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DIL KI BAAT

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गीता का संदेश वाहक है कुरान !

पोस्टेड ओन: 30 Oct, 2010 जनरल डब्बा में

एक ही है इस्‍लाम और वैदिक धर्म
कुरान गीता का ही संदेशवाहक है और इस्‍लाम सनातन धर्म की ही एक सशक्‍त अंर्तधारा। दोनो आस्तिक और एकेश्‍वरवादी हैं। सनातन धर्मी और मानवकृत नहीं, अपौरुषेय हैं। दोनों सर्व समर्थ एक परमात्‍मा और एक परम तत्‍व (तौहीद) को सत्‍य मानते हैं। दोनों अहंकार को जीतने और ईश्‍वर के समक्ष पूर्ण समर्पण पर जोर देते हैं। गीता समग्र को मानती है , इस लिए उसका आरंभ और अंत शरणागति से हुआ है। यही कुरान कहता है- आओ, अल्‍लाह की ओर।
गीता- कुरान दोनों ईश्‍वर की वाणी हैं। ईश्‍वर की वाणी बडे बडे ऋषि-मुनियों की वाणी से भी श्रेष्‍ठ होती है, क्‍यों कि ईश्‍वर ही सब का आदि कारण है। पहले आने से गीता सभी दर्शनों की मां है। सभी गीता के अंर्तगत हैं, पर गीता किसी दर्शन के अंर्तगत नहीं है। बाद में आने से कुरान अलकिताब (सभी किताबों) का संरक्षक है और सभी की पुष्टि करने वाला है। दोनों आस्‍थावानों को जीव, जगत और ईश्‍वर का अनुभव कराते हैं। दोनों में किसी मत का आग्रह नहीं है। दोनों का उद्देश्‍य साधक को समग्र की ओर ले जाना है।
कुरान एक आयत में संकेत करता है कि कुरान और वे सभी किताबें जो विभिन्‍न समय और विभिन्‍न भाषाओं में अल्‍लाह की ओर से अवतीर्ण हुईं, सब की सब वास्‍तव में एक ही किताब(अलकिताब) हैं । एक ही उनका रचयिता है उनका एक ही आशय और उद्देश्‍य है। एक ही शिक्षा- ज्ञान है जो उनके माध्‍यम से मानव जाति को प्रदान किया गया है। अंतर है तो वर्णन का जो देश, काल और श्रोताओं की स्थिति को ध्‍यान में रख कर अलग अलग ढंग से किया गया।
गीता उपनिषद रूपी कामधेनु का दूध है जिसे जिसे भगवान श्रीकृष्‍ण ने दुहा था। कुरान कलाम ए इलाही है जो सन 610से 8जून 832 के दौरान रसूल पाक पर अवतीर्ण हुआ। कृष्‍ण ने गीता -ज्ञान युद्ध के मैदान में मोह ग्रस्‍त , धर्मसम्‍मूढचेता: , हो गए धर्नुधारी अर्जुन को दिया था। नबूवत के बाद मोहम्‍मद का काबा के शक्तिशाली कुरैश प्रबंधकों से अघोषित युद्ध शुरू हो गया था।
एक संस्‍कृत और एक अरबी में है। लेकिन, दोनों की भाषा में गजब का लालित्‍य, रवानी और वाणी का प्रभाव है। दोनों की वर्णन शैली लेख की नहीं, भाषण की है। गीता एक संवाद सत्र में समाप्‍त हुई तो कुरान करीब 22 वर्ष की समयावधि में टुकडों में आया। प्रसिद्ध इस्‍लामी विद्वान मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी के शब्‍दों में- अवसर और आवश्‍यकता के अनुरूप एक अभिभाषण नबी सल्‍ला. पर उतारा जाता था और पैगम्‍बर उसे भाषण के रूप में लोगों को सुनाते थे। यानी कुरान मजीद की हर सूरा वास्‍तव में एक भाषण थी जो इस्‍लामी आह्वान के किसी चरण में एक विशेष अवसर पर अवतरित होती थी। उसकी एक विशेष पृष्‍ठभूमि होती थी। कुछ विशेष परिस्थितियां उसकी मांग करती थीं और कुछ आवश्‍यकतायें होती थीं जिन्‍हें पूरा करने के लिए वह उतरती थी।
गीता-कुरान दोनों किसी जाति, सम्‍प्रदाय, क्षेत्र या काल विशेष के लिए नहीं हैं। सर्वजनहिताय ,सार्वभैमिक और सर्वकालिक हैं। दोनों लोक-परलोक सुधारने का रास्‍ता बताने वाले हैं। परलोक का रास्‍ता लोक से हो कर ही जाता है। मनुष्‍य ईश्‍वर की सर्वोत्‍कृष्‍ट रचना है । ईश्‍वर ने मनुष्‍य को बुद्धि, विवेक और संवेदनशीलता का अनुपम गुण दिया है। मनुष्‍य जन्‍म ही सब जन्‍मों का आदि तथा अंतिम जन्‍म है । परमात्‍म प्राप्ति कर ले तो अंतिम जन्‍म भी यही है और न करे तो जन्‍म चक्रों का आदि जन्‍म भी यही है।इस लिए मनुष्‍य को अपना जीवन लक्ष्‍य और मार्ग बहुत सोच विचार कर चुनना चाहिए। गीता- कुरान दोनों इस उद्देश्‍य की पूर्ति करते हैं। दोनों किसी वाद विवाद या खंडन मंडन में नहीं पडते। दोनों आस्‍थावान दिलों में प्रकाश- पवित्रता भरने वाले हैं। परम पथ प्रकाश हैं।
प्रकाश और पवित्रता ज्ञान के सहज और अनिवार्य गुण हैं। पूर्णत: शुद्ध-पवित्र हो जाना ज्ञान का प्रतिफल है। कृष्‍ण कहते हैं- नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिहविद्यते…… ज्ञान के समान कुछ भी पवित्र नहीं है। अज्ञान का आवरण हट जाना, हकीकत खुल जाना या प्रकाशित हो जाना ज्ञान है। ज्ञान प्रकाश का प्रतिफल है पवित्रता-शुद्धता। इसी लिए रसूल के साथ पाक जोडते हैं।
ज्ञान ब्रहृम का प्रकाश है। ज्ञान से भक्ति है। ज्ञान और भक्ति ईश्‍वर तक पहुंचाने वाले दो द्वार हैं। ज्ञान-सूत्र के सहारे हम ईश्‍वरोन्‍मुखी यात्रा में आगे बढते हैं। ज्ञान का समुच्‍चय है वेद। वेद विद्- जानने से, पूर्ण को पूर्णता से जानने से है। जो पूर्ण है,वही सनातन है और जो सनातन है वह शास्‍वत भी है। ब्रह्म या ईश्‍वर ही सनातन है, शेष सब मरणधर्मा, मायावी, परिवर्तशील और क्षणभंगुर है। जो मार्ग या विद्या सूत्र सनातन से जोडे, वही सनातन धर्म है। इस्‍लाम ईश्‍वरीय आज्ञा के आगे सर झुकाना ,शांति चाहना, ईमान लाना और अपने आप को ईश्‍वर को समर्पित कर देना है। रामायण में इसी को लक्ष्‍मण गुह से कहते हैं- सखा परम परमारथ एहू , मनकर्म बचन राम पद नेहू। मुस्लिम वह जो अल्‍लाह के आदेशानुपान में स्‍वयं को समर्पित कर दे। अल्‍लाह ही को अपना स्‍वामी, शासक और पूज्‍य मान ले और अल्‍लाह की ओर आये आदेश के अनुसार जीवन व्‍यतीत करे। इसी धारणा और नीति का नाम इस्‍लाम है। यही सब नबियों का धर्म था जो संसार के आरंभ से विभिन्‍न देशों और जातियों में आए।
तत्‍वत: और मूलत: धर्म एक ही है। उसे सनातन,वैदिक या इस्‍लाम कुछ भी कह सकते हैं। तीनों का मन-प्राण एक है क्‍यों कि ईश्‍वर एक है। ब्रह्म को जानने में जो ज्ञान सहायक हो वही वैदिक है। वही विद्या ब्रहृम-विद्या है। इस विधा- विद्या का जानकार या उसके अनुसंधान में रत ब्‍यक्ति ही ब्राहृमण है। जन्‍मना नहीं, मनसा-कर्मणा। इस लिए वैदिक धर्म को ब्राह्मण धर्म भी कहा जाता है।
ब्रह्म-ईश्‍वर की तरह ही उनको जानने का ज्ञान, वेद, भी सनातन-शास्‍वत है। श्रृष्टि लय-प्रलय में भी ज्ञान नष्‍ट नहीं होता। वेद-ज्ञान नष्‍ट हो गया तो कोई ईश्‍वर को जानेगा कैसे ? अवतार के रूप में राम या कृष्‍ण ने वेदों को नहीं रचा-बनाया । ये पहले से हैं। उन्‍हों ने इनके बारे में केवल बताया भर है। किसी ने कोई धर्म नहीं चलाया, क्‍यों कि धर्म तो सनातन है। मोहम्‍मद भी जिस धर्म के ध्‍वजी बने वह पहले से, आदम- इब्राहीम के जमाने से चला आ रहा था। यानी सनातन।
गीता- कुरान दोनों ने कोई नयी बात नहीं बतायी। पहले से चले आ र‍हे सत्‍य-सिद्धांतों को ही नये सिरे से प्रकाशित किया। ज्ञान सनातन होने के चलते कोई नयी बात कह ही कैसे सकता है ? गीता में वर्णित सिद्धांत उपनिषदों-स्‍मृतियों में पहले से मौजूद हैं। गीता ज्ञानी विनोबा जी ने कहा था- इन सिद्धांतों को जीवन में कैसे उतारा जाए इसी में गीता की अपूर्वता है।
गीता में श्रीकृष्‍ण स्‍वयं अर्जुन को बताते हैं कि यह पुरातन योग है। ‘पुराप्रोक्‍ता मयानघ’ मेरे द्वारा पहले से कहा गया। कुरान का एक सूरा कहता है- हे नबी, तुम को जो कुछ कहा जा रहा है उसमें कोई भी चीज ऐसी नहीं है जो तुम से पहले गुजरे हुए रसूलों से न कही जा चुकी हो। उक अन्‍य कहती है- जो किताबें इससे पहले आयीं हैं, यह उन्‍हीं की पुष्टि है।
कृष्‍ण योगेश्‍वर थे। हम कह सकते हैं कि मोहम्‍मद भी जीने की कला जानते थे। जो जीने की कला जानता है वह योगी है। जीने की कला वही है जो मृत्‍यु की कला बतलाती है। मृत्‍यु भी जीवन और कदाचित उससे भी अधिक महत्‍वपूर्ण होती है। जो जन्‍मा है उसकी मृत्‍यु तय है – जातस्‍य हि ध्रुवोमृत्‍यु: (गीता)। सूरा अननिसा में यही कुरान कहता है- नहीं, मृत्‍यु तो जहां भी तुम हो वह प्रत्‍येक दशा में तुम्‍हें आकर रहेगी, चाहे तुम कैसे ही सुदृढ भवन में हो।
विनोबा जी ने कहा था- जीवन के सिद्धांतों को व्‍यवहार में लाने की जो कला या युक्ति है उसी को योग कहते हैं। ‘सांख्‍य ‘ का अर्थ है सिद्धांत अथवा शास्‍त्र और ‘योग’ का अर्थ है कला। शास्‍त्र और कला दोनों के योग से जीवन सौन्‍दर्य खिलता है। कोरा शास्‍त्र किस काम का ?
गीता ‘सांख्‍य’ और ‘योग’ – शास्‍त्र और कला दोनों से परिपूर्ण है। कुरान भी। वह भी अमीर- गरीब, सभी को दुनिया और आखरत संवारने के सरल कला सूत्र बताता है। गफलत में पडे लोगों को जगाता, सचेत करता है। कुरान भी गीता की तरह समरस और सब को लेकर चलने वाला है। एकेश्‍वर का उद्घोष करते हुए कुरान कहता है- रब्बिलआलमीन अर्रहमानर्रहीम(सूरा फातेहा) -वह सारे संसार – सृष्टि का प्रभु है, अत्‍यंत करुणामय और दया करने वाला है। एक अन्‍य आयत है- पूर्व और पश्चिम सब अल्‍लाह के हैं। जिस ओर भी तुम रुख करोगे , उसी ओर अल्‍लाह का रुख है। अल्‍लाह सर्व व्‍यापी और सब कुछ जानने वाला है। कृष्‍ण कहते हैं- वासुदेव सर्वं। सब कुछ ईश्‍वर है। सर्वस्‍य चाहं हृदिसन्निविष्‍ट: .. मैं ही सम्‍पूर्ण प्राणियों के हृदय में स्थित हूं। कुरान कहता है- सावधान कर दो, मेरे सिवा कोई तुम्‍हारा प्रभु पूज्‍य नहीं है, अत: तुम मुझी से डरो। गीता में कृष्‍ण कहते हैं- सर्वधर्मानपरित्‍यज्‍य मामेकं शरणंब्रज- अनन्‍य भाव से मेरी मेरी शरण में आ जा। तमेव शरणं गच्‍छ सर्वभावेन भारत- हे अर्जुन तू सर्व भाव से उसकी ही शरण में चला जा।
काबा में सात तवाफ(परिक्रमा) करते हैं। बाल कटवाने और सर मुडवाने की परंपरा है। भारत में मंदिरों में सात बार परिक्रमा करने और तीर्थों में बाल घुटवाने का रिवाज है। दायें हाथ से खानापीना , खाने से पहले बिस्मिल्‍ला या श्रीगणेश कहना और अंतिम क्रिया में शव को नहलाना-धोना जैसी कई बातों में समानता है।
जकात-सदका,रोजा, ईमान , नमाज और हज इस्‍लाम के स्‍तंभ हैं। ईमान परमेश्‍वर में श्रद्धा,रोजा व्रत-उपवास,जकात-दान, और नमाज प्रार्थना-योग है। यही वैदिकों का आधार है। विश्‍व बंधुत्‍व का संदेश देने वाले हज को कुंभ और संगम के माघ -महत्‍वों से जोड सकते हैं। जप भारतीय परंपरा में भी बहुत महत्‍वपूर्ण है। इसे श्रव्‍य,उपांसु और मानस तीन प्रकार का बताया गया है। कुरान कई जगह जप करने को कहा है। इसी तरह संतोष और तप का भी दोनों में समान महत्‍व है। इस्‍लाम ईमान को सर्वाधिक महत्‍व देता है। वेदांत में ध्‍यान और जप से भी अधिक श्रद्धा का महत्‍व बताया गया है। महा भारत कहती है- अश्रद्धा परमं पापं श्रद्धा पाप विमोचनी … अश्रद्धा से बढ कर कोई पाप नहीं है और श्रद्धा सब पापों से छुडाने वाली है। गीता का कहना है- श्रद्धावांल्‍लभते ज्ञानं..श्रद्धावान ज्ञान प्राप्‍त करता है। दान का महत्‍व बताते हुए गीता में कृष्‍ण ने कहा- दानंतपश्‍चैव पावनानि मनीषिणाम् । दान और तप मनुष्‍यों को पवित्र करने वाले हैं। और तो और वेदांत के निर्विकल्‍प समाधि के सिद्धांतों और महर्षि पतंजलि के अष्‍टांग योग की भी अधिकांश बातें इस्‍लामी विचार-दर्शन में समाहित हैं। दोनों में इतनी समानतायें हैं कि उन्‍हें संक्षेप में पुस्‍तक में ही समेटा जा सकता है। एक प्रमुख दृष्‍टांत-
वैदिक परंपरा में राजा,देवता और गुरू के पास खाली हाथ जाने मना किया गया है। यथा-रिक्‍तपाणिर्नसेवेत राजानां देवतां गुरुम् और रिक्‍त हस्‍तो न गच्‍छेत राजानांदेवतांगुरुम् । कुरान के सूरा अलमुजादला में इसकी नजदीकी यूं दिखती है – हे लोगों जो ईमान लाये हो, जब तुम रसूल से तन्‍हाई में बात करो तो बात करने से पहले कुछ सदका(दान) दो। यह तुम्‍हारे लिए अच्‍छा और अधिक पवित्र है। अलबत्‍ता अगर तुम सदका देने के‍ लिए कुछ न पाओ तो अल्‍लाह क्षमाशील और दयावान है। लोगों की असुविधा को देखते हुए यह आदेश बाद में वापस ले लिया गया।
अरब के लोगों, इस्‍लाम के अनुयायियों और भारत सनातन धर्मियों के बीच दार्शनिक – वैचारिक के साथ ही लोक व्‍यवहार की भी तमाम बातें इतनी अधिक समान हैं कि विचार करने पर पता चलता है कि दोनों की सांसें आपस में कितनी रचीबसी हैं। पूरी विनम्रता से कहा जा सकता है कि कुरान की एक भी सूरा या आयत ऐसी नहीं है जो वैदिक विचारधारा की विरोधी हो। गीता और रामायण में भी एक भी लाइन ऐसी नहीं है जो इस्‍लामी दर्शन से टकराती हो। कुरान के अल्‍लाह की ही अवधारणा से प्रभावित होकर तो गोस्‍वामी तुलसी दास ने अपने राम को ‘साहिब’ और ‘सुसाहिब’ कहा । तो फिर दिलों की दूरियां क्‍यों ? आप सब को इसका जवाब देना चाहिए।( अगली पोस्‍ट ‘प्रेम’ पर)।

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dr.satyendra के द्वारा
November 29, 2010

