुछ और विशलेषण देखें – - हिन्सायाम दुश्यते यस्य स हिंदू – अर्थात हिंसा से दूर रहने वाला हिंदू हन्ति दुर्जनं यस्य स हिंदू – अर्थात दुष्टों का दमन करने वाला हिंदू हीं दुष्यति यस्य स हिंदू – अर्थात हिंसकों का विनाश करने वाला हिंदू हीनं दुष्यति स हिंदू – अर्थात निम्नता को दूषित समझने वाला हिंदू - आपको इसमें से जो भी हिंदू अच्छा लगता हो आप चुन सकते है….यहाँ कम से कम इतनी आजादी तो है ही| अच्छा अब हिंदू शब्द की एक परिभाषा भी दिए देते है, हो सकता है आपको कुछ अच्छा लग जाये| - गोषु भक्तिर्भवेद्यस्य प्रणवे च दृढ: मति:| पुनर्जन्मनि विश्वास:,स वे हिन्दुरिती स्मृत:|| - अर्थात गोमाता, ओंकार और पुनर्जन्म में आस्था रखने वाला हिंदू |डॉ भीमराव अम्बेडकर जी भी इस तथ्य से अपरिचित नहीं थे इसीलिए जब विभाजनकारी सिखों ने अपने आपको हिंदुओं से अलग चिन्हित किये जाने की मांग की, तो वे तन कर खड़े हो गए और बौद्ध,जैन,सनातनी,सिख सभी को हिंदू माना|वेदों में हिंदू का पर्यायवाची शब्द भारत या आर्य शताधिक बार आया है| विष्णुपुराण में तो हिंदुओं के नाम भारत की पक्की रजिस्ट्री ही हो गयी है, वह भी चौहद्दी बांधकर|ध्यान दीजियेगा – - उत्तरं यद् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिण| वर्षं तद भारतं नाम भारती यत्र संतति:|| - अर्थात जो समुद्र से उत्तर है (चौहद्दी न. १ ) और हिमालय से दक्षिण है (चौहद्दी न. २ ) वह भारत नाम का भूभाग है और उसकी संतति, संतान (हिंदू ) भारतीय हैं| - जहाँ तक मेरी जानकारी है| यह श्लोक ईसा या मूसा से कुछ पहले का तो होगा ही और नहीं तो गुप्तकाल का होना तो निश्चित ही है| कलिका पुराण और मेरु तंत्र में हिंदू ज्यों का त्यों आया है|वर्तमान हिंदू ला के मुताबिक वेदों में विश्वास रखने वाला हिंदू माना गया है|आज तो ९० प्रतिशत हिंदुओं ने वेद देखा भी नहीं होगा तो क्या हिंदू ला के अनुसार वे हिंदू नहीं होने चाहिए| स्पष्ट है की हिंदू शब्द आर्य और भारत की ही भांति श्रेष्ठता और गौरव का बोधक होने के कारण स्वयं में पूर्ण है और आस्तिक, नास्तिक वेद, लवेद के आधार पर कोई भेद विभेद नहीं करता| - हिंदुओं को उनके जातीय चेतना से पृथक करने और आत्म विस्मृति के निरंतर प्रयासों ने ही आज पुरे भारत में विभाजन से पूर्व की स्थिति का निर्माण कर दिया है|आश्चर्य की बात तो यह है की लगातार २ सौ सालों तक जिस आत्मविस्मृति की मदिरा पिलाकर अंग्रजों ने सम्पूर्ण भारत में शासन किया,आजादी के पश्चात कांग्रेस और अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल और छद्म बुद्धिजीवी आज भी जनता को वही मदिरा पिला रहे हैं|विभाजन के समय लीगी नेताओं द्वारा लड़ के लिया है पाकिस्तान,हंस के लेंगे हिंदुस्तान जैसा नारा लगाया जाता था और आज इंडियन मुजहिद्दीन अथवा हिंदू मुजाहिद्दीन (अर्थ का अनर्थ न किया जाये…इंडियन का अर्थ हिंदू ही होता है) जैसे हिंदू इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा धमाके करके किया जा रहा है| कुछ लोग हिंदी को एक भाषा मानते हैं ……………… - मैं हिंदू ठेठ हिंदू खून हिंदू जात हिंदू हूँ . यही मजहब यही फिरका यही है खानदा मेरा.

