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न जन्‍म है, न मृत्‍यु !

Posted On: 25 Nov, 2010 Others में

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हम कब से हैं ? जन्‍म लेने के बाद से? या फिर नामकरण के बाद से? उसके पूर्व नहीं थे ? या मृत्‍यु के बाद नहीं रहेंगे ? कह सकते हैं अस्तित्‍व का होना जीवन है और उस ‘होने’ का न रह जाना मृत्‍यु। दोनों का आधार जन्‍म है। तो फिर वही पुराना सवाल- पहले अंडा हुआ या मुर्गी ? ‍पहले जन्‍म हुआ या मृत्‍यु ? जन्‍म हुआ तो मृत्‍यु भी होगी ही। दोनों क्‍या एक ही सिक्‍के के दो पहलू नहीं हैं ? तो फिर वह सिक्‍का क्‍या है ? जन्‍म पर थाली क्‍यों बजाना और मृत्‍यु पर मातम क्‍यों मनाना ?
हम विचार करें तो पाते हैं कि जन्‍म -मृत्‍यु की चर्खी अनवरत चलती रहती है। आ रहे और अपना पार्ट अदा कर जा रहे हैं। शरीर और मन में भी श्‍ह खेल चलता रहता है। हजारों लाखों कोशिकायें प्रति पल जन्‍मती-मरती रहती हैं। कितने ही भाव-विचार और संकंल्‍प-विकल्‍प आते जाते रहते हैं। हर सांस में आयु घट रही है, शरीर जर्जर हो रहा है । मर रहा है। एक क्षण भी स्थिर नहीं है। जवान होने पर लडकपन मर जाता है और बूढे होने पर जवानी भी मर जाती है। इसे रोक-टाल पाना किसी वश में नहीं है।
सब कुछ मरणशील- मरणधर्मा है। हम सब जानते हैं किएक दिन हम भी मरेंगे।सब बिछड जाएंगे। सब कुछ छूट जाएगा-
पत्‍ता टूटा पेड से ,ले गयी पवन उडाय
अब के बिछडे न मिलें , दूर पडेंगे जाय।
किसी दिन देख लेना , तुम्‍हें ऐसी नींद आएगी
तुम जग न पाओगे, दुनिया तुम्‍हें तुम्‍हें जगाएगी।
हम भी गुस्‍ताखी करेंगे , जिंदगी में एक बार
दोस्‍त पैदल चलेंगे, हम कंधों पर सवार।

बिना यह जाने कि हम कहां से आये हैं, कहां जाएंगे और हमारी मंजिल क्‍या है। हमारे होने का कोई मकसद भी है या यूं ही बस जीते जाना है ?मरने के बाद हम नहीं रह जाते। कुछ अर्से बाद हमारी यादें और नाम भी। उसी तरह जैसे कितने ही नाम-चेहरे और नाते5रिश्‍तेदार नहीं रहे। सुंदर चेहरा, सुगढ शरीर और बलिष्‍ठ देहयष्टि देखते देखते कैसी कमजोर काया में बदल जाती है। अधिकार और रोब टपकाती आवाज अनुग्रह की याचक हो जाती है। धीरे धीरे सब उठते रहते हैं। अपने-पराये सभी। बीमारी-बुढापा या किसी घटना- दुर्घटना के बहाने से। कितना आश्‍चर्यजनक है कि सब कुछ अस्‍थायी और खत्‍म होने वाला देखते- जानते हुए भी हम मृत्‍यु की चर्चा तक नहीं करना चाहते। इसका नाम तक नहीं लेना -सुनना चाहते। आंख मूंद कर दुनियादारी में ऐसे लगे रहना चाहते है मानों हम कभी नहीं मरेंगे- सामान सौ बरस का पल की खबर नहीं।
साधो ! यह मुर्दों का गांव
पीर मरे , पैगम्‍बर मरिहैं, मरिहैं जिंदा जोगी
राजा मरिहैं, परजा मरिहैं, मरिहैं वैद्य औ रोगी
चांद मरे औ सूरज मरिहैं
गुरू मरे और शिष्‍य भी मरिहैं……।

भारतीय मूल की वैज्ञानिक डा. प्रिया नटराजन के नेतृत्‍व में येल यूनिवर्सिटी के खगोलशास्त्रियों के दल ने एक महत्‍वपूर्ण अध्‍ययन में पाया है कि ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है।डार्क एनर्जी उसका लगातार विस्‍तार कर रही है। डार्क एनर्जी अदृश्‍य ऊर्जा मानी जाती है। इस प्रक्रिया से ब्रह्मांड अंतत: एक दिन मृतप्राय और ठंढे बंजर में बदल जाएगा, जिसमें कुछ पैदा नहीं होगा और जीवन संभव नहीं होगा।
जिन रिश्‍तों में हम भूले और फूले रहते हैं वे इतने कच्‍चे होते हैं कि शरीर से प्राण पखेरू उडते ही सब का व्‍यवहार बदल जाता है। जल्‍दी से जल्‍दी शव को हटाने का प्रयास होता है। पत्‍नी- प्रेयसी का वही शरीर जिससे अलग होने का मन नहीं करता था , भुतहा लगने लगता है। उसे कितना सजायें, सुगंधित सेंट वगैरह लगायें वह सुंदर नहीं लगता। उस शव के साथ अकेले में रात गुजारने में डर लगता है।प्राणाधार होने का दंभ भरने वाली पत्‍नी भी रोपीट कर किनारे हो जाती है-
घर नारि बडो हित जासो, रहत अंग संग लागी
जब ही हंस तजी यह काया , प्रेत प्रेत कर भागी।

मुंशी प्रेम चंद अपने एक उपन्‍यास में एक पात्र से कहलाते हैं- जीवन तो अमर है। मृत्‍यु तो केवल पुनर्जन्‍म की सूचना है। एक उच्‍चतर जीवन का मार्ग। जिस मृत्‍यु पर घर वाले रोएं वह भी कोई मृत्‍यु है। वीर मृत्‍यु वही है जिस पर बेगाने रोएं और घर वाले आनंद मनायें। दिव्‍य मृत्‍यु दिव्‍य जीवन से कहीं उत्‍तम है। कोई जीवन दिव्‍य नहीं जिसका अंत भी दिव्‍य न हो।
सफल जीवन से अधिक महत्‍वपूर्ण है सफल-सार्थक मृत्‍यु। जीवन की सफलता किस में है? जीवन-पूंजी जुटाने में। पुण्‍य हैं जीवन पूंजी।पुण्‍य सत्‍कर्मों का फल हैं। और सार्थकता? जीवन रहस्‍य समझ लेने में । हम क्‍या हैं, कहां तक जाएंगे -यह जान लेने में। यही जीवन का वास्तविक उद्देश्‍य है। परम पुरुषार्थ है। जो मृत्‍यु समाज को कुछ सकारात्‍मक दे जाए, लोगों को चेता और सही पथ की ओर उन्‍मुख कर जाए, वही सार्थक मृत्‍यु है।
इसके विपरीत लोग पद -पैसा में जीवन की सफलत मानते हैं। जैसे भी हो पैसा आये। अधिकार सम्‍पन्‍नता रहे। काफी पहले एक उपन्‍यास की कहते पढा था- सफल जीवन पर्याय है खुशामद, अत्‍याचार और धूर्तता का। मैं जिन महात्‍माओं को जानती हूं उनके जीवन सफल न थे।
जन्‍म-जीवन और मृत्‍यु पर हमारे धर्मशास्‍त्रों ने गहन विवेचन किया है। हजारों साल पहले गीता ने उदघोष किया था-
न जायते म्रियते वा कदाचिन्‍नायं भूत्‍वा भविता व नभूय:
अजो नित्‍य: शास्‍वतोअयंपुराणो प हन्‍यते हन्‍यमाने शरीरे।