The Koran\’s 164 Jihad Verses K 2:178-179 Set 1, Count 1+2 [2.178] O you who believe! retaliation is prescribed for you in the matter of the slain, the free for the free, and the slave for the slave, and the female for the female, but if any remission is made to any one by his (aggrieved) brother, then prosecution (for the bloodwit) should be made according to usage, and payment should be made to him in a good manner; this is an alleviation from your Lord and a mercy; so whoever exceeds the limit after this he shall have a painful chastisement. [2.179] And there is life for you in (the law of) retaliation, O men of understanding, that you may guard yourselves. K 2:190-191 Set 2, Count 3+4 [2.190] And fight in the way of Allah with those who fight with you, and do not exceed the limits, surely Allah does not love those who exceed the limits. [2.191] And kill them wherever you find them, and drive them out from whence they drove you out, and persecution is severer than slaughter, and do not fight with them at the Sacred Mosque until they fight with you in it, but if they do fight you, then slay them; such is the recompense of the unbelievers. K 2:193-194 Set 3, Count 5+6 [2.193] And fight with them until there is no persecution, and religion should be only for Allah, but if they desist, then there should be no hostility except against the oppressors. [2.194] The Sacred month for the sacred month and all sacred things are (under the law of) retaliation; whoever then acts aggressively against you, inflict injury on him according to the injury he has inflicted on you and be careful (of your duty) to Allah and know that Allah is with those who guard (against evil). K 2:216-218 Set 4, Count 7-9 [2.216] Fighting is enjoined on you, and it is an object of dislike to you; and it may be that you dislike a thing while it is good for you, and it may be that you love a thing while it is evil for you, and Allah knows, while you do not know. [2.217] They ask you concerning the sacred month about fighting in it. Say: Fighting in it is a grave matter, and hindering (men) from Allah\’s way and denying Him, and (hindering men from) the Sacred Mosque and turning its people out of it, are still graver with Allah, and persecution is graver than slaughter; and they will not cease fighting with you until they turn you back from your religion, if they can; and whoever of you turns back from his religion, then he dies while an unbeliever—these it is whose works shall go for nothing in this world and the hereafter, and they are the inmates of the fire; therein they shall abide. [2.218] Surely those who believed and those who fled (their home) and strove hard in the way of Allah these hope for the mercy of Allah and Allah is Forgiving, Merciful. K 2:244 Set 5, Count 10 And fight in the way of Allah, and know that Allah is Hearing, Knowing. K 3:121-126 Set 6, Count 11-16 [3.121] And when you did go forth early in the morning from your family to lodge the believers in encampments for war and Allah is Hearing, Knowing. [3.122] When two parties from among you had determined that they should show cowardice [about Jihad], and Allah was the guardian of them both, and in Allah should the believers trust. [3.123] And Allah did certainly assist you at [the Battle of] Badr when you were weak; be careful of (your duty to) Allah then, that you may give thanks. [3.124] When you said to the believers: Does it not suffice you that your Lord should assist you with three thousand of the angels sent down? [3.125] Yea! if you remain patient and are on your guard, and they come upon you in a headlong manner, your Lord will assist you with five thousand of the havoc-making angels. [3.126] And Allah did not make it but as good news for you, and that your hearts might be at ease thereby, and victory is only from Allah, the Mighty, the Wise. K 3:140-143 Set 7, Count 17-20 [3.140] If a wound has afflicted you (at [the Battle of] Uhud), a wound like it has also afflicted the (unbelieving) people; and We bring these days to men by turns, and that Allah may know those who believe and take witnesses from among you; and Allah does not love the unjust. [3.141] And that He [Allah] may purge those who believe and deprive the unbelievers of blessings.[3.142] Yusuf Ali: Did ye think that ye would enter Heaven without God testing those of you who fought hard (in His Cause) and remained steadfast? [3.143] Pickthall: And verily ye used to wish for death before ye met it (in the field). Now ye have seen it [death] with your eyes! K 3:146 Set 8, Count 21 Yusuf Ali: How many of the prophets fought (in Allah\’s way) [Jihad], and with them (fought) large bands of godly men? But they never lost heart if they met with disaster in Allah\’s way [lost a battle], nor did they weaken (in will) nor give in. And Allah loves those who are firm and steadfast [in Jihad]. K 3:152-158 Set 9, Count 22-28 [3.152] And certainly Allah made good to you His promise when you slew them by His [Allah\'s] permission [during a Jihad battle], until when you became weak-hearted and disputed about the affair and disobeyed after He [Allah] had shown you that which you loved; of you were some who desired this world and of you were some who desired the hereafter; then He [Allah] turned you away from them that He might try you; and He has certainly pardoned you, and Allah is Gracious to the believers. [3.153] Pickthall: When ye climbed (the hill) and paid no heed to anyone, while the messenger, in your rear, was calling you (to fight). Therefore He rewarded you grief for (his) grief, that (He might teach) you not to sorrow either for that which ye missed [war spoils] or for that which befell you. Allah is informed of what ye do. [3.154] Then after sorrow He sent down security upon you, a calm coming upon a party of you, and (there was) another party whom their own souls had rendered anxious; they entertained about Allah thoughts of ignorance quite unjustly, saying: We have no hand in the affair. Say: Surely the affair is wholly (in the hands) of Allah. They conceal within their souls what they would not reveal to you. They say: Had we any hand in the affair, we would not have been slain here [in a Jihad battle]. Say: Had you remained in your houses, those for whom slaughter was ordained [in a Jihad battle] would certainly have gone forth to the places where they would be slain, and that Allah might test what was in your breasts and that He might purge what was in your hearts; and Allah knows what is in the breasts. [3.155] (As for) those of you who turned back on the day when the two armies met, only the Satan sought to cause them to make a slip on account of some deeds they had done, and certainly Allah has pardoned them; surely Allah is Forgiving, Forbearing. [3.156] O you who believe! be not like those who disbelieve and say of their brethren when they travel in the earth or engage in fighting: Had they been with us, they would not have died and they would not have been slain; so Allah makes this to be an intense regret in their hearts; and Allah gives life and causes death and Allah sees what you do. [3.157] And if you are slain in the way of Allah or you die, certainly forgiveness from Allah and mercy is better than what they amass [what those who stay home from Jihad receive—no booty and no perks in heaven]. [3.158] And if indeed you die or you are slain, certainly to Allah shall you be gathered together. K 3:165-167 Set 10, Count 29-31 [3.165] What! when a misfortune befell you, and you [Muslims] had certainly afflicted (the unbelievers) with twice as much [with Jihad], you began to say: Whence is this? Say: It is from yourselves; surely Allah has power over all things. [3.166] And what befell you on the day when the two armies met ([the Battle of] Uhud) was with Allah\’s knowledge, and that He might know the believers. [3.167] And that He might know the hypocrites; and it was said to them: Come, fight in Allah\’s way, or defend yourselves. They said: If we knew fighting, we would certainly have followed you. They were on that day much nearer to unbelief than to belief. They say with their mouths what is not in their hearts, and Allah best knows what they conceal. K 3:169 Set 11, Count 32 And reckon not those who are killed in Allah\’s way as dead; nay, they are alive (and) are provided sustenance from their Lord [meaning they are enjoying their 72 virgins in heaven]; K 3:172-173 Set 12, Count 33+34 [3.172] (As for) those who responded (at [the Battle of] Uhud) to the call of Allah and the Apostle after a wound had befallen them, those among them who do good (to others) and guard (against evil) shall have a great reward. [3.173] Those to whom the people said: Surely men have gathered against you [in battle], therefore fear them, but this increased their faith, and they said: Allah is sufficient for us and most excellent is the Protector. K 3:195 Set 13, Count 35 So their Lord accepted their prayer: That I will not waste the work of a worker among you, whether male or female, the one of you being from the other; they, therefore, who fled and were turned out of their homes and persecuted in My way and who fought and were slain, I will most certainly cover their evil deeds, and I will most certainly make them enter gardens beneath which rivers flow; a reward from Allah, and with Allah is yet better reward. K 4:071-072 Set 14, Count 36+37 [4.71] O you who believe! take your precaution, then go forth in detachments or go forth in a body [to war]. [4.72] And surely among you is he who would certainly hang back [from Jihad]! If then a misfortune befalls you he says: Surely Allah conferred a benefit on me that I was not present with them [in Jihad]. K 4:074-077 Set 15, Count 38-41 [4.74] Therefore let those fight in the way of Allah, who sell this world\’s life for the hereafter; and whoever fights in the way of Allah, then be he slain or be he victorious, We shall grant him a mighty reward. [4.75] And what reason have you that you should not fight in the way of Allah and of the weak among the men and the women and the children, (of) those who say: Our Lord! cause us to go forth from this town, whose people are oppressors, and give us from Thee a guardian and give us from Thee a helper. [4.76] Those who believe fight in the way of Allah, and those who disbelieve fight in the way of the Satan. Fight therefore against the friends of the Satan; surely the strategy of the Satan is weak. [4.77] Have you not seen those to whom it was said: Withhold your hands, and keep up prayer and pay the poor-rate; but when fighting is prescribed for them, lo! a party of them fear men as they ought to have feared Allah, or (even) with a greater fear, and say: Our Lord! why hast Thou ordained fighting for us? Wherefore didst Thou not grant us a delay to a near end? Say: The provision of this world is short, and the hereafter is better for him who guards (against evil); and you shall not be wronged the husk of a date stone. K 4:084 Set 16, Count 42 Fight then in Allah\’s way; this is not imposed on you except in relation to yourself, and rouse the believers to ardor maybe Allah will restrain the fighting of those who disbelieve and Allah is strongest in prowess and strongest to give an exemplary punishment. K 4:089-091 Set 17, Count 43-45 [4.89] They desire that you should disbelieve as they have disbelieved, so that you might be (all) alike; therefore take not from among them friends until they fly (their homes) in Allah\’s way; but if they turn back [to their homes], then seize them and kill them wherever you find them, and take not from among them a friend or a helper. [4.90] Except those who reach a people between whom and you there is an alliance, or who come to you, their hearts shrinking from fighting you or fighting their own people; and if Allah had pleased, He would have given them power over you, so that they should have certainly fought you; therefore if they withdraw from you and do not fight you and offer you peace, then Allah has not given you a way against them [Allah supposedly does not allow Muslims to fight people friendly to Muslims]. [4.91] You will find others who desire that they should be safe from you and secure from their own people; as often as they are sent back to the mischief they get thrown into it headlong; therefore if they do not withdraw from you, and (do not) offer you peace and restrain their hands, then seize them and kill them wherever you find them; and against these We have given you a clear authority. K 4:094-095 Set 18, Count 46+47 [4.94] O you who believe! when you go to war in Allah\’s way, make investigation, and do not say to any one who offers you peace: You are not a believer. Do you seek goods of this world\’s life! [Meaning that Muslim ought not say someone is a non-Muslim just to plunder him.] But with Allah there are abundant gains; you too were such before, then Allah conferred a benefit on you; therefore make investigation; surely Allah is aware of what you do. [4.95] The holders back from among the believers, not having any injury, and those who strive hard [Jihad] in Allah\’s way with their property and their persons are not equal; Allah has made the strivers with their property and their persons to excel the holders back a (high) degree, and to each (class) Allah has promised good; and Allah shall grant to the strivers [i.e., Jihadist] above the holders back a mighty reward: K 4:100-104 Set 19, Count 48-52 [4.100] And whoever flies in Allah\’s way [forsakes his home to fight in Jihad], he will find in the earth many a place of refuge and abundant resources, and whoever goes forth from his house flying to Allah and His Apostle, and then death overtakes him [in Jihad], his reward is indeed with Allah and Allah is Forgiving, Merciful. [4.101] Rodwell: And when ye go forth to war in the land, it shall be no crime in you to cut short your prayers, if ye fear lest the infidels come upon you; Verily, the infidels are your undoubted enemies! [4.102] And when you are among them and keep up the prayer for them, let a party of them stand up with you, and let them take their arms; then when they have prostrated themselves let them go to your rear, and let another party who have not prayed come forward and pray with you, and let them take their precautions and their arms; (for) those who disbelieve desire that you may be careless of your arms and your luggage, so that they may then turn upon you with a sudden united attack, and there is no blame on you, if you are annoyed with rain or if you are sick, that you lay down your arms, and take your precautions; surely Allah has prepared a disgraceful chastisement for the unbelievers. [4.103] Khalifa: Once you complete your Contact Prayer (Salat), you shall remember GOD while standing, sitting, or lying down. Once the war is over, you shall observe the Contact Prayers (Salat); the Contact Prayers (Salat) are decreed for the believers at specific times. [4.104] And be not weak hearted in pursuit of the enemy; if you suffer pain, then surely they (too) suffer pain as you suffer pain, and you hope from Allah what they do not hope; and Allah is Knowing, Wise. K 4:141 Set 20, Count 53 Sher Ali: Those who await your ruin. If you have a victory [in Jihad] from Allah, they say, ‘Were we not with you?’ And if the disbelievers have a share of it, they say to them, ‘Did we not on a previous occasion get the better of you and save you from the believers?’ Allah will judge between you on the day of Resurrection; and Allah will not grant the disbelievers a way to prevail against the believers. K 5:033 Set 21, Count 54 The punishment of those who wage war against Allah and His apostle and strive to make mischief in the land is only this, that they should be murdered or crucified or their hands and their feet should be cut off on opposite sides or they should be imprisoned [Pickthall and Yusuf Ali have \"exiled\" rather than \"imprisoned\"]; this shall be as a disgrace for them in this world, and in the hereafter they shall have a grievous chastisement, K 5:035 Set 22, Count 55 O you who believe! be careful of (your duty to) Allah and seek means of nearness to Him and strive hard [at Jihad] in His way that you may be successful. K 5:082 Set 23, Count 56 Certainly you will find the most violent of people in enmity for those who believe (to be) the Jews [compare \" with \"whenever Jews kindle fire for war, Allah [Muslims] puts it out\" (K 005:064)] and those who are polytheists [while they are converted to Islam on pain of death]… K 8:001 Set 24, Count 57 Pickthall: They ask thee (O Muhammad) of the spoils of war. Say: The spoils of war belong to Allah and the messenger, so keep your duty to Allah, and adjust the matter of your difference, and obey Allah and His messenger, if ye are (true) believers. K 8:005 Set 25, Count 58 Even as your Lord caused you to go forth from your house with the truth, though a party of the believers were surely averse; K 8:007 Set 26, Count 59 Yusuf Ali: Behold! Allah promised you one of the two (enemy) parties, that it should be yours: Ye wished that the one unarmed should be yours, but Allah willed to justify the Truth according to His words and to cut off the roots of the Unbelievers; K 8:009-010 Set 27, Count 60+61 [8.9]When you sought aid from your Lord [at the Battle of Badr], so He answered you: I will assist you [in Jihad] with a thousand of the angels following one another [see K 008:012]. [8.10] And Allah only gave it as a good news and that your hearts might be at ease thereby; and victory is only from Allah; surely Allah is Mighty, Wise. K 8:012 Set 28, Count 62 When your Lord revealed to the angels: I am with you, therefore make firm those who believe. I will cast terror into the hearts of those who disbelieve. Therefore strike off their heads and strike off every fingertip of them. K 8:015-017 Set 29, Count 63-65 [8.15] O you who believe! when you meet those who disbelieve marching for war, then turn not your backs to them. [8.16] And whoever shall turn his back to them on that day—unless he turn aside for the sake of fighting or withdraws to a company—then he, indeed, becomes deserving of Allah\’s wrath, and his abode is hell; and an evil destination shall it be. [8.17] So you did not slay them, but it was Allah Who slew them, and you did not smite when you smote (the enemy), but it was Allah Who smote [Allah gets the credit for Jihad], and that He might confer upon the believers a good gift from Himself; surely Allah is Hearing, Knowing. K 8:039-048 Set 30, Count 66-75 [8.39] Shakir: And fight with them until there is no more persecution and religion should be only for Allah; but if they desist, then surely Allah sees what they do. [8.40] Yusuf Ali: If they [unbelievers] refuse [to stop fighting], be sure that God is your Protector—the best to protect and the best to help. [8.41] Shakir: And know that whatever thing [loot] you gain, a fifth of it is for Allah and for the Apostle and for the near of kin and the orphans and the needy and the wayfarer, if you believe in Allah and in that which We revealed to Our servant, on the day of distinction, the day on which the two parties met [in a Jihad versus anti-Jihad battle]; and Allah has power over all things. [8.42] When you were on the nearer side (of the valley) and they were on the farthest side, while the caravan was in a lower place than you [the Makkan caravan the Muslims robbed]; and if you had mutually made an appointment, you would certainly have broken away from the appointment, but—in order that Allah might bring about a matter which was to be done, that he who would perish might perish by clear proof [bring success to Muslims engaged in robbing a caravan near Badr against all the odds], and he who would live might live by clear proof; and most surely Allah is Hearing, Knowing; [8.43] When Allah showed them [the Makkans] to you in your dream as few [fighters]; and if He had shown them [the Makkans] to you as many [fighters] you would certainly have become weak-hearted [i.e., hearts. See the similar discussion in K 002:249 about how a smaller army can defeat a larger army] and you would have disputed about the matter, but Allah saved (you); surely He is the Knower of what is in the breasts. [8.44] And when He showed them to you, when you met, as few [fighters] in your eyes and He made you to appear little [few fighters] in their eyes, in order that Allah might bring about a matter which was to be done [a Jihad versus anti-Jihad battle brought on by overconfidence in each side], and to Allah are all affairs returned. [8.45] O you who believe! when you meet a party [in battle], then be firm, and remember Allah much, that you may be successful. [8.46] And obey Allah and His Apostle and do not quarrel for then you will be weak in hearts [demoralized] and your power [to execute Jihad] will depart, and be patient; surely Allah is with the patient. [8.47] And be not like those [Makkans] who came forth from their homes [in an anti-Jihad War on Islamic terrorism] in great exultation and to be seen of men, and (who) turn away from the way of Allah, and Allah comprehends what they do. [8.48] And when the Satan made their works fair seeming to them, and [Satan] said [to the Makkans]: No one can overcome you this day, and surely I [Satan] am your protector: but when the two parties [Muslims versus Makkans] came in sight of each other he [Satan] turned upon his heels, and [Satan] said: Surely I am clear of you [the Makkans], surely I see what you do not see [Allah\'s angels], surely I fear Allah; and Allah is severe in requiting (evil). K 8:057-060 Set 31, Count 76-79 Pickthall: [8.57] If thou come on them in the war, deal with them so as to strike fear in those who are behind them, that haply they may remember. [8.58] Khalifa: When you are betrayed by a group of people, you shall mobilize against them in the same manner. GOD does not love the betrayers. [8.59] Shakir: And let not those who disbelieve think that they shall come in first; surely they will not escape. [8.60] And prepare against them what force you can and horses tied at the frontier, to frighten thereby the enemy of Allah and your enemy and others besides them, whom you do not know (but) Allah knows them; and whatever thing you will spend in Allah\’s way [for Jihad], it will be paid back to you fully and you shall not be dealt with unjustly. K 8:065-075 Set 32, Count 80-90 [8.65] O Prophet! urge the believers to war; if there are twenty patient ones of you they shall overcome two hundred, and if there are a hundred of you they shall overcome a thousand of those who disbelieve, because they are a people who do not understand [in other words, \"do not understand totalitarian ideologies like Islam\"]. [8.66] For the present Allah has made light your burden, and He knows that there is weakness in you; so if there are a hundred patient ones of you they shall overcome two hundred, and if there are a thousand they shall overcome two thousand by Allah\’s permission, and Allah is with the patient. [8.67] It is not fit for a prophet that he should take captives unless he has fought and triumphed in the land; you desire the frail goods [i.e., ransom money] of this world, while Allah desires (for you) the hereafter; and Allah is Mighty, Wise. [8.68] Had it not been for a previous ordainment [i.e., the revelation of K 008:067] from God, a severe penalty would have reached you for the (ransom) that you took [or better, \"would have taken\"]. [8.69] Eat then of the lawful and good (things) which you have acquired in war [war spoils], and be careful of (your duty to) Allah; surely Allah is Forgiving, Merciful. [8.70] O Prophet! say to those of the captives [non-Muslims] who are in your hands: If Allah knows anything good in your hearts, He will give to you better than that which has been taken away from you [in Jihad] and will forgive you, and Allah is Forgiving, Merciful. [8.71] Yusuf Ali: But if they have treacherous designs against thee, (O Apostle!) , they have already been in treason against God, and so hath [has] He [Allah] given (thee) power over them. And God so He Who hath (full) knowledge and wisdom. [8.72] Yusuf Ali: Those who believed, and adopted exile, and fought for the Faith, with their property and their persons, in the cause of God, as well as those who gave (them) asylum and aid, – these are (all) friends and protectors, one of another. As to those who believed but came not into exile, ye [you] owe no duty of protection to them until they come into exile; but if they seek your aid in religion, it is your duty to help them, except against a people with whom ye have a treaty of mutual alliance. And (remember) God seeth [sees] all that ye do. [8.73] Yusuf Ali: The Unbelievers are protectors, one of another: Unless ye do this, (protect each other), there would be tumult and oppression on earth, and great mischief. [8.74] Yusuf Ali: Those who believe, and adopt exile, and fight for the Faith, in the cause of God as well as those who give (them) asylum and aid, – these are (all) in very truth the Believers: for them is the forgiveness of sins and a provision most generous. [8.75] Yusuf Ali: And those who accept Faith subsequently, and adopt exile, and fight for the Faith in your company,—they are of you. But kindred by blood have prior rights against each other in the Book of God. Verily God is well acquainted with all things. K 9:005 Set 33, Count 91 So when the sacred months have passed away, then slay the idolaters wherever you find them, and take them captives and besiege them and lie in wait for them in every ambush, then if they repent and keep up prayer and pay the poor-rate, leave their way free to them; surely Allah is Forgiving, Merciful. K 9:012-014 Set 34, Count 92-94 [9.12] And if they break their oaths after their agreement and (openly) revile your religion, then fight the leaders of unbelief—surely their oaths are nothing—so that they may desist. [9.13] What! will you not fight a people who broke their oaths and aimed at the expulsion of the Apostle, and they attacked you first; do you fear them? But Allah is most deserving that you should fear Him, if you are believers. [9.14] Fight them, Allah will punish them by your hands and bring them to disgrace, and assist you against them and heal the hearts of a believing people. K 9:016 Set 35, Count 95 What! do you think that you will be left alone while Allah has not yet known those of you who have struggled hard [Jihad] and have not taken any one as an adherent besides Allah and His Apostle and the believers; and Allah is aware of what you do. K 9:019-020 Set 36, Count 96+97 [9.19] What! do you make (one who undertakes) the giving of drink to the pilgrims and the guarding of the Sacred Mosque like him who believes in Allah and the latter day and strives hard in Allah\’s way [Jihad]? They are not equal with Allah; and Allah does not guide the unjust people. [9.20] Those who believed and fled (their homes), and strove hard [Jihad] in Allah\’s way with their property and their souls, are much higher in rank with Allah; and those are they who are the achievers (of their objects). K 9:024-026 Set 37, Count 98-100 [9.24] Say: If your fathers and your sons and your brethren and your mates and your kinsfolk and property which you have acquired, and the slackness of trade which you fear and dwellings which you like, are dearer to you than Allah and His Apostle and striving in His way [Jihad]:, then wait till Allah brings about His command [to go on Jihad]: and Allah does not guide the transgressing people. [9.25] Certainly Allah helped you in many battlefields and on the day of [the Battle of] Hunain, when your great numbers made you vain, but they availed you nothing and the earth became strait to you notwithstanding its spaciousness, then you turned back retreating. [9.26] Then Allah sent down His tranquility upon His Apostle and upon the believers, and sent down hosts which you did not see, and chastised those who disbelieved [Muhammad gives credit to angels and Allah for the actions of Jihadists], and that is the reward of the unbelievers. K 9:029 Set 38, Count 101 Fight those who do not believe in Allah, nor in the latter day, nor do they prohibit what Allah and His Apostle have prohibited, nor follow the religion of truth, out of those who have been given the Book, until they pay the tax in acknowledgment of superiority and they are in a state of subjection. K 9:036 Set 39, Count 102 Surely the number of months with Allah is twelve months in Allah\’s ordinance since the day when He created the heavens and the earth, of these four being sacred; that is the right reckoning; therefore be not unjust to yourselves regarding them, and fight the polytheists all together as they fight you all together; and know that Allah is with those who guard (against evil). K 9:038-039 Set 40, Count 103+104 [9.38] O you who believe! What (excuse) have you that when it is said to you: Go forth in Allah\’s way [to Jihad], you should incline heavily to earth; are you contented with this world\’s life instead of the hereafter? But the provision of this world\’s life compared with the hereafter is but little. [9.38] If you do not go forth [to go on Jihad], He will chastise you with a painful chastisement and bring in your place a people other than you [to go on Jihad], and you will do Him no harm; and Allah has power over all things. K 9:041 Set 41, Count 105 They do not ask leave of you who believe in Allah and the latter day (to stay away) from striving hard with their property and their persons [Jihad], and Allah knows those who guard (against evil). K 9:044 Set 42, Count 106 They do not ask leave of you who believe in Allah and the latter day (to stay away) from striving hard [Jihad] with their property and their persons, and Allah knows those who guard (against evil). K 9:052 Set 43, Count 107 Say: Do you await for us but one of two most excellent things? And we await for you that Allah will afflict you with punishment from Himself or by our hands. So wait; we too will wait with you. K 9:073 Set 44, Count 108 O Prophet! strive hard [Jihad] against the unbelievers and the hypocrites and be unyielding to them; and their abode is hell, and evil is the destination. K 9:081 Set 45, Count 109 Those who were left behind were glad on account of their sitting behind Allah\’s Apostle and they were averse from striving m Allah\’s way [Jihad] with their property and their persons, and said: Do not go forth [to Jihad] in the heat. Say: The fire of hell is much severe in heat. Would that they understood (it). K 9:083 Set 46, Count 110 Therefore if Allah brings you back to a party of them and then they ask your permission to go forth, say: By no means shall you ever go forth with me and by no means shall you fight an enemy with me [in Jihad]; surely you chose to sit the first time, therefore sit (now) with those who remain behind. K 9:086 Set 47, Count 111 And whenever a chapter is revealed, saying: Believe in Allah and strive hard [in Jihad] along with His Apostle, those having ampleness of means ask permission of you and say: Leave us (behind), that we may be with those who sit. K 9:088 Set 48, Count 112 But the Apostle and those who believe with him strive hard [in Jihad] with their property and their persons; and these it is who shall have the good things and these it is who shall be successful. K 9:092 Set 49, Count 113 Yusuf Ali: Nor (is there blame) on those who came to thee to be provided with mounts [saddles on which to go to war], and when thou said, \"I can find no mounts for you,\" they turned back, their eyes streaming with tears of grief that they had no resources wherewith to provide the expenses [to go on Jihad]. K 9:111 Set 50, Count 114 Surely Allah has bought of the believers their persons and their property for this, that they shall have the garden; they fight in Allah\’s way, so they slay and are slain; a promise which is binding on Him in the Taurat and the Injeel and the Quran; and who is more faithful to his covenant than Allah? Rejoice therefore in the pledge which you have made; and that is the mighty achievement. K 9:120 Set 51, Count 115 Yusuf Ali: It was not fitting for the people of Madina and the Bedouin Arabs of the neighborhood, to refuse to follow Allah\’s Messenger, nor to prefer their own lives to his: because nothing could they suffer or do, but was reckoned to their credit as a deed of righteousness,- whether they suffered thirst, or fatigue, or hunger, in the cause of Allah [while on a march to Jihad], or trod paths to raise the ire of the Unbelievers [invade their territory], or received any injury whatever from an enemy [during a Jihad battle]: for Allah suffers not the reward to be lost of those who do good; K 9:122-123 Set 52, Count 116+117 [9.122] Pickthall: And the believers should not all go out to fight. Of every troop of them, a party only should go forth, that they (who are left behind) may gain sound knowledge in religion, and that they may warn their folk when they return to them, so that they may beware. [9.123] O you who believe! fight those of the unbelievers who are near to you and let them find in you hardness; and know that Allah is with those who guard (against evil). K 16:110 Set 53, Count 118 Yusuf Ali: But verily thy Lord,- to those who leave their homes after trials and persecutions,- and who thereafter strive and fight for the faith and patiently persevere,- Thy Lord, after all this is oft-forgiving, Most Merciful. K 22:039 Set 54, Count 119 Permission (to fight) is given to those upon whom war is made because they are oppressed, and most surely Allah is well able to assist them; K 22:058 Set 55, Count 120 Sher Ali: And those who leave their homes for the cause of Allah, and are then slain or die, Allah will, surely, provide for them a goodly provision. And, surely, Allah is the Best of providers. K 22:078 Set 56, Count 121 And strive hard [in Jihad] in (the way of) Allah, (such) a striving a is due to Him; He has chosen you and has not laid upon you a hardship in religion; the faith of your father Ibrahim; He named you Muslims before and in this, that the Messenger may be a bearer of witness to you, and you may be bearers of witness to the people; therefore keep up prayer and pay the poor-rate and hold fast by Allah; He is your Guardian; how excellent the Guardian and how excellent the Helper! K 24:053 Set 57, Count 122 And they swear by Allah with the most energetic of their oaths that if you command them they would certainly go forth [to Jihad (see K 024:055)]. Say: Swear not; reasonable obedience (is desired); surely Allah is aware of what you do. K 24:055 Set 58, Count 123 Allah has promised to those of you who believe and do good that He will most certainly make them rulers in the earth [as a reward for going on Jihad (see K 024:053)] as He made rulers those before them, and that He will most certainly establish for them their religion which He has chosen for them, and that He will most certainly, after their fear, give them security in exchange; they shall serve Me, not associating aught with Me; and whoever is ungrateful after this, these it is who are the transgressors. K 25:052 Set 59, Count 124 Palmer: So obey not the unbelievers and fight strenuously with them in many a strenuous fight. K 29:006 Set 60, Count 125 And whoever strives hard [in Jihad], he strives only for his own soul; most surely Allah is Self-sufficient, above (need of) the worlds. K 29:069 Set 61, Count 126 And (as for) those who strive hard [in Jihad] for Us [Allah], We will most certainly guide them in Our ways; and Allah is most surely with the doers of good. K 33:015 Set 62, Count 127 Pickthall: And verily they had already sworn unto Allah that they would not turn their backs (to the foe) [in Jihad battle]. An oath to Allah must be answered for. K 33:018 Set 63, Count 128 Allah knows indeed those among you who hinder others and those who say to their brethren: Come to us; and they come not to the fight [Jihad] but a little, K 33:020 Set 64, Count 129 They think the allies are not gone, and if the allies should come (again) they would fain [gladly] be in the deserts with the desert Arabs asking for news about you, and if they were among you they would not fight save a little [in Jihad]. K 33:023 Set 65, Count 130 Pickthall: Of the believers are men who are true to that which they covenanted with Allah. Some of them have paid their vow by death (in battle), and some of them still are waiting; and they have not altered in the least. K 33:25-27 Set 66, Count 131-133 [33.25] And Allah turned back the unbelievers in their rage; they did not obtain any advantage, and Allah sufficed the believers in fighting; and Allah is Strong, Mighty. [33.26] And He drove down those of the followers of the Book who backed them from their fortresses and He cast awe into their hearts; some [Jews] you killed and you took captive another part. [33.27] And He made you heirs to their [Jewish] land and their dwellings and their property, and (to) a land which you have not yet trodden, and Allah has power over all things. K 33:050 Set 67, Count 134 O Prophet! surely We have made lawful to you your wives whom you have given their dowries, and those [captive women] whom your right hand possesses out of those whom Allah has given to you as prisoners of war, and the daughters of your paternal uncles and the daughters of your paternal aunts, and the daughters of your maternal uncles and the daughters of your maternal aunts who fled with you; and a believing woman if she gave herself to the Prophet, if the Prophet desired to marry her—specially for you, not for the (rest of) believers; We know what We have ordained for them concerning their wives and those whom their right hands possess in order that no blame may attach to you; and Allah is Forgiving, Merciful. K 42:039 Set 68, Count 135 Sale: …and who, when an injury is done them, avenge themselves… K 47:004 Set 69, Count 136 So when you meet in battle those who disbelieve, then smite the necks until when you have overcome them, then make (them) prisoners, and afterwards either set them free as a favor or let them ransom (themselves) until the war terminates. That (shall be so); and if Allah had pleased He would certainly have exacted what is due from them, but that He may try some of you by means of others; and (as for) those who are slain in the way of Allah, He will by no means allow their deeds to perish. K 47:020 Set 70, Count 137 And those who believe say: Why has not a chapter been revealed? But when a decisive chapter is revealed, and fighting [allusion to Jihad] is mentioned therein you see those in whose hearts is a disease look to you with the look of one fainting because of death. Woe to them then! K 47:035 Set 71, Count 138 Rodwell: Be not fainthearted then; and invite not the infidels to peace when ye have the upper hand: for God is with you, and will not defraud you of the recompense of your works… K 48:15-24 Set 72, Count 139-148 [48.15] Pickthall: Those who were left behind will say, when ye set forth to capture booty: Let us go with you. They fain would change the verdict of Allah. Say (unto them, O Muhammad): Ye shall not go with us. Thus hath Allah said beforehand. Then they will say: Ye are envious of us. Nay, but they understand not, save a little. [48.16] Shakir: Say to those of the dwellers of the desert who were left behind: You shall soon be invited (to fight) against a people possessing mighty prowess; you will fight against them until they submit; then if you obey, Allah will grant you a good reward [booty]; and if you turn back as you turned back before, He will punish you with a painful punishment. [48.17] Pickthall: There is no blame for the blind, nor is there blame for the lame, nor is there blame for the sick (that they go not forth to war). And whoso obeyeth Allah and His messenger [by going on Jihad], He will make him enter Gardens underneath which rivers flow; and whoso turneth back [from Jihad], him will He punish with a painful doom. [48.18] Certainly Allah was well pleased with the believers when they swore allegiance to you under the tree, and He knew what was in their hearts, so He sent down tranquility on them and rewarded them with a near victory, [48.19] And much booty that they will capture. Allah is ever Mighty, Wise. [48.20] Allah promised you many acquisitions which you will take, then He hastened on this one for you and held back the hands of men from you, and that it may be a sign for the believers and that He may guide you on a right path. [48.21] Sale: And [he also promiseth you] other [spoils], which ye have not [yet] been able [to take]: But now hath God encompassed them [for you]; and God is almighty. [48.22] And if those who disbelieve fight with you, they would certainly turn (their) backs, then they would not find any protector or a helper. [48.23] Such [i.e., the Jihad mentioned the previous verse] has been the course [practice] of Allah that has indeed run before, and you shall not find a change in Allah’s course. [48.24] And He [Allah] it is Who held back their hands from you and your hands from them [in Jihad] in the valley of Mecca after He had given you victory over them; and Allah is Seeing what you do. K 49:015 Set 73, Count 149 Sale: Verily the true believers [are] those only who believe in God and his apostle, and afterwards doubt not; and who employ their substance and their persons in the defense of God\’s true religion: These are they who speak sincerely. K 59:002 Set 74, Count 150 He it is Who caused those who disbelieved of the followers of the Book to go forth from their homes at the first banishment you did not think that they would go forth, while they were certain that their fortresses would defend them against Allah; but Allah came to them whence they did not expect, and cast terror into their hearts; they demolished their houses with their own hands and the hands of the believers [i.e. Muslims demolished Jewish homes]; therefore take a lesson, O you who have eyes! K 59:5-8 Set 75, Count 151-154 Pickthall:[59.5] Whatsoever palm-trees you cut—cut down or left standing on their roots [during a Jihad siege of the Jews at Madina], it was by Allah\’s leave, in order that He might confound the evil-livers [Jews]. [59.6] And that which Allah gave as spoil unto His messenger from them, you urged not any horse or riding-camel for the sake thereof, but Allah gives His messenger lordship over whom He will. Allah is Able to do all things. [59.7] That which Allah gives as [war] spoil unto His messenger from the people of the townships [Jews], it is for Allah and His messenger and for the near of kin and the orphans and the needy and the wayfarer, that it become not a commodity between the rich among you. And whatsoever [spoils] the messenger gives you, take it. And whatsoever he forbids, abstain (from it). And keep your duty to Allah. Lo! Allah is stern in reprisal. [59.8] And (it is) for the poor fugitives who have been driven out from their homes and their belongings, who seek bounty [war spoils] from Allah and help Allah and His messenger. They are the loyal. K 59:014 Set 76, Count 155 They will not fight against you in a body save in fortified towns or from behind walls; their fighting between them is severe, you may think them as one body, and their hearts are disunited; that is because they are a people who have no sense. K 60:009 Set 77, Count 156 Allah only forbids you respecting those who made war upon you on account of (your) religion [i.e., no fraternizing with the enemy], and drove you forth from your homes and backed up (others) in your expulsion, that you make friends with them, and whoever makes friends with them, these are the unjust. K 61:004 Set 78, Count 157 Surely Allah loves those who fight in His way in ranks as if they were a firm and compact wall. K 61:011 Set 79, Count 158 You shall believe in Allah and His Apostle, and struggle hard in Allah\’s way [Jihad] with your property and your lives; that is better for you, did you but know! K 61:013 Set 80, Count 159 And yet another (blessing) that you love: help from Allah and a victory [in Jihad] near at hand; and give good news to the believers. K 63:004 Set 81, Count 160 And when you see them, their persons will please you, and If they speak, you will listen to their speech; (they are) as if they were big pieces of wood clad with garments; they think every cry to be against them. They are the enemy, therefore beware of them; may Allah destroy them, whence are they turned back? [This verse speaks of internecine Jihad against Muslims deemed infidels or \"hypocrites.\"] K 64:014 Set 82, Count 161 O you who believe! surely from among your wives and your children there is an enemy to you; therefore beware of them [collaborators with the enemy, especially if the women were once war spoils]; and if you pardon and forbear and forgive, then surely Allah is Forgiving, Merciful. K 66:009 Set 83, Count 162 O Prophet! strive hard against the unbelievers and the hypocrites, and be hard against them; and their abode is hell; and evil is the resort. K 73:020 Set 84, Count 163 Surely your Lord knows that you pass in prayer nearly two-thirds of the night, and (sometimes) half of it, and (sometimes) a third of it, and (also) a party of those with you; and Allah measures the night and the day. He knows that you are not able to do it, so He has turned to you (mercifully), therefore read what is easy of the Quran. He knows that there must be among you sick, and others who travel in the land seeking of the bounty of Allah, and others who fight in Allah\’s way, therefore read as much of it as is easy (to you), and keep up prayer and pay the poor-rate and offer to Allah a goodly gift, and whatever of good you send on beforehand for yourselves, you will find it with Allah; that is best and greatest in reward; and ask forgiveness of Allah; surely Allah is Forgiving, Merciful. K 76:008 Set 85, Count 164 And they [Muslims] give food out of love for Him [Allah] to the poor and the orphan and the captive [of Jihad]… VI. Footnotes 1 This list was compiled based on the examination of

    dr.satyendra के द्वारा
    December 1, 2010

    ऊपर लिखे अन्म्शों को समझने का प्रयास कर रहा हूँ की ये किस सन्दर्भ में और क्यूँ लिखे गए हैं ? हो सकता है ये किसी विशेष परिस्थिति में लिखे गए हों .