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 भाई साहब,  आप जैसे इतिहास और भाषा विज्ञान के विद्वान के समर्थन से उत्‍साहित हूं। एक विसंगति और है। हमने उधार के शब्‍द से सनातन पर वरीयता देते हुए ''हिंदू धर्म'' तो बना लिया लेकिन हिंदू दर्शन नहीं बना पाए। हम भारतीय दर्शन ही कह कर काम चलाते हैं। भारतीय दर्शन में वेदांत, मीमांसा, सांख्‍य, न्‍याय, वैशेषिक आदि षड दर्शन, और बौद्ध, जैन, वाम मार्ग, शैव आदि तथा कई स्‍वतंत्र दर्शन भी हैं। इनमें किसी का भी मानने वाला या न मानने वाला भी सनातन की स्‍थापना में हिंदू हो सकता है। लेकिन जब हिंदू धर्म कहने पर इनमें से कई पृथक हो जाते हैं। कहने का तात्‍पर्य यह कि हमने दर्शन को धर्म से अलग कर दिया जब कि प्राचीन भारत में दर्शन एक स्‍वतंत्र स्‍थान रखने के बावजूद धर्म से अनन्‍योश्रित रूप से संबंद्ध रहा है।

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 भाई रमेश जी,   आप ने मरी पोस्‍ट पढ कर प्रतिक्रिया दी, यह देख संतोष हुआ। अन्‍यथा हमारे कुछ विद्वान भाई प्राय: हेडिंग और सरसरी तौर पर ऊपर - नीचे की कुछ लाइनों पर नजर डाल दौड पडे । उन्‍हों ने मेरा मंतव्‍य, तथ्‍य और सवालों को सम‍झने का कष्‍ट नहीं किया।  खैर, मैंने मुखौटा इस वजह कहा कि मुखौटा या मास्‍क प्रतिकृति होता है। यह संबंधित चेहरा जैसा तो लगता है लेकिन वस्‍तुत: चेहरा नहीं होता।  किसी भारतीय ने नहीं , विदेशियों ने इसे हमारे सूर्य की तरह चमकदार सनातनी चेहरे पर लगा दिया। जिसे शासन सत्‍ता के प्रभाव- दबाव में आम लोक ब्‍यवहार में तो मान्‍यता मिल गयी लेकिन साधु-संतों की सनातनी धारा ने आज तक स्‍वीकार नही ंकिया। वहां धर्म के रूप में सनातन ही व्‍यवहार में है। राजनीतिकों ने जरूर हिंदू धर्म की पताका पकडी। आप स्‍वयं विचार करें क्‍या सनातन का समानार्थी या उसका भाव बोधक हिंदू श्‍ाब्‍द है या हो सकता है ?

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आदरणीय भाई जी प्रणाम ..................................". भारतीय चेतना यह मानती रही है कि परम सत्‍य तक पहुंचने और जगत-रहस्‍य सुलझाने के अनेक रास्‍ते हैं और सभी एक ही मंजिल को जाते हैं। इसी चिंतन – औदार्य की बदौलत प्राचीन भारत धरा में विचार-पद्धतियों के प्रकाश-दीप जल सके जिनका सिरा पकड दुनिया के तमाम दर्शन और मत विकसित हुए। भारत में उपास्‍यों और उपासना पद्धतियों की बहुलता के बावजूद सह अस्तित्‍व, समन्‍वय और सामंजस्‍य की सनातन चेतना का सूर्य यहां सदैव चमकता रहा। तमाम भाषाई, सांस्‍कृतिक, वैचारिक और क्षेत्रीय विभिन्‍नतायें एक छतरी के नीचे प्रश्रय पाती रहीं। सिंधु घाटी की सभ्‍यता में कई आस्‍था , विश्‍वास, मान्‍यतायें, दर्शन- मार्ग पुष्पित-पल्‍लवित हुए। " इस लेख पर सभी विद्वान् जनों ने अपनी राय दी है | लेख के शीर्षक का " मुखौटा " शब्द शायद कुछ लोगो को अटपटा लगा है | यदि इसमें किसी की कोई जिज्ञाषा हो तो सार्थक बहस होनी चाहिए | आप जैसा विद्वान् बिना चिंतन किये इस तरह की पोस्ट नहीं लिख सकता | धर्म के गूढ़ तत्वों की विवेचना आप जिस सहज तरीके से कर लेते है उसमे दसको का चिन्तन ,मनन, व मंथन समाहित है आपकी इसी सहजता ,सरलता का मै कायल हु , मुरीद हु | कृपा बनाये रखे |