एक शरीर है, दूसरा इसमें रहने वाला शरीरी यानी आत्‍मा। शरीर तो जन्‍मता और प्रतिपल मरता रहता है।शरीरी न कभी जन्‍मता है और न मरता है। यह जन्‍म रहित, नित्‍य निरंतर रहने वाला, शास्‍वत और अनादि है। शरीर के मरने या मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
शरीरी में कभी विकार नहीं होता । यह ‘ नायं हन्ति न हन्‍यते’ – न मरने वाला है ,न मारने वाला है। इसे न आग जला सकती है और पानी गीला कर सकता है। और तो और इसे दुनिया का भी कोई भी अस्‍त्र-शस्‍त्र भी मार या नष्‍ट नहीं कर सकता।ये शरीर को ही मार सकते हैं, उसमें व्‍याप्‍त शरीरी को नहीं। सभी अस्‍त्र-शस्‍त्र पृथ्‍वी तत्‍व से ही बनते हैं। शरीर के आगे शरीरी तक उनकी पहुंच ही नहीं होती।
मरता वह है जिसमें कोई विकार -बदलाव होता है। शरीर में छह विकार होते हैं- यह पैदा होता है,सत्‍ता वाला दीखता है, बदलता, बढता , घटता और नष्‍ट होता है। शरीरी इन सभी विकारों से रहित है।शरीर ही जन्‍मता और मरता है। गीता भगवान कृष्‍ण कहते हैं जो जन्‍मता है वह मरता ही है और जो मरता है वह जन्‍मता है- जातस्‍यहि ध्रुवोमृत्‍युर्धवंजन्‍ममृतस्‍यच। शरीरी को अपना अंश बताते हुए उन्‍हों ने इसे सनातन कहा- ममैवांसो जीवलोके जीवभूत:सनातन:।
आधी उम्र बीतने पर शरीर कमजोर होने लगता है, इंद्रियों की शक्ति कम होने लगती है। इस तरह शरीर, इंद्रियों और अंत:करण आदि का तो अपक्षय होता है, पर शरीर इन सबसे अप्रभावित रहता है। इसके नित्‍य तत्‍व में कमी आती। बालपन, जवानी और बुढापा तीनों अवस्‍था में यह समान रहता है।हम शरीर के साथ चिपके नहीं रहते। स्‍वामी रामसुख दास कहते हैं कि उत्‍पन्‍न होने वाली वस्‍तु स्‍वत: नष्‍ट होती है उसे मिटाना नहीं पडता।जो उत्‍पन्‍न नहीं होती वह कभी मिटती ही नहीं। हमने 84 लाख शरीर धारण किये, पर कोई शरीर हमारे साथ नहीं रहा। हम जयों के त्‍यों रहे। यह जानने की विवेक शक्ति उन शरीरों में नहीं थी, किन्‍तु इस मनुष्‍य शरीर में है।
कुरान मजीद तो मूलत: इस जीवन की नश्‍वरता और अंतिम यात्रा को ही सत्‍य बताने की चेतावनियों-संदेशों पर ही केन्द्रित है। देखें कुछ आयतें-
* हर चीज जो इस धरती में है, नाशवान है, और केवल तेरे प्रभु का प्रतापवान व उदार स्‍वरूप ही शेष रहने वाला है( सूरा अर रहमान)। ध्‍यान देने की बात है गीता भी शरीर को मिट्टी यानी पृथ्‍वी तत्‍व से उत्‍पन्‍न मानती है।
* यह कि (परलोक में) कोई बोझ उठाने वाला , दूसरें का बोझा नहीं उठाएगा। अर्थात हर व्‍यक्ति स्‍वंय के कर्मों का उत्‍तरदायी है। किसी की जिम्‍मेदारी दूसरे पर नहीं डाली जा सकती। कोई चाहे भी तो किसी के कर्म की जिम्‍मेदारी अपने ऊपर नहीं ले सकता(सूरा अल नज्‍म)।
* और यह कि पहुंचना अंतत: तेरे प्रभु के पास ही है , और यह कि उसी ने हंसाया , उसी ने रुलाया और यह कि उसी ने मृत्‍यु दी और उसी ने जीवन प्रदान किया और यह कि उसी ने नर और मादा का जोडा पैदा किया और एक बूंद से जब वह टपकाई जाती है और कि दूसरा जीवन देना भी उसी के जिम्‍मे है।
* और यह कि सांसारिक जीवन कुछ नहीं है, एक खेल और दिल बहलावा है। वास्‍तविक जीवन का घर तो पारलौकिक घर है (सूरा अन कबूत)।
* और हे नबी, नित्‍यता तो हमने तुम से पहले भी किसी मनुष्‍य के लिए नहीं रखी है। यदि तुम मर गए तो क्‍या ये लोग नित्‍य जीते रहेंगे ?हर जानदार को मृत्‍यु का मजा चखना है (यानी जो जन्‍मा है उसका मरना तय है-गीता)। आखिर में हमारी ओर ही पलटना है (सूरा अल अंबिया)।
* लोगो बचो अपने प्रभु के प्रकोप से और डरो उस दिन से जब कोई बाप अपने बेटे की ओर बदला न देगा और न कोई बेटा ही बाप की ओर बदला देने वाला होगा( सूरा लुकमान)।
* वही है जिसने तुम्‍हें मिट्टी से पैदा किया, फिर तुम्‍हारे जीवन की एक अवधि निश्चित कर दी, और एक दूसरी अवधि और भी है। किंतु तुम लोग संदेह में पडे हुए हो। वही एक अल्‍लाह आसमानों में भी है और धरती में भी। तुम्‍हारे छुपे और खुले हाल सब जानता है और जो बुराई या भलाई तुम कमाते हो उससे भलीभांति वाकिफ है (सूरा अलअनआम)।
हम अपने इस रोगी- विकारी और मरणशील शरीर से ही अपनी पहचान अभिहित करते हैं। उस शरीर से जो चेतना निकल जाने के बाद केवल गंदगी-दुर्गंध का ढेर रह जाता है। जो जीवित अवस्‍था में भी तमाम साफ सफाई के बाद भी अपने सभी छिद्रों से केवल गंदगी ही उत्‍सर्जित करता है। लेकिन धर्मशास्‍त्र इस शरीर को सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण बताते हैं। यह लोक- परलोक को संवारने-सुधारने का साधन है। लेकिन इसे साध्‍य समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। कुमार सुभव का एक श्‍लोक है-
शरीरमाद्यं खलुसाधनम्, धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्‍यं मूलकारणम्।
धर्म, अर्थ , काम और मोक्ष समेत सभी सिद्धियों के लिए आरोग्‍यता मूल कारण है। यदि शरीर रोग ग्रस्‍त हो जाए तो कोई भी कार्य सुचारु ढंग से नहीं होगा। इस लिए स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति सजग रहना आवश्‍यक है। स्‍वस्‍थ रहना धर्म का अंग है।
रामायण मानव शरीर को संसार सागर पार कराने वाला जहाज बताती है-नर तनु भव बारिधि कहुं बेरो । अन्‍य सभी योनियां भोग शरीर हैं। उन से काल, कर्म गुण व स्‍वभाव के घेरे का टूटना संभव नहीं है। अन्‍य शरीरों से केवल पुण्‍य-पाप का भोग होता है, उससे भव संतरण नहीं हो सकता। देवता भी अपने पुण्‍यों का भोग करते हैं, नये पुण्‍य संचित नहीं कर पाते।पुण्‍य क्षय के बाद उन्‍हें पुन: जन्‍म मरण के चक्र में फंसना पडता है। मानव शरीर में अपने पुरुषार्थ से इस भव जाल से निकल सकने की योग्‍यता है । अन्‍य शरीर में पुरुषार्थ की क्षमता नहीं है।
इसी कहा जाता है कि बिना कोई क्षण गंवाये तुरंत पुरुषार्थ में दत्‍तचित्‍त हो जाना चाहिए। भगवान श्री राम अयोध्‍या के आम दरबार में मानव जन्‍म की महत्‍ता बताते हुए कहते हैं-
बडे भाग मानुष तन पावा, सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्‍ह गावा।
साधनधाम मोक्ष कर द्वारा,पाई न जेहि परलोक संवारा।
सो परत्र दुख पावइ, सिर धुनि धुनि पछताइ
कालहि कर्महि ईश्‍वरहिं मिथ्‍या दोष लगाइ।