    dr.satyendra के द्वारा
    December 1, 2010

    trying to understand above said , in which contest these sooras were written

vivek dubey के द्वारा
November 26, 2010

supreme lord be true and formless, the reason behind it http://vedikhindudharm.blogspot.com/2010/11/god-be-true-and-formless-reason-behind.html Moon in the Hindu astrological effect based on the science http://vedikhindudharm.blogspot.com/2010/11/moon-in-hindu-astrological-effect-based.html properties of the President http://vedikhindudharm.blogspot.com/2010/11/properties-of-president.html what is oum ? why put forward oum in sanskrit mantra ? http://vedikhindudharm.blogspot.com/2010/11/what-is-oum-why-put-forward-oum-in.html A son http://vedikhindudharm.blogspot.com/2010/11/son.html एक ईश्वरवाद की बात करने वालों क्या प्रमाण है तुम्हारे पास की प्रम प्रभु एक हैं ? नही परमानित कर सकते तो इन सबको पढ़ लो Four Types of Adulterous Relations in Islam are called Marriages! http://vedikhindudharm.blogspot.com/2010/11/four-types-of-adulterous-relations-in.html

vivek dubey के द्वारा
November 26, 2010

समझदारों जरा कुरान की इन आयतों को भी पद लो । कभी कुरान पढ़ी है ? 1- काफिरों ( मूर्ति पूजक )पर हमेशा रौब डालते रहो .और मौक़ा मिलकर सर काट दो .सूरा अनफाल -8 :112 2 -काफिरों ( मूर्ति पूजक )को फिरौती लेकर छोड़ दो या क़त्ल कर दो . “अगर काफिरों से मुकाबला हो ,तो उनकी गर्दनें काट देना ,उन्हें बुरी तरह कुचल देना .फिर उनको बंधन में जकड लेना .यदि वह फिरौती दे दें तो उनपर अहसान दिखाना,ताकि वह फिर हथियार न उठा सकें .सूरा मुहम्मद -47 :14 3 -गैर मुसलमानों को घात लगा कर धोखे से मार डालना . ‘मुशरिक जहां भी मिलें ,उनको क़त्ल कर देना ,उनकी घात में चुप कर बैठे रहना .जब तक वह मुसलमान नहीं होते सूरा तौबा -9 :5 4 -हरदम लड़ाई की तयारी में लगे रहो . “तुम हमेशा अपनी संख्या और ताकत इकट्ठी करते रहो.ताकि लोग तुमसे भयभीत रहें .जिनके बारेमे तुम नहीं जानते समझ लो वह भी तुम्हारे दुश्मन ही हैं .अलाह की राह में तुम जो भी खर्च करोगे उसका बदला जरुर मिलेगा .सूरा अन फाल-8 :60 5 -लूट का माल हलाल समझ कर खाओ . “तुम्हें जो भी लूट में माले -गनीमत मिले उसे हलाल समझ कर खाओ ,और अपने परिवार को खिलाओ .सूरा अन फाल-8 :69 6 -छोटी बच्ची से भी शादी कर लो . “अगर तुम्हें कोई ऎसी स्त्री नहीं मिले जो मासिक से निवृत्त हो चुकी हो ,तो ऎसी बालिका से शादी कर लो जो अभी छोटी हो और अबतक रजस्वला नही हो .सूरा अत तलाक -65 :4 7 -जो भी औरत कब्जे में आये उससे सम्भोग कर लो. “जो लौंडी तुम्हारे कब्जे या हिस्से में आये उस से सम्भोग कर लो.यह तुम्हारे लिए वैध है.जिनको तुमने माल देकर खरीदा है ,उनके साथ जीवन का आनंद उठाओ.इस से तुम पर कोई गुनाह नहीं होगा .सूरा अन निसा -4 :3 और 4 :24 8 -जिसको अपनी माँ मानते हो ,उस से भी शादी कर लो . “इनको तुम अपनी माँ मानते हो ,उन से भी शादी कर सकते हो .मान तो वह हैं जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया .सूरा अल मुजादिला 58 :2 9 -पकड़ी गई ,लूटी गयीं मजबूर लौंडियाँ तुम्हारे लिए हलाल हैं . “हमने तुम्हारे लिए वह वह औरते -लौंडियाँ हलाल करदी हैं ,जिनको अलाह ने तुम्हें लूट में दिया हो .सूरा अल अह्जाब -33 :50 10 -बलात्कार की पीड़ित महिला पहले चार गवाह लाये . “यदि पीड़ित औरत अपने पक्ष में चार गवाह न ला सके तो वह अलाह की नजर में झूठ होगा .सूरा अन नूर -24 :१३ 11 -लूट में मिले माल में पांचवां हिस्सा मुहम्मद का होगा . “तुम्हें लूट में जो भी माले गनीमत मिले ,उसमे पांचवां हिस्सा रसूल का होगा .सूरा अन फाल- 8 :40 12 -इतनी लड़ाई करो कि दुनियामे सिर्फ इस्लाम ही बाकी रहे . “यहांतक लड़ते रहो ,जब तक दुनिया से सारे धर्मों का नामोनिशान मिट जाये .केवल अल्लाह का धर्म बाक़ी रहे.सूरा अन फाल-8 :39 13 -अवसर आने पर अपने वादे से मुकर जाओ . “मौक़ा पड़ने पर तुम अपना वादा तोड़ दो ,अगर तुमने अलाह की कसम तोड़ दी ,तो इसका प्रायश्चित यह है कि तुम किसी मोहताज को औसत दर्जे का साधारण सा खाना खिला दो .सूरा अल मायदा -5 :89 14 – इस्लाम छोड़ने की भारी सजा दी जायेगी . “यदि किसी ने इस्लाम लेने के बाद कुफ्र किया यानी वापस अपना धर्म स्वीकार किया तो उसको भारी यातना दो .सूरा अन नहल -16 :106 15 – जो मुहम्मद का आदर न करे उसे भारी यातना दो “जो अल्लाह के रसूल की बात न माने ,उसका आदर न करे,उसको अपमानजनक यातनाएं दो .सूरा अल अहजाब -33 :57 16 -मुसलमान अल्लाह के खरीदे हुए हत्यारे हैं . “अल्लाह ने ईमान वालों के प्राण खरीद रखे हैं ,इसलिए वह लड़ाई में क़त्ल करते हैं और क़त्ल होते हैं .अल्लाह ने उनके लिए जन्नत में पक्का वादा किया है .अल्लाह के अलावा कौन है जो ऐसा वादा कर सके .सूरा अत तौबा -9 :111 17 -जो अल्लाह के लिए युद्ध नहीं करेगा ,जहन्नम में जाएगा . “अल्लाह की राह में युद्ध से रोकना रक्तपात से बढ़कर अपराध है.जो युद्ध से रोकेंगे वह वह जहन्नम में पड़ने वाले हैं और वे उसमे सदैव के लिए रहेंगे .सूरा अल बकरा -2 :217 18 -जो अल्लाह की राह में हिजरत न करे उसे क़त्ल करदो जो अल्लाह कि राह में हिजरत न करे और फिर जाए ,तो उसे जहां पाओ ,पकड़ो ,और क़त्ल कर दो .सूरा अन निसा -4 :89 19 -अपनी औरतों को पीटो. “अगर तुम्हारी औरतें नहीं मानें तो पहले उनको बिस्तर पर छोड़ दो ,फिर उनको पीटो ,और मारो सूरा अन निसा – 4 :34 20 -काफिरों के साथ चाल चलो . “मैं एक चाल चल रहा हूँ तुम काफिरों को कुछ देर के लिए छूट देदो .ताकि वह धोखे में रहें अत ता.सूरा रिक -86 :16 ,17 21 -अधेड़ औरतें अपने कपडे उतार कर रहें . “जो औरतें अपनी जवानी के दिन गुजार चुकी हैं और जब उनकी शादी की कोई आशा नहीं हो ,तो अगर वह अपने कपडे उतार कर रख दें तो इसके लिए उन पर कोई गुनाह नहीं होगा .सूरा अन नूर -24 :60 क्या इस्लाम ये सिखाता है ???

    dr.satyendra के द्वारा
    November 29, 2010

    is it really from Quran????? seems to be ver funny. mmay be ur own views :)

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

    मैंने कुरान मजीद एकाधिक बार पढी है। मुझे ऐसा कुछ नहीं दिखा। न मैं इन उल्लिखित अर्थों- निष्कर्षों से सहमत हूं। किसी के खिलाफ कहने को बहुत हो सकता है, लेकिन इससे हम देश-समाज को क्या दे रहे हैं, यह देखने की बात है। वास्तविक संदर्भों से हट कर जाने अनजाने कुअर्थ निकाल हम अनर्थ ही कर रहे हैं। मैं इस्लाम का कोई कोई प्रचार नहीं कर रहा , न कुरान या इस्लाम को मुझ जैसे छोटे ब्यक्ति के प्रचार की कोई जरूरत है। इस्लाम एक सुस्थापित विचारधारा है और कुरान पूरी तरह नैतिकता पर जोर देने वाला प्रकाश-ग्रंथ । उसके विचार- दर्शन पूरी तरह वैदिक विचार धारा और गीता का अनुगामी हैै, यह मैंने हृदय से महशूस किया है। मेरा करबद्ध निवेदन है कि हम प्रेम-सदभाव बढाने वाली ही बातें करें तो शायद धर्म के अधिक नजदीक होंगे। ऐसी बात जिससे किसी को चोट पहुंचे अधर्म है। रामायण का ही उदघोष है- परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीडा सम नहिं अधमाई।

    dr.satyendra के द्वारा
    November 29, 2010

    http://www.answering-islam.org/Quran/Themes/jihad_passages.html trying to understand this , found in google searchafter reading above post

    satyendrasingh के द्वारा
    December 6, 2010

    आदरनीय वाजपायी जी मुझे आशा थी की आप उपर्युक्त लिंक पढ़ कर मेरी शंकाओं का समाधान करते किन्तु आपने नहीं किया :( सादर

    sdvajpayee के द्वारा
    December 6, 2010

        प्रिय श्री डा. सत्‍येन्‍द्र सिंह जी,  कुछ तो मजबूरियां रहीं होंगी, वर्ना कोई यूं ही बेवफा नहीं होता।  इस पर आप से बात करने को भविष्‍य के लिए रख लिया है। अभी अपेक्षित समय नहीं मिल पा रहा । आशा है स्‍नेहानुग्रह बनाये रखेंगे।

Mustafa के द्वारा
November 14, 2010

वाजपेयी जी हम आपसे सहमत है और खुश भी है की कोई तो है जो दो नो धर्म को एक मानते है…. घर का मालिक एक ही होता है। मै फरमाना चाहता हूं कि जब दुनिया एक है मालिक एक है तो फिर बहस क्यों? क्या फर्क पड़ता है कि हम अल्लाह कहें यह भगवान कहें और न वो कभी कहते हैं कि मुझे इस नाम से नवाजो। आज मै आप को एक जीता जागता उदाहरण देता हूं…..आसमान मे निकले सूरज को ही लिजिए हम उसे हमारी भाषा में आफताब कहतें हैं आप सूरज कहते हैं अंग्रेजी भाषा में सन कहते हैं। न जाने कितने नाम है उसके। कहने का अर्थ यह है कि सत्य तो सत्य ही रहेगा और यह भी सत्य है कि एक ना एक दिन सत्य को स्वीकार करना ही है तो आज क्यों नहीं ? इस्लाम का अर्थ है खुदा को मानना…मस्जिद में अगर राम जी मूर्ती रख दी जाए तो भी मुझे खुशी ही होगी क्यों कि तब हम एक साथ ईश्वर के कई रुपो को एक साथ देख पाएंगे…… सब का अपना नजरिया है……

    sdvajpayee के द्वारा
    November 15, 2010

     मुस्‍तफा भाई , मैं धर्म के बारे में आपके यह विचार श्री केएम मिश्र जी ,डा. सत्‍येन्‍द्र सिंह जी समेत तमाम उन भाइयों से पढने का आग्रह करूंगा जो मेरे लेख से बिल्‍कुल भी सहमत नहीं हो पा रहे थे। आप के विचार ही वास्‍तविक भक्ति है।

    kmmishra के द्वारा
    November 15, 2010

    प्रिय मुस्तफा भाई सादर नमस्कार । मैं आपसे पूर्णतः सहमत हूं । यही मैंने भी कहा है अपनी छोटी सी टिप्पणी में । असल में प्रेम दोतरफा होना चाहिये । हम साथ साथ हैं सैंकड़ों सालों से लेकिन एक दूसरे को समझने की कोशिशें अभी भी जारी हैं । हमें न सिर्फ एक दूसरे की भावना और आस्था का सम्मान करना सीखना होगा बल्कि प्रेम को मजबूत बनाने के लिये उस रास्ते पर हाथ पकड़ कर चल भी देना होगा । मैं आपसे और राशिदजी की सोच से प्रभावित हूं । हमारा प्रेम सत्य के धरातल पर होगा तो दुनिया के सामने एक बहुत बड़ी मिसाल होगा । इतिहास से सबक लेते हुये अपनी अपनी गलतियों को न दोहराने का संकल्प ले कर ही हम दो समुदायों के बीच प्रेम और समरसता को बढ़ा पायेंगे । आपकी बहुमूल्य टिप्पण्णी के लिनये आभारी हूं ।

    dr.satyendra के द्वारा
    November 29, 2010

    Sir! Mustafa bhai is very near to you and us , I am also of the same opinion. but let Mustafa bhai have a fatwa from Dev Vand on his views . As a human being Mustafa is 100% correct , but as a muslim his view is against the Islamic thought, as well as , against Paigambers rules of Islam

sdvajpayee के द्वारा
November 12, 2010

प्रिय डा. सत्‍येन्‍द्र सिंह‍ जी, श्री केएम मिश्र जी के सवालों के संदर्भ में आपकी प्रतिक्रिया देखी और सामाजिक समरसता बढाने के सर्वमान्‍य उपाय बताने के बारे में अपेक्षा भी। डा. साहब, आपने लिया है कि इतिहास से सबक लेते हुए सामाजिक समरसता का ऐसा रास्‍ता अवश्‍य खोजना चाहिए जो सत्‍य पर आधारित हो और सत्‍य कडुवा होता है। निवेदन: सत्‍य कडुवा नहीं होता। सत्‍य तो सत्‍य होता । कडुवा होता है हमारा मनोभाव, हमारी अपनी वृत्ति। सत्‍य तो यह भी है कि किसी धर्म विशेष के रीति रिवाजों को मानना दूध का धुला होने की गारंटी नहीं है। न ही इसी आधार पर किसी समुदाय को हिंस्र ,धर्म विरोधी और देश विरोधी कहा जा सकता है। हम सब एक ही परमेश्‍वर की संतान हैं। गुण-दोष सब में हैं। रास्‍ता है प्रेम का । सिर्फ प्रेम का।प्रेम ही लीक हो सकता है। इतिहास से भी यही सबक लेना चाहिए कि नफरत की आग से कब किसका भला हुआ है। मिलजुल कर भी रह सकते हैं। यही इंसानियत, यही समझदारी और यही धर्म है। यह रास्‍ता ठीक लगता है तो पीछे नहीे चलना, आगे बढें और मोहब्‍बतें फैलाने वाला कारवां बनायें। राह कठिन जरूर है लेकिन असंभव नहीं। काबा तोडा नहीं गया था। वहां से सिर्फ मूर्तियां हटवायीं गयीं थीं। उन मूर्तियों की आड में कितना अधर्म-अनाचार हो गया था, यह भी समझने की बात है। मूलत: इस्‍लाम भी असहिष्‍णु नहीं है। उसे दिल में न उतारने वाले उसके तथाकथित हो सकते हैं। वैदिक धर्म के अगर सर्वाधिक कोई धार्मिक विचार धारा है तो इस्‍लाम है। एक बार दोनों ने यह तथ्‍य समझ लिया और आपस में दिल मिल गए तो भारत फिर सोने की चिडिया होने की स्‍िथिति में होगा और दुनिया को दिशा दे सकेगा। वैदिक धर्म मूर्तिपूजा का बहुत आग्रही नहीं है। महर्षि दयानंद सरस्‍वती ने तो मूर्ति पूजा को वेद विरुद्ध बताते हुए इसके खिलाफ अभियान ही छेडा था। साकार- निराकार दोनों एक हैं। समझने का फेर है। इस्‍लाम निराकार प्रधान तो है पर ईश्‍वर के बारे में उसकी अवधारणा साकार से मिलती है। जिन्‍हें हम हिन्‍दू कहते हैं उनमें मूर्तिपूजक भी हैं और मूर्तिपूजा न करने वाले भी। सभी धर्मों का सार प्रेम है। दोनों पक्षों को इसे माना होगा। संकल्‍प लें कि ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे दूसरे भावनायें आहत हों। वही करेंगे , कहेंगे जिससे दोनों में प्रेम- विश्‍वास और एक दूसरे को सम्‍मान देने का भाव बढे। व्‍यवहार में संयम रखें और संवेगों पर नियंत्रण। धर्म से अधिक अध्‍यात्‍म पर जोर दें। अध्‍यात्‍म में गोलबंदी की गुंजाइश नहीं होती।

    dr.satyendra के द्वारा
    November 13, 2010

    हमारा विषय ये है की कोई मूर्ति पूजता है या नहीं इस आधार पर उसे काफ़िर मानना सही है क्या ? उससे घ्रिडा करना उसकी आस्था के केन्द्रों को तोड़ देना न्यायोचित है क्या? क्या वास्तव में लोग मूर्ती की ही पूजा करते हैं या फिर एक माद्यम के माध्यम सड़े निराकार इश्वर में लीं हो जाते हैं मुझे तो पूजा करते वक्त आज तक मूर्ति दिखाई ही नहींदी पूजपधती के आधार पर घ्रिडा जायज है क्या? मूर्ती पूजने से पडोसी के कार्य कलापों पर कोई विपरीत प्रभाव पड़ता हो ऐसा कभी देखा है क्या? मेरे विचार में पूजा करना ही महत्वपूर्ण है किस प्रकार से किस आसन द्वारा पूजा की जा रही है ये विवाद का विषय ही नहीं होना चाहिए . कोई नास्तिक भी यदि समाज विरोधी कार्यों में लिप्त नहीं है तो वोह भी सम्मान के योग्य है . बम्मियाँ में भगवान् बुद्ध की पोरादिक मूर्तियाँ यदि ऐतिहासिक साख्यों के रूप में राखी भी रहती तो इश्वर को कोई फर्क पड़ने वाला था क्या या फिर टूट गयी तो कोई फर्क पद गया? सर्व्शाकिमान इश्वर की निगाह में मूर्ती का होना न होना दोनों ही निरर्थक हैं लेकिन किसी के आस्था और विस्वास की प्रतिमूर्ति को तोड़ कर निश्चित ही हम घ्रिडा का माहोल ही पैदा करते हैं और घ्रिडा में कभी इश्वर रह ही नहीं सकता, जहाँ इश्वर है वहां अध्यात्म है , वहीँ प्रेम है वहीँ अहिंसा है हिंसा से इश्वर का क्या वास्ता? ये तो विवाद का विषय होना ही नहीं चाहिए की मैं स्सेद्धा सोता हूँ तो आप भी सीधे ही सोइए मैं करवट से सोता हूँ तो आप भी करवट लेकर ही सोयिये . विवाद के विषय ही इतने निरर्थक हैं जिन्हें यदि थोडा ऊपर से देखा जाए तो स्वाम पर ही हंसी आये फिर भी विवाद हैं और वो सत्य हैं और विवाद का मूल कारन ही बड़ा फिजूल सा है की मेरी साडी तेरी साडी से ज्यादा सफ़ेद क्यूँ? :० :) अध्यात्म और प्रेम की बात अपनी जगह पर है एर सामजिक संरचना , भोगोलिक , धार्मिक विवाद अपनी जगह राह तो धरातल पर ही निकालनी होगी न ! और धरातल इतना नर्म नहीं है जितना की हम और आप कंप्यूटर पर बैठ कर समझ रहे हैं धन्यबाद

    sdvajpayee के द्वारा
    November 14, 2010

    प्रिय डा. सत्‍येन्‍द्र सिंह जी, समयाभाव में श्री केएम मिश्र जी सवालों- दलीलों के बारे अपनी राय नहीं दे पाया था। इसी बीच आपके कुछ सवाल-शंकायें भी देखी जो श्री मिश्र जी के पक्ष के नजदीक हैं। मिश्र जी के विस्‍तृत पक्ष पर अपना निवेदन ‘समय मिलने पर ‘ छोड संक्षेप में आप के प्रमुख्‍ सवालों पर अपनी बात रख रहा हूं। मैं केवल कुरान और पैगम्‍बर मोहम्‍मद की बात करता हूं। और कोई क्‍या कह-कर रहा है नहीं जानता। कुरान में काफिर शब्‍द विभिन्‍न संदर्भों में कई अर्थों में आया है। मोटे तौर काफिर का अर्थ होता न मानना वाला। कुफ्र को अश्रद्धा कह सकते हैं। श्रद्धा पर वैदिक विचारधारा में सर्वाधिक जोर दिया गया है। कुरान के अनुसार जो एक ईश्‍वर की सत्‍ता को न माने , ईश्‍वर का कोई साझीदार माने और मोहम्‍मद को रसूल न माने वह काफिर है। कुरान में कहीं हिन्‍दू या भारतवासियों को काफिर नहीं कहा गया है। कुरान में कहीं नहीं है कि जहां जहां मूर्तियों वाले मंदिर दिखें उन्‍हें ध्‍वस्‍त कर दो। काबा का मामला कोई हिन्‍दूबनाम मुस्लिम का नहीं था। काबा सदियों से एकेश्‍वरवाद का अरब का सबसे बडा उपासना केन्‍द्र था। जैसे आजकल के पंडे-पुजारी अपनी कमाई बढाते रहने के लिए तमाम अंधविश्‍वास और लोगों को गुमराह करने वाली बातें व तरीके अपना लेते हैं वैसे ही काबा के व्‍यवस्‍थापकों ने कर लिया था। वास्‍तविक धर्म -उपासना नेपथ्‍य में चली गयी थी। काबा के कब्‍जेदार-पुजारी कोई और नही मोहम्‍मद के ही कुटुम्‍बी थे। मोहम्‍मद साहब ने कहीं किसी धार्म्रिक स्‍थल पर न कभी हमला किया और न ऐसा करने के लिए कहा। वह मूलत: दार्शनिक -संत थे। साम्राज्‍यवादी नहीं। संगए असवद को बहुत लोग मूर्तिपूजा के प्रतीक के रूप में मानते हैं। आपको पूजा करते वक्‍त मूर्ति नहीं दिखती यह आपकी भक्ति-श्रेष्‍ठता है लेकिन उसी ईश्‍वर की सर्वोत्‍कृष्‍ट कृति मनुष्‍य के बारे में विभेद क्‍यों दिखता है। हम निर्जीव पत्‍थर को तो भगवान मान लेते हैं सजीव में भी भगवान को नहीं देखते। पूजा करना महत्‍वपूर्ण है कोई चाहे जैसे करे लेकिन जैसा हमारे कई तथाकथित धर्माचार्य भगवान के एजेंट-ठेकेदार बन कर करते हैं कि यही सही है, तब वे धर्म को छोड अधर्म को ही जाने अनजाने बढाते हैं। मेरी साडी तेरी से अच्‍छी तो सब से अधिक इन्‍हीं ‘धर्मधुरंधरों’ के बीच होता है। मेरा राम तेरे शंकर से बडा है तो काली कलकत्‍ता वाली बडी है । कोई कहेगा नही विष्‍णु ही सब कुछ हैं तो कहेगा अरे भगवान तो कृष्‍ण ही हैं। इन्‍हीं खींचतान से कितने पंथ बनते गए। हमें ठंठे मन से गंभीरता अपनी कमियों- कमजारियों पर विचार करना और उन्‍हें सुधार करना चाहिए। धर्म गतिवान होता है,जडता जकडन नहीं। बामियान हमें सालता है, पर एक लोकतांत्रिक देश में, जिसे हम देव भूमि कहते हैं वहां और चुनी सरकारों के सामने किस तरह से अयोध्‍या हो जाता है, उससे हम गौरवान्वित महशूस करते हैं। यह दोहरा मापदण्‍ड क्‍यों ? हम तालिबान- अलकायदा तो सामने रख्‍ाते और उसके आतंकवादी चेहरे से इस्‍लाम को जोडते हैं, लेकिन इन रक्‍त बीजों को बनाने-बढाने वाले और इराक जैसे देश और उसके ऐतिहासिक संग्रहालय तक को अपनी सनक में बर्बाद कर देने वाले अमेरिका और पश्चिमी देशों के छद्म आतंकवाद को नजरअंदाज कर देते हैं। अध्‍यात्‍म और प्रेम अगर व्‍यावहारिक धरातल की बात नहीं है तो फिर इनका अर्थ ही ? इनकी उपयोगिता तभी है जब ये व्‍यावहारिक धरातल पर उतारी जा सकें। यह कम्‍यूटर पर बैठ कर वाग्विलास या बौद्धिक विचार विनिमय का प्रयास नहीं है। मैंने और आपने सभी ने मुसलमानों और हिन्‍दुओं दोनों को नजदीक से देखा है। मूलत: दोनों इंसान हैं।खून और तमाम मानसिक व शारीरिक चेष्‍टायें समान हैं। दोनों का खून मिला दिया जाए तो फिर अलग करना कठिन होगा । कभी अपने जीवन में हुए कुछ मुस्लिम परिवारों के निजी अनुभव बताऊंगा। केवल दिलदिमाग का फेर है। हां यह बात जरूर है कि इस्‍लाम के अनुयायियों को भी गंभीरता से सोचना होगा कि वह रसूल ंऔर कुरान के करीब हैं ? उन्‍हें भी दरार पाटने की ईमानदार पहल और प्रयास करने होंगे। दोनों की एकता पर कहने को बहुत कुछ है ,लेकिन फिर कभी। सादर आपका शंभू दयाल वाजपेयी

    kmmishra के द्वारा
    November 14, 2010

    काका सादर प्रणाम । आप महान हो । कभी समय मिले तो हदीस का भी अध्ययन करियेगा फिर जैसा कि लोग तर्क करते हैं कि कुरान मजीद को मु0 साहब की जीवनी से जोड़ कर पढ़ना चाहिये, पढ़ियेगा । उसके बाद अपनी इस पंक्ति पर फिर विचार करियेगा – मोहम्‍मद साहब ने कहीं किसी धार्म्रिक स्‍थल पर न कभी हमला किया और न ऐसा करने के लिए कहा। वह मूलतरू दार्शनिक .संत थे। साम्राज्‍यवादी नहीं।

    dr.satyendra के द्वारा
    November 28, 2010

    आदरनीय बाजपाई जी ! मैंने तो प्रारंभ में ही कहा की मैं इतना ज्ञानी नहीं हूँ , सामान्य व्यक्ति हूँ , चलिए आपने ये तो मन की काबह में मूर्तियाँ थीं :) देखिये सर हम लोग सत्य नहीं सुनना चाहते हम अपने मन की बात सुनना चाहते है :० पिछले विधानसभा इलेक्शन के दौरान सुबह सुबह अखिलेश यादव जी का फ़ोन आया की डॉ साहेब क्या हल चाल? कैसा चल रहा है ? मैंने उनसे पूछा की अखिलेश जी आप सत्य सुनना चाहते हैं या अपने मन की बात, बोले आपसे तो सत्य की ही अपेक्षा है , तो मैंने उनको दो टूक सत्य बता दिया की मान्यवर सरकार नहीं बनेगी बुरी तरह हारेंगे, बरेइल्ली के बारे में उन्होने पूछा तो मैंने बतायाकि तीन सीट मिल सकती हैं , वो बुधिम्मान थे थोड़ी देर बहस की कारन पूछे फिर बोले की आप ठीक कह रहे हो तो यदि आप सतुआ सूने के इच्छुक हों तो मैं और लिखूं नहीं तो , फिर आपके मन की बात ही लिखने लगूंगा , आप के मन को दुखाना मेरा अभिप्राय नहीं है :) और न ही किसी धर्मब्लाम्बी के लेकिन सत्य को सत्य तो कहना ही पड़ेगा ये भी सत्य है की प्रारंभ में कबह में केवल एक कला पत्थर था केंद्र में , बाद में अनन्य मूर्तियाँ प्रथिश्थापित की गयीं जैसा की अमूमन और मंदिरों में भी होता है और ये भी सत्य है की मूर्तियाँ तोड़ी गयीं फिर सत्य को न माने का कोई कारन? मैं कोई मूर्ति पूजा का समर्थक नहीं हूँ , लेकिन , सत्य को सत्य न मानने का कोई कारन मेरी समझ में नहीं आता और न ही मेरा अभिप्राय या सोच कबह के परस्ती असम्मान जनक है , इंसानी आस्थाका कोई भी स्थान जहाँ करोड़ों मस्तक सिजदा करते हों , पूजयानीय है ,जब लोगों को वहां नमन करते देखता हूँ एक सफ़ेद कपडे में , तो मेरा सर भी श्रद्धा से झुक जाता है. और एक गीत मेरे मन में गूंजने लगता है की मुबारिक हो तुम द्सब्को हज का महीना, न थी मेरी किस्मत मैं देखूं मदीना, मदीने वाले से मेरा सलाम कहना शब्बीर अली साहेब ने गया है, बचपन में गाँव में एक किताब थी जिसमे पैगम्बर और बुधिया के कूड़ा फेंकने की कहानी पढ़ी थी तभी से उनकर प्रति मेरे मन में सम्मान की भावना है , किन्तु मिथ्या सत्य मैं नहीं बोल sakta , मेरे नाम की भी कुछ मजबूरी है, सत्य इन्द्र .इसलिए क्षमाप्रार्थी हूँ. विषय विवाद से दूर रहे , ये ही धर्म का कार्य होगा , इस्सेलिये आपके पीछे पीछे चल रहा हूँ धन्यबाद

    dr.satyendra के द्वारा
    November 28, 2010

    भारत सरकार द्वारा कश्मीर में , विगत कुछ वर्षों में तोड़े गए मंदिरों की संख्या प्रसारित की है, आदरणीय वाजपई जी से प्रार्थना है की , भूत काल छोड़ कर वर्तमान के लोकतांत्रिक भारत वर्ष की स्थितियों का भी अवलोकन करलें

kmmishra के द्वारा
November 12, 2010

प्रिय राशिद भाई नमस्कार । आपके प्रति मेरे हृदय में बहुत सम्मान है क्योंकि जहां हम लोग भावना में बह गये वहीं आपने संयम से काम लिया और कहीं भी कोयी गलतसलत बात नहीं की । सच्चा ज्ञान यही है जो अशांति नहीं शांति फैलाता है । . आपने भला किया जो द ट्रू फुरकान के बारे में सही तथ्यों को रखा । इससे कितने लोग भ्रमित हुये होंगे इसका अंदाज ही लगाया जा सकता है । . आप स्वयं देखिये कि आज पश्चिम के लोग कुरान की नकली प्रतियां बना रहे हैं और उसको असली कह कर प्रचारित कर रहे हैं जैसे मध्ययुग में भारत में अल्लोपनिषद, अरबोपनिषद आदि ग्रंथ कुछ भटके वेदपाठी ब्राह्मणों से इस्लाम का प्रचार करने के लिये और हिंदुओं को भ्रमित कर धर्मपरिवर्तन करने के लिये लिखवाये गये थे । आज कल लोग मु0 साहब को कल्कि अवतार कह कर प्रचारित कर रहे हैं ताकि हिंदू भ्रमित हो जायें । . जिस तरह इस्लाम के प्रचार के लिये सदियों पहले ये कुत्सित हथकण्डे अपनाये गये थे वैसे हथकण्डे आज पश्चिमी देश इस्लाम के प्रति अपना रहा है । हिंदू तो दोनों ही के लिये येन केन प्रकरेण धर्मपरिर्वतन की वस्तु रहा है । . द ट्रू फुरकान के बारे में वास्तविकता से परिचित कराने के लिये आपका आभारी हूं । सादर आपका ।

Coolbaby के द्वारा
November 12, 2010

Respected Sir ! The Quran I have taken is translated by Maulana Wahiduddin Khan…….published by GOODWORD. Yes I feel lucky to gift you books …..I am now in varanasi in my city The holy place …….when I go to delhi i would ask you … May God keep You guiding us

Rashid के द्वारा
November 11, 2010

मिश्रा जी,, जिस खबर का आप ने हवाला दिया है, वह एकदम गलत है,, दुबई सरकार या किसी भी अरब देश मे कुरान मे कोई फेर बदल नहीं किया गया है,, हक़ीक़त यह है की एक ग्रुप मे यह किताब लिखी है अरबी भाषा मे जो क्रिश्चियन या बाइबल की बातों पर आधारित है , कुरान का इससे कोई लेना देना नहीं है, खाली यह समानता है की दोनों अरेबिक मे है !! सच तो यह है की लोगो मे भ्रम ना फैले इस लिए इस किताब का वितरण बंद कर दिया गया है !!मुस्लिम समूहो का आरोप है की भ्रम फैलाने के लिए इस किताब को एकदम कुरान के स्टाइल मे (आयात / सूरा आदि) लिखा गया है !! ज़्यादा जानकारी के लिए आप नेट का सहारा ले सकते है !! नीचे एक लिंक दे रहा हूँ !! http://en.wikipedia.org/wiki/The_True_Furqan धन्यवाद राशिद  ( http://rashid.jagranjunction.com)

    sdvajpayee के द्वारा
    November 11, 2010

     कुरान मजीद में एक पाई मात्रा का भी परिवर्तन करना हराम है। ऐसा कोई प्रयास स्‍वीकार्य ही नहीं होगा।