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प्रिय श्री भट्ट जी, प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद। सनातन धर्म इस लिए भी सही और स्‍वाभाविक रूप से ग्राह्य है कि इस का सिरा मानवीय चेतना की शुरुआत से मिलता है। दूसर, इसमें सभी धर्म-दर्शन की धारायें बीज रूप में समाहित हैं। हम सनातन से बौद्ध- जैनादि धर्म- चिंतन गंगायें निकलीं तो कह सकते हैं लेकिन हिंदू धर्म से निकलीं नहीं कह सकते। क्‍यों कि तब हिंदू धर्म नाम ही नहीं पडा था। उत्‍तर से आए आर्य अपने साथ धर्म-दर्शन भी लाए। भारत में तब समुन्‍नत द्रविण सभ्‍यता-संस्‍कृति के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं। दोनों के मिलन से कुछ संसोधनों के साथ आर्य धर्म विकसित हुआ होगा या आर्यों ने कुछ आवश्‍यक संसोधनों के साथ द्रविण धर्म- धारा को गले लगाया होगा, ये दोनों स्‍िथतियां इतिहासकारों के अनुसार मानी जाती हैं। दर्शन परंपरा से वैश्विक ही रहा है। दार्शनिक विचारधाराओं को लोग अपेक्षाकृत अधिक उदारता से स्‍वीकार करते थे। धर्म प्राय: जातीय व सांस्‍कृतिक पहचान अधिक रहता है। लेकिन कालांतर में दर्शन के साथ धार्मिक विश्‍वास-रिवाज भी प्रभावित होते रहे होंगे, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। आर्यों में मूर्तिपूजा नहीं थी। इंद्र,वरुण आदि प्रकृति से जुडी शक्तियां ही उनके उपास्‍य थे। शिव और काली आदि देव-देवियां द्रविण सभ्‍यता की ली गयीं मानी जाती हैं। प्रकृति के रहस्‍यों को खोजना-खोलना जिसमें जिसमें अपने स्‍वरूप को जानना भी है और सह अस्तित्‍व की भावना के साथ्‍ा संसार को रहने लायक बनाये रखने के उद्यम ही धर्म था । यही सनातन धर्म है जो आज भी उसी तरह प्रासंगिक और धारण करने योग्‍य है।

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वाजपेयी जी चर्चा करना अच्छी बात है लेकिन साइंस की क्लास में इतिहास की चर्चा करना कहाँ की समझ दारी है और जबकि आपने साइंस में Ph D कर रखी हो ! रही बात हरी कृपा की तो हरी पर उतना ही विश्वास करलो जैसे एक छोटा बच्चा अपनी माँ पर करता है उसकों पता होता है की मैं केवल माँ की गोद में ही सुरक्षित रह सकता हूँ चाहे माँ उसको थप्पड़ भी मार दे फिर भी वो उसकी गोद ही जाता है उसकों पता है यह थप्पड़ भी मेरी भलाई के लिए लगा है जो उस थप्पड़ का जवाब दूसरों से पूछता है वो जीवन में सफल नहीं हो सकता क्योकि जो अपने जनम देने वाले पर विश्वास नहीं कर सकता वो किसी पर भी विश्वास नहीं कर सकता उसका जीवन नरक के सामान है रही बात मेरे स्नेह की तो मेरे स्नेह से आप ब्लागर ऑफ़ दा वीक तो जरूर बन जाओगे : ) आशुतोष दा