मनुष्‍य जन्‍म बहुत बडे भाग्‍योदय का फल है। जिसने इस साधनधाम और मोक्ष द्वार को व्‍यर्थ में गंवा दिया वह इस लोक और परलोक दोनों में दुख पाता है। उसके पास फिर पक्षताने और समय या ईश्‍वर को कोसते रहने के अलावा कोई रास्‍ता नहीं बचता। इस मनुष्‍य तन का सबसे बडा लाभ ज्ञान- भक्ति है और मनुष्‍य शरीर पा कर भी ज्ञान- भक्ति रहित होने के समान कोई हानि नहीं है।
कृष्‍ण्‍ा गीता में अर्जुन को समझाते हैं कि शरीर के मरने पर भी शरीरी यानी आत्‍मा का मरना नहीं होता। अर्थात उसका अभाव नहीं होता, इस लिए शोक करना अनुचित है। बालि वध के मार्मिक प्रसंग में भी यही संदेश मिलता है। पति के शव को देख शोकाकुल तारा से राम कहते हैं-
क्षिति जल पावक गगन समीरा, पंच रचित यह अधम शरीरा।
प्रकट सो तनु तव आगे सोवा , जीव नित्‍य केहि लगि तुम रोवा।

पृथ्‍वी, अग्नि, आकाश , जल और वायु इन पांच तत्‍वों से बना यह अधम शरीर तो तुम्‍हारे सामने पडा है। जीव नित्‍य है। वह न जन्‍मता और न मरता है, इस लिए तुम किसके लिए रो रही हो ?
स्‍वामी रामसुख दास कहते हैं- शरीरों के मरने का जो दुख होता है, वह मरने से नहीं होता, प्रत्‍युत जीने की इच्‍छा से होता है। मैं जीवित रहूं, ऐसी इच्‍छा रहती है और मरना पडता है तब दुख होता है। यानी हम शरीर के साथ एकात्‍मकता कर लेते हैं, तब शरीर के मरने से अपना मरना लगता है, तभी दुख होता है। परंतु जो शरीर के साथ अपनी एकात्‍मकता नहीं मानता, उसे मरने पर दुख नहीं होता, अपितु सुख होता है। नये कपडे मिलने का सुख। वासांसि जीर्णानि यथाविहाय …।
विचार करने पर हम पाते हैं कि न हम कभी जन्‍मते हैं और न कभी मरते हैं। केवल रूपांतरित होते रहते हैं। शरीर मिट्टी से आता और मिट्टी में मिल जाता है। हर प्राणी पृथ्‍वी से ही उत्‍पन्‍न चीजों को खाता-पीता है। आहार के लिए सभी प्राणी एक दूसरे पर निर्भर हैं। मनुष्‍य समेत सभी प्राणी आकाश तत्‍व से परस्‍पर जुडे-बंधे हैं।सागर के बुलबुले की तरह। बुलबुला अलग दिख कर क्‍या सागर से सम्‍पृक्‍त नहीं है ? आइए, एक नया जन्‍म लें। अपने नये जन्‍म -मृत्‍यु का मजा लें। अहं का मिटना ही मृत्‍यु और समता-असंगता आने को जन्‍म मान कर।

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3019 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Neeraj के द्वारा
August 1, 2011

आप मेरे को अमर की सही मतलब बताओ क्योकि मे इस बात से सहमत नही हूँ की अमर का मतलब है जो कभी न मरे बल्कि इसका सही मतलब है जो अधिक समय तक जिए/

    Lavar के द्वारा
    July 12, 2016

    Indeed. That reminds me…a kind of mea culpa – I saved the images in this post before I had really had much of a background read so the image URLs are either slightly or very inaccurate, should anybody notice. But given the outlandish nature of many of these images, identifying them as West Indes or Peru is a bit difficult in any event. ‘St Brendan meeting the Pope’ was pallrcuiarty stupid however.

    sdvajpayee के द्वारा
    December 23, 2010

     प्रिय बहुत अच्‍छा लगा तुम्‍हारा नाम देख कर। तुम तो पहले से ही सोचते-लिखते रहे हो। मैं जरूर लिखने-पढने से अर्से से दूर ही रहा। इसी बीच कुछ लिखा। समय मिलने अन्‍य लेख भी देखना। मैं भी संदर्भित लिंक पर जाने का प्रयास करूंगा। अपने समाचारदेना।

    Rawal Kishore के द्वारा
    December 30, 2010

    श्रीमान आपके इस लेख का उत्तर मैं अपने अगले लेख में जरुर दूंगा वादा है आपसे और हाँ आपका लेख पड़ा पढ़कर बहुत अच्छा लगा पर ………………… नोट : सिक्के के दो नहीं तीन पहलु होते है इस बात से अभी शायद आप अनजान है इंतजार कीजिये आप मेरे अगले लेख का धन्यवाद !

    Jolyn के द्वारा
    July 12, 2016

    "Vai nessa que tu vai para no inte&norquof;.Vai nessa.Continua nessa.Não saia dessa.E assim caminham os extra-terrestres, que habitam entre nós, mas se julgam superiores a nós.Concordo com este indiano, e me interessei nele. Procurarei algo dele para ler.