Rashid के द्वारा
November 11, 2010

मिश्रा जी,, जिस खबर का आप ने हवाला दिया है, वह एकदम गलत है,, दुबई सरकार या किसी भी अरब देश मे कुरान मे कोई फेर बदल नहीं किया गया है,, हक़ीक़त यह है की एक ग्रुप मे यह किताब लिखी है अरबी भाषा मे जो क्रिश्चियन या बाइबल की बातों पर आधारित है , कुरान का इससे कोई लेना देना नहीं है, खाली यह समानता है की दोनों अरेबिक मे है !! सच तो यह है की लोगो मे भ्रम ना फैले इस लिए इस किताब का वितरण बंद कर दिया गया है !!मुस्लिम समूहो का आरोप है की भ्रम फैलाने के लिए इस किताब को एकदम कुरान के स्टाइल मे (आयात / सूरा आदि) लिखा गया है !! ज़्यादा जानकारी के लिए आप नेट का सहारा ले सकते है !! नीचे एक लिंक दे रहा हूँ !! धन्यवाद राशिद ( http://rashid.jagranjunction.com) http://en.wikipedia.org/wiki/The_True_Furqan

Coolbaby के द्वारा
November 10, 2010

Sir ! I like your study …. My heart brought me today to book shop……I bought translation of Quran…..which is now kept under my eyes ….written on its back cover \"We shall show them Our signs in the universe and within themselves,until it becomes clear to them that this is the truth.\’ I am on begining my religous journy…..Soon I will get geeta and vedas also ….. I want to share with you something, \"I believe not in any particular God ……I believe in The super being who is the cause of all thing …..the universe is his slave …his power makes the entire thing go around……. Now I believe He will help me to take me to right path ….. What is the right path?I have no answer about it but……Ye to kahte hai na dhoondo to bhagvan bhi mil jata hai\’ SO I am going to search God ….May be I back to my heart asking O My God you are here in my heart and I am finding you out outer of mine… Hope you will pray for me God bless you keeping us energatic

    kmmishra के द्वारा
    November 10, 2010

    प्रिय अनुज कूलबेबी, ईश्वर तुम्हें ज्ञान से परिपूर्ण करे । मुझे खुशी है कि हमारी इस बहस से तुम ईश्वर को समझने के लिये धर्मग्रंथों का अध्ययन करने के लिये प्रेरित हुये । लेकिन छोटे भाई इन तमाम धार्मिक ग्रंथों को जीवन भर पढ़ कर भी बहुत से लोग कोरे के कोरे ही रह जाते हैं । ईश्वर किताबों मे नहीं मिलेगा । ईश्वर सब जगह है । तुम्हारे अंदर है और मेरे अंदर भी विद्यमान है । ईश्वर पूरी सृष्टि में व्याप्त है क्योंकि इस पूरी सृष्टि का निमार्ण ही ईश्वर तत्व से हुआ है । जब सभी जड़ चेतन के अंदर उस परमपिता को देखने लगोगे तो वह विराट ज्ञान तुम्हारे अंदर भी उतर आयेगा । जहां घृणा है और अपने आप को सर्वश्रेष्ठ मानने की भावना हो वहां ईश्वरतत्व नहीं पाया जा सकता । . उम्मीद है कि आप बायस होकर, गलतियां ढूंढने के लिये धर्मग्रंथों का अध्ययन नहीं करेंगे क्योंकि तब आप ईश्वर नहीं ईश्वर से भी महान बनने का निरर्थक प्रयत्न कर रहे होंगे । . आपका के एम मिश्र

    sdvajpayee के द्वारा
    November 11, 2010

     प्रिय श्री मिश्र जी, आपने बहुत विस्‍तार दृष्‍टांत सहित कुछ अहम मुद्दे उठाये हैं। मैं ऐसा गंभीर अध्‍ययन तो नहीं किया है, ज्‍यादा पढ भी नहीं पाता,फिर अपनी सहज बुद्धि से प्रश्‍नगत प्रमुख बातों पर प्रत्‍युत्‍तर देना चाहता हूं। शायद कुछ भ्रम मिटे, इस लिए देना भी चाहिए। लेकिन कुछ मजबूरियां हैं,इस लिए इस कार्य को समय पर छोड रहा हूं। समय मिला तो जरूर दूंगा। प्रतिक्रियाओं-टिप्‍पणियों से मैं मानता हूं कि कूल बेबी बेहद संवेदनशील,विचारशील और देश- समाज के प्रति कुछ सकरात्‍मक करने की सोच रखने वाले हैं। वह छोटे भाई भी हो सकते हैं और बहन भी। मेरा अंत:करण कहता है कि भविष्‍य में वह अंधेरा छाटने और प्रेम प्रकाश फैलाने में बडी भूमिका निभायेंगे।

    sdvajpayee के द्वारा
    November 11, 2010

      कूलबेबी जी,  आपकी नव यात्रा के लिए शुभ कामनायें। कुरान लाये अच्‍छा लगा। सलाह है कि-  1- सुनिश्चित कर लें कि अनुवाद किसी अच्‍छे जानकार द्वारा किया गया हो। मुझे 9-10 साल पहले बरेली में किसी ने कुरान मजीद भेंट की थी। यह मरकजी मकतबा इस्‍लामी, दिल्‍ली-6 द्वारा प्रकाशित है। इसकी टीका सैय्यद अबुल आला मौदूदी ने की है और हिन्‍दी अनुवाद मोहम्‍मद फारूक खां ने किया है। मेरे पास जो प्रति है उसे संभवत: ‘ कार्यालय जमाअते इस्‍लामी हिन्‍द, मोहल्‍ला जकाती,नालारोड- बरेली ने बटवाया होगा, क्‍यों कि ऐसी मुहरलगी है। जो भी हो देने वाले ने मुझ पर बडा उपकार किया था। आप इस का सहारा लें। ऐसी उपयोगी कोई अन्‍य किताब मिलने पर मुझे गिफ्ट कर आप  भी मेरे साथ उपकार कर सकते हैं। कोशिस करें कि कामचलाऊ ही अरबी जबान सीख लें और उस का इतिहास व सामाजिक स्थिति वगैरह का अध्‍ययन करें। कुरान समझ कर ही रसूल को समझा जा सकता है। 2- गीता के साथ भी अनुवाद के स्‍तरीय होने का ध्‍यान रखें। फिलहाल गीता तक ही सीमित रहें। वेदों वगैरह तक न जाएं। गीता सब का सार-निचोड है। 3- धार्मिक के बजाय आध्‍यात्मिक पथ पकडें। अघ्‍यात्‍म अंतिम पडाव है।धर्म वहां ले जाता है। अध्‍यात्‍म में कोई भेद-विभेद नहीं है। 4- कुछ सफर तय कर लेने के बाद आप पायेंगे कि गीता -कुरान दोनों का दार्शनिक और सैद्धांतिक पक्ष  पूरी तरह एक है। और तो और अकबर के समय लिखी गयी गोस्‍वामी तुलसी दास जी की राम चरित मानस में इस्‍लाम की अदभुत नजदीकी है। 5- अध्‍यात्‍म विशुद्ध विज्ञान है। इसमें तीन बातें जरूरी बतायी गयी हैं- रुचि,विश्‍वास और योग्‍यता। समझने की योग्‍यता विकसित करते रहने पर ध्‍यान देना चाहिए।

kmmishra के द्वारा
November 10, 2010

आदरणीय बाजपेई जी सादर वंदेमातरम ! . निसंदेह आपका प्रयास अत्यंत प्रशंसनीय है लेकिन मैं उम्मीद कर रहा था कि आपका यह लेख मय उद्धरणों के होगा । जैसा कि मैंने पहले भी निवेदन किया था कि धर्मग्रंथों में बहुत कुछ अच्छा ही लिखा रहता है पर उसके अनुयायी कैसे हैं यह देखने वाली बात होती है । . आपके पिछले लिखे लेख उच्चकोटि के हैं । पिछला लेख – ईश्‍वर ने पैगम्‍बर का राजतिलक किया- जिसमें आपने मेरे अनुरोध पर राम और मुहम्मद साहब की तुलना की । इसके पीछा मेरा एकमात्र उद्देश्य मिथकीय और इतिहास के पन्नों से अदृश्य श्रीराम को उनलोगों तक पहुंचाना था जो न राम को मानते हैं और न ही अयोध्या में राममंदिर के अवशेषों कों । भाईचारे की ताली एक हाथ से तो बजती नहीं है । . सत्य के कई पहलू होते हैं । सत्य कड़वा भी होता है । हमारे यहां मान्यता है कि दूसरों को कष्ट देने वाले सत्य की जगह प्रिय लगने वाला सत्य बोला जाना चाहिये । भारतवासी स्वभाव से शांतिप्रेमी होता है । वह हद से ज्यादा भीरू और सहिष्णु होता है । वह विवाद में नहीं पड़ना चाहता और सदैव आनंद में मग्न रहता है चाहे घर में दो जून की रोटी भी न हो । भारतवासी किसी दूसरे के चरित्र पर लांछन भी नहीं लगता है । वह हमेशा से अपने ही दोषों पर निगाह रखता है दूसरे के दोषों को देखना पाप समझता है । उदाहरण के तौर पर गुजरात के हर चुनावों में कांग्रेस ने मोदी पर कीचड़ा उछालना चाहा लेकिन गुजरातियों ने हर बार कांग्रेस को करारा जवाब दिया की गुजरात दंगों से उबर कर देश का सबसे समृद्ध राज्य बन चुका है । गुजराती समृद्धि चाहता है इतिहास का दुहराव नहीं । इसी प्रकार जब जब एनडीए ने सोनियागांधी के ऊपर हमला किया तब तब उसे मुंह की खानी पड़ी । यह दो वर्तमान के उदाहरण है कि भारतवासी शांतिप्रिय भीरू सहिष्णु समरसता मे विश्वास रखता है और ऐसा हजारों साल से है । यह हमारे खून में है । इसके लिये हमें किसी नारे बेमेल की रेल और धर्मनिरपेक्षता के आत्महंता आधुनिक सिद्धातों की जरूरत नहीं है । ऐसे में मेरे जैसे कुछ लोगों द्वारा सत्य के कड़वे पक्ष की बात करना एक प्रकार से भाईचारे और शांति में खलल डालने सरीखा है । शास्त्रों में तो असत्य कहां कहां बोलना चाहिये उसका भी जिक्र आता है । जैसे – जब किसी की प्राण रच्छा करनी हो. गोवध रोकने के लिये. विद्वानों की रक्षा के लिये. रतिकाल में इत्यादि यह कुछ स्थितियां हैं जहां असत्य कहने से पाप नहीं लगता है । . लेकिन सत्य छिपाना भी नहीं चाहिये । मानस में ही कहा गया है – सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।। . जब बात राश्ट्र की हो तब न तो सत्य छिपाना चाहिये न सत्य की ओर से आंखें मूंदनी चाहिये और न ही असत्य बोलना चाहिये अन्यथा राष्ट्र का नाश होते देर भी नहीं लगती है । शांति- भाईचारा- समरसता एक बात है और बेमेल की रेल चलाना दूसरी बात है । . धर्म के कई आयामों में से राजनीति भी एक महत्वपूर्ण आयाम है । आप 2500 साल पहले से विश्वइतिहास का अवलोकन करें । पूरे विश्वकी राजनीति तब से लेकर आज तक धर्म से ही संचालित हो रही है । रोम के शक्तिशाली साम्राज्य से लेकर अरब में इस्लाम के उदय होने तक । भारत में कई हजार साल पहले से (तब से जब यूरोप में महान साम्राज्यों का उदय भी नहीं हुआ था । जब न प्लेटो थे न अरस्तु आदि) धर्म को कर्तव्य से जोड़ा गया । धर्म जो कि धारण किये जाने योग्य हो यानी वह कर्तव्य जो कि परिवार. समाज. राष्ट्र के हित में हो । इसीलिये पिता. पुत्र. पुत्री. पति. पत्नी. राजा. प्रजा. सबके कर्तव्य निर्धारित किये गये । लोकतंत्र. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता. सभी प्राणियों को एक समान मानना और सभी में एक ईष्वर को देखना. यहां मानवाधिकार बहुत पीछे चला जाता है. यह सारे सिद्धांत और मूल्य हमने तब खोजे थे जब वे जंगलों में पत्ते पहन कर रहते थे । . भारत में धर्म का राजनीति में सम्मिश्रण वसुधैव कुटंबकम को जन्म देता है लेकिन यूरोप और अरब में धर्म जब राजनीति से मिलता है तो साम्राज्य की सीमाएं फैलने लगती हैं और सदियों क्रूसेड जैसे धर्मयुद्ध लड़े जाते हैं । एक मयान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं और आज भी क्रूसेड इराक. अगानिस्तान. अफ्रीकी देशों में लड़ा जा रहा है । इसके विपरीत भारत में कभी धर्म के लिये युद्ध नहीं लड़े गये जबकि हिंदू. बौद्ध और जैन धर्म जैसे तीन महान धर्मों की जन्मस्थली भारत रहा है । आपको जान कर आश्चर्य होगा कि अयोध्या न सिर्फ हिंदुओं का बल्कि बौद्धों और जैनों का भी तीर्थस्थल रहा है लेकिन अयोध्या कभी गाजा नहीं बना । . भारत पर हजारों साल से लगातार हमले हो रहे हैं । ग्रीक. पार्थियन. शक. कुषाण. इस्लामिक. मंगोल और अंत में अंग्रेजों के रूप में क्रिस्चैनिटी का हमला हुआ । हमने सबको अपने अंदर समेट लिया । हमलावरों को भी अपना बना लिया । भारत का राष्ट्रीय संवत शकसंवत है । . आपको जानकर आश्चर्य होगा कि अमेरिका. यूरोपिय देश खरबों डालर वेटिकन के कहे अनुसार धर्म के लिये और अरब देशों के खरबों पेट्रो डालर इस्लामी साम्राज्य के नाम पर चंदे के रूप में पूरे विश्व में भेजे जाते हैं । सन 2000 में तत्कालीन पोप का कथन था कि नयी सहस्त्राब्दि में क्रिस्चैनिटी का प्रचार प्रसार एशिया में होगा । आप देखिये माइनो सोनिया के सत्तारूढ़ होने के बाद से भारत में इसाई बनने की दर में कई कई गुना वृद्धि हुयी है । इसके आलावा अरब देशों से कई अरब रूपये मदरसों और दूसरे धार्मिक कार्यों के नाम पर भारत भेजे जाते हैं । एनजीओ के माध्यम से भारत आने वाले इन खरबों रूपयों का कोई सरकारी आडिट अब तक नहीं होता था । खरबों रूपये धर्म परिवर्तन. माओवादियों. अरूंधतीरायों और गिलानियों. नक्सलियों. हूजी. सिमी जैसे संगठनों और इन संगठनों को संरक्षण देने वाली राजनैतिक पार्टियो को चंदे में भेजे जाते हैं। सन 2010 में भारत पर जब विदेशी दबाव पड़ा आंतकियो के आर्थिक हवाला नेटवर्क को तोड़ने के लिये तब जाकर भारत सरकार ने फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट 1976 में संशोधन किया । इसी एक्ट के द्वारा अब तक विदेशी मदद के नाम पर आने वाले धन के आडिट की कोयी व्यवस्था नहीं थी । . भारत पर हजारों साल से धर्म के नाम पर राजनैतिक हमले हो रहे हैं । फिर निवेदन करूंगा कि हजारों साल लंबी इतिहास की सड़क पर हम मात्र 63 डग चले हैं और यह खुमारी । सिर्फ 63 साल में आज हम देश के कितने हिस्से गवां चुके और कितने गंवाने की कगार पर हैं इसपर किसी की निगाह नहीं जा रही है । धर्मनिरपेक्षता का राजनैतिक पाखंड भारत के टुकड़े टुकड़े कर देगा । जिस समाज या राष्ट्र में इतिहासबोध नहीं होता है वहां इतिहास बार बार दुहराया जाता है । . आपके पिछले लेख में एक भाई ने मुझसे कहा था कि पाकिस्तान. आई. एस. आई. लश्करे तैयबा आदि कोई धार्मिक संगठन नहीं हैं इसलिये उनको इस्लाम से न जोड़ा जाये । वे भूल गये कि पाकिस्तान का निमार्ण ही धर्म के नाम पर हुआ था और कश्मीर में धर्म आधारित वोटिंग के लिये पाकिस्तान ही संयुक्तराष्ट्र में पिछले 62 साल से रट लगाये हुये है । . जिन्ना ने बंटवारे में धर्म के नाम पर जो पाकिस्तान मांगा था वो वर्तमान पाकिस्तान से कई गुना बड़ा था । उसने धर्म के आधार पर जो पाकिस्तान मांगा था उसमें आज जो पाकिस्तान है उसके अलावा पूरा कश्मीर. पश्चिमी उत्तरप्रदेश. पूरा पंजाब. पूरा बंगाल. उस वक्त का विस्तृत हैदराबाद स्टेट और तमाम मुस्लिमबहुल इलाके मांगे थे । धर्म के आधार पर बनने वाले पाकिस्तान का स्वरूप जिन्ना के जेहन में बिल्कुल वैसा था जैसा कि किसी खूबसूरत कालीन को चूहे कुतर कर तहस नहस कर दें । बाद में पटेल आदि नेताओं के प्रयास से जिन्ना पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान पर माने लेकिन कष्मीर पर उनकी आंख लगी रही जो कि 1948 के भारत पाक युद्ध की वजह बनी और आज भी पाकिस्तान की नीयत कश्मीर पर खराब है । . भारत पर किस किस तरह से हमले हो रहे हैं यह माननीय सुप्रीमकोर्ट ने अपने कई निर्णयों में बताया है लेकिन धन्य है सत्ता की राजनीति उन्हें सत्ता के आगे सब गौड़ लगता है । माननीय सुप्रीमकोर्ट ने आपने एक निर्णय में कहा है – . सरवदानंद सोनवाल बनाम भारत संघ ए आई आर 2005 सुप्रीमकोर्ट पेज नं0 2920 . इस मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि आधुनिक काल में युद्ध की अवधारणा में काफी परिवर्तन आ गया है । हमारे संविधान निर्माताओं ने अनु0 355 में आक्रमण शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में किया है । लाखों की संख्या में असम में अवैध बंग्लादेशियों का घुसना.. मतदाता बन जाना…. नौकरियां पा जाना असम पर अक्रमण है जिससे केन्द्र सरकार को इसे संरक्षा प्रदान करना चाहिये । केन्द्र अपने इस कर्तव्य में विफल रही है । . आज बंग्लादेशी घुसपैठियों को हमारे नीतिनिंयता अतिथि देवो भव की निगाह से देख रहे हैं और उनको एक मुश्त अपना वोट बैंक बनाने के लिये ललायित हैं । पिछले 40 साल से यही नीति बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार की भी रही और यह समस्या उन्हीं की पैदा की हुयी है जैसे नक्सल समस्या । उन्होंने बंग्लादेशी घुसपैठियों को मतदाता बना दिया और बंगाल की सत्ता का सुख भोगते रहे । . देश की बढ़ती जनसंख्या पर आज भी कोई बहस करने को राजी नहीं है। लगता है जैसे यह मुद्दा कभी राष्ट्रहित में था ही नहीं । . इसके आलावा अभी कुछ साल पहले माननीय इलाहाबाद का एक निर्णय था कि यूपी में मुसलमान जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर अब अल्पसंख्यक नहीं रह गये हैं । लेकिन वोट की और तुष्टीकरण की राजनीति इस देश में सत्ता हथियाने का एक मात्र रास्ता रह गयी है । . धर्म किस तरह से किसी देश की सीमाएं बदल देता है आईये जरा इसपर गौर करें । एक महान राजनैतिक चिंतक का कहना है कि धर्मपरिर्वन राष्ट्रपरिर्वतन होता है । आप पूरे विश्व का इतिहास उठा कर देखें । जब जब किसी देश के नागरिकों ने बड़े पैमाने पर धर्मपरिवर्तन किया है उस देश की सीमाओं.. नीतियों और आस्था में जबरदस्त बदलाव हुआ है । दूर न जायें अपना ही देश देखें । धर्म के नाम पर एक अलग राष्ट्र की मांग जिन्ना ने की और पाकिस्तान का जन्म हुआ । कश्मीर का फिर से बंटवारा धर्म के नाम पर ही मांगा जा रहा है । पहले वहां से डेढ़ लाख कश्मीर पंडितों को मार कर भगाया गया और जब वहां की जनसंख्या में एक पक्ष मजबूत हो गया तो धर्म के आधार पर वोटिंग की बात होने लगी जबकि घाटी का बहुत थोड़ा ही इलाका मुस्लिमबाहुल्य है । जम्मू और लद्दाख हिंदू और बौद्धबाहुल्य है । आज आप पूर्वोत्तर के राज्य देखिये वहां जबरदस्त ईसाईकरण हुआ है और इसके साथ ही अलग राष्ट्र की मांग भी जोर पकड़ने लगी है । ईसाईकरण की आंधी इतनी तेज है कि भारत के बहुत से नेताओं ने और प्रसिद्ध व्यक्तियों ने ईसाई धर्म अपना लिया है । इसके पीछे आत्मिक उत्थान नहीं पैसा है । भारत में हजारों साल से गरीबों.. अशक्तों की सेवा को धर्म (कर्तव्य) माना गया है । इसके पीछे कोई लालच काम नहीं करता है पर ईसाई मिशनरियां सेवा के बदले आत्मा का सौदा कर रही हैं । यह एक राजनैतिक षडयंत्र है । भारत जैसे विशाल और शक्तिशली देश पर कब्जा करने के लिये और उस पर अपनी नीतियां थोपने के लिये किया जाने वाला यह एक अंतराष्ट्रीय षडयंत्र है । अंग्रेजों ने धर्म का यह पासा सबसे पहले फेंका था । भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी से भी पहले धर्म के प्रचार प्रसार के लिये पादरियों ने हमला किया था । मध्ययुगीन इतिहास मे आपको ऐसे दर्जनों पादरियों के नाम पढ़ने को मिलेंगे । इसके अलावा इस्लाम में गर्भनिरोध पर पाबंदी है । यह एक राजनैतिक दृष्टिकोण है । जब आप जनबल में विशाल होंगे तब सब कुछ आपके नियंत्रण में होगा । . मैं दुबारा धर्म के इतिहास पर लौटता हूं । ऊपर मैंने बताया कि हमने अपने यहां आने वाले दूसरे सभी धर्मों को जगह दी और उन्हें अपनाया लेकिन इस्लामिक विचारधारा जिसने तलवार के साथ भारत में प्रवेश किया था एक कट्टर धार्मिक विचारधारा थी । इस्लाम में दूसरे धर्म के प्रति सहिष्णुता देखने को नहीं मिलती है । एक बार फिर विश्वइतिहास के साथ ही अपने अगल बगल के देशों पर निगाह फिरायें । यह विचारधारा जब जहां ताकतवर होती है दूसरी विचारधारा या धर्म का समूल नाश कर देती है । यह साफ देखा जाता है कि जब ये बहुसंख्यक होते हैं तब अल्पसंख्यकों के पास सिवाये इस्लाम कबूल करने के कोयी चारा नहीं होता है । पाकिस्तान… मिडिलईस्ट के देश. अगानिस्तान और बंग्लादेश में न सिर्फ हिंदू बल्कि दूसरे धर्म के अनुयायी किस स्थिति में हैं इस पर गौर करें । वहां इनको न मानवाधिकार प्राप्त हैं…. बल्कि राजनैतिक अधिकारों से भी इनको बेदखल कर दिया जाता है । आप कश्मीर देखिये । बंटवारे के बाद गये हिंदुओं को वहां की विधानसभा चुनाव में वोट करने का अधिकार नहीं है.. वे सिर्फ लोकसभा के चुनाव में ही वोट कर सकते हैं । यह है अनु0 370 का आत्मघाती स्वरूप । . इस्लामिक युग में भारत में 30000 मंदिर तोड़ दिये गये । आज भी 3000 मस्जिदें ऐसी हैं जो कि तोड़े गये मंदिरों के अवशेषों से बनी हैं और साफ देखी जा सकती हैं । उस काल में मंदिरों को तोड़ने का क्या कारण था .. आज के कम्युनिस्ट इतिहासकार पहले तो मंदिरध्वंस के तथ्यों को ही न मानेंगे… अगर इलाहाबाद उच्च न्यायालय जैसी विधिक संस्थाएं इसको सिद्ध करती हैं तब कुतर्कों का जाल दुबारा बुना जाता है । मंदिरों के ध्वंस का कोयी राजनैतिक कारण नहीं था । दूसरे धर्मों के प्रति सहिष्णु न होना और मूर्तिपूजकों को प्रताड़ित करना और मूर्तियों का ध्वंस इस्लाम की नींव रही है । इस नींव पर इमारत खड़ी करने के लिये उन्हें 30000 मंदिर तोड़ने पड़े और उसके मलबे से मस्जिदें बनायी गयीं । अब एक प्रश्न आप सभी के लिये – क्या काफिरों का कोयी मानवाधिकार…राजनैतिक अधिकार और धार्मिक अधिकार नहीं होता है । इन अधिकारों को छीनने का अधिकार मुस्लिम शासकों को किसने और क्यों दिया । अगर राम और रहीम एक हैं तब सिर्फ रहीम की ही इबादत क्यों । राम और रहीम को चुनने का अधिकार काफिरों को क्यों नहीं दिया गया । क्या वह परमपिता परमेश्वर तभी खुश होगा जब वह खुदा के नाम से पूजा जायेगा और क्या वह अपनी इबादत खुदा के रूप में करवाने के लिये अपने अनुयायियों को तलवार का प्रयोग करने और काफिरों का बलात धर्मपरिर्वतन करने और अमानवीय अत्याचार करने की खुली छूट देता है । इसके अलावा स्त्रियों के प्रति कुरान और हदीस की क्या मान्यताएं हैं । कम से कम हिंदू धर्म तो सभी प्राणियों को एक निगाह से देखता है । चाहे आप आस्तिक हो या फिर नास्तिक या किसी भी धर्म के मानने वाले हों । हमारी यह विचार उन सब धार्मिक विचारों से कई हजार साल पुरानी हैं जो तलवार की जोर पर धर्म का प्रचार प्रसार करते हैं । . बाबर के शिया सिपहसालार मीर बाकी ने 2000 साल पुराना राजा विक्रमादित्य का बनवाया राम मंदिर तोड़ कर वहां हिंदुओं को अपमानित करने के लिये एक इमारत बनवायी । उस इमारत में न तो मिनारें थीं और न ही वजू करने के लिये पानी का हौज । इस्लाम में कब्जे की जमीन पर मस्जिद बनवाना पाप समझा गया है । उस मस्जिद में की गयी नमाज खुदा कुबूल नहीं करता है । तमाम ऐतिहासिक किताबों और एएसआई की विशद रिपोर्ट से यह साफ हो गया कि वहां पर 2500 साल पुराने मंदिरों के अवशेष पाये गये हैं और वहां पर पहले राम मंदिर ही था। इतना कुछ साबित होने के बाद भी अगर हिंदुओं को वह स्थान नहीं सौंपा जाता है तो अब बताईये कि बाबर की हिंदुओं को अपमानित करने की मानसिकता के साथ कौन रह रहा है और भाईचारे और समरसता की जिम्मेदारी किसके ऊपर है । जबकि हिंदू अपने पैसों से एक भव्य मस्जिद निर्माण की बात कर रहा है । अब दूसरे पक्ष को यह तय करना है कि उन्हें मस्जिद चाहिये कि बाबर की अपने आपको सर्वश्रेष्ठ मानने वाली घृणित मानसिकता । उस स्थान की कीमत हिंदुओं के लिये मक्का मदीना से कम नहीं है यह बात दूसरा पक्ष भी जानता है लेकिन वह आज भी हिंदुओं को अपमानित करना चाहता है । सब कुछ साबित होने के बाद भी अगला सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खटखटा रहा है । कोयी कैसे मान ले कि इस्लाम शांतिप्रिय और सहिष्णु धर्म है । बाबरी ढांचा गिराना एक आपराधिक कृत्य था जिस पर अलग से क्रिमनल प्रोसीडिंग चल रही है लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह फैसला एक सिविल सूट पर आया है । दोनो मामलों में अंतर है । . जब यह कहा जाता है कि कुरान में काफिर शब्द का प्रयोग किया गया है और काफिरों (मूर्तिपूजकों) के खिलाफ हिंसा के प्रयोग की छूट दी गयी है तब बचाव में यह कहा जाता है कि उन आयतों को मुहम्मद साहब की जीवनी के साथ पढ़ा जाना चाहिये । वे आयतें परिस्थति विशेष के लिये कही गयीं थी (कुरैशों द्वारा स्थापित की गयी मूर्तियों के लिये)। यानी जिन आयतों पर उंगली उठायी जायें वे परिस्थति विशेष के लिये बाकी सब युनीवर्सल ट्रूथ । 1400 साल पहले का अरब का पिछड़ा समाज । जिसकी तुलना तब के भारत की परिस्थतियों से नहीं की जा सकती हैं वर्तमान विश्व तो जाने ही दीजिये । अगर कुरान शरीफ परिस्थति विशेष के लिये कहा गया है तब वह काल.. देश… परिस्थतियां गुजर चुकी हैं । परिस्थिति विशेष की दलील एक लचर दलील है । 1400 साल बाद न सिर्फ भारत की बल्कि अरब की भी परिस्थति में बहुत परिर्वतन आ चुका है । . बहुत से धार्मिक विद्वानों का मानना है कि कुरान शरीफ में वेदों.. उपनिषदों और गीता की तमाम बातें मिलती हैं । यह बात सिद्ध है । फिर यह कहा जाता है कि सभी धर्मग्रंथ एक सा ही उपदेश करते हैं (अनुयायियों के कर्म ध्यान में रखिये) । अब आप यह सोचिये कि क्या विष्व के सबसे पुराने ग्रंथ वेद… उपनिषदों…. गीता पर हमारा कोयी कॉपी राईट था । जो हमारे बाद आये उन्होंने उसमें से बहुत सी बातें कॉपी की । अब इसके लिये हम उन पर कॉपीराईट एक्ट के तहत रॉयलटी तो मांगने से रहे । एक शोध के अनुसार कुरान शरीफ की एक हजार आयतें वेद और गीता की अरबी में हूबहू ट्रांसलेशन है । अच्छी बात है । हमें इससे क्या आपत्ति हो सकती है । ज्ञान को किसी सीमा में नहीं बांधना चाहिये । ज्ञान पर सभी प्राणियों का अधिकार होना चाहिये । . जलप्लावन की कथा बाईबल में भी मिलती है और इस्लामिक किताबों में भी । पूरी धरती पर जलप्रलय आयी । एक राजा ने एक बड़ी सी नाव में सभी बीजों को.. जानवरों को…बचे हुये इंसानों को लादा और बहुत समय तक उस जलप्रलय में नाव खेता रहा । बाद में जब पानी उतरा तो उसने फिर से नयी शुरूआत की । अब आप बताईये कि क्या इस कथा पर हमने कॉपी राईट ले रखा था । नहीं । हमसे यह कहानी दूसरों ने सुनी और सबने इसे अपनी कहानी बना लिया । . आपने अपने लेख में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि वेद.. गीता और कुरान सिर्फ एकेश्वरवाद की बात करते हैं । मैं यहां आदिगुरू शंकराचार्य और निर्गुण और सगुण उपासना के बारे में कुछ तथ्य रखना चाहूंगा । . आदि गुरू शंकराचार्य . आदि शंकराचार्य वेद के परमज्ञाता थेए वे अद्वैतमत के प्रणेता थे उनके अनुसार आत्मा और परमात्मा एक है। हमें उनमे जो भी अन्तर नजर आता है उसका कारण अज्ञान होता है। . उनके अनुसार परमात्मा सगुण और निरगुण दोनों हो सकता हैं …साकार अथवा निराकार . राष्ट्रीय एकात्मता की स्थापना के लिए जगतगुरू शंकराचार्य ने देश के चारों कोनों पर चार धाम तथा द्वादश ज्योतिर्लिंगों की स्थापना की। चार धामों में हिमालय पर बद्रीनाथए समुद्र किनारे जगन्नाथपुरीए रामेश्वर तथा द्वारिकापुरी स्थापित किए। . उनका व्यक्तित्व अलौकिक था। वे आठ वर्ष की आयु में चारो वेदो के ज्ञाता। 12 वर्ष की आयु सभी शास्त्रों में पारंगत तथा 16 वर्ष की आयु में ब्रह्मसूर पर भाष्य लिखकर शंकराचार्य बन गये। उनका जन्म ई.पू. 477 में केरल के कालडी नामक ग्राम में हुआ था और 32 वर्ष की आयु में पवित्र केदारनाथ धाम में शरीर त्याग दिया उन्होनें हिन्दु धर्म को पुनरूस्थापित व प्रतिष्ठित किया। अपने तर्को एवं शास्त्राथों के द्वारा उन्होने विभिन्न पंचो एवं गलत मानताओं में उचित सुधार कर मुख्य धारा में जोड़ा। एक तरफ उन्होने अद्वैत चिन्तन को पुनर्जीवित करके सनातन हिन्दू धर्म के दार्शनिक आधार को सुदृढ़ कियाए तो दुसरी तरफ उन्होने जनसामान्य में प्रचलित मूर्तिपूजा का औचित्य सिद्ध करने का भी प्रयास किया। वे आदि गुरूए प्रछनन बुद्ध तथा शिव अवतार भी कहलाये। . अद्वैत ब्रह्मवादी आचार्य शंकर केवल निर्विशेष ब्रह्म को सत्य मानते थे और ब्रह्मज्ञान में ही निमग्न रहते थे। एक बार वे ब्रह्म मुहूर्त में अपने शिष्यों के साथ एक अति सँकरी गली से स्नान हेतु मणिकर्णिका घाट जा रहे थे। रास्ते में एक युवती अपने मृत पति का सिर गोद में लिए विलाप करती हुई बैठी थी। आचार्य शंकर के शिष्यों ने उस स्त्री से अपने पति के शव को हटाकर रास्ता देने की प्रार्थना कीए लेकिन वह स्त्री उसे अनसुना कर रुदन करती रही। तब स्वयं आचार्य ने उससे वह शव हटाने का अनुरोध किया। उनका आग्रह सुनकर वह स्त्री कहने लगी. ष्हे संन्यासी! आप मुझसे बार.बार यह शव हटाने के लिए कह रहे हैं। आप इस शव को ही हट जाने के लिए क्यों नहीं कहतेघ्ष् यह सुनकर आचार्य बोले. ष्हे देवी! आप शोक में कदाचित यह भी भू ल गयीं कि शव में स्वयं हटने की शक्ति ही नहीं है।ष् स्त्री ने तुरंत उत्तर दिया. महात्मन् आपकी दृष्टि में तो शक्ति निरपेक्ष ब्रह्म ही जगत का कर्ता है। फिर शक्ति के बिना यह शव क्यों नहीं हट सकता. उस स्त्री का ऐसा गंभीरए ज्ञानमयए रहस्यपूर्ण वाक्य सुनकर आचार्य वहीं बैठ गए। उन्हें समाधि लग गई। अंतरूचक्षु में उन्होंने देखा. सर्वत्र आद्याशक्ति महामाया लीला विलाप कर रही हैं। उनका हृदय अनिवर्चनीय आनंद से भर गया और मुख से मातृ वंदना की शब्दमयी धारा स्तोत्र बनकर फूट पड़ी। . अब आचार्य शंकर ऐसे महासागर बन गए… जिसमें अद्वैतवाद…. शुद्धाद्वैतवाद…. विशिष्टा द्वैतवाद…. निर्गुण ब्रह्म ज्ञान के साथ सगुण साकार की भक्ति की धाराएँ एक साथ हिलोरें लेने लगीं। उन्होंने अनुभव किया कि ज्ञान की अद्वैत भूमि पर जो परमात्मा निर्गुण निराकार ब्रह्म है… वही द्वैत की भूमि पर सगुण साकार है। उन्होंने निर्गुण और सगुण दोनों का समर्थन करके निर्गुण तक पहुँचने के लिए सगुण की उपासना को अपरिहार्य सीढ़ी माना। ज्ञान और भक्ति की मिलन भूमि पर यह अनुभव किया कि अद्वैत ज्ञान ही सभी साधनाओं की परम उपलब्धि है। उन्होंने ष्ब्रह्मं सत्यं जगन्मिथ्या का उद्घोष भी किया और शिव… पार्वती… गणेश… विष्णु आदि के भक्तिरसपूर्ण स्तोत्र भी रचेए ष्सौन्दर्य लहरीष्… ष्विवेक चूड़ामणि.. जैसे श्रेष्ठतम ग्रंथों की रचना की । प्रस्थान त्रयी के भाष्य भी लिखे। अपने अकाट्य तर्कों से शैव.शाक्त.वैष्णवों का द्वंद्व समाप्त किया और पंचदेवोपासना का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने आसेतु हिमालय संपूर्ण भरत की यात्रा की और चार मठों की स्थापना करके पूरे देश को सांस्कृतिकए धार्मिकए दार्शनिकए आध्यात्मिक तथा गोलिक एकता के अविच्छिन्न सूत्र में बाँध दिया। उन्होंने समस्त मानव जाति को जीवन्मुक्ति का एक सूत्र दिया. ष्दुर्जनरू सज्जनो ऽाूयात सज्जनरू शांतिमाप्नुयात्।शान्तो मुच्येत बंधेम्यो मुक्तरू चान्यान् विमोच्येत्॥ष् अर्थात दुर्जन सज्जन बनेंए सज्जन शांति बनें। शांतजन बंधनों से मुक्त हों और मुक्त अन्य जनों को मुक्त करें। अपना प्रयोजन पूरा होने बाद तैंतीस वर्ष की अल्पायु में उन्होंने इस नश्वर देह को छोड़ दिया। . वेदसार शिवस्तवरू आदिगुरू श्री शंकराचार्य द्वारा रचित यह शिवस्तव वेद वर्णित शिव की स्तुति प्रस्तुत करता है। शिव के रचयिताए पालनकर्ता एव विलयकर्ता विश्वरूप का वर्णन करता यह स्तुति संकलन करने योग्य है। पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम् जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम् . हे शिव आप जो प्राणिमात्र के स्वामी एवं रक्षक हैं.. पाप का नाश करने वाले परमेश्वर हैं….गजराज का चर्म धारण करने वाले हैंए श्रेष्ठ एवं वरण करने योग्य हैं…. जिनकी जटाजूट में गंगा जी खेलती हैंए उन एक मात्र महादेव को बारम्बार स्मरण करता हूँद्य . महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम् विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम् हे महेश्वरए सुरेश्वर… देवों के भीद्ध दुरूखों का नाश करने वाले विभुंश्वनाथ आपद्ध विभुति धारण करने वाले हैं… सूर्य… चन्द्र एवं अग्नि आपके तीन नेत्र के सामान हैं। ऎसे सदा आनन्द प्रदान करने वाले पञ्चमुख वाले महादेव मैं आपकी स्तुति करता हूँ। गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम् भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम् . इस्लाम के उदय से भी 1000 साल पहले आदिगुरू शंकराचार्य ने पूरे भारत का भ्रमण कर के एकेश्वरवाद पर उस वक्त के सभी विद्वानों को शास्त्रार्थ में परास्त किया था लेकिन फिर भी उन्होंने भारत के चार कोनों में चार विशाल मंदिरों की स्थापना की । . कबीर एकेश्वरवाद के सबके बड़े प्रचारक थे लेकिन उनके गुरू सगुण भक्त थे और उनसे कबीर को गंगातट पर जो मंत्र प्राप्त हुआ था वह भगवान राम का अमोघ मंत्र राम…था। तुलसी.. सूर… रहीमदास.. मीरा आदि सैंकड़ों हजारों संतों को सगुण भक्ति से ईश्वर की प्राप्ति हुयी है । यह कहना गलत है कि सिर्फ एकेश्वरवाद के सहारे ही ईश्वर को पाया जा सकता है । जो लोग सिर्फ एकेश्वरवाद को पूरी दुनिया पर थोपना चाहते हैं वे दूसरों की धर्म…आस्था…. विश्वास और उपासना की स्वतंत्रता के घोर दुश्मन हैं । हमारे यहां ईश्वर प्राप्ति के सभी दरवाजे आपके लिये खुले हुये हैं । आप किसी भी रास्ते से उस तक पहुंचने के लिये स्वतंत्र हैं और ईश्वर को मानने और न मानने के लिये भी स्वतंत्र हैं । यह आपका निर्णय है । हम उसका भी सम्मान करते हैं न कि विरोधियों के खिलाफ फतवा जारी करते हैं । बहुतों को जान कर आश्चर्य होगा कि किसी धार्मिक व्यक्ति से नास्तिक व्यक्ति का सभी धर्मों का ज्ञान विशाल होता है । वह ज्ञानयोग का मुसाफिर है और ईश्वर को ज्ञान द्वारा सिद्ध करना चाहता है। बहुत से घोर नास्तिक जीवन के अंत समय में घोर आस्तिक होते देखे गये हैं । . श्री राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापित किया था । योगेश्वर श्री कृष्ण ने गोवर्धन पूजा आरंभ करायी थी । आज भी भारत में बहुत से मंदिर ऐसे मिल जायेंगे जिनकी स्थापना स्वयं श्री राम या श्री कृष्ण ने की थी । एकेश्वरवाद अगर परम सत्य है तो उस सत्य तक पहुंचने की सीढ़ी सगुण उपासना है । बड़े बड़े से योगी को भी हवा पर ध्यान लगाने से पहले किसी सगुण को आधार बनाना पड़ता है । सगुण उपासना प्राइमरी और हाईस्कूल की पढाई है । बिना सगुण उपासना के आप निगुर्णरूपी पीएचडी कर ही नहीं सकते हैं । बिना भाव के भक्ति पैदा नहीं होती है और भक्ति के लिये किसी आधार की जरूरत पड़ती है । जब सगुण भाव दृढ हो जाता है तब उस साधक की अपने आप उस विराट शून्य की तरफ यात्रा शुरू हो जाती है और वह निगुर्ण उपासना में प्रवेश कर जाता है । तब उसे पूरी सृष्टि में सिवाय परमतत्व के और कुछ दिखायी नहीं पड़ता । जैसा कि मनोज मयंक ने कहा इस्लाम में भी लोग पीर.. हाजी… मजार… दरगाह को आधार बनाते हैं… उन्हें भी निगुर्णरूपी हिमालय की चढ़ाई के लिये सगुणरूपी सीढ़ी की आवश्यकता महसूस होती है । निर्गुण तो अदृश्य है । उस अनचीन्हे.. अनजाने से आप सरलता से कैसे कोयी रिश्ता बना सकते हैं । . हिंदूधर्म कितना उदार… सहिष्णु और धमनिरपेक्ष है यह सिर्फ एक उदाहरण से समझा जा सकता है । शिरडी के साईंबाबा एक ऐसे फकीर थे जिन्होंने द्वारकामाई में अपने रहने के स्थान में फकीरों और संतों दोनों के ही चिन्ह धारण कर रखे थे । वे मस्जिद में रहते थे लेकिन वहां धूनी भी लगातार जलती रहती थी । उनके हिंदू और मुसलमान दोनो शिष्य थे । आज आप देखिये कि शिरडी जाने वाले लोगों में मुस्लिम कितने हैं और अजमेर में चिश्ती की दरगाह हो या मुंबई की हाजीअली की दरगाह या पूरे भारत में फैली तमाम फकीरों की दरगाह पर जाने वाले हिंदुओं का कितनी संख्या है । . अब कुछ बातें धर्मनिरपेक्षता पर कहना चाहूंगा । . जैस कि मैंने ऊपर कहा है हिंदू धर्म और हिंदू के मूल में धर्मनिरपेक्षता हजारों साल रही है । यह एक ऐसा तत्व है जिसके बारे में किसी हिंदू को बताने की जरूरत नहीं है । हमारे मूल में वसुधैव कुटुबकंम… सभी प्राणियों में एक परमतत्व को देखने की भावना… सत्य के प्रति जबरदस्त आग्रह और सभी प्राणियों के कल्याण की भावना हमेशा से रही है । विश्व भर में मानवाधिकार पर बहस मैग्नाकार्टा 1215.. पीटिशन ऑफ राइट्स 1628… हैबियस कारपस एक्ट 1679…. बिल ऑफ राइट्स 1689… अमरीकी स्वतंत्रता की घोषणा 1776 से शुरू हुयी । लेकिन इसके विपरीत 5000 साल पहले से ही हमारे यहां – सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः द्य सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखं आप्नवेत ॥ की भावना काम कर रही थी । हम सभी प्राणियो के कल्याण की भावना रखते हैं । सभी प्राणियों में मानव भी आता है । मानवाधिकार और धर्मनिरपेक्षता इस महान विचारधारा का मात्र एक छोटा सा हिस्सा है । . जहां एक तरफ हम पूरी सृष्टि को एक निगाह से देखते हैं उसके विपरीत कुरान में मूर्तिपूजकों और स्त्रियों के प्रति एक नकारात्मक विचारधारा है । वह उन्हें मानवाधिकार.. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र जैसे मूलभूत सिद्धांतों को भी न मानने के लिये प्रेरित करता है । . यही कारण था कि संविधानसभा ने एक लंबी बहस के बाद मूल संविधान में धर्मनिरपेक्षता शब्द को जगह नहीं दी । हिंदू हजारों साल से धर्मनिरपेक्ष रहा है । धर्मनिरपेक्षता उसके खून में है । उसे धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाने की संविधानसभा ने कोयी जरूरत महसूस नहीं की । इसके विपरीत संविधान के मूलाधिकारों में धर्म की स्वतंत्रता को अनु0 25.. 26.. 27.. 28 में जगह दी गयी है । . धर्मनिरपेक्षता शब्द को संविधान में न रखने का एक और कारण था धर्म के नाम पर भारत का विभाजन । इतनी बड़ी त्रासदी अगर देश को झेलनी पड़ी तो उसके पीछे भी एक आक्रामक धर्म था । सन 46….47 के दंगों ने महात्मा गांधी समेत बहुत से राजनैतिक नेताओं की सोच बदल दी थी । मोहनदास करम चन्द्र गांधी – मेरा अपना अनुभव है कि मुसलमान कूर और हिन्दू कायर होते हैं मोपला और नोआखली के दंगों में मुसलमानों द्वारा की गयी असंख्य हिन्दुओं की हिंसा को देखकर अहिंसा नीति से मेरा विचार बदल रहा है । गांधी जी की जीवनी.. धनंजय कौर पृष्ठ ४०२ व मुस्लिम राजनीति श्री पुरूषोत्तम योग . फिर धर्मनिरपेक्षता शब्द संविधान में कब आया । भारत में इमरेजेंसी का पीरियड । इंदिरागांधी की तानाशाही । संविधान का 42वां संशोधन । 42 वां संशोधन अब तक का सबसे बड़ा संशोधन रहा है । इसके द्वारा संविधान में व्यापक स्तर पर संशोधन किये गये । यह संशोधन तब किये गये जब समूचा विपक्ष जेल की सलाखों के पीछे था । संसद खाली पड़ी थी । 42 वां संशोधन एक फर्जी संविधान संशोधन था । इसी संविधान संषोधन में संविधान की प्रस्ता