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आदरणीय वाजपेयी जी, सबसे पहले एक महत्‍वपूर्ण और ऐतिहासिक विषय पर बहस छेडने के लिए हार्दिक वधायी स्‍वीकार करें। वास्‍तव में हिन्‍दू कौन है और क्‍या इस शब्‍द को किसी धर्म अथवा सम्‍प्रदाय से जोडा जा सकता या नहीं, इसे लेकर काफी पहले से विवाद होता आ रहा है लेकिन आज लगभग हर प्रबुद्ध इसे स्‍वीकार कर चुका है हिन्‍दू कोई धर्म नहीं बल्कि एक संस्‍कति है। इसे सप्‍तसिंधु क्षेत्र में रहने वाले आर्यों ने सिन्‍धु तो मेसोपोटामिया में रहने वाले उन्‍हीं के बंशजों ने हिन्‍दु कहा। लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है, जैसा कि लेख में आपका भी दर्द झलकता है कि सदा सदा से उदार और शायद इसी से आज तक जीवित रहने वाला हिन्‍दू समुदाय आज अचानक इतना कठोर और निष्‍ठुर कैसे हो गया है। इतिहास साक्षी है कि हिन्‍दुस्‍तान ने शक, कुषाण, पल्‍हव, हूण आदि तमाम विदेशी आक्रमणकारी ताकतों को अपनी उदारता से ही खुद में समाहित कर लिया। चाहे शक शासक रूद्रदामन की हो या पिफर कुषाण राजा कनिष्‍क और विमकडपिफस की, इन सभी ने भारत में आकर वैष्‍णव तथा शैव मत स्‍वीकार कर लिया। कुछ ऐसा ही तुर्क और मुगल आक्रमणकारियों के साथ भी हुआ। कई मुगल बादशाहों ने गीता और उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया अथवा कराया। इससे हिन्‍दू और हिन्‍दुस्‍तान के असली स्‍वरूप का पता चलता है। आधुनिक भारत में भी इकबाल जैसे लोग कहते हैं- हिन्‍दू हैं हम, वतन हैं, हिन्‍दुस्‍तान हमारा। जाहिर तौर पर वे हिन्‍दुस्‍तान में रहने वाले सभी लोगों को हिन्‍दु मानते थे। मेरी समझ से यही सच है और आज के दौर में मुनासिब भी। एक बार शुभकामनाएं-----

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 भाई राजीव जी, यह सामान्‍य प्रवृत्ति है कि हम चीजों के प्रति एक सुस्‍थापित नजरिया बना लेते हैं और मानते हैं मैं सही हूं। मुझे लगता कि कम लोगों ने पूर्वाग्रह रहित हो मेरा कथ्‍य पढा हो और फिर उस पर गुण दोष के आधार पर तटस्‍थ विवेचन किया हो।  यह भी समझने की कोशिश नहीं की कि मैं जो बिंदु रेखांकित कर रहा हूं वह विचारणीय भी हैं या नहीं। मैं किसी सनक -संवेग में यह नहीं लिखा। इसके पीछे सुदीर्घ अध्‍ययन-चिंतन है। और एक पवित्र उद्देश्‍य कि सनातन धर्म या इसे हिंदू धर्म ही कहें का पुराना गौरव और तेज बहाल हो। लेकिन लगता है कि शायद हम में से अधिकांश ने यही मान लिया है कि हमारे समाज-धर्म सब कुछ इतना ठीक है कि उस पर नयी चर्चा के लिए खिडकी भी नहीं खुल सकती।