Haseeb Rizvi,Baheri के द्वारा
December 22, 2010

सर आदाब जीवन है तो मौत भी है पर मौत का खौफ तो सभी को है इन्सनिअत का kisi को नहीं आपके ज्ञान्बर्धक लेख के liye हार्दिक बधाई इतने अच्छे blog और कमेन्ट पढ़कर काफी ज्ञान मिलता है

    sdvajpayee के द्वारा
    December 23, 2010

     हसीब भाई ,तुम तो बहुत बाद में आए।

Amit Dehati के द्वारा
December 15, 2010

सर वाकई क्या गहन चिंता और चिंतन किया है आपने .काबिल-ए-तारीफ . अच्छी एव दमदार पोस्ट के लिए हार्दिक बधाई ! http//amitdehati.jagranjunction.com

    sdvajpayee के द्वारा
    December 15, 2010

     प्रिय श्री अमित जी,  यह जीवन चक्र कैसे चकर घन्‍नी कटाता रहता है कि हम कभी अगली यात्रा के लिए तैयारी ही नहीं कर पाते। पूरी उम्र अच्‍छा-बुरा सब भोगने के बाद भी इस मायावी संसार से जी नहीं भरता-  सिर कम्‍पयों पग डगमगे नैन ज्‍योति हीन  कहो नानक एहि बिधि भई तऊ न हरि रस लीन।  एक दिन ऐसा होएगा कोउ कोऊ का नाहि  घर की नारी को कह तन की नारी जाहि।   शरीर की नाडी भी छूट जाएगी।  कहता हूं कहि जात हौं , कहूं बजाय ढोल  तीनों लोकों की सम्‍पत्ति दे कर भी कोई एक श्‍वास भी नहीं बढवा सकता। जब परवाना आ गया तो जाना ही है। कोई ताकत एक पलभी नहीं रोक सकती। कबरी दास जी यह ढोल बजा बजा कर कह गए। इसी लिए उन्‍हों ने यह भी कहा- कबीर सो धन संचिये जो आगे के होय सीस चढाए गाठरी जात न देखा कोय। स्‍वांसा खाली जात है , तीन लोक का मोल

    Lurraine के द्वारा
    July 12, 2016

    The odd thing his is being depicted as some kind of toff because he went to Rugby (where they do use the word pleb). However, he is nothing of the sort – he was in my mine (and your) pualncbi. Owner of El Vino.

srinivass के द्वारा
December 14, 2010

आप के लेख में एक गहन बेचारगी के दर्शन हुए . इतना सब कह कर भी आप स्वीकार भाव पर आ के रुक गए . कुछ विचार हैं जिनपर विचार कर के आप कुछ कहें . (१) पदार्थ , शून्य की ही प्रतिक्रियात्मक अभिव्यक्ति है . (२) उदासीनता भी सापेक्छ रूप से निष्क्रियता नहीं है. (३) शरीर सीमित हो कर ही असीम को प्रतिष्ठित करता है . (४) एक प्रसंग में जब भगवान् कृष्ण कहते हैं कि ‘जो मुझे जिस दृष्टि से देखेगा मैं उसे वैसा ही दिखाई दूंगा ‘ तो वह स्वयं का नहीं बल्कि मनुष्य के दृष्टि कि छमता कि बात कर रहे हैं . वो जो देखना चाहता है उसे वही दिखाई देता है . साधुवाद .

    sdvajpayee के द्वारा
    December 15, 2010

     आद. श्री श्रीनिवास जी, आपके सवालों से मजा आ गया । बहुत अच्‍छे लगे। समय न निकल पाने की वजह से अभी उत्‍तर नहीं लिख पा रहा हूं। इंशा अल्‍लाह कल-परसों में निवेदन करूंगा। पुन: प्रश्‍नों के लिए धन्‍यवाद।