    kmmishra के द्वारा
    November 10, 2010

    । इसी संविधान संशोधन में संविधान की प्रस्तावना में ..धर्मनिरपेक्ष.. समाजवादी और राष्ट्र की अखंडता… शब्द जोड़ा गया । जनता पार्टी की सरकार ने 44 वें संविधान संशोधन 1978 के द्वारा 42 वें संविधान संशोधन द्वारा आपातकाल में इंदिरागांधी द्वारा किये गये तमाम फर्जी संशोधनों को निरस्त कर दिया । लेकिन वे संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गये ..धर्मनिरपेक्ष.. समाजवादी.. शब्द के दुरगामी प्रभाव का विश्लेषण नहीं कर पाये और ये शब्द बने रहने दिये गये । . केशवानंद भारती.. इंदिरागांधी बनाम राजनारायण.. मिनर्वा मिल आदि महत्वपूर्ण वादों ने संविधान के आधारभूत ढांचे को मान्यता दी । इस ढांचे में शामिल है – 1. विधि का शासन 2. समता का अधिकार एवं शक्ति के पृथक्करण का सिद्धांत 3. संविधान की सर्वोच्चता 4. परिसंघवाद 5. धर्मनिरपेक्षता 6. देश का प्रभुत्वसम्पन्न… लोकतांत्रिक ढांचा 7. संसदीय प्रणाल की सरकार 8. न्यायापालिका की स्वतंत्रता 9. उच्चतम न्यायालय की अनु0 32,136,141 और 142 के अधीन शक्ति 10. कतिपय मामलों मे मूलअधिकार 11. संसद की संविधान संशोधन की सीमित शक्ति । . धर्मनिरपेक्षता को विभिन्न महत्वपूर्ण वादों में उच्चतम न्यायालय ने संविधान के आधारभूत ढांचे का हिस्सा माना है । संविधान संशोधन अनु0 368 के तहत आधारभूत ढांचे में संशोधन की प्रक्रिया अत्यंत कठिन है जिसके लिये संसद के प्रत्येक सदन के 2/3 सदस्यों का बहुमत और उसके बाद 50 प्रतिशत राज्यों की विधानमण्डल का समर्थन भी जरूरी है । . जनतापार्टी की सरकार धर्मनिरपेक्ष… समाजवादी… इन दो शब्दों के भारतीय राजनीति में दूरगामी प्रभाव का आकलन नहीं कर सकी और 44 वें संविधान संशोधन में इन शब्दों को हटाने के लिये उसने कोयी प्रयास नहीं किया । . जिस तरह से भारतीय समाज हजारों साल से धर्मनिरपेक्ष रहा है उसी तरह से वह समाजवादी रहा है । हमें विदेशी समाजवाद की जगह गांधी के समाजवाद को अपनाना चाहिये थे । धर्मनिरपेक्ष… समाजवादी.. यह दो शब्द अनु0 14 समता के मूलाधिकार का उल्लंघन करते हैं । इन दो शब्दों की वजह से भारतीय राजनीति में कुछ राजनैतिक पार्टियों को वीटो अधिकार प्राप्त हो जाता है । आप देखें कि भारत में पिछले दो दशक में हुये चुनावों में बहुत सी अलग अलग विचारधारा की पार्टियां अपनी असफलता को छिपने के लिये और जनता के मत से विपरीत जाकर मात्र धर्मनिरपेक्षता की आड़ लेकर अपने सारे गुनाह छिपा लेती हैं और एक पार्टी के खिलाफ…जनता के मत के विपरीत जाकर सब एक हो कर खड़े जाते हैं । चाहे चुनाव में वे एक दूसरे के खिलाफ ही क्यों न खड़े हुये हों । यह साफ साफ जनता के मत के साथ बलात्कार है और लोकतंत्र के सिद्धांत का मजाक उड़ाना है । . इसी के साथ समाजवाद शब्द कुछ पार्टियों की बपौती बन गया है । समाजवादी पार्टी और बंगाल और केरल के कम्युनिस्टों ने इस शब्द का पेटेंट करा रखा है और चुनावों में वे इसे एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं जबकि समाजवाद के वास्तविक अर्थ से ये पार्टियां कोसों दूर हैं । इस तरह हम देखते हैं कि इन दोनों शब्दों का भारतीय राजनीति में घोर दुरूपयोग किया जा रहा है जिससे कि राजनैतिक असमानता को अनैतिक और असंवैधानिक रूप से बढ़ावा मिल रहा है । यह दोनो ही शब्द अनु0 14 के तहत समता के मूलाधिकार का सरासर उल्लंघन करते हैं इसलिये इन्हें असंवैधानिक मानते हुये निरस्त कर देना चाहिये । . मैं बाजपेई जी की भावना की कद्र करता हूं पर दो विपरीत विचारधाराओं की बेमेल तुलना से असहमत हूं । बाजपेई जी ने प्रयास करके दोनों धर्मो के महान ग्रंथों की तुलना की है लेकिन जिन्होंने दोनों ही धर्मों के धर्मग्रंथों का अध्ययन किया है उनके लिये असमानताएं खोजना बच्चों का खेल है क्योंकि समानताएं कम हैं और असमानताएं बहुत अधिक । मैं अपनी बात के समर्थन में 100 से अधिक महापुरूषों की इस्लाम पर टिप्पणियां रख सकता हूं जैसे कि महात्मा गांधी के कथनों को मैंने ऊपर उद्धृत किया है लेकिन मैं उनको यहां दे कर उनको भी इस विवाद में घसीटना नहीं चाहता । मैं बाजपेई जी की भाईचारे की भावना का सर्मथन करता हूं लेकिन दो विपरीत ध्रुवों की तुलना का नहीं क्योंकि मेरे सामने 100 अधिक महापुरूषों के कथन हैं जो कि उनके व्यक्तिगत अनुभवों और इतिहास पर आधारित हैं । . अगर इस्लाम वाकई में एक शांतिप्रिय और सहिष्णु धर्म है तो उसके अनुयायियों के पास एक सुनहरा मौका 500 साल में पहली बार आया हुआ है । वे इस सुनहरे मौके को अगर भुना लेते हैं तो दुनिया भर के सवा अरब रामभक्त हिंदुओं का वे दिल जीत लेंगे और इतिहास को एक नया मोड़ देंगे । तमाम ऐतिहासिक समकालीन किताबों.. साक्ष्यों और एएसआई की रिपोर्ट से यह सिद्ध हो चुका है कि 1528 में बाबर के शिया सिपहसालर मीर बाकी ने राजा विक्रमादित्य का बनवाया 2000 साल पुराना राममंदिर तोड़ा था । हिंदू एक भव्य मस्जिद अपने पैसे से बनावाने की बात करके भाईचारे की पेशकश कर रहा है अब आपको यह निर्णय लेना है कि आप बाबर की हिंदुओ को अपमानित करने वाली मानसिकता को चुनते हैं या भाईचारे की एक कभी न मिटने वाली मिसाल स्थापित करते हैं । . बाजपेई जी ने मैंन आपसे पहले भी अनुरोध किया था कि सेमेटिक धर्मों से हिंदू धर्म की तुलना कभी नहीं हो सकती क्योंकि इनका एक मात्र मकसद येन केन प्रकरेण दूसरे लोगों का धर्मपरिर्वतन है । आपने अंगूठा दिया था प्रिय सायमा मलिक और डैनियल जी अपने नये लेख से कंधा और सिर दबोचने की तैयारी में हैं ।

    rajshahil के द्वारा
    November 10, 2010

    वन्देमातरम मिश्रा जी क्या आप भाजपा या उसके किसी सहयोगी santhan के सदस्य हो क्योकि ऐसी बाते वे ही कर सकते है क्योकि उन्होंने अपने द्वारा एक कुरान की रचना की है बस उसी में से बोलते रहते है कुरान में औरतो के प्रति क्या सम्मान है आपने नहीं लिखा लिखते तो अच्छा लगता आपने लिखा है की हिन्दू धर्म औरतो को समान अधिकार देता है शायद आप भूल गए यह वही धर्म है जिसमे औरतो के अगर पति मार जाते थे तो उन्ही जिंदा आग में जला ( सती ) दिया जाता था ऐसे सामान अधिकार बहुत अच्छे लगते है आपको जब पति नहीं तो तू भी नहीं सम्मान की बात करते हो औरतो के नग्न चित्र अजंता अलोरा में बना दिए उन्हें रासलीला की वस्तु बना दिया बोद्धो ने और जैनियों ने आपके धर्म को छोड़कर अपना अलग धर्म ऐसे ही नहीं बना लिया मिश्रा जी samay की kami होने के कारण छोटा ही likh paya hu वन्देमातरम वन्देमातरम

    kmmishra के द्वारा
    November 10, 2010

    प्रिय राज जी सादर वंदेमातरम ! मैं न तो भाजपा से जुड़ा हूं और न ही आर एस एस से । इसके अलावा ऊपर जो मैंने तथ्य दिये हैं वो ऐतिहासिक, धार्मिक और संवैधानिक हैं । उन्हें ध्यान से पढ़िये और अगर कहीं गलती हो तो बताईये । कुरान में मूर्तिपूजकों और स्त्रियों के लिये क्या विचार हैं इसे जानने के लिये आपको आपको बहुत ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी । नींचे दिये गये लिंक पर क्लिक कीजिये बहुत कुछ शीशे की तरह साफ हो जायेगा । . http://khabarworld.com/index.php?option=com_content&view=article&id=1042:poltics&catid=22:2010-05-20-11-55-06&Itemid=62 . क्या आपको पता है कि अरब सरकार ने कुरान की बहुत सी आयतों पर बैन लगा दिया है और एक नई कुरान प्रकाशित की है क्योंकि कुरान की उन आयतों से मुस्लिम लड़के आतंकवाद की प्रेरणा ले रहे थे । जानने के लिये लिंक पर क्लिक कीजिये । . सती प्रथा हिंदू सनातन धर्म की देन नहीं है । मुस्लिम काल में मुस्लिम शासक हारने वाले राज्य की सम्पत्ति के साथ वहां की औरतें भी जबरन उठा ले जाते थे । उनसे बचने के लिये जौहर की परंपरा की नींव पड़ी (नापाक हाथों से बेइज्जत होने से बचने के लिये हिंदू स्त्रियां आग में कूद अपने आपको खत्म कर देती थी) । बाद में इसने सती प्रथा का रूप धारण कर लिया । राजाराममोहन राय के प्रयासों से इस प्रथा पर अंग्रेज सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था । अब सतीप्रथा के बारे में सुनने को नहीं मिलता है . आपने अंजता ऐलोरा में औरतों की मूर्तियों के बारे में पूछा था । इसके लिये आपको धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के सिद्वांत से परिचित होना पड़ेगा । . समय के साथ हिंदू धर्म में कुछ शिथिलता आ गयी थी और बौद्ध और जैन धर्म का उदय हुआ लेकिन आज से 2500 साल पहले जन्मे आदि गुरू शंकराचार्य के अथक प्रयास से हिंदू धर्म फिर उठ कर खड़ा हुआ और बौद्ध धर्म को भारत के बाहर शरण लेनी पड़ी । गौर से देखेंगे तो बौद्ध़़ और जैन धर्म भी हिंदू धर्म का ही एक भाग हैं और तीनों धर्म एक दूसरे से इतने मिले जुले हैं कि तीनों में बहुत बारीक सा ही अंतर है । . आभार ।

    kmmishra के द्वारा
    November 10, 2010

    भूल सुधार आचार्य शंकर का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी तिथि ईसवी 788को तथा मोक्ष 820ई. को स्वीकार किया जाता है