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 प्रिय श्री मुन्‍ना जी, आप मेरी बातों से सहमत हैं, यही मेरे लिए काफी है। आपने सिंगतियों के लिए ब्राह्मणों और उनके(मेरे) पूर्वजों को इसके लिए कोसा है। इस बारे में मेरा निवेदन है कि यदि पूर्व में कोई गलतियां हुईं तो क्‍या उन पर चर्चा-विचार की गुंजाइश ही नहीं है ? दूसरे  पूर्वज तो अंतत: आपके हमारे सब कहीं न कहीं एक ही कुटुम्‍ब के रहे होंगे। ईश्‍वर एक है तो हमारे या ब्राह्मणों के पूर्वज अलग तो नहीं रहें होंगे। जिस अनेकता में एकता की बात आपने कही वह तो मैं अपने लेख में ही कह चुका हूं कि सिंधु घटी सभ्‍यता की विशेषता रही है कि यहां एक ही छतरी के नीचे विभिन्‍न मत, आस्‍था और विचार दर्शन पुष्पित-पल्‍लवित हुए। आपने लिख है '' बोलो हिंदू धर्म की जय' तो भाई यह बात तो अपने धर्माचार्यों से कहनी चाहिए। वे हिंदू धर्म की जय हो नहीं बोलते, सनातन धर्म की जय बोलते हैं। यह अंतर्विरोध भी तो दूर होना चाहिए। यही मेरा मकसद है।

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 प्रिय भाई आल राडंडर जी, आपने मेरे विचार पढे यह जान कर अच्‍छा लगा , लेकिन आप आहत हुए इससे मैं चकित हूं। क्‍यों कि मैंने किसी को आहत करने के मकसद से नहीं लिखा। और ध्‍यान से आप पुन: पढेंगे तो मेरा लेखन-उद्देश्‍य  और यह भी अपने धर्म की शान के खिलाफ कुछ नहीं है , स्‍पष्‍ट हो जाएगा।  आस्तिक भी हिंदू और नास्तिक भी हिंदू आदि कहने के बाद मैं यह भी लिखा है- ''अनंत की खोज और उपासना पद्धतियों का यह वैविध्‍य ही भारतीय भूभाग का अनुपम वैशिष्‍ट्य रहा है। भारतीय चेतना यह मानती रही है कि परम सत्‍य तक पहुंचने और जगत-रहस्‍य सुलझाने के अनेक रास्‍ते हैं और सभी एक ही मंजिल को जाते हैं। इसी चिंतन – औदार्य की बदौलत प्राचीन भारत धरा में विचार-पद्धतियों के प्रकाश-दीप जल सके जिनका सिरा पकड दुनिया के तमाम दर्शन और मत विकसित हुए। भारत में उपास्‍यों और उपासना पद्धतियों की बहुलता के बावजूद सह अस्तित्‍व, समन्‍वय और सामंजस्‍य की सनातन चेतना का सूर्य यहां सदैव चमकता रहा। तमाम भाषाई, सांस्‍कृतिक, वैचारिक और क्षेत्रीय विभिन्‍नतायें एक छतरी के नीचे प्रश्रय पाती रहीं। सिंधु घाटी की सभ्‍यता में कई आस्‍था , विश्‍वास, मान्‍यतायें, दर्शन- मार्ग पुष्पित-पल्‍लवित हुए।'' यह कहां से सनातन या हिंदू धर्म का अपमान करना है मैं नहीं समझ पा रहा।    मेरा मानना है कि '' हिंदू'' रूपी नाम चस्‍पा हो जाने के बाद सनातन धर्मी अवधारणा कमजोर हुई है। सनातन धर्म सभी धर्मों का जनक है। बुद्ध, जैन आदि सब इसी की शाखा-प्रशाखायें हैं, लेकिन  हिंदू से भाव बोध नहीं निकलता।  भाई , सब कुछ लिखने की आजादी जिसे होगी वह जाने। मेरे लिए नही ं है। मैं अपने ही संस्‍कारों - विचारों के मर्यादा-बंधन में बंधा हूं। पूर्वाग्रह छोड एक बार पुन: पढने का अनुग्रह करें और हिंदू शब्‍द यात्रा और तज्‍जनित प्रश्‍नों पर विचार करें। संभव है कि मुझसे सहमत हों।

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