    sdvajpayee के द्वारा
    December 16, 2010

    आदरणीय श्री श्रीनिवास जी, गहन बेचारगी समर्पण की आवश्‍यक आधार -भूमि है। जब लगे कि मेरे किये धरे कुछ नहीं होगा। उद्यम-पराक्रम की परम तत्‍व तक कोई पहुंच नहीं है, तब बेचारगी ही उसका फलित होती है। लेकिन केवल इस बेचारगी से ही कोई काम नहीं बनने वाला। बेचारगी घनीभूत हो, सनम से मिलन की, मालिक से सामीप्‍य की, परमेश्‍वर के दर्शन की, परम रहस्‍य की गुत्‍थी सुलझाने की , सत्‍य के साक्षात्‍कार की द्वंदातीत हो एकाकार होने की उद्दाम प्‍यास और उत्‍कट तडप बढे और ”उसकी कृपा” भी हो जाए तब काम बने। गीता में भगवान कहते हैं- अनन्‍याश्चिन्‍तयन्‍तो मां ये जना: पर्युपासते, तेषां नित्‍याभियुक्‍तानां योगक्षेम वहाम्‍यहम। जो अनन्‍य भक्‍त भली भांति मेरा चिंतन करते हुए मेरी भली भांति उपासना करते हैं, मुझ में निरंतर लगे हुए उन भक्‍तों का योग(अप्राप्‍त की प्राप्ति) ,क्षेम(प्राप्ति की रक्षा) मैं वहन करता हूं। बेचारगी के बिना उन्‍मुखता नहीं होगी, उत्‍कटता के बिना अनन्‍य समर्पण -एक निष्‍ठा या एक बुद्धि नहीं होगी और इस सब के बावजूद बिना उसकी कृपा के स्‍थैर्य नहीं रहे्गा। मैं गोस्‍वामी तुलसी दास जी को महान दार्शनिक-संत मानता हूं जो तमाम साधन-चिंतन करते हुए ” पायउं परम विश्राम” कहने की अवस्‍था तक पहुंचे। वह भगवान शंकर के मुखारविंद से कहलाते हैं- उमा कहउं में अनुभव अपना ,सच हरि भ्‍ाजन जगत सब सपना। सो नर इंद्रजाल नहिं भूला , जा पर होइ सो नट अनुकूला। कुछ अन्‍य प्रसंगों के कथन – नट मरकट इव सबहि नचावत , राम खगेस बेद अस गावत। नट इव कपट चरित कर नाना , सदा स्‍वतंत्र एक भगवाना। चरित रामके सगुन भवानी ,‍ तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी। अस विचारि जे तग्‍य विरागी, रामहिं भजहिं तर्क सब त्‍यागी। देखिए इन सब में बेचारगी ही दिखती है। जब वहां तक बुद्धि-वाणी और इंद्रियों के बल की पहुंच ही नहीं है, तो बेचारगी ही आएगी। स्‍वीकार भाव पर आकर रुक गए- इसका तात्‍पर्य नहीं समझ पा रहा हूं। कुछ और सपष्‍ट करने का अनुग्रह करें। अभी उस नट की पूरी कृपा नहीं हुई इस लिए मामला रुका पडा है- ऐसा भी कहा जा सकता है। 1- पदार्थ शून्‍य की ही प्रतिक्रियात्‍मक अभिब्‍यक्ति ? हां, ऐसा कह सकते हैं। यह भी कह सकते हैं कि पदार्थ प्रकृति की स्‍वाभाविक अभिव्‍यक्‍त है। शून्‍य ही ब्रह्म या ब्रह्म ही शून्‍य है। ब्रह्म शून्‍य अवस्‍था से ‘एकोहंबहुष्‍यामि’ विचार -विकार से एक से अनंत रूपों में परिवर्तित-स्रजित होता है। जड और चेतन में। ब्रह्म अपनी प्रकृति से चेतन – जड दोनों है। जड यानी पदार्थ भी ब्रह्मोत्‍पन्‍न होने से शून्‍य की अभिब्‍यक्ति है और चेतन भी। यानी प्रकृति भी और पुरुष भी। उक औपनिषिदिक कथन है- एकाकी न रम्‍यते। अकेले मन नहीं लगा तो वह अनेकों-अनंत रूपों में प्रगट हो खेल खेलने लगा। 2- उदासीनता भी सापेक्ष रूप से निष्क्रियता नहीं है? उदासीनता में क्रियता रहती है। कर्तत्‍व और संगता का भी पूरी तरह अभाव नहीं होता। उदासीनता में कर्म और कर्मफल के गुण-स्‍वरूप को तो हम जानते हैं , लेकिन विशेष आकर्षक – अभीष्‍ट न लगने से उसमें हमारी रुचि नहीं होती। 3-शरीर सीमित होकर ही असीम को प्रतिष्ठित करता है। नहीं, शरीर भी सीमित है और ‘असीम’ भी सीमित है। असीम और ससीम(सीमित) दोनों हैं। शरीर भी आकाश तत्‍व से जुडा होने से मूलत: असीम ही है। प्रकृति का अंश है। असीम ससीम भी होता है। दर अस्‍ल , असीम-ससीम दो आंखों का दृष्टि भेद है। द्वंद है,द्वैत है जो होता नहीं केवल भासता है। असीम शरीर में ही नहीं प्रतिष्ठित होता, उस असीम में सीमित यानी शरीर भी प्रतिष्ठित-व्‍याप्‍त रहता है। बाल कृष्‍ण के प्रसंग का एकश्‍लोक याद नहीं आ रहा। भावार्थ है- हे सखी ! आज मैंने बडा कौतुक देखा। अनंत ब्रह्म नंद के आंगन में धूलधूसरित नाच रहा था। यह असीम का कैसा मोहक ससीमत्‍व है ! 4- जो मुझे जिस दृष्टि से देखेगा, मैं उसे वैसा ही दिखाई दूंगा, तो भगवान स्‍वयं की नहीं मनुष्‍य के दृष्टि की क्षमता की बात कर रहे हैं। वो जो देखना चाहता है, उसे वही दिखाई देता है। गीता में मुझे ऐसा प्रसंग नहीं याद पडता । एक यह है कि – ये यथा मां प्रपद्यन्‍ते तांस्‍तथैव भजा‍म्‍यहम मम वर्त्‍मानुवर्तन्‍ते मनुष्‍या: पार्थ सर्वश:। जो भक्‍त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं , मैं उन्‍हें उसी प्रकार आश्रय देता हूं , क्‍यों कि सब मनुष्‍य सब प्रकार से मेरे मार्ग का अनुसरण करते हैं। भक्‍त भगवान की जिस भाव से, जिस संबंध से, जिस प्रकार शरण लेता है, भगवान भी उसे उसी भाव, उस संबंध से , उसी प्रकार से आश्रय देते हैं। इस से इतर किसी अन्‍य प्रसंग से आपका तात्‍पर्य है तो कृपया स्‍पष्‍ट करने का अनुग्रह करें ,अच्‍छा लगेगा। रामायण में रा विवाह के समय एक अति रुचिकर प्रसंग आता है। धनुष यज्ञ को सजे मंच पर सब राजा-महराजाओं के विराजने के बाद अंत में ऋषिवर के साथ राम -लक्ष्‍मण पधारते हैं। सबने उन्‍हें अपनी मन-भावना के अनुसार देखा। भगवान सब को एक से नहीं दिखे।( एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ, तेहि तस देखेउ कोसल राऊ)। जिन्‍ह के रही भावना जैसी , प्रभु मूरत देखी तिन्‍ह तैसी। देखहिं रूप महारन धीरा ,मनहु वीर रस धरे सरीरा । डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी, मनहु भयनक मूरति भारी। रहे असुर छल छोनित बेसा, तिन्‍ह प्रभु प्रगट काल सम देखा। पुरबासिन्‍ह देखेउ दोउ भाई, नर भूषन लोचन सुखदायी। अब दो बातें हैं। मनुष्‍य जो देखना चाहता है उसे वही दिखायी देता है , यह भी सही है। और , जो , जितना , जब ,जैसे वह नट दिखा देता है, वह उतना , वैसे ,तब दिखता है। यह हमारी सामर्थ्‍य में नहीं है कि हम जब, जैसे , जितना, जैसे चाहें देख लें।जगत यानी पदार्थ भी पूर्णत: चाक्षुष नहीं है। वह (नट – पता नहीं क्‍यों यह शब्‍द मुझे बहुत प्‍यारा लगता है) दिखता तो है,पर टुकडों में। हवा के झोंकों में, पानी के प्रवाह में, अग्नि के ताप में,आंधी,तूफान,बारिश , सूखा में,धरती -आकाश में, सूरज, चांद ,सितारों में , बीज के अंकुर बन कर निकलने में,बच्‍चों-बूढों ख्‍ अपाहिज-असक्‍तों में , नवयौवनाओं में। लेकिन समग्रता में नहीं दिखता। टुकडों में दिखने से पकड में नहीं आता, टिकता नहीं। समपूर्णता में चाक्षुष साता नहीं। सम्‍पूर्णता में दिखेगा तो फिर कुछ और नहीं दिखेगा। इसी लिए भगवान को अर्जुन को दिव्‍य नेत्र देने पडे थे। आंसिक विराट रूप देख कर ही माता कौशल्‍या डर गयीं थीं। काक भुशुंडि जी के यह कहने अर्थ तो है ही – निज अनुभव अब कहउं खगेसा , बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा। राम कृपा बिनु सुनु खगराई, जानि न जाइ राम प्रभुताई। जाने बिनु होइ परतीती , बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती। और , प्रीति बिना नहिं भगति दृढाई…..( याद नहीं आ रही)। फि वही बेचारगी।

BRAJESH PANDEY के द्वारा
December 10, 2010

भाई साहब, जन्‍म और मृत्‍यु के बारे में आपसे बहुत को जानने को मिला। आशा है कि ऐसे ही आप मार्ग दर्शन करते रहेंगे। कर्म और फल दोनों उत्‍पन्‍न होकर नष्‍ट हो जाता है पर अन्‍त:करण में जो आशक्ति रह जाती है वह बार-बार जन्‍म मरण देती है।

    sdvajpayee के द्वारा
    December 10, 2010

      प्रिय पाण्‍डे जी,  कर्म के परिपाक के रूप में ही तो बार बार जन्‍म मरण मिलता है। आशक्ति कर्म फल से इतर कैसे कही जा सकती है ?

gajadhar के द्वारा
December 8, 2010

वैदिक युग से लेकर आज तक समस्‍त जागे हुए महापुरुषों ने कहा है कि म2त्‍यु  नहीं होती, यह हमारी भेद द2ष्टि के चलते दिखती है, भेद द2ष्टि के नाते हम किसी भी चीज को विभाजन कर देखते हैं, इसलिए एक ही चीज दो रूपों में बंट जाती है, जीवन म2त्‍यु भी हमारी भेद द2ष्टि का परिणाम है, बुद़धों ने कहा है कि म2त्‍यु नहीं है, मतलब केवल जीवन है, म2त्‍यु एक पड1ाव है जहां से हम एक जीवन से दूसरे जीवन में प्रवेश करते हैं, यह बात सच भी हो सकती है और झूठ भी, क्‍योंकि मेरा अपना कोई अनुभव नहीं है,  कहते हैं कि जीवन एक सतत प्रवाह है जो बहता ही चला जाता है, अनंत अनंत दिशाओं व राहों में, तब तक बहता रहता है जब तक अपने मूल स्‍वरूप को पहचान नहीं लेता, मूल स्‍वरूप को उपलब्‍ध होने के लिए मानव जीवन जरूरी है, शायद इसीलिए कहा गया है कि देवता भी मानव योनि के लिए तरसते हैं, बाजपयेी जी का यह लेख लोगों को जीवन के प्रति यानी अपने मूल स्‍वरूप को जानने के प्रति प्रेरणादायक बने अर्थात साधना के सोपानों पर चढकर लोगों की भेद द2ष्टि समाप्‍त हो और जीवन उस परम तत्‍व को उपलब्‍ध हो सके जिसे न शस्‍त्र छेद सकता है न अग्नि जला सकती है तो लेख की सार्थकता होगी,

    sdvajpayee के द्वारा
    December 9, 2010

      धन्‍यवाद गजाधर भाई, ,। एक भजन की कुछ लाइनें आपकी प्रतिक्रिया में जोड रहा हूं-  कौन है तेरा कुटुम्‍बी तेरे मर जाने के बाद तेरा मेरा क्‍या करे कुछ भी नहीं जल जाने के बाद कौन करता हे खुशामद पद से हअ जाने के बाद छोड देते हें हर पक्षी पेड, पत्‍ते झझ जाने के बाद  मौत छोडेगी नहीं आयु खत्‍म हो जाने के बाद सोच लो जाना कहां है घर खाली कर जाने के बाद।