    Rashid के द्वारा
    November 11, 2010

    मिश्रा जी,, जिस खबर का आप ने हवाला दिया है, वह एकदम गलत है,, दुबई सरकार या किसी भी अरब देश मे कुरान मे कोई फेर बदल नहीं किया गया है,, हक़ीक़त यह है की एक ग्रुप मे यह किताब लिखी है अरबी भाषा मे जो क्रिश्चियन या बाइबल की बातों पर आधारित है , कुरान का इससे कोई लेना देना नहीं है, खाली यह समानता है की दोनों अरेबिक मे है !! सच तो यह है की लोगो मे भ्रम ना फैले इस लिए इस किताब का वितरण बंद कर दिया गया है !!मुस्लिम समूहो का आरोप है की भ्रम फैलाने के लिए इस किताब को एकदम कुरान के स्टाइल मे (आयात / सूरा आदि) लिखा गया है !! ज़्यादा जानकारी के लिए आप नेट का सहारा ले सकते है !! नीचे एक लिंक दे रहा हूँ !! धन्यवाद राशिद http://en.wikipedia.org/wiki/The_True_Furqan

    dr.satyendra के द्वारा
    November 11, 2010

    निश्रा जी , आपके प्रश्न सार्थक हैं और बहस के योग्य भी , दिनकर जी ने कुरुक्षेत्र में लिखा है की– हिंसा का आघात अहिंसा ने कब कहाँ सहा है देवों का दल सदा दानवों से हारता रहा है बाजपाई जी थोडा लीक से हट कर सामजिक समरसता का रास्ता खोजने का प्रयास कर रहे हैं उनको साधुवाद , और आप ऐतिहासिक तथ्यों को नज़र अंदाज न करने को कह रहे हैं आपको भी साधुवाद ये सत्य है की हिन्दुस्तान के जिस भूभाग से हिन्दुओं की संख्या कम हुयी या हिती है वहां अलगाववादी आन्दोलन जोर पकड़ने लगता है ये सत्य है की सदियों से विश्व में धर्म के नाम पर ही आक्रमण और युध्ध हो रहे हैं ये एक कटु सत्य है की आजादी के ६३ साल बाद भी देश में साम्प्रदायिक दंगों में हजारों लोग अपनी जान गंवान चुके हैं और ये भी सत्य है की काश्मीर से धर्म के नाम पर ही काश्मीरी पंडितों का सफाया कर दिया गया लेकिन ये भी सत्य है की करोड़ों लोग साथ साथ भी रहना चाहते हैं करोड़ों लोग धर्म के नाम पर हिंसा के विरोधी हैं और ऐसा केवल हिन्दुस्तान में ही नहीं है मुस्लिम राष्ट्रों में भी अतिवादियों और कट्टरपंथियों में युद्ध चल रहा है पकिस्तान , अफगानिस्तान इराक से लेकर इरान तक मुस्लिम जगत में हिंसा एवं हाहाकार मच हुआ है ये भी सत्य है की इस्लाम में मूर्ति पूजा हराम है और पहिला मुर्तियुक्त मंदिर काबह में ही तोडा गया इस्लाम निराकार इश्वर की अव्धार्दा को बहुत ही सैधांतिक एवं सख्त रूप में स्वीकार करता है अब वो गलत हैं या सही ये तो भोले बाबा ही जानें . मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ की हमें इतिहास से सबक लेते हुए जो की हजारों साल पुराना है जैसा की आपने कहा मेरा मानना है की वर्तमान में भी चल रहा है हिन्दुस्तान की सामजिक समरसता के लिए कोई न कोई रास्ता अवश्य ही खोजना चाहिए , वो रास्ता स्थाई तभी हो सकता है जबकि इउसकी नींव सत्य पर राखी गयी हो और सत्य कडुआ तो है ही इस्लाम मूर्ती पूजा में विश्वास नहीं रखता और हिन्दू मूर्ती पूजक हैभी और रहेगा भी , तो रास्ता कैसे निकले ये ही एक यक्ष प्रश्न है . आदरणीय बाजपाई जी ही कोई मार्ग बताएं जिसपर हम ओग उनके पीच्चे पीछे चल कर कोई समुचित हल खोजने में उनके मददगार हो सकें धन्यबाद डॉ. सत्येन्द्र सिंह

    kmmishra के द्वारा
    November 12, 2010

    डा0 साहब मुझे खुशी है कि आप ने मेरी टिप्पणी को पूरा पढ़ा और मुझसे सहमत भी हैं । वास्तव में हम एक ही नाव पर सवार हैं लेकिन उसे अलग अलग दिशा में खे रहे हैं । हिंदू और मुसलमानों को इसी देश में रहना है चाहे वो शांति से रहलें या फिर एक दूसरे से नफरत करके । . प्यार हमेशा त्याग मांगता है । हमारे त्याग की पराकष्ठा पाकिस्तान का निमार्ण है । आज पूरा हिंदू समाज अपने मुस्लिम भाईयों की तरफ उदास आंखों से देख रहा है और पूछ रहा है कि भाई हम तुमसे तुम्हार मक्का मदीना नहीं मांगते हैं । राममंदिर हर तरह(ऐतिहासिक किताबों, साक्ष्यों, ए. एस. आई. की रिपोर्ट) से अदालत में सिद्ध होने के बावजूद भी क्या तुम अब भी बाबर के साथ खड़े रहोगे । हमारे लिये स्थान का महत्व है । मस्जिद हमसे उससे भी भव्य और ऊंची बनवालो पर हमारे श्रीराम की जन्मभूमि हमें वापस कर दो । दुनिया भर के सवा अरब रामभक्त हिंदू तुम्हारा यह एहसान कभी नहीं भूलेंगे और पूरी दुनिया में भारतीय मुसलमानों की मिसाल दी जायेगी कि भाईचारा क्या होता कोयी भारतीय मुसलमानों से सीखे । . डा0 साहब मेरे नये लेख ”धर्मनिरपेक्षता का असंवैधानिक पक्ष“ पर आपके विचार जानना चाहंूगा । सादर प्रणाम ।

    dr.satyendra के द्वारा
    November 12, 2010

    मिश्र जी बहुतबहुत धन्यबाद , मैं तो इतिहास के निकट हूँ इसीलिये आपको लग रहा है की आपके निकट हूँ . जहाँ तक पाकिस्तान के निर्माण का सवाल है वो हमारा त्याग नहीं मजबूरी थी और ऐसी बहुत सी मजबूरियों को हम त्याग की उपमा देकर अपने मन का क्षोभ मिटा लेते हैं :) खैर फिर भी हम आज़ाद हिन्दुस्तान के वर्तमान्स्वरूप की ही बात करें तो अच्छा आपने बहुत ही सुन्दर बात कही है की हिन्दुस्तान में सभी को साथ साथ ही रहना है चाहे ख़ुशी से रहें या मजबूरी से एक गाने की पंक्तियाँ याद आ गयीं ज़माने वालो किताबे गम में ख़ुशी का कोई बहाना ढूढो अगर जीना है ज़माने में तो हंसी का कोई बहाना ढूढो हम लोग बहानों में ख़ुशी ढूंढ रहे हैं काश सत्यके आधार पर , कडुई सच्चाई के धरातल पर , प्रेम की ऐसी नींव रखें जो स्थाई हो , तो आने वाली पीढियां हमें दूरदर्शी के रूप में , अन्यथा महादूरदर्शी , मूर्ख पूर्वजों के रूप में जानेगी अध्यात्म और महामात्य से गांधी की पदवी प्राप्त होती है लेकिन देश समाज क़ानून व्यवस्था सरदार पटेल जैसे लोह पुरुषों की दूरदर्शिता पर रखी गयी नींव पर ही फलती फूलती है, ये ही सत्य है भारतवर्ष एक बहुभाषी , बहुआयामी , वृहत लोकतांत्रिक देश है जिसके पास जल थल एवं नभ में रक्षा करने वाली, बलशाली सेना है , इसलिए पूर्व इतिहास की तरह ,जब देश छोटे छोटे राज्यों में बनता हुआ था , इस पर आक्रमण कर विजय प्राप्त करना किसी अन्य देश के बश की बात नहीं है हमारी सीमायें सुरक्षित हैं लेकिन समाज में असुरक्षा की भावना , अजीब सी विडम्बना है यह. समाज में सुरक्षा एवं स्नेह की भाव्नमा सभी स्दामाज मिल कर ही कर सकते हैं , राजनीतिक लोगों पर छोड़ना तो इस प्रकार होगा जैसे चोर के हाथों में घर इ चावी सोम्पना , राजनीतिक लोग कभी भी समाज में सुरक्षा की भावना नहीं पनपने देंगे , यदि ऐसा हो गया तो बहुत से नेताओं की दूकान ही बंद हो जाएगी , चाहे वो हिन्दू पोलिटिक्स करते हों चाहे मुस्लिम, और मुस्लिम नेता तो ज्यादातर असुरक्षा की भावना का ही दोहन करते नज़र आते है , उनका सेकुलरिस्म केवल कौम की पोल्तिक्स करने तक ही सीमित है, जो भला आदमी सही पोलिटिक्स करने का प्रयास करता है उसे नक्कारखाने में टूटी की तरह मोलवी लोग किनारे लगा देते हैं. इसलिए समाज के अछे , भले लोगों को आह्गे आकर इस दिशा में आहुति देने की आवश्यकता है , भारतवर्ष का पुनुरुथान सभी समाजों की मानसिक , शारीरिक, एवं आर्थिक सोच में बसा हुआ है, शान्ति निर्माण लेकर आती है, शान्ति का पहिला सूत्र प्रेम है अशांति , भूकंप हमेशा तबाही और क्रंदन लेकर ही आते हैं इस बात को सभी भारतवासियों को धर्म ,जाती की सीमाओं से ऊपर उठ कर सोचने की आवश्यकता है, जितना हमारा वर्तमान शान्तमय होगा उतना ही अधिक निर्माण हम अपनी आनेवाली पीढ़ियों के लिए कर जायेंगे ऐसा मेरा मानना है तो आईये क्यूँ न आज से ही , या बाजपाई जी के ब्लॉग के माध्यम से ही इस अखंड ज्योति को और अधिक प्रज्वलित किया जाये . वन्दे मातरम :) डॉ.सत्येन्द्र singh

rajshahil के द्वारा
November 8, 2010

वाजपेयी साहब आपने जो लेख लिखा है पहले तो मै आपकी सोच को करोडो -२ बार नमन करता हूँ . मुझे अच्छा लगा की आप जैसे महान लोग भी इस ब्लॉग पर हम साधारण लोगो के साथ विचारो का आदान प्रदान करते है मुझे भाई चारे जैसे लेखो का इन्तेजार रहेगा, maiचाहता की वो लेख आप ही लिखे —————————————————————– मनोज{जिन्होंने आपके लेख का उत्तर दिया है } जैसे लोग नहीं जो सिर्फ यही सोचते है हिंसा परमो धर्म बहुत बहुत धन्यवाद वाजपयी साहब

    sdvajpayee के द्वारा
    November 9, 2010

     भाई राज साहिल जी,  आपकी ”आप जैसे महान लोग भी इस ब्लॉग पर हम साधारण लोगो के साथ” बात से मैं सहमत नहीं हूं। न तो आप साधारण हैं और मैं महान-वहान। आप के दिल में भी प्रेम व भाईचारे की ललक है , मेरे मन भी है। इस लिए हम आप समान ही हैं। मैं ने इस्‍लाम- वैदिक विचारधारा और गीता – कुरान की एकरूपता पर वही लिखा है जो मैंने पाया और महशूस किया है। लेकिन सिर्फ लिखने पढने से काम नहीं चलेगा। कुछ और सकारात्‍मक करना होगा।

nazim mikrani के द्वारा
November 6, 2010

सर, सादर प्रणाम, कुरान व गीता के उद्देश्यों को एकरूपता में प्रदर्शित करने का आपका यह प्रयास साम्प्रदयिक सदभाव कायम करने में सार्थक साबित होगा. आपको दीपावली की हार्दिक बधाई.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 12, 2010

     नाजिम भाई, गीता – कुरान की एकरूपता संबंधी पोस्‍ट तुम ने पढी , अच्‍छा लगा । ” प्रेम , स्‍वार्थ का ब्‍यापार या कुछ और ” संभवत: अभी नहीं देखी। देखना।

HASEEB,BAHERI के द्वारा
November 5, 2010

Vajpayee sir adaab DIWALI MUBARAK, dono granthon me ek hi sandesh dia gaya h,maqsad ek,mission ek ,lekin granth ke qanoon pe amal ho jaye burayee hi khatm ho jayegi.insaan jo apna aim bhool ker bhatak gaya h line per aajayega,

ashvinikumar के द्वारा
November 4, 2010

परम आदरणीय वाजपेयी जी प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामना (आईये भगवान् श्री राम के पद चिन्हों का अनुसरण करते हुए इस प्रकाश पर्व से खुद को प्रकाशित करके एक नई आभा के साथ अनाचाआर को मिटाने का संयुक्त प्रयत्न करें ) सादर आपका

    sd vajpayee के द्वारा
    November 5, 2010

    priya Bhai Ashwani ji, aap do bhi deepawali bahut bahut shubh ho!

atharvavedamanoj के द्वारा
November 4, 2010

नंदा दीप जलाना होगा| अंध तमस फिर से मंडराया, मेधा पर संकट है छाया| फटी जेब और हाँथ है खाली, बोलो कैसे मने दिवाली ? कोई देव नहीं आएगा, अब खुद ही तुल जाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा|| केहरी के गह्वर में गर्जन, अरि-ललकार सुनी कितने जन? भेंड, भेड़िया बनकर आया, जिसका खाया,उसका गाया| मात्स्य-न्याय फिर से प्रचलन में, यह दुश्चक्र मिटाना होगा| नंदा-दीप जलाना होगा| नयनों से भी नहीं दीखता, जो हँसता था आज चीखता| घरियालों के नेत्र ताकते, कई शतक हम रहे झांकते| रक्त हुआ ठंडा या बंजर भूमि, नहीं, गरमाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा ||…………………………….मनोज कुमार सिंह ”मयंक” आदरणीय वाजपेयी जी, आपको और आपके सारे परिवार को ज्योति पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं || वन्देमातरम

kmmishra के द्वारा
November 4, 2010

  ”बांग्लादेश में उपद्रवियों ने काली मंदिर तोड़ा” पढ़ने के नीचे क्लिक कीजिये http://mahashakti.jagranjunction.com/2010/11/03/%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82%E0%A4%B2%E0%A4%B0-%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BF/#comment-11

pushkar jain के द्वारा
November 3, 2010

बाजपेइ जी, नमस्कारआपका यह कहना तो ठीक है की गीता और कुरान एक ही सन्देश देते है परन्तु आज हम यह स्वीकार करने को तैयार ही कहाँ है चाहे गीता हो या कुरान हो कोई नहीं कहता की दुसरे को कष्ट दो, धर्म का आशय मानव को संचालित करने वाली अमूर्त को नियंत्रित करते हुए जीवन को सरल बनाना है परन्तु जब धर्म को अपनाने के बजाय उसको गाने में यकीं रखेंगे तो आप कितनी ही समानता या भाईचारे की बात करो कुछ होने जाने वाला नहीं है गीता या कुरान की वाणी आचार का विषय है विचार का नहीं, और आचार तो छोटी छोटी बातो से ही सुधरेगा बड़ी बातें तो पोस्टरों और सभाओ के लिए है, गीता और कुरान में जो लिखा है उसके पीछे क्या उद्देश्य है और किनके लिए लिखा है किन देशकाल और परिस्थितियों में लिखा गया है साथ साथ उसकी प्रसिंग्कता और भावना की चर्चा होनी भी जरूरी है शायद हम बेहतरी और बढ़ सके आपके ब्लॉग के लिए साधुवाद  

    sd vajpayee के द्वारा
    November 3, 2010

    प्रिय भाई पुष्कर जैन जी, गीता-कुरान की एक रुपता और उनका संदेश स्वीकार न करने ही प्रेम और सद़भाव का माहौल प्रभावित होता है ! आप का कहना सही है कि धर्म अपनाने की चीज है, गाने की नहीं ! लेकिन बिना विचार के आचार कठिन है! विचार -सिद्धांतों को ही तो हम आचरण में उतारते हैं! दूसरी बात आपने गीता- कुरान में लिखे की प्रासंगगिकता पर भी चर्चा किये जाने की आवश्यकता बतायी है! मेरा मानना है कि ये दोनों सर्वकालिक हैं! इनके दार्शनिक पक्ष की प्रासंगगिता हमेशा रहेगी! आप ने प्रतिक्रिया दी और वह भी देवनागरी में बहुत अच्छा लगाा!

vishal gupta के द्वारा
November 3, 2010

आदरणीय भैया वाजपेयी जी, गीता और कुरान पर आपका विश्लेषण निसंदेह लोगों की आँखें खोलने वाला है. इस हेतु आपको बहुत – बहुत बधाई . धनतेरस पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ स्वीकार करें.

    sd vajpayee के द्वारा
    November 3, 2010

    प्रिय विशाल भाई, बहुत बहुत धन्यवाद आपको भी धनतेरस और दीपावली शुभ हो!

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
November 3, 2010

आदरणीय श्री वाजपेयी जी, मैंनें धर्म या दर्शनशास्‍त्र का अध्‍ययन नहीं किया हैं । मैं स्‍वयं एक साधारण ब्राह्मण परिवार से हूँ । तथापि आपके इस सारगर्भित लेख से प्रभावित हुआ हूँ । लेकिन जानता हूँ व मैंनें सुना भी है कि जितनें मुंड उतनी बातें । इस मंच पर देख भी रहा हूँ कि धर्म के बारें में निरंतर विद्धजनों की टिप्‍पणिया ब्‍लॉग पोस्‍टों के रूप में ही नहीं कमेंटस के रूप में भी आ रही हैं । इससे संशय ही अधिक उत्‍पन्‍न होता है । इसलिए मैं तो यही कहूँगा कि जाकी रही भावना जैसी प्रभू मूरत देखी तिन तैसी । अरविन्‍द पारीक

    sdvajpayee के द्वारा
    November 9, 2010

     प्रिय श्री अरविंद पारिक जी, ‘ गीता का संदेश वाहक है कुरान’ पर आप की प्रतिक्रिया देखी। कतिपय कारणों से विलम्‍ब से आपके सम्‍मुख हूं। दर्शन शास्‍त्र मेरा प्रिय बिषय शुरू से रहा है। ल‍ेकिन कम से कम एक बात पर तो मैं आपके नजदीक हूं ही- मैं भी एक साधारण या कहिए अति साधारण ब्राह्मण परिवार से हूं। सम्‍मति देने के लिए बहुत बहुत आभार।

kmmishra के द्वारा
November 2, 2010

बाजपेयी जी सादर वंदेमातरम ! आपको व सभी ब्लोगर्स को धनतेरस और दीपावली की शुभ कामनाएं । मिठाईयों से दूर रहियेगा और पटाखे थोड़ी दूरी से फोड़ियेगा । आभार ।

    mr. x के द्वारा
    November 2, 2010

    vandematram

    sd vajpayee के द्वारा
    November 3, 2010

    प्रिय श्री मिश्रा जी, नमस्कार !आपको भी धनतेरस और दीपावली की शुभ कामनाएं !असहमत ही सही आप को प्रतिक्रिया देनी चाहिए थी !

Mohammad.Khalid.Khan के द्वारा
November 2, 2010

भइया जी एक शख्स जिसे लोग भूल गए, पंडित मौलाना डॉ. बशीरूद्दीन कादरी शाहजहांपुरी साहब को गीता और कु़रान -दोनों कंठस्थ थे। अपने मिलने-जुलने वालों को अक्सर वे उनके उद्धरण सुनाया करते थे। गीता से वे इतने प्रभावित थे कि उसका अरबी में उन्होंने खुद अनुवाद किया था। और उन्होंने कुरान का भी अनुवाद संस्कृत में किया था, ताकि दोनों ही भाषाओं के जानकार इनके फलसफे को पढ़ और समझ सकें। असल में तो पंडित बशीरूद्दीन 11 भाषाओं के विद्वान थे। कई बार दूसरे पंडित और मौलाना लोग किसी श्लोक में उपसर्ग या हलंत या किसी आयत के उच्चारण में सुधार कराने के लिए उनके पास आया करते थे। गीता और कुरान पर व्याख्यान देने के लिए अक्सर उन्हें मंदिरों व मस्जिदों में आमंत्रित किया जाता था। वे गांधी फैज-ए-आम इंटर कॉलेज में इन्हें भी पढ़ें और स्टोरीज़ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें पढ़ाते थे, 1986 में वहीं से सेवा निवृत्त हुए। लेकिन उनके परिवार को सेवा निवृत्ति के फंड और ग्रच्युइटी वगैरह अब तक प्राप्त नहीं हुए हैं। उनकी पत्नी तमीजन बेगम भी उन ढाई हजार दुर्लभ पुस्तकों के संरक्षण की दुहाई देती अल्लाह को प्यारी हो गईं, जो पंडितजी ने लिखी थीं या एकत्रित की थीं। अंतरधर्म सद्भाव व समभाव को बढ़ावा देने वाले इस विद्वान ने अपना सारा जीवन गरीबी में गुजारा। यह और बात है कि धर्मनिरपेक्षता और समरसता को बढ़ावा देने की बात हमारे यहां राजनैतिक मंचों पर बहुत जोर-शोर से की जाती है, मगर ऐसी शख्सियतों को मिसाल के तौर पर जनता के सामने पेश करने का काम सरकारें कभी नहीं करतीं। लोगों के दिलों में ऐसे लोग अपनी नायाब पहचान खुद ही गढ़ते हैं। मौलाना साहब का जन्म शाहजहांपुर में अक्टूबर 1900 में हुआ था। उनके पिता मौलवी खैरूद्दीन बदायूं के लिलमा गांव की प्रारंभिक पाठशाला में अध्यापक थे। बशीरूद्दीन साहब ने उसी पाठशाला में अपनी पढ़ाई शुरू की। अपनी तेजस्वी छवि और प्रतिभा का परिचय उन्होंने हर स्तर पर दिया। 1922 में इंटर की परीक्षा में वे बरेली इंटर कॉलेज में प्रथम रहे। इसके बाद की पढ़ाई और अपनी पीएचडी उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से की। अरबी की उनकी दक्षता देख कर वहां के प्रफेसर भी दंग रह जाते थे। लेकिन यह पढ़ाई उन्हें अपने असली उद्देश्य तक नहीं पहुंचाती थी। इसलिए उन्होंने उर्दू, हिंदी, अंग्रेजी और फारसी में अलग से निपुणता प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने हदीस, कुरान, वेदों और गीता का गूढ़ अध्ययन किया और उनसे संबंधित हजारों अन्य पुस्तकें पढ़ने के बाद संस्कृत में कुरान और अरबी में गीता का अनुवाद किया। इन दोनों ग्रंथों पर इस प्रकार का वह पहला अनुवाद था। अभी तक किसी और ने तो ऐसा किया नहीं है। लेकिन इसके समानांतर 34 वर्ष तक लगातार वे गांधी फैज-ए-आम इंटर कॉलेज में ही पढ़ाते रहे और ‘86 में वहीं से रिटायर हुए। उन्हें सिर्फ कुरान और गीता ही नहीं, उनके अरबी और संस्कृत अनुवाद भी जुबानी याद थे। कई बार कुरान की किसी आयत की व्याख्या कर वे उससे मिलते-जुलते उपदेशों वाले गीता के श्लोकों की समीक्षा करते थे या उसका उलटा भी बताते थे। पंडित जी का निष्कर्ष यह होता था कि गीता और कुरान के साठ प्रतिशत उपदेश एक से ही हैं। पंडितजी का मानना था कि भारतीय मदरसों में आधुनिक शिक्षा की बहुत आवश्यकता है। यही कारण है कि बशीर साहब रचित कुछ पुस्तकें जयपुर के रामगढ़ क्षेत्र की बादी-ए-हिदायत में स्थित मदरसा ‘जामियतुल हिदाया’ में पढ़ाई जाती हैं। यह मदरसा आधुनिक शिक्षा का एक ऐसा मंदिर है जहां मौलवी लोग कंप्यूटर, हिंदी और विज्ञान आदि सीखते हैं। इतिहास का भी पंडित बशीरूद्दीन साहब को जबर्दस्त ज्ञान था। हिंदी में उन्होंने एक इतिहास पुस्तिका तारीख-ए-हिंदी की रचना की। यह पुस्तक अलीगढ़ विश्वविद्यालय की स्नातक कक्षाओं में आज भी पढ़ाई जाती है। विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. इरफान हबीब मानते हैं कि हिंदी के इतिहास पर यह पुस्तक मील का पत्थर है। पंडित मौलाना बशीरूद्दीन का निधन 12 फरवरी 1988 में हुआ। सारी उम्र उन्होंने दरवेशाना शान और फकीराना शहंशाही से गुजारी, पर राजनीतिज्ञों से हमेशा परहेज ही रखा। हम लोग भारत रत्न देने के लिए ऐसी गुमनाम हस्तियों के योगदान पर विचार क्यों नहीं करते?

    preetam thakur के द्वारा
    November 2, 2010

    खान साहेब ! बेहद शुक्रिया | आपने ऐसी सख्शियत से वाकफियत करवा कर मुझ पर बड़ा अहसान किया है | मेरा इ-मेल preetamthakur206@gmail.com है | मैं उस अज़ीम शख्शियत के लिए ज़रूर कुछ करना चाहूँगा अगर मुझे मौक़ा दिया जाये | हमें Politicianons के भरोसे नहीं रहना चाहिए | ये तो अपनी सँवारने के लिए लड़ाई (चुनाव ) लड़ते हैं | हमारी तो हमें ही संवारनी होगी | मुझे ख़ुशी होगी अगर मैं किसी किसम की सेवा कर पाऊँ |

    sdvajpayee के द्वारा
    November 9, 2010

     खालिद भाई , श्री प्रीतम ठाकुर जी को वांक्षित जानकारी दी या नहीं। कृपया उन्‍हें जवाब दे देना।

shivprasadsingh के द्वारा
November 1, 2010

namaskar. aapane pura nam nahin likha hai fir bhi manleta hoon ki aap hamare bareilly wale shambhu bhaee honge. Bhaee vajpeyee je yah to bahumooly shodh hai. Agar aise kuchh aur lekh ho to post karen. kuchh gyan badhaya jay.

    mr. x के द्वारा
    November 2, 2010

    u rit..

    sd vajpayee के द्वारा
    November 3, 2010

    bhaee Shiv Prashad ji, ji main apke Bareilly vala shambhu hun abhi bareilly hi hun gkp pahunch kar bhet karoonga. Gita& Qran ki ekroopta aur Islam ki Vaidik Dharm se najdiki par kuch kam kiya hai. dono ek hain. Deepawali ki shubhkamnayen.

atharvavedamanoj के द्वारा
November 1, 2010

आदरणीय वाजपेयी जी सादर चरण स्पर्श| एक बार फिर से झूठ का पुलिंदा मंच पर रखने का हास्यास्पद प्रयास….तर्क आपको स्वीकार नहीं,तथ्य आप देखना नहीं चाहते…हिन्दू मुस्लिम भाई भाई का नारा लगते हुए आपने बिना ऋत (cosmic order) की परिभाषा किये हजरत को ऋषि बना दिया| क्षमा करें इस्लाम कहाँ से एकेश्वरवादी है ? मुसलमान हाजी को पूजता है,गाजी को पूजता है,काजी को पूजता है,पाजी को पूजता है,सुल्तान को पूजता है,मुल्तान को पूजता है, पीर को पूजता है,फकीर को पूजता है,कब्र को पूजता है,मजार को पूजता है…वह कैसे एकेश्वरवादी हुआ? हजरत ने इल्म आने से पहले मूर्तियों को बेचा और जन जान लिया की काबिले मूर्तियों के लिए नहीं विस्वास के लिए लड़ते हैं तो एक बड़ी लडाकी विचारधारा रख दिया…लो पढो और लड़ो…अपनी बात को सिद्ध करने के लिए आपको हिन्दू धर्मग्रन्थो का उदाहरण देना पड़ा है इस बेचारगी पर मुझे तरस आता है…मैं तो धुर दक्षिणपंथी हूँ और आप धुर वामपंथी भी नहीं हैं…मेरा पक्ष भारत माता हैं जो हिन्दुओं के नाम 8वी शताब्दी में ही रजिस्टर हो गयीं थी| धर्मः धारयति प्रजानाम को ख़ारिज करने के कारन न तो इस्लाम एक धर्म है और सम्यक प्रकारेण प्रदीयते इति सम्प्रदायः मानने के कारन एक सम्प्रदाय| कुछ रिलीज भी नहीं करता इसलिए रिलिजन भी नहीं है| खैर, मैंने क्या कहता है कुरान हिन्दुओं के बारे में एक बार फिर से डाल दिया है…और १५५ भागों में मय सूरा पारा आयत इस्लाम की सही तस्वीर ही रखूंगा…आप प्रेम की दरिया बहाइये और मैं उस दरिया में इस्लाम की नाव चलता हूँ…तल्ख़ होने के लिए क्षमा करें

    ऋषि वाणी के द्वारा
    November 1, 2010

    आदरणीय वाजपेयी जी भाई आप भी कमाल है ,(दुनियां में जितनी भी पुस्तकें हैं सब में आपस में समानता है क्योंकि सभी में शब्द हैं सभी में सन्देश हैं ) धर्म को धारण करना चाहिए ,,और आस्था को सदैव ही गोपनीय रखना चाहिए (वृद्ध जन इसका पालन करें तो ……….(अंत भला तो सब भला )

    rajesh khanna के द्वारा
    November 1, 2010

    @rishi vaani- kaash is samaanta ko humare hindu aur muslim bhai bhi samajh sktey to kitna accha hota..

    sdvajpayee के द्वारा
    November 1, 2010

     ऋषि वाणी जी को प्रणाम। आस्‍था प्रेमाधारित होती है। कैसे गोपनीय रह सकती है ? रहीम जी  ही कह गये हैंकि वैर, प्रीति और मदमान छिपाने से भी नहीं छिपते। सही आस्‍था आक्रामक और कठोर नहीं होती। सरस, सहज,स्‍नेमयी और सर्वग्राही होती है।

    sdvajpayee के द्वारा
    November 1, 2010

     प्रिय मनोज भाई, मै आपके सवालों का जवाब कोशिश कर के भी नहीं दे पाऊंगा क्‍यों कि मेरा उतना अपेक्षित अध्‍ययन-ज्ञान नहीं है। फिर कुछ निवेदन – मैं ने हिन्‍दू – मुस्लिम एकता जैसा कोई नारा नहीं दिया। मैं कोई राजननीतिक या सामाजिक कार्यकर्ता भी नही हूं। प‍ारिवारिक दायित्‍व पूरे करने के लिए दैनिक जागरण में छोटी सी नौकरी करता हूं।मैं हिन्‍दू- मुस्लिम जैसा कुछ भेद -विभेद  मानता भी नहीं हूं। आप धुर दक्षिण पंथी हैं। मैं कोई पंथी नहीं हूं। पंथ को पगडंडी मानें तो गीता प्रस्‍थान – राजमार्ग – है। कुरान को भी मैंने ऐसा पाया है। इन्‍हीं का अनुरागी हूं। आप के या किसी अन्‍य के अनुभव अलग हो सकते हैं। दरिया न सही , प्रेम की फुहार  का प्रयास तो है ही। इस्‍लाम को सही संदर्भों में समझने का प्रयास करिए। वह विधर्म – अधर्म नहीं अपना ही , स्‍वधर्म, है। सनातन है। हिन्‍दू ग्रंथ तो कुछ होता ही नहीं। भारतीय या आर्य या वैदिक ग्रंथ ही कह सकते हैं। इस्‍लाम प्रेम का सागर है । डूबेगा नहीं ,डुबा सकता है।

    Mohammad.Khalid.Khan के द्वारा
    November 2, 2010

    हस्ती चढ़िए ज्ञान की, सहज दुलीचा डार श्वान रूप संसार है, भूंकन दे झकमार

    श्रीकृष्‍ण के द्वारा
    November 2, 2010

    हे अर्जुन वह आर्य जो अनार्यों की तरह आचरण करते हैं ,फिर चाहे वह तुम्हारे बंधु बांधव हों,वह क्षमा योग्य नही हैं ,तुम अपना गांडीव उठाओ (यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः अभ्रिथानाम सृजान्य्हम,संभवामि युगे युगे , तुम चिंता विमुक्त हो जाओ मै पुनः धर्म रक्क्षा हेतु शीघ्रातिशीघ्र प्रकट हो रहा हूँ ) हे अर्जुन वह कौरव तो राज मद में चूर हो दर्म को पद दलित कर रहे थे (लेकिन यह आर्य) जिसका श्रधेय वह है जिसके मतानुयाई धर्म को शर्मसार कर रहे हैं (पूर्णतः अनार्य बन गया है)

    ऋषि वाणी के द्वारा
    November 2, 2010

    मै पुनः कहता हूँ हे विप्र आस्था को सदैव गोपनीय रखना चाहिए ,( वैर, प्रीति और मदमान छिपाने से भी नहीं छिपते) क्या तुमारे अन्दर यह तीनों गुण हैं ?