Gaurav Mer के द्वारा
December 8, 2010

ेसर नमस्ते, पहली बार आपका ब्लॉग पढने का मौका िमला. फोटो ही सही लंबे समय बाद आपको देखकर बहुत ख़ुशी हुई. ज्ञान वर्धन के िलए धन्याद.

    sdvajpayee के द्वारा
    December 8, 2010

     बालक, तुम्‍हारी मौजूदगी देख कर बहुत अच्‍छा लगा।

Nazim Mikrani के द्वारा
December 8, 2010

.सर प्रणाम, आपके लेख हमेशा ही बहुत अच्छे और ज्ञानवर्धक होते हैं, अगले पोस्ट का इंतज़ार रहेगा.

    sdvajpayee के द्वारा
    December 8, 2010

     प्रिय नाजिम भाई, प्रशंसात्‍मक  टिप्‍पणी के बजाए समालोचनात्‍मक और अपने विचार भी दिया करो।

sanjay mishra के द्वारा
December 8, 2010

बाजपेयी जी हमारी भारतीय सनातन परम्‍परा में कहा गया है-हम न मरब मरिहैं संसारा। मृत्‍यु ही सत्‍य है लेकिन हम उसे स्‍वीकारने को तैयार नहीं रहते। हम आदि काल से ही मृत्‍यु का रहस्‍य खोजने में लगे हैं लेकिन जितना ही कदम आगे बढाते हैं रहस्‍य उतना ही गहरा हो जाता है। हम हमेशा जीवन का उत्‍सव मनाते हैं यह जानते हुए भी कि हर सांस उम्र घट रही है। यह मोह-माया है। यह मोह-माया हमारी सांसारिकता है। सांसारिकता में व्‍यक्ति भोग की कामना करता है। भोग उसे उत्‍सव के लिए प्रेरित करता है। असल में मनुष्‍य के जीवन में दुख ही दुख होता है। वह सुख के अवसर तलाशता रहता है। इसी तलाश में वह ढलते जीवन में भी नवीनता का एहसास करना चाहता है, जिसमें मृत्‍यु की कल्‍पना नहीं होती। अब सवाल यह कि पहले अंडा हुआ या मुर्गी ? ‍पहले जन्‍म हुआ या मृत्‍यु ? यह सामान्‍य धारणा है कि मृत्‍यु की कल्‍पना भी जन्‍म के बाद ही की जाती है। मौत अंतिम सत्‍य है। प्रथम सत्‍य तो जीवन ही है। आइए हम आपको एक सवाल की ओर ले चलते हैं-आंख हमें रोशनी देती है जिससे हम सबको देख पाते हैं लेकिन एक समय इसी आंख से हमें कुछ भी दिखायी नहीं पडता। तब हम चस्‍मा लगाते हैं और चस्‍मा लगते ही आंख सब कुछ देखने लगती है। अब सवाल यह कि संसार को आंख देखती है या चस्‍मा। यदि आंख देखती तो चस्‍मे की क्‍या जरूरत थी। मेरे विचार से जीवन व मृत्‍यु दोनों एक सिक्‍के के दो पहलू ही हैं। और वह सिक्‍का है ईश्‍वर जो हमारे मन में जीवन व संसार के प्रति अपार अस्‍था भरता है। न जन्‍म है न मृत्‍यु आपके इस आलेख के संदर्भ में मुझे कई महानुभावों के विचार पढने के अवसर मिले। मुझे उम्‍मीद है कि यह विचार प्रवाह ऐसे ही आगे बढता रहेगा। एक शानदार आलेख के लिए बाजपेयी जी आपको धन्‍यवाद। -संजय मिश्र

    sdvajpayee के द्वारा
    December 8, 2010

    प्रिय भाई संजय जी,  जन्‍म-मृत्‍यु के रहस्‍यों पर आपने सराहनीय सममति दी है।द ”हम न मरब मरिहै संसारा ” में तो अपने वेदांत का सार -सूत्र आ गया। अधिकांश भारतीय , और खास कर वेदांत, यही मानता है। संसार चूंकि सत्‍य नहीं , माया-भ्रम है इस लिए उसका अस्तित्‍व भी मरणधर्मा है। जीव ईश्‍वरांश होने से मरने वाला नहीं है।-  ईश्‍वर अंश जीव अविनासी, चेतन अमल सहज सुखरासी। ईश्‍वर जन्‍म-मृत्‍यु से परे है। भोगोत्‍सव हमें बांधते और दुख की ओर ही ले जाते हें

Ramesh bajpai के द्वारा
December 8, 2010

आदरणीय भाई जी प्रणाम . वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवनि गृह्णाति नरोपराणी तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि ,संयाती,नवानी देहि

    sdvajpayee के द्वारा
    December 8, 2010

    प्रिय भाई रमेश जी,  दीर्घ अंतराल के बाद आप आए, अच्‍छा लगा। आते ही स्‍वाभाविक रूप से धडाधड हाजिरी लगायी ,।लेकिन मेरा विनम्र अनुरोध है गीता जैसे शुद्ध दर्शन ग्रंथों की बात को भागते- दौडते नहीं, ईत्‍मीनान से कहना बेहतर होता है। दो चार बाद कुछ सहज होने पर एक बार पुन: दृष्टिपात का अनुग्रह कीजिएगा।

preetam thakur के द्वारा
December 7, 2010

आदरनीय बाजपाई जी ! नमस्कार ! देर से आने के लिए माफ़ी ! इससे मुझे बहुत फायेदा हुआ ! इस महा सत्संग में इतने सारे मनीषियों के सत्संग का सोभाग्य आपने मुझे दिया | और सभी मनीषियों ने इतने अछे विचार दिए कि शुक्रिया अदा करने के लिए अलफ़ाज़ भे कम पड़ जाएँ | सभी ने इस हवन में बहुत ऊंचे दर्जे के हवन सामग्री अर्पण की | खासकर Dr. SatyenderaDr.Sanjay Shukhani,Mhd Ajam Khan, Dr. Saleem Khan,Ttapan’s one liner,The Vaidic Science of Sh. Prabhu Chawla, बहुत अछे लगे | सबको बहुत धन्यवाद | हर चीज़ की व्याख्या हर आदमी एक जैसे नहीं करता क्योंके हर एक के ज्ञान का आधार अलग अलग होता है | मुझे तो ये लगता है के जनम से पहले जब आदमी गर्भ में होता है तो परमानन्द में होता है | न खाना न पीना न सांस लेना और गर्भ के पानी के बीचों बीच समाधी लगाये रहता है | बहार आते ही जो रोना शुरू होता है वोह जिंदगी भर चलता है | इस लिए जिन्दगी तो एक डगर भर है जिसपर कदम दर कदम चलते हुए हम मौत महबूबा कि आगोश में फिर उसी परमानन्द कि समाधि में जाते हैं | फिर मौत से क्यों डरना ? जब जनम लेते हैं तो सबसे जयादा उम्र होती है बैलेंस में जो टिक टिक टिक कर कम होती जाती है फिर भी हर साल जन्मदिन की धूम होती है | मुझे ये समझ नहीं आता के यह धूम बड़ा होने की , जिन्दा होने की , छोटा होने की या फिर मौत महबूबा की जानिब एक और कदम बढ़ने की होती है ? ये सब आज तक किसी की समझ में नहीं आया और न कभी आएगा | इस को भी माया कहा जा सकता है | असल में माया के अलावा यहाँ कुछ है नहीं | जो सूरज हम अभी देख रहे हैं वो सात मिनट पहले का है | अभी का सूरज तो सात मिनट बाद दिखेगा | कुछ तारामंडल इतनी दूर हैं के जो हम अभी देखते हैं वोह अरबों साल पहले का है अभी का तो अरबों साल बाद दिखेगा | जो फूल हमें लाल दिख रहा है वोह असल में लाल नहीं पर वोल हमें लाल दिख रहा है क्योंके वो स्पेक्ट्रम के लाल हिस्से को सोख नहीं पाता, वापस कर देता है और हमें लाल दीखता है | जो कुछ हमें ब्रह्माण्ड में दिख रहा है वो वह उस का असर है जो हम देख नहीं पाते और न कभी देख पाएंगे | इस लिए ये सब माया है जिस से कोई नहीं बच सकता | जिन्दगी भी माया है मौत भी माया है दोनों अपरिहार्य हैं |

    sdvajpayee के द्वारा
    December 7, 2010

     आदरणीय श्री प्रीतम सिंह जी,  धर्म- अध्‍यात्‍म आपके दायें बायें हैं, इस लिए आपके लिखे पर कुछ कह पाने की स्‍िथति नहीं है। वैसे वैचारिक और भावात्‍मक रूप से मैं स्‍वयं को आपके करब ही पाता हूं। मैंने लेख जहां से -’ न जन्‍म है, न मृत्‍यु’ - शुरू किया था, अनायास ही सही, वहीं आपकी प्रतिक्रिया का समापन हुआ है।- जिन्दगी भी माया है मौत भी माया है दोनों अपरिहार्य हैं |  आपकी बात के साथ कुछ श्‍लोक रख रहा हूं। लगता भारतीय दर्शन ने काफी पहले  ही सुस्‍थापित मत बना लिया कि उद्यम से परमात्‍मा को नहीं पाया जा सकता।   गीता-  श्रुत्‍वाप्‍येनं वेद न चैव कश्चित् – इस को सुन कर भी कोई नहीं जानता। तपस्‍या, यज्ञ,दान,तीर्थ, व्रत आदि जितने भी श्रेष्‍ठ कर्म हैं उनके बल पर परमात्‍मा की प्राप्ति नहीं हो सकती।  केन- नतत्र चर्क्षुगच्‍छति न वाग्‍गच्‍छतिनोमन: – उस ब्रह्म तक न तो नेत्रेन्द्रिय जाती है, न वाणी जाती है और न मन जाता है।  कइ- नैव वाचा न मनसा प्राप्‍तुं शक्‍यो न चक्षुषा-  वह परमात्‍म तत्‍व न तो वाणी से, न मन से और न नेत्रों से ही प्रापत किया जा सकता है।  कठ व मुंडक- नायमात्‍मा प्रवचनेन लभ्‍यो न मेध्‍या न बहुना श्रुतेन                      यमेवैष वृणते तेन लभ्‍यस्‍तरस्‍यैष आत्‍मा विवृणुते तनुं स्‍वाम्।  - यह आतम तत्‍व न तो प्रवचन से, न बुद्धि से और न बहुत सुनने से ही प्राप्‍त हो सकता है। यह जिसको स्‍वीकार कर लेता है उसके द्वारा ही प्राप्‍त किया जा सकता है, क्‍यों कि यह परमात्‍मा उसके लिए अपने यर्था‍थ स्‍वरूप को प्रगअ कर देता है।

    Delonte के द्वारा
    July 12, 2016

    Yetrysdae, while I was at work, my sister stole my iphone and tested to see if it can survive a thirty foot drop, just so she can be a youtube sensation. My apple ipad is now broken and she has 83 views. I know this is completely off topic but I had to share it with someone!

Annu Kapoor के द्वारा
December 6, 2010

Everything in life is temporary, because everything changes. That\’s why it takes great courage to love, knowing it might end anytime but having the faith it will last forever.

    sdvajpayee के द्वारा
    December 7, 2010

      श्री शिवम खन्‍ना जी, आपका कथन – जीवन मैं क्‍या कर सकता हूं और मैं क्‍या करूंगा- सर माथे पर। लेकिन मैं ने इस और इसके पूर्व के भी लेखों में यही निवेदन किया है कि हमारे वश में है क्‍या ?  न जन्‍म, न जीवन और न मृत्‍यु। न भूत, न भविष्‍य और न भविष्‍य। न धरती, न आकाश और न पाताल। हमारी इन सब में कितनी समर्थ गति हो पायी है ? फिर कुछ करना कैसे हमारे हाथ है ? मच्‍छर या कोई पच्‍छी आकाश में उडे और सोच ले कि मैं आकाश नाप लिया, कुछ करने की बात ऐसी ही है। रामायण की ण्‍क चौपाई है- तुम समान खग मसक प्रजंता , नभ उडाहिं नहिं पावहिं अंता। कोई कितना उडने ले आकाश का आदि – अंत कहां पाता है? नट मरकट इव सबहिं नचावत, राम खगेस वेद अस गावत। वह सबको कइपुतली की तरह नचा रहा है।

    sdvajpayee के द्वारा
    December 7, 2010

     श्री अन्‍नू कपूर जी,  हम स्‍वयं को ही कहां प्रेम कर पाते हैं ? हर क्षणिक और परिवर्तनशील है इस लिए प्रेम करने में कठिनाई नहीं होती बल्कि इस लिए कि हम जीवन के वास्‍तविक महत्‍व को नहीं समझते और समझना चाहते हैं। शेख्‍ा शादी ने कहा था- तकदीर, तख्‍त,बादशाही, शानशौकत,हुक्‍म , रोब और पकड धकड ये चीजें हमेशा रहने वाली नहीं हैं, इस लिए किसी काम की नहीं।  इसका तात्‍पर्य है कि हम इन नश्‍वर चीजों को सत्‍य मान कर इनमें ही उलझ कर न रह जाएं। क्‍या रहने वाला उसे समझें और प्रेम करें।

    sdvajpayee के द्वारा
    December 7, 2010

     श्री शिवम खन्‍ना जी और श्री अन्‍नू कपूर जी के जवाब भूल से व्‍यतिक्रमित हो गए हैं।

Shivam Khanna के द्वारा
December 6, 2010

Life is not about what I’ve done, what I should’ve done, what I could’ve done… it’s about what I can do and what I will do.