    धर्मराज के द्वारा
    November 2, 2010

    हे पुत्र मैं तुम्हारे सारे कुकर्मों को देख रहा हूँ ,चिता मत करो कृष्ण का पदार्पण होने वाला है और मैं इस बार अर्जुन रूप में पृथ्वी पर जन्म लूंगा,दुराचार छोड़कर सदमार्ग धारण कर लो ,द्रोपदी का चीर हरने वाले दुःशाशन न बनो ,गीता की पवित्रतता भंग मत करो,या फिर (लादेन हो गये हो ) क्योंकि वह भी शरियत की स्थापना कर रहा था ,कहीं तुम भी उसके भाई तो नही हो देश पवित्र लोगों के लिए है (वैसे (शूकर,कुत्ता ) की भी दो आखं दो कान एक मुंह होता है वह भी भोजन करता है , मल विसर्जन करता ,इस अर्थ में तुम भी उसी के सामान हो )

    JK के द्वारा
    November 2, 2010

    मनोज जी आप एक अच्छे द्र्रष्टा मालूम पड़ते हैं पर मैं आप से एक बात अवश्य ही कहना चाहूंगा आप खुद का ही पक्ष ले रहें हैं आपको निषपक्ष होना चाहिए। बदलाव की पहल तो करनी ही होगी। मंदिर मस्जिद को एक होना होगा…तभी हम एक हो पाएंगे|

    JK के द्वारा
    November 2, 2010

    धर्मराज जी आप का मानसिक संतुलन ठीक नहीं है। आप मानसिक रुप से ग्रस्त हैं

    mr. x के द्वारा
    November 2, 2010

    dharma raj ji ki umar lagta hai 60 ke paar ho gayi hai..

    sd vajpayee के द्वारा
    November 3, 2010

    प्रिय श्री धर्म राज जी, आप ने तो अपना नाम ही धर्मराज , धर्म का राज , लिखा है इस लिए मैं मान लेता हूं कि आप मुझे कुत्ता कंह रहे हैं तो यह आपका मेरे प्रति प्रेम और आप के ज्ञान कप संम दृष्टि ही होगी! पंचवें अध्याय में गीता का एक श्लोक है- विद्याविनयसम्पन्ने ब्राम्हणे गविहस्तिनि शुनिचैव स्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः ! ज्ञानी जन विद्या विनय से युक्त ब्राम्हण तथा चांडाल में , गाय में और कुत्ते में तथा हाथी में समान दृष्टि वाले होते हैं! उनकी दृष्टि में विद्या विनय वाला न तो कोई विशेषता रखता है और न चांडाल कोई हीनता रखता है! न गाय धर्म है , न कुत्ता अधर्म है और न हाथी विशालता ही रखता है! ऐसे ज्ञाता जन समदर्शी – समवर्ती होते हैं! शिरडी वाले साईं बाबा भी कुत्ते में ब्रम्ह देखते थे! दीपावली की आपको सपरिवार हार्दिक शुभकामनायें!

    dr.satyendra के द्वारा
    November 5, 2010

    श्रीकृष्ण जी नमस्कार! भगवन महाभारत के युध्ध में आप दो वन्धावों के बीच फंसे थे और दोनों ही आपसे मदद्मांगने आये थे दोनों ही आपके रिश्तेदार थे और मुझे आज तक याद है की युद्ध से पूर्व आपने पांडवों और कौरवों दोनों में ही समझौते का अथक प्रयास भी किया था आज आपकी भूमिका अधूरी क्यूँ>??????????????????

    rajshahil के द्वारा
    November 8, 2010

    सबसे पहले मैं आपसे कहना चाहूँगा की मैं आपका क्या नाम है समझ नहीं पाया आपने अपने नाम का घसीटा बना दिया है जो आपकी घटिया सोच को दर्शाता है जहाँ आज सभी भाई चारे और सवंवय से रहना चाहते है वहा आप जैसे भाजपा दूषित प्राणी कुछ और कर गुजरने को तैयार है मेरे विचार में वाजपयी साहब ने बहुत अच्छा लिखा जो उनकी स्वस्थ मानसिकता को दर्शाता है आप लिखते हो इस्लाम हर चीज को पूजता है तो इस्लाम पूजता नहीं मानता है उनका आदर करता है जैसे आप अपने पिता का करते है क्या गीता यदि आप सबसे बड़े धर्मवादी हो तो गीता mei दुसरे धर्मो का अपमान करो लिखा है अगर ऐसा लिखा तो तो आप किस गीता को पड़ते हो पता नहीं आपकी जानकारी के किये बता दू गीता रामायण हो या महाभारत सभी युध्द की प्रष्टभूमि पर लिखी गयी है क्या आपने इनमे से से सिर्फ गीता से कौरवों , रामायण से रावण के उपदेश ही पड़े है और आप उनकी सोच को ही अपनाते है श्रीमान कुछ अच्छी बातें भी पड़ लिया करे वाजपयी साहब ने जो लिखा है इसको बहस का मुद्दा बनाना चाहते है छोटी सोच दर्शाता है यदि आप सोचते है की कुरान हिंसा की परिचायक है तो आप बताये गीता मे क्या सिर्फ शांति का उपदेश छिपा है क्या उसमे भी तो धर्म के लिए चचेरे भाइयों को मारने की बात कही गयी है श्रीमान मैं इसे बहस का मुद्दा नहीं बनाना चाहता हूँ यदि आप इसे बहस का मुद्दा बनाते हो तो हम भारत बासी आपको इसका मुहतोड़ जबाब देने के लिए तैयार है क्योकि गीता मे लिखा है यदि बात धर्म पर आये तो …………………….. क्या करना करना चाहिए गीता पड़ कर देख लेना यदि आपको बुरा लगा हो तो इसके लिए मे आपसे माफ़ी मांगना ……………… नहीं चाहता क्योकि आपका लेख मुझे ऐसा करने से रोकता है

preetam thakur के द्वारा
November 1, 2010

बाजपाई जी ! आप तो इल्म का सरचश्मा हैं | पर जिनको यह पढना चाहिए वोह तो कभी पढेंगे ही नहीं और बहुत मुमकिन है के अगर पढ़ भी लिया तो आप को दांत दें | सब मालिक का ही कमाल है |

    sdvajpayee के द्वारा
    November 1, 2010

    आदरणीय प्रीतम ठाकुरजी, जिन्‍हें पढना चाहिए वे अगर नहीं भी पढते हैं तो इससे हकीकत तो नहीं बदल जाएगी। मुझे दाद न ही दें तो अच्‍छा। दाद की सही दिशा में सोच की जरूरत है। आपने सौ की सीधी एक बात कही है-सब मालिक का ही कमाल है |

    preetam thakur के द्वारा
    November 1, 2010

    देख लीजिये | मुझे ये कहे थोड़ी देर ही हुयी थी और वही डांट आप को आ चुकी है | इनकी गलती नहीं है इन्हों ने न तो वैदिक विचार को जाना और न इस्लाम को | जो दो सांपो को आपस में खेलता देख कर शिव और पार्वती की प्रेम लीला कह कर मंदिर बना कर, लिंग बना कर उसे योनी पर टिका कर, मिटटी का गणेश बना कर , मंदिर में ६-६ भैंसें काट कर इश्वर का मज़ाक उड़ाते हैं उन्हें ये क्या समझा के इश्वर क्या है | मन के मज़ार की पूजा कुरान की अवहेलना है तो क्या बुत्फरोशी गीता की अवहेलना नहीं है | बात इन गलतियों की नहीं की जानी चाहिए | असली बात यह है के इस्लाम में भी खुदा के अलावा किसी का सजदा करना कुफ्र है तो वेदों और गीता में भी कर्म काण्ड बुत फरोशी और रात को जाग कर पागलों की तरह एक ही धुन में हल्ला करना खुद भी जागना औरों की भी नींद हराम करना कुफ्र है | जब बात सैट की हो रही हो तो असत की चर्चा करना असंगत है | मत्ता पर तर ना किंचित असती मई सर्वं इदं प्रोक्तं सूत्रे इदं मंनिगान्ना | मुझ से अलग कुछ भी नहीं है | सब मुझ में इस तरह पिरोये हैं जैसे माला में मनके | ये गीता कें इश्वर नें कहा है | तो हर जीव इश्वर की माला के मनके हैं | नफरत के लिए जगह ही कहाँ है | जो नफरत करते हैं वो भी उसी माला में हैं और उसकी मर्ज़ी से उसका कोई मकसद पूरा कर रहे हैं जो हमारी समझ से परे है | इस लिए हर क्रिया को इश्वर की इच्छा समझाना ज़रूरी है |

    sdvajpayee के द्वारा
    November 1, 2010

      भाई साहब, मैं मानता हूं कि जो ईश्‍वर को मानता होगा वह आखरत को भी मानता होगा।यह मानता होगा कि एक यात्रा इस जीवन के आगे भी है जिसे हम देख जान नहीं पाते । वह ब्‍यक्ति सिर्फ प्रेमानुरागी ही होगा। वहां नफरत नहीं होगी।  गीता तो देवी- देवताओं तक की पूजा को हतोत्‍साहित करती है। कृष्‍ण कहते हैं- मन्‍मना भव……माम नमष्‍कुरु। या  सर्व धर्मान परित्‍यज्‍य मामेकं शरणं व्रज।   केवल मेरा भक्‍त बन। केवल मुझे नमष्‍कार कर। केवल मेरी शरण में आ।  आपका स्‍नेहाकांक्षी  

saransh के द्वारा
November 1, 2010

I think you should write a book on this topic..

    sdvajpayee के द्वारा
    November 1, 2010

     सारांश जी,  अभी तो खुश्‍क बहुत है मौसम बारिश हो तो सोचेंगे  हमने अपने अरमानों को किस मिट्टी में बोना है।

Ajay Shukla के द्वारा
November 1, 2010

भाई साहब शानदार। गीता और कुरान का यह संगम आपकी गंगा-जमुना और सरस्वती के संगम जैसी सोच का नतीजा है। 

    nachiketa के द्वारा
    November 1, 2010

    I agree with Mr. Ajay Shukla..

    sdvajpayee के द्वारा
    November 1, 2010

     प्रिय अजय जी,   आपने मेरे अपनी से व्‍यस्‍तता से समय निकाल मेरे प्रयास को पढा- सराहा अच्‍छा लगा। जो कमियां, सुझाव हों बताते रहें मुझे मदद मिलेगी।

Munish के द्वारा
November 1, 2010

आदरणीय वाजपेयीजी, एक अच्छे लेख के लिए बधाई, लेकिन सच बताऊँ तो मुझे कुछ ज्यादा की उम्मीद थी, जैसे आप कुछ सूरा और श्लोकों का सन्दर्भ देंगे, परन्तु आपने सन्दर्भ कुछ खास नहीं दिए और जो दिए उनमें किसी के भी विषय में ये नहीं बताया की ये किस अध्याय का कौन सा श्लोक या सूरा है. मुझे कुछ तर्कसंगत लेख की आशा थी एक सामान्य निबंध की नहीं. मैं आपसे माफ़ी चाहता हूँ यदि कुछ ठेस पहुँचाने वाली बात लिख दी हो परन्तु मैं आपके एक सार्थक प्रयास में तर्कों के आभाव की ओर ध्यान दिला रहा हूँ.

    crook के द्वारा
    November 1, 2010

    Mr. Munish.. It isnt necessary to state facts nd logic to ligthen the feeling of peace and brotherhood among the people of our country.. Please dont be insane..

    Munish के द्वारा
    November 1, 2010

    प्रिय Mr Crook , कृपया अनपढ़ों की तरह लकीर के फकीर मत बनिए, यदि कुछ कहा गया है अथवा लिखा गया है तो किसी तथ्य के आधार पर ही होगा, वाजपेयीजी के यदि ये अपने विचार होते तो प्रमाणों की आवश्यकता नहीं थी, लेकिन क्योंकि उन्होंने आधार धर्म ग्रंथों को बनाया है तो उन तर्कों को तो कायदे में उन्हें देना ही चाहिए. और यदि वो ये सब अपने मन से लिख रहे हैं तो में उनके विचारों का स्वागत करता हूँ और मैं ने ये नहीं लिखा की आपने गलत लिखा है या गलत प्रयास है, मैंने लिखा की उनको कुछ श्लोकों और सूराओं का भी जिक्र करना चाहिए था. तथ्य को समझिये साहब, Please dont be insane …..

    sdvajpayee के द्वारा
    November 1, 2010

     भाई मुनीश जी, आपने ऐसा लिख कर कतई ठेस नहीं पहुंचाई। अगर कोई सामान्‍य ब्‍यक्ति गीता-कुरान  की एक रूपता जैसा संवेदनशील मुद्दा उठाता है तो आप या किसी को ऐसे लेख की अपेक्षा तो करनी ही चाहिए जो भावुकता भरा कम, तथ्‍याधारित ज्‍यादा हो। मुझे आपकी इस अपेक्षा से खुशी हुई। अब इस बारे में मैं अपनी सीमाओं के बारे में निवेदन करना चाहता हूं। शुरू मेरा विचार जैसा  आप चाह रहे थे, कुरान मजीद की हर सूरा आयत और गीता के उल्लिखित श्‍लोकों के अध्‍याय का ससंदर्भ देने का था। लेकिन कुछ कारणों से मुझे काफी कम समय में इसे कंपोज और पोस्‍ट करना था। दौरान कंपोज्रिग मुझे लगा कि यह तो काफी लम्‍बा हो जाएगा और एक लेख में नहीं सिमट पाएगा।तब मैंने इसे जैसे तैसे यथा संभव कम कर समाप्‍त करने की कोशिश की। कई सूरतों -श्‍लोकों का तो जिक्र ही नहीं किया। अब देखिए , कुरान के अल्‍लाह की अवधारणा से गोस्‍वामी कितना प्रभावित थे यह पुष्टित करने के लिए कहां किस प्रसंग व कांड में साहब जैसे शब्‍द प्रयुक्‍त हुए हैं, देता और कुरान-गीता के सारे संदर्भ देता तो मेरे एक लेख में लिख पाना बडा मुश्किल था। इस की एक वजह तो यह कि मैं लेखन कौशल में सिद्धहस्‍त नहीं हूं। दूसरे , कोई शास्‍त्रीय विवेचन का इरादा भी नहीं था। इस इरादे से मैंने गीता- कुरान पढी भी नहीं। मामला केवल स्‍वांत:सुखाय वाला ही था। उसी दिल में एक भाव आया कि लिखूं। देखूं जो मुझे सच लग रहा है दूसरे लोग उसे कैसे लेते हैं। शायद सचाई की यह छोटी भावधारा आप सरीखे भाइयों का सहयोग पा बडी नदी बन जाए। आप ने मेरे \’\’ निबंध\’\’  में मार्क किया होगा – जब मैं कम समय में और एक ही प्रयास में इसे पूरा कर पाने में लडखडाने लगा तो मैंने यह निवेदन किया कि दोनों की एकरूपता को तो संक्षेप में किताब लिख कर ही दिया जा सकता है। वैसे में जो आधार- संदर्भ दिये हैं वे सही हैं और यह भी सौ फीसदी सही है कि दोंनों तत्‍वत: एक ही हैं।

    preetam thakur के द्वारा
    November 1, 2010

    मुनीश जी माफ़ करें तो याद करें के भुलले शाह अनपढ़ थे और सबसे बड़ा कमाल तो ये है के गुरु नानक तो पढने गए ही नहीं | ये तो अनादी रौशनी है क्या जाने कब किस को मिल जाये | क्यों के ज्ञान तो पहले से मौजूद है | ये तो उसकी मेहरबानी होती है के कही पे ज़ाहिर हो जाती है और कहीं पर अन्धकार बरपा कर देते हैं | कमाल तो ये है के जिस के अन्दर साड़ी रोशनियाँ जाकर ख़तम हो जातीं है खुद काला छेद (Black hole) है | ना ततार भासयते सूर्यो न शशांक ना पावका | यात गत्वा न प्रवंते तट धम्म परमम् मम | यह गीता के १५ वें में है और astrophysics में बिलकुल इन्हीं अलफ़ाज़ में black hole की परिभाषा है की वहां जाने के बाद कुछ भी वापस नहीं पलट सकता चाहे वोह अरबों खरबों सूरजों की रौशनी हो या नज़र न आने वाला , वज़न न रखनें वाला Neutrino हो | इस कमाल को गहराई से पढो तो ये mass hypnotism आधारित सारे मज़हब बौने और मजाक जैसे लगते हैं सिर्फ गीता और कुरान सच्च दिखती है |

gaurav tripathi के द्वारा
November 1, 2010

bahut hi accha.. is uplabhi ke liye badhaiyaan.. aap ki is pehel mein hum sab aapke saath hai..

    sdvajpayee के द्वारा
    November 1, 2010

    धन्‍यवाद गौरव जी, आपके साथ रहने से निश्चित रूप से सकारात्‍मक परिणाम  आएंगे।

ramesh sippi के द्वारा
November 1, 2010

Vajpayee sahab kya likhte hain aap.. Aapke pichle lekh bhi padh kar maza aa gaya..

    sdvajpayee के द्वारा
    November 1, 2010

     श्री रमेश सिप्‍पी जी,  मैं तो गीता- कुरान की सदृश्‍यता का थोडा सा संकेत ही कर सका हूं। इस पर पूरी किताब लिखी जा सकती है।

    ramesh sippi के द्वारा
    November 1, 2010

    ji haan vajpayee ji.. Kitaab to likhi jaa sakti.. Aur isse behtareen to kuch bhi nai ho sakta hai ki is kitaab ko aap likhein..

ashish dwedi के द्वारा
November 1, 2010

Sir.. Apne bahut accha lekh likha.. Samaj mein aaj aap jaise logon ki hi zarurat hai.. :) )

Rajnish kumar singh के द्वारा
November 1, 2010

sir aap to ish lekh se hindu muslim ekta ke ambassador ban sakte hain Aaj aap jaiso log ki hi jaroorat hain

    sdvajpayee के द्वारा
    November 1, 2010

     भाई रजनीश जी, हिन्‍दू- मुस्लिम अलग ही नहीं हैं। कुछ निहित स्‍वार्थी लोग सायास दूरियां फैलाते हैं।  मैं तो बहुत बहुत छोटा, अति सामान्‍य ब्‍यक्ति हूं। hindu muslim ekta ke ambassador जैसा बनने की भूमिका में अपने को उपयुक्‍त नहीं पाता। लेकिन आप और अन्‍य सक्षम लोग लोग इसे दिशा में आगे बढें तो देश और धर्म दोनों का भला करेंगे।

razia mirza के द्वारा
November 1, 2010

बहोत ही बहेतरीन पोस्ट !!!क्या समा बाँध लिया है आपने !!!

    sdvajpayee के द्वारा
    November 1, 2010

      सम्‍माननीया रजिया जी, यह बिल्‍कुल सत्‍य है गीता और कुरान पूरी तरह एक ही बात कहते हैं।  इस तथ्‍य को समझने ,स्‍वीकार करने और जीवन में उतारने की जरूरत है।  मैंने आपकी कुछ पोस्‍ट्स पढी हैं- जज्‍बाती, मोहक संसमरण।

zafar diamond के द्वारा
November 1, 2010

source is same .. so is the message :) we just have to understand and try to live in peace and harmony

    sdvajpayee के द्वारा
    November 1, 2010

     जनाब जफर साहब, आपने सारी बात एक सूत्र में कह दी। दर अस्‍ल यही, प्रेम, शांति, सद्भाव से रहना  ही ईश्‍वर-अल्‍लाह को अच्‍छा लगेगा। जो उसे अच्‍छा लगे वही करना ही धर्म है। फिर यह देश दुनिया के ति में भी है।

    sdvajpayee के द्वारा
    November 1, 2010

    जफर साहब, माफी चाहता हूं-   ”ति” को हित  के रूप में पढें।

shyamendra kushwaha के द्वारा
November 1, 2010

सर प्रणाम, एक बार आपने ि‍फर समाज को आइना दिखाया। काश, दिलों की दूरियां बढाने वाले तथाकथित कट्टरवादी तत्‍वों को समझ में आता कि हमारे धार्मिक ग्रंथ हमें क्‍या संदेश देते हैं। हमारे खान-पान, रहन-सहन, पूजा-पाठ के तरीकों में भिन्‍नता हो सकती है लेकिन धर्मग्रंथ तो हमें एक जैसी ही शिक्षा देते हैं।

    sdvajpayee के द्वारा
    November 1, 2010

     प्रिय श्‍यामेन्‍द्र भाई,  सब एक ही रास्‍ते से आते, एक ही रास्‍ते से(एक ही तरीके से) जाते हैं। परमात्‍मा  भी एक है। चाहे हम जिस नाम से पुकारें। सामान्‍य सी बात है कि सर्वोच्‍च शक्ति एक ही होगी। धर्म ग्रंथ भी मन-प्राण से एक हैं। भाषा, लोग और परिस्थितियां वगैरह भिन्‍न होती हैं। हम सब लोगों को आज इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

गणेश जोशी , हल्द्वानी के द्वारा
October 31, 2010

सर जैसा की आप कहते है… दोनों किसी वाद विवाद या खंडन मंडन में नहीं पडते। दोनों आस्‍थावान दिलों में प्रकाश- पवित्रता भरने वाले हैं। परम पथ प्रकाश हैं। कितना सुन्दर होता. हम सब इसी विचार और धारणा के साथ, एक होकर बिना किसी मतभेद के आपस में प्रेम करते हुए जीते. क्या हिदू है. क्या मुसलमान है. क्या सिख है और क्या ईसाई है… हम तो एक एसी शक्ति से संचालित है. जिसका अंत अभी तक कोई भी नहीं खोज पाया………वही परमेश्वर ही सब कुछ है… http://www.ugatasooraj.blogspot. com

    sdvajpayee के द्वारा
    November 1, 2010

    हां बालकख्‍ तुम ने ठीक कहा -हम तो एक ऐसी शक्ति से संचालित हैं जिस का अंत आज तक कोई नहीं खोज पाया। लेकिन इसमें मैं एक बात और जोडना चाहता हूं – आदि – मध्‍य भी नहीं । गीता में भगवान कहते हैं- मै ही प्राणियों का,इस सृष्टि का आदि, मध्‍य और अंत हूं।   हम इस तिलिस्‍म को नहीं तोड पाये हैं। शायद संभव ही नहीं है।

    dr. pramod goldi के द्वारा
    November 2, 2010

    बाजपेई जी आप जिस मुहीम में चल रहे है बहुत बढ़िया…………………

    sanjay rustagi के द्वारा
    November 4, 2010

    इस प्लेटफार्म पर गोल्डी भाई बहुत देर से दिखाई पड़े हैं। खैर उनके देर आयद दुरुस्त आयद पर बधाई। संजय रुस्तगी

Moh Ajam Khan के द्वारा
October 31, 2010

واجپئی جی آداب کتنی مہوببت ہے آپ کے دل میں یہ تو آپ کے گزشتہ مضمون پتہ چل گیا تھا پر آج دل سے خوشی ہوئی ہے ہمیں کیوں کی آج آپ نے ہمارے مذہب کو وپنت مذہب کے سامان بتا کر جو عزت بخشی ہے وہ الائتاا کی محبت ہے ہمارے لئے جو آپ کے ذریعے سے مل رہا ہے..

    sdvajpayee के द्वारा
    November 1, 2010

     आजम भाई ,  जहां तक मैं समझता हूं आप का मजहब सूरज की तरह सब को रोशनी देने वाला है। मुझ  जैसे नाचीज के इज्‍जत देने न देने से क्‍या फर्क पडता है ? लेकिन मेरा मानना है कि यह आपका मजहब पूरी तरह इंसानियत का और पूरी तरह इंसानियत के लिए है। वही जो शायद डा. अल्‍लामा इकबाल ने कहा था – मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना…….।साथ खडे होने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।

    preetam thakur के द्वारा
    November 1, 2010

    खान साहेब बहुत ऊंचे और अछे ख्याल हैं आपके ! मुमकिन है बाजपाई साहेब उर्दू न पढ़ पाते हों | मैं पढ़ तो लेता हूँ पर लिख नहीं पाता | बाजपयी जी खान साहेब का ख्याल है के आप के दिल में कितनी मुहब्बत है ये तो आपके पिछले लेख से ही पता चल गया था | पर इस लेख को पढ़ कर दिल को ख़ुशी हुई के क्यों के आपने हमारे मज़हब को वैदिक मज़हब के बराबर बता कर जो इज्ज़त बख्शी है वो अल्लाताला की मुहब्बत है हमारे लिए जो आप के ज़रिये से मिल रही है |

ramesh mewari के द्वारा
October 31, 2010

Bhai-sahab.. The initiative taken by you is and will b supported by all those who are the supporters of peace and harmony and always wish to sse the society united, widout any kind of stratifications..

    sdvajpayee के द्वारा
    November 1, 2010

     श्री रमेश मेवाडी जी, धर्म के बारे में सुनियोजित तरीके से फैलायी गयीं गलतफहमियों को दूर करने  से से हमें  शंति- सद्भाव बढाने के प्रयासों में मदद मिलेगी।

ansh gujral के द्वारा
October 31, 2010

(arre ruk ja re bande arre tham ja re bande ki kudrat hans padegi ho….) – 2 arre mandir yeh chup hai arre masjjid yeh gumsum ibaadad thak padegi samay ki laal aandhi kabristaan ke raste arre latpat chalegi (kise kaafir kahega kise kaayar kahega teri kab tak chalegi ho….) – 2 arre ruk ja re bande arre tham ja re bande ki kudrat has padegi ho…. YE LINES UN LOGON KE LIYE HAIN JO DHARM KE NAAM PE IS SAMAJ MEIN PEACE AND HARMONY NAHI AANEY DETEY HAIN..

    sdvajpayee के द्वारा
    November 1, 2010

     अंश गुजराल जी, धन्‍यवाद।    

hrishabh के द्वारा
October 31, 2010

Sir you have written a great blog.. It gives so empericalknowledge and provides such great feeling of harmony and peace..

    sdvajpayee के द्वारा
    November 1, 2010

     धन्‍यवाद ऋषभ जी।

dr.satyendra के द्वारा
October 31, 2010

श्रीमान! आपके इस महायज्ञ में मेरी एक आहुति मात्र ही मेरे मन को शान्ति प्रदान करने वाली होती है मानव प्रवृति ही स्वार्थपरक है मैं भी अपवाद नहीं हूँ कशमकश में जिंदगी का लुत्फ़ पा लेता हूँ मैं दर्द जब उठता है दिल में मुस्कुरा लेता हूँ मैं आप चलते रहिये पीछे पीछे मैं भी लगा रहूँगा :) प्रभु चावला जी जैसे विद्वानों को इस यज्ञ में शामिल होते देख अत्यंत हर्ष हुआ

Amit Kumar के द्वारा
October 31, 2010

Respected Sir,You have the facts prove that the Quran Gita is communicator. It certainly will guide such people who believe in God and discriminate. This in itself proves that the name of religion to spread hate he neither believed nor the Koran, the Gita believed

arvind gupta के द्वारा
October 31, 2010

All religions are ways to reach to almighty.They all spread the message of peace and harmony, then why fight on the basis of religion? Your critical analysis of “Gita and Koran” is very nice!

    sdvajpayee के द्वारा
    October 31, 2010

     आदरणीय गुप्‍ता जी,मैं मानता हूं  र्ध‍म कई नहीं एक ही है। जैसे ईश्‍वर या आकाश। हमारे देखने – मानने का अंदाज अलग है। प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूं।

Ashutosh के द्वारा
October 31, 2010

प्रणाम सर मैं ने ज्यादा तो कुरान के बारे कभी नहीं पढ़ा पर गीता के बारे मैं अक्सर चर्चा होती रहती हैं। ये तो आज के युवाओं का सौभाग्य है कि आप के माध्यम से दोनो धर्म के मध्य प्रेम और मिठास से युक्त रिश्ते को जानने का सुअवसर प्राप्त होना हमारे लिए सौभाग्य की बात है। मै इस एकता के संदेश को तथा इसके महत्व को जन जन के मध्य पहुंचाने का प्रयत्न करुंगा। आशुतोष

    sdvajpayee के द्वारा
    October 31, 2010

     प्रिय आशुतोष,  आप बडी बडी बातें करने वाले भी कुरान नहीं पढे होते हैं। जो कुरान या गीता को हृदयंगम कर लेगा  उसका नजरिया ही बदल जाएगा।

    Ashutosh के द्वारा
    October 31, 2010

    सर मैं आप की बात का समर्थन करता हूं तथा आपकी बात से सहमत भी हूं आप मेरे आर्दश हैं । आप के माध्यम से यह ज्ञान प्राप्त करना सौभग्य है मेरा मैं आप की हर बात का पालन करने का प्रयास करता हूं।

nishamittal के द्वारा
October 31, 2010

बाजपाई जी,मुझको धर्म के विषय मैं बहुत गहन जानकारी नहीं.अतः समझ नहीं पा रही हूँ क्या लिखूं.फिलहाल तो ज्ञान वृद्धि कर रही हूँ.

    sdvajpayee के द्वारा
    October 31, 2010

      आदरणीया निशा जी, ज्ञानोपासना ही तो धर्मनिष्‍ठा है। धर्मनैष्ठिक वही होगा जिसे धर्म की समझ है , जो धर्म मार्ग की ओर चलने को उद्यत-तत्‍पर है। धर्म के साथ गहनता, जटिलता और दुरूहता नहीं सरलता, सुगमता और सहजता चलते हैं। यह वाग्विलास नहीं धारणा का बिषय है। जानता तो मैं कुछ नहीं हूं । जो देखा-पाया वही निवेदित किया है।

Tufail A. Siddequi के द्वारा
October 31, 2010

वाजपेयी जी अभिवादन, “गीता-कुरान दोनों किसी जाति, सम्‍प्रदाय, क्षेत्र या काल विशेष के लिए नहीं हैं। सर्वजनहिताय ,सार्वभैमिक और सर्वकालिक हैं। दोनों लोक-परलोक सुधारने का रास्‍ता बताने वाले हैं। परलोक का रास्‍ता लोक से हो कर ही जाता है। मनुष्‍य ईश्‍वर की सर्वोत्‍कृष्‍ट रचना है । ईश्‍वर ने मनुष्‍य को बुद्धि, विवेक और संवेदनशीलता का अनुपम गुण दिया है।” आप वास्तव में प्रचार-प्रसार के माद्ध्यम का सदुपयोग कर देश और समाज हित में बहुत नेक कार्य कर रहे है, जिससे केवल और केवल प्राणी जगत का भला ही होगा. दिलों में बैठी नफरत घटेगी तो प्यार स्वतः ही बढ़ेगा. इस पोस्ट के साथ ही पिछली पोस्ट की भी हार्दिक बधाई कबूल कीजिये.

    sdvajpayee के द्वारा
    October 31, 2010

     तुफैल भाई,  तस्‍लीमात। बधाई के लिए मश्‍कूर हूं। यह स्‍वयंसिद्ध है कि गीता और कुरान एक ही संदेश देते हैं।   लोगों को इस दिशा में गंभीरता से विचार करना होगा। सचाई को समझना -स्‍वीकार करना होगा।

BRAJESH PANDEY के द्वारा
October 31, 2010

भाई साहब, आपने तथ्‍यों से यह सा‍बित कर दिया है कि कुरान गीता का संदेश वाहक है। इससे निश्चित तौर पर ऐसे लोगों को मार्गदर्शन मिलेगा जो ईश्‍वर में विभेद मानते हैं। ग्रन्‍थ हमारे समाज में अच्‍छाई और बुराई की पहचान कराता है। समाज को दिशा देता है। तभी तो इन ग्रन्‍थों को हथियार बनाकर तथाकथित कथावाचक, संत अपनी दाल-रोटी चला रहे हैं। पथभ्रष्‍ट समाज के अंदर की कुरीतियों को दूर करने के लिए किया गया प्रयास निश्‍चित तौर पर सार्थक है। पर दुख इस बात को लेकर होता है कि ज्ञान की तलाश में मनुष्‍य इधर-उधर भटक रहा है। जबकि उसके अंदर ही ईश्‍वरीय गुण मौजूद हैं। बस उसे जागृत करने की जरूरत है। दुख इसका भी है कि तमाम संत एवं कथावाचकों के द्वारा इन्‍ही धर्म ग्रन्‍थों की आड में जनता को लूटा जा रहा है। लूट की रकम का प्रयोग गरीबों की शादी, बीमारों के इलाज में नहीं बल्कि मौज-मस्‍ती व बाह़य आडम्‍बर में होता है। आपसे अनुरोध है कि धर्म के तथाकथित लूटेरों पर भी मार्गदर्शन करें। महति कृपा होगी।

    sdvajpayee के द्वारा
    October 31, 2010

     भाई बृजेश जी,  धर्म ग्रंथों की आड में लूटने का जो कार्य कर रहे हैं निश्चित रूप से वे धर्म की गलत व्‍याख्‍या कर ज्‍यादा नुकसान कर रहे हैं। विभिन्‍न कारणों अधिकांश लोग धर्म ग्रंथों का सम्‍यक अध्‍ययन -ज्ञान नहीं कर पातें । इसके वे धर्म गुरुओं के ही सहारे रहते हैं। कथित धर्मगुरू इसका तरह तरह से अनुचित लाभ उठाते हैं।

kavita banerjee के द्वारा
October 31, 2010

सर आप के लेख ने मुझे मोक्ष की पृापती करा दी।

Dharmesh Tiwari के द्वारा
October 31, 2010

आदरणीय बाजपेयी जी सादर प्रणाम,आपके हर एक लेख से धर्मो के बारे में गहन जानकारी मिलती है…………कुरान की एक भी सूरा या आयत ऐसी नहीं है जो वैदिक विचारधारा की विरोधी हो। गीता और रामायण में भी एक भी लाइन ऐसी नहीं है जो इस्‍लामी दर्शन से टकराती हो। कुरान के अल्‍लाह की ही अवधारणा से प्रभावित होकर तो गोस्‍वामी तुलसी दास ने अपने राम को ‘साहिब’ और ‘सुसाहिब’ कहा। तो फिर दिलों की दूरियां क्‍यों,……………………………..यही तो समझ से परे है की ये दूरियां क्यों है,धन्यवाद!

    sdvajpayee के द्वारा
    October 31, 2010

    आत्‍मीय धर्मेश भाई, वैदिक या सनातन धर्म का विरोधी कोई धर्म धर्म नहीं होगा और धर्म न होने से टिकेगा नहीं। कुरान तो वेद शास्‍त्र ही है। इसे किसी इंसान ने रचा या लिखा नहीं है। वैदिक ऋषि भी तो मंत्र दृष्‍टा ही होते थे। देश,काल ,परिस्थितियों के अनुसार कुछ क्रिया.-व्‍यवहार भिन्‍न हो सकते हैं। मुझे लगता है दूरियों का एक कारण तो यह है कि हम धार्मिक तो बनते हैं पर धर्म के पास नहीं होते ।

r.satyendra singh के द्वारा
October 31, 2010

Nice post thanx but , its very unfortunate that millions of people were killed,in last thousand years on the name of religion and inter-religious hatred and fight is still prvailing amongst human beings it doesnt matter who is reading which book first or last but people are fighting on ther name of books लोगों को समझना चाहिए की एक कागज़ का टुकड़ा ज्यादा कीमती है या एक जिंदगी सिद्धांत और नियम सहेजना समझना जरूरी है की किताब का पन्ना , जो दुबारा प्रिंट हो सकता है But we can see mobs fighting and killing people, raising slogans arsening and looting :) even raping females on the name of religion :) In which book its written? In which book this messege is given from Almighty? as I narrated in my previous post that No one has given new messege its the old messege based on four pillars of Dharma which we all know but dont follow. so its useless and should not be a matter of dispute that which book you are following first one or last one, More important is this wheather we are following four pillars of Dharma or not You raised a very valid question- की फिर दिलों में दूरियां क्यूँ????? Because we want to see these four pillars by our own spectacles :) Fight is for the number of spectacles and eye site My vision is more clear than you :) ________________________________ This is the main reason of inter-religious fights __________________________________ अज्ञान लड़ाई की जड़ है आपके ज्ञान चक्षु खुल गए हैं अतः आप धर्म का मर्म समझ गए हैं आपको साधुवाद Mass killings are still going on all around on the name of religion because of this ignorance people learnt the books but they didnt get the real messege there are two types of people in all the religions One-like you others- are in masses just opposite to you Basically people are away from religion they are fighting for communities and greeds most of the intelligent criminals , using communal feelings for their own gains these criminals may be social or political as per their ambitions and they are capable of mass movilisation their gains are in division not in union and they are more successful rather than people like you and me even then , your mission is pious you should carry on May Lord shiva bless you in achieving your goal Regards Dr.satyendra singh

    r.satyendra singh के द्वारा
    October 31, 2010

    mobilisation(movlisation)

    sdvajpayee के द्वारा
    October 31, 2010

     प्रिय श्री डा. सत्‍येन्‍द्र सिंह जी, धर्म के बारे में आप का सूक्ष्‍म ज्ञान-विवेचन चकित कर देने वाला है। आप नामी चिकित्‍सक हैं। मरीजों की बडी तादाद के चलते आपके पास ठीक से बात करने भी समय नहीं होता। आश्‍चर्यजनक है कि कब और कैसे अध्‍ययन-चिंतन को समय पाते होंगे।  मेरे भाव विचारों को आप समझ रहे हैं यह मेरे लिए बडी बात है।

Rashid के द्वारा
October 31, 2010

वाजपई सर,, आप के लेख साम्प्रदायिकता की आग को बुझाने में कारगर साबित होंगे ऐसा मेरा मानना है !! जैसा की आप के लिखा की कुरान में हिन्दू शब्द का कहीं प्रयोग नहीं है और कि कुरान की एक भी सूरा या आयत ऐसी नहीं है जो वैदिक विचारधारा की विरोधी हो। गीता और रामायण में भी एक भी लाइन ऐसी नहीं है जो इस्‍लामी दर्शन से टकराती हो। यह अपने आप में साबित करता है की जो मज़हब के नाम पर नफरत फैलाते है वह न तो गीता के मानने वाले है और ना ही कुरान के मानने वाले !! आप से ही प्रेरणा लेकर मैंने भी “क्या इस्लाम वास्तव मे वैदिक धर्म का ही प्रसार है ??” लेख लिखा है !! उम्मीद करता हूँ की लोगो के बीच जो ग़लतफहमिया है वह कम होंगी और देश में एक नयी सोच विकसित होगी !!! राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    sdvajpayee के द्वारा
    October 31, 2010

    प्रिय राशिद भाई,   आप के साथ खडे होने से अच्‍छा लगा। कुरान अल्‍लाह का कलाम, ईश्‍वर की वाणी, है। बिल्‍कुल पाक, उदार और पूरी दुनिया के लिए। अंतिम ईश्‍वरीय किताब होने से गीता समेत सभी किताबों का संरक्षक है। सामाजिक व्‍यवस्‍था में इस्‍लाम के महान योगदान का सुसंगत पुर्नमूल्‍यांकन होना चाहिए। इस्‍लाम को लेकर फैली या फैलाई जा रही गलतफहमियों को दूर करने का पूरी शिद्दत से प्रयास होना चाहिए। यह हर प्रबुद्ध भारतीय का कर्तव्‍य है।  मैं पिछले लेख ” ईश्‍वर ने पैगम्‍बर का राजतिलक किया’ में आप की पुरखलूस मौजूदगी की उम्‍मीद में था।

Alka Gupta के द्वारा
October 31, 2010

श्री बाजपेयीजी, मैं धर्म के बारे में बहुत अल्पज्ञानी हूँ पर रुचि है । पढ़ने पर  काफी सामग्री मिली और वह  भी सारगर्भित तथा ज्ञानवर्धक कुरान और गीता  की सादृश्यता को आपने बड़ी ही अच्छी तरह समझाया है बहुत अच्छा लगा पढ़ने में ।

    sdvajpayee के द्वारा
    October 31, 2010

     अल्‍का जी, मेरा मानना है कि धर्म के बारे में बहु ज्ञानी होने का विशेष महत्‍व नहीं है। एक सूत्र जानना काफी है कि हम सब का परम पिता एक है। हम ब्‍यर्थ में आपस में लडेंगे-मरेंगे तो उसे कष्‍ट होगा। परमेश्‍वर को बुरा लगे ऐसा कोई काम हमें नहीं करना चाहिए। मतलब इस सिद्धांत-सूत्र के जानने के बाद धर्म केवल आचरण-व्‍यवहार में लाने , पालन ,की बात रह जाता है। कुरान कहता है- धरती और आकाश में जो कुछ है सब का मालिक , सब को पैदा करने वाल अल्‍लाह है। वह बडी सामर्थ्‍य वाला है। राम कहते हैं- सकल विश्‍व यह मोर उपाया,सब पर मोरि बराबर दाया। गुरुवाणी है- एक नूर ते सब जग जाया। फिर हम आपस में इतना क्‍यों बंटते हैं ?

Ramesh bajpai के द्वारा
October 31, 2010

आदरणीय भाई जी यहाँ मै कवीवर रहीम जी का रामचरित मानस के बारे में मंतब्य दे रहा हु “रामचरित मानस विमल संतान जीवन प्रान | हिन्दुवान को वेद सम जमनहि प्रकट कुरान | गंगा की निर्मल धारा ,सूर्य का प्रकाश , और संतो की वाणी ,सदैव सब का सामान हित करती है

    sdvajpayee के द्वारा
    October 31, 2010

     भाई रमेश वाजपेयी जी, कविवर अब्‍दुल रहीम खानखाना और गोस्‍वामी तुलसी नजदीकी मित्र थे और  एक दूसरे का बहुत सम्‍मान करते थे। ऐसा भी जिक्र मिलता है कि गोस्‍वामी जी के सिफारिशी पत्र पर रहीम जी ने किसी की बडी आर्थिक मदद की थी। कुरान के अल्‍लाह की अवधारणा का गहार प्रभाव राम चरित मानस में देखा जा सकता है।

manoj vajpayee के द्वारा
October 31, 2010

sir thank you so much for give me the way of love, respect, trust, and life …

rajiv kumar pal के द्वारा
October 30, 2010

भाई साहब,        आपको पुनः बधाई 

    sdvajpayee के द्वारा
    October 31, 2010

     भाई साहब, अब तो आपने देवनागरी में टाइपिंग भी सीख ली । सुखद आश्‍चर्य हुआ।

Rahul Bos के द्वारा
October 30, 2010

आप के लेख के शीर्षक में ही इतना वजन है कि व्याख्या की जरुरत नहीं थी पर शीर्षक के साथ व्याख्या करना शीर्षक के साथ न्याय करना होता है। कुरान के द्वारा जो ज्ञान दिया गया है वह ज्ञान उसे गीता से विरासत में मिला है। इस विरासती ज्ञान और संदेशा का चक्र यूहीं चलता रहे बस यहीं प्रार्थना है ईश्वर से हमारी।

    sdvajpayee के द्वारा
    October 31, 2010

     श्री राहुल बोस जी, कितनी बडी विडंबना और दुर्भाग्‍य की बात है जिन ‘धर्मों’ के नाम इतनी असहिष्‍णुता और मारामारी है वे दोनों मन प्राण से आपस में एक हैं।

October 30, 2010

आदरणीय वाजपेयी जी………… एक पुस्तक में मैंने पढ़ा था की स्वामी रामकृष्ण परमहंस जो की काली के परम उपासक थे…… उन्होंने एक अदभुद प्रयोग किया …….. उन्होंने हिन्दू धर्म के अतिरिक्त उस समय प्रचलित सभी सम्प्रदायों जैन, बोद्ध के साथ ही इस्लाम के तरीकों से भी उस परमात्मा को पाने का प्रयास किया……… और सफल रहे और तब उन्होंने उद्घोष किया की आप किसी भी धर्म या पंथ को माने पर अंत में आप एक ही परमात्मा को पाते हैं…………… हमारे संतों ने अहम ब्रह्मास्मि कहा तो इस्लाम में सूफी फकीरों ने अनलहक का उद्घोष किया……. दोनों का शाब्दिक अर्थ एक ही है…….. महत्व इस बात का नहीं है की कौन धर्म बड़ा है……. महत्व इस बात का है की आप परमात्मा को कैसे पा सकते हैं…….. हमारे धर्म ग्रन्थ केवल परमात्मा की और संकेत कर रहे हैं…….. वो स्वयं परमात्मा नहीं हैं…….. हमें उन ग्रंथों के सहारे आगे बढ़कर उस परम शक्ति को पाने का प्रयास करना चाहिए…….. सारगर्भित लेख के लिए हार्दिक बधाई…….

    sd vajpayee के द्वारा
    October 30, 2010

      प्रिय भाई पियूष जी,  आपने सही कहा कि सभी धर्म ग्रंथ केवल परमात्‍मा की ओर संकेत करते हैं, वे   स्‍वयं परमात्‍मा नहीं हैं। लेकिन मुझे कभी कभी लगता है कि श्रद्धा के साथ इन्‍हें आत्‍मसात किया  जाए तो ये सब से गुरू होने की भूमिका निभाते हैं।  भगवान राम कृष्‍ण परमहंस ने इस्‍लामी पद्धति से भी साधना की थी। वे उसमें इतना रचबस गये थे कि काली मंदिर से उनके संबंधों पर भी सवाल उठने लगे थे। अल्‍लाह का अर्हनिश नाम जप और फकीरों की तरह ही रहना ,खाना। उस दौरान मां काली की पूजा भी भूल गए थे। रोमां रोला ने उनकी जीवनी लिखी है।  परम हंस जी पर यह पठनीय किताब है।

    Prabhu chawla के द्वारा
    October 30, 2010

    वाजपेयी जी आप चकित न हों मैं तो बस आप को उस कृष्ण रुपी सारथी की छाया मान रहा हूं और इस देश में अर्जुन बहुत हैं। और व्यक्तिगत हित से सर्वोपरी होता है सर्व हित जो आप कर रहें है और मैने आपकी तारीफ नहीं की है बस आप का समर्थन किया है|

    sdvajpayee के द्वारा
    October 31, 2010

     श्री प्रभु चावला जी, आप के समर्थन से बडा संबल मिला।सादर नमन।

Prabhu chawla के द्वारा
October 30, 2010

वाजपेयी जी आप ने जो लिखा है वह अतुल्य तो है ही कभी न बुझने वाली प्रेम और एकता की ज्योती भी जला दी है। महाभारत में जिस प्रकार श्री कृष्ण युद्ध के दौरान श्री अर्जुन के सारथी बनकर उनका मार्गदर्शन करते हैं ठीक उसी प्रकार आज आप का सारथी बनकर देश को प्रेम संदेश देना बहुमूल्य है देश के लिए। आज ऐसे सारथी की हम सबको जरुरत है।

    sd vajpayee के द्वारा
    October 30, 2010

     श्री प्रभु चावला जी, मैं तो अत्‍यंत अकिंचन हूं। प्रशंसा के शब्‍द मुझे फिट नहीं बैठते। मै कोई  नया रहस्‍योद्धाटन नहीं कर रहा। कोई भी कुरान – गीता के नजदीक जाएगा तो दोनों का एकत्‍व देख कर दंग रह जाएगा। इस सचाई से कैसे अधिक से अधिक लोग अवगत हों देश और मनुष्‍यता के हित में यह किया जाना जरूरी है। 

jaswant singh के द्वारा
October 30, 2010

वाजपेयी जी गीता और कुरान के बारे में लोग हमेशा से अपने विचार देते रहें हंै। पर आप ने जिन घटनाओं अथवा धर्म युद्ध का वर्णन किया है वह हमंे कहीं न कहीं आपस में जोड़ती हैं। सारी घटनाए एक के बाद एक घटित हुई हैं जो इस बात का साफ संकेत देती है कि जो ज्ञान गीता से प्रारम्भ हुआ है वह कुरान के माध्यम से आगे बढ़या गया है। हम ने तो अखंड भारत में जन्म लिया था पर आज वहीं देश प्रति दिन खंडित हो रहा है। कारण ;मैंद्ध हैं आज हर नागरिक मैं शब्द का शिकार हा रहा है। वाजपेयी जी आज मैं या आप किसी पडोसी की सहायता या उनका समर्थन भर कर देते हैं तो हम अपने ही घर के विरोधी कहलाते हंै। आप का प्रयास सराहने योग्य तो है ही साथ ही साथ मै अपील करता हूं अपनो से कि आप साचे कि प्रेम की एकता की जरुरत किसे नहीं हैं। जसवंत सिंह

    sd vajpayee के द्वारा
    October 30, 2010

      प्रिय श्री जसवंत सिंह जी,   बिल्‍कुल तार्किक, तथ्‍यपरक और प्रामाणिक है कि कुरान और गीता एक ही भाव-दर्शन का प्रकाश फैला रहे हैं और वैदिक दर्शन परंपरा व इस्‍लाम आपस में इजने सजातीय हैं कि उन्‍हें  विलग करना कठिन है। बडे आश्‍चर्य की बात है कि इसके बावजूद हिन्‍दू-मुस्लिम में दूरियां हैं।  प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार।

Ramesh bajpai के द्वारा
October 30, 2010

परम आदरणीय भाई जी प्रणाम .तमेव शरणं गच्‍छ सर्वभावेन भारत- हे अर्जुन तू सर्व भाव से उसकी ही शरण में चला जा। इस रहष्य रोमांच व अदभुद पोस्ट पर बधाई . श्रधा ,आस्था व धर्म के बिन्दुओ को आत्मसात करती यह पोस्ट पठनीय और महत्व पूर्ण है .कुरान की बहुत सी बातो को समझने का अवसर अनायास ही मिला है . बाकि प्रेम तो सर्वोपरि है ही

    sd vajpayee के द्वारा
    October 30, 2010

      प्रिय भाई रमेश वाजपेयी जी,   धर्म के बिना काम भी नहीं चलता, फिर हम धर्म पर स्‍वस्‍थ- सकारात्‍मक चर्चा से बचते हैं। करते हैं तो पूर्वाग्रह नहीं छोड पाते । एक बार खुले दिल दिमाग से देखें तो कि कमी कहां है । इस्‍लाम और वैदिक धर्म तो पूरी तरह एक ही आधार बिंदु पर खडे हैं- एक ईश्‍वर और प्रेम।

jalal के द्वारा
October 30, 2010

आदरणीय वाजपेयी जी , 12 घंटे काम के बाद बहुत मुश्किल से टाइम मिलता है जागरण पर आकर कुछ करने की. और इसी चंद मिनटों में आपका लेख पढ़ा, ऐसा लगा मानो दिल को सुकून दे गया. आपने एक बेहतरीन संवाद स्थापित किया और जातीय द्वेषों को फिर से दफ़नाने में आपकी भूमिका महत्वपूर्ण रही. और जहाँ तक हो सकेगा हम साथ खड़े रहेंगे. बस मेरा समय मुझे मेरा कलम बंद करने को कह रहा है, नहीं तो बातें और होती. मेरी तरफ से एक बार फिर से आपको आदर.

    sd vajpayee के द्वारा
    October 30, 2010

     जलाल भाई,   कृपया थोडा वक्‍त निकालें और अपने भाव -विचारों से पुन: अवगत करायें। आपकी सक्रिय मौजूदगी से  सचाई सामने लाने में मदद मिलेगी।

आर.एन. शाही के द्वारा
October 30, 2010

आदरणीय वाजपेयी सर, प्रेम और सद्भाव का यह संदेश पिछली कृतियों से कई मामलों में अधिक समृद्धियुक्त है । हर पोस्ट के साथ नया निखार आ रहा है, और तार्किकता भी प्रभावोत्पादक बनती जा रही है । बहुत-बहुत बधाई । ‘श्रद्धा से बढ कर कोई पाप नहीं है और श्रद्धा सब पापों से छुडाने वाली है।’ यहां पहली श्रद्धा संभवत: अश्रद्धा के स्थान पर त्रुटिवश टंकित हो गई है । चाहें तो अपने लाग से आराम से एडिट कर सुधार कर सकते हैं । धन्यवाद ।

    sd vajpayee के द्वारा
    October 30, 2010

      भाई शाही जी,  अश्रद्धा ही होना चाहिए। गलती की आकर ध्‍यानाकृष्‍ट करने के लिए ………। ठीक कर दिया है। लेकिन आप को पुन: आना पडेगा। बोध नहीं हुआ। यह तो त्‍वरित टिप्‍पणी ही है।

ASif Iqbal Rizvi के द्वारा
October 30, 2010

First of all i would like to thanks to start a debate which is very necessary in present scenario. When people are fighting on name of religion without know the truth. We don’t know what the Gita and Quran say but at every moment we tell gita says…quran says but in fact we don’t know the teaching of gita and quran if we know we never fight for religion.

    sd vajpayee के द्वारा
    October 30, 2010

      प्रिय आसिफ भाई, यह भी कितना दुखद और आश्‍चर्यजनक है  जिस धर्म – इस्‍लाम और वैदिक – के नाम पर हम आपस लडते हैं वे तो आपस में एक हैं। समझदार और जिममेदार लोगों का सबसे बडा  फर्ज है कि वे धर्म के नाम फैले अंधकार को दूर करें।

sarbjee pathak के द्वारा
October 30, 2010

good one sir

    sd vajpayee के द्वारा
    October 30, 2010

     धन्‍यवाद श्री पाठक जी।

Nitin Chabbra के द्वारा
October 30, 2010

Sir.. it was a pleasure to read your blog.. It opened my eyes and pulled me out of insanity..

    sd vajpayee के द्वारा
    October 30, 2010

     श्री नितिन छाबडा जी, गीता- कुरान की समीपता का संदेश फैलाने की जरूरत है। इस सचाई के सामने से भारत और मजबूत होगा।

anjali के द्वारा
October 30, 2010

Lajawaab lekh hai..

    sd vajpayee के द्वारा
    October 30, 2010

     अंजली जी,  सौ प्रतिशत सही है कि गीता और कुरान एक ही संदेश देते हैं। हम उनके नजदीक नहीं जाते या उन्‍हें सही संदर्भों में नहीं समझ पाते यह हमारा और देश का दुर्भाग्‍य है।

    अयोध्या प्रसाद त्रिपाठी के द्वारा
    March 18, 2011

    अपनी खैर मनाएं अंजली जी. आप लोगों से राम राज्य का वादा किया गया था, सोनिया के रोम राज्य में रहते आप लोगों को लज्जा क्यों नहीं आती? ईमाम आप को गाली देता है. स्वयं दास है और आप की आजादी छीनता है. क्या आप को नहीं मालूम कि संविधान ने आप को आजादी का वचन दिया है? ईमामों को दंडित करने के स्थान पर सोनिया ईमामों को वेतन दिलवा रही है. वह भी सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से! (एआईआर, एस सी १९९३, २०८६). जज शीघ्र ही कुमारी माताओं को इनाम देने का आदेश पारित करेंगे. संयुक्त राष्ट्र संघ इसका कानून पहले ही बना चुका है. [मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा. अनुच्छेद २५(२)]. जजों ने मानवता के हत्यारों जेहोवा व अल्लाह को ईश्वर घोषित कर रखा है. कुरान व बाइबल को धर्मपुस्तक घोषित कर रखा है. ईमाम के लिए आप काफ़िर हैं. इस्लाम है तो काफ़िर नही. हम आप के लिए लड़ रहें हैं और आप लोग अपने सर्वनाश की जड़ मस्जिदों और ईमामों को बचाने के लिए हमें प्रताडित कर रहे हैं. ईश्वर से डरिये.

ramesh के द्वारा
October 30, 2010

Sir.. MAZA AA GAYA.. JITNI TAREEF KARI JAYE KAM HAI..

    sd vajpayee के द्वारा
    October 30, 2010

     श्री रमेश जी, केवल मजा से मकसद नही पूरा होगा। अब तो वास्‍तविकता का प्रकाश फैलाने के लिए उठ खडे होने की जरूरत है।

nachiketa के द्वारा
October 30, 2010

Yes sir.. Exactly.. The title itself conveys the nature of the content filled with vibrations of harmony.. Kabir said that he was the child of RAMA AND RAHIM.. (since he was born by a brahmin widow and was brought up by by a muslim weaver family). He siad that GOD IS ONE.. He is only known by DIFFERENT names in DIFFERENT religions.. Vedas and Puranas and Quran and other holy books are just different methods of describing the universal power.. Rwading this blog of yours, which is full of knowledge and is a result of some great research work, reminded me of the life of KABIR and GURU NANAK DEV who devoted their life in the promotion of the unity of the HINDUS AND THE MUSLIMS..

    sd vajpayee के द्वारा
    October 30, 2010

     प्रिय नचिकेता, आप ने सही कहा – कबीर ने यह कह कर कि वे राम और रहीम के बेटे हैं धर्म तत्‍व  को पकड लिया था।

sanjay rustagi के द्वारा
October 30, 2010

सर उत्तम-अतिउत्तम….

    sd vajpayee के द्वारा
    October 30, 2010

     प्रिय संजय भाई, अपने  भाव विचारों को थोडा और विस्‍तार दो। हर प्रबुद्ध बयक्ति को धर्म पर जाग्रत होने की जरूरत है तभी देश में कुछ सकारात्‍मक बदलाव की बयार बहेगी।

    हिन्दू के द्वारा
    December 21, 2010

    किताब असल किताब पढ़ों.. मूर्खों.. कबीर, रहीम.. वगैरह को आतंकी नहीं मानते. वे क़ुरआन पढ़कर आतंक सीख रहे हैं.. असल किताब पढ़ क्यूं नहीं लेते. इंटरनेट पर ढेरो पड़ी है. हिन्दी मे ही पढ़ लो. गंगा-जमनी के चक्कर में गू मत खाओ.




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