Manoj salvi के द्वारा
December 6, 2010

अब के बिछडे न मिलें , दूर पडेंगे जाय। किसी दिन देख लेना , तुम्‍हें ऐसी नींद आएगी तुम जग न पाओगे, दुनिया तुम्‍हें तुम्‍हें जगाएगी। हम भी गुस्‍ताखी करेंगे , जिंदगी में एक बार दोस्‍त पैदल चलेंगे, हम कंधों पर सवार। वाजपेयी जी आप के इन पंक्तियों ने मेरी आंखो को नम कर दिया सच कह रहा हूं इस समय भी हमारे आंखे में नमी है। मै थक गया हूं पर इस संसार के लोगो समझ नहीं पाया हूं।

    sdvajpayee के द्वारा
    December 6, 2010

     प्रिय भाई मनोज साल्‍वी जी, थकना जीवन का अनिवार्य गुण है। संवेदनश्‍ीलता और सक्रियता की निशानी है। थकने पर अलप विश्राम के बाद हम फिर नयी ऊर्जा से कर्म निष्‍ठ हो जाते हैं। हां , हार मन लेना, नैराश्‍यांधकार और बात है। उन के लिए किसी शायर ने कहा है-  एक अंधेरा लाख सितारे, एक निराश लाख सहारे  सबसे बउी सौगात हे जीवन , नादां हैं जो जीवन से हारे।  भाई साहब , संसार के लोगों को समझना मो बाद की बात है , हम स्‍वयं को ही कितना समझ पाये हैं ?

AB के द्वारा
December 6, 2010

आज के इस मायावी संसार में जन्म और मृत्यु के कोई मायने नहीं हैं क्यों कि आज हर मनुष्य भौतिक सुख की प्राप्ती चाहता है। आज के इस दौर में भावनाओं की कोई कद्र नहीं है। लोग बड़े बूढ़ों का सम्मान तक भूलते जा रहें हैं आज की पीढ़ी व्यपारी हो गयी है। आज अगर कोई किसी की शव यात्रा में शरीक होता है तो वह उस समय भी वह अपने स्वार्थ की बातें करता और व्यपार की बातें करता है। इस स्वार्थी संसार से तो ईश्वर के घर का आगंन ही भला है जहा कोई स्वार्थ छल कपट तो नहीं है। इस संसार में हमारा जन्म हमारी मृत्यु है और हमारी मृत्यु हमारा जन्म है।

    sdvajpayee के द्वारा
    December 6, 2010

     प्रिय एबी , बहुत महतवपूर्ण बात कही। आदमी इतना क्षुद्र स्‍वार्थी और असंवेदनशील होता जा रहा है कि वह मित्रों , रिश्‍तेदारों की अंत्‍येष्टि यात्रा में भी राजनीति, ब्‍यापार और इधर उधर की बातें करता रहता है। वह वहां भी यह एहसास नहीं करता कि उसे भी एक दिन ऐसे ही जाना है। और कब टिकट कट जाए कोई नहीं जानता।

sanjay rustagi के द्वारा
December 6, 2010

सर अब अगली पोस्ट का इंतजार है। कब आ रही है।

    sdvajpayee के द्वारा
    December 6, 2010

      बालक, समय नहीं मिल पा रहा। कल-परसों में कोशिश करूंगा।

    Gerrie के द्वारा
    July 12, 2016

    Wow Ronny Rockel ca#n7821&;t get a break , he clearly won this competition I agree with Shawn Ray’s placing of the top three. The Mr Olympia will be very interesting this year

mridula sharma के द्वारा
December 6, 2010

Excellent article.It makes you think . This fact is universal and known to all but everyone denies it .The truth is -two things which are sure and certain are birth and death, the in between phase is uncretain, lies in grey zone . These uncretainities trouble us more but they are not in our control . We should aim to use this in between phase to the best of our ability so thats the regrets are minimum.

    sdvajpayee के द्वारा
    December 6, 2010

     आदरणीया डा. मृदुला जी,  हार्दिक आभार।      बेखुदी छा जाए ऐसी, दिल से मिट जाए खुदी उनसे मिलने का तरीका , अपने खो जाने में है।  शायद यही एकमेव रास्‍ता है पछतावे कम करने का।

    Tessica के द्वारा
    July 12, 2016

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mohit sharma के द्वारा
December 5, 2010

ईश्वर जब हमें घर से बाहर भेज देते हैं तो हमारा जन्म हो जाता है और जब वो वापस बुला लेते है तो हमारी मृत्यु हो जाती है और हम शोक मानाते हैं पर यह गलत है जब हम अपने माता पिता के पास जाते हैं तो शोक किस बात का? यह खुशी और शोक तो मेरी समझ से परे है। जीवन का एक एक क्षण विधाता ने रच दिया है बस हमें उसकी इस रचना को समझना है और उसकी इस रचना को हम उसके समीप जाकर ही समझ पाएंगे

    sdvajpayee के द्वारा
    December 6, 2010

      आपने बहुत अच्‍छी बात कही भाई मोहित जी, जब हम अपने परम पिता-माता के पास जाते हैं तो शोक किस बात का  ? ईश्‍वर के शरणागत हो कर ही हम विधि प्रपंच को समझ सकते हैं, आपकी इस बात से भी मैं पूरी तरह सहमत हूं।

Jag Jit Singh के द्वारा
December 5, 2010

Take death for example. A great deal of our effort goes into avoiding it. We make extraordinary efforts to delay it and often consider its intrusion a tragic event. Yet we’d find it hard to live without it. Death gives meaning to our lives. It gives importance and value to time. Time would become meaningless if there were too much of it. If death were indefinitely put off, the human psyche would end up, well, like the gambler in the “Twilight Zone” episode.

    sdvajpayee के द्वारा
    December 6, 2010

     अनुग्रही प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूं आद. जग जीत सिंह जी।  श्री वसीम बरेलवी जी का एक शेर है- बडा कठिन है दुनिया ए हुनर आना भी , तुम्‍ही से फासला रखना और तुम्‍हें अपनाना भी।

Sanjay के द्वारा
December 5, 2010

Perhaps passing through the gates of death is like passing quietly through the gate in a pasture fence. On the other side, you keep walking, without the need to look back. No shock, no drama, just the lifting of a plank or two in a simple wooden gate in a clearing. Neither pain, nor floods of light, nor great voices, but just the silent crossing of a meadow.

    sdvajpayee के द्वारा
    December 6, 2010

      मृत्‍यु की मोहक परिकल्‍पना जो भय दूर कर अगली यात्रा का सुखद एहसास दिलाती है। डा. शंभू नाथ सिंह जी की एक कविता काफी पहले पढी थी-   समय की सिला पर मधुर चित्र कितने  किसी ने बनाये, किसी ने मिटाये  किसी ने लिखी आंसुओं से कहानी किसी ने पढा,किंतु दो बूंद पानी इसी में गए बीत दिन जिंदगी के  गयी घुल जवानी, गई मिट निशानी विकल सिंधु से साध मेघ कितने धरा ने उठाए गगन ने गिराये शलभ ने सिखा को सदा ध्‍येय माना  किसी को लगा यह मरण का बहाना शलभ जल न पाया,शलभ मिट न पाया तिमिर में उसे पर मिला क्‍या ठिकाना प्रणय पंथ पर प्राण के दीप कितने  मिलन ने जलाये, बिरह ने बुणये किसी के चरण पर वरण फूल कितने लता ने चढाये, लहर ने बहाये।

Jaya के द्वारा
December 5, 2010

Life is pleasant. Death is peaceful. It’s the transition that’s troublesome.

    sdvajpayee के द्वारा
    December 6, 2010

     धन्‍यवाद जया जी, आपने जीवन-मृत्‍यु के बारे में एक लाइन में बहुत महत्‍वपूर्ण बात कही है।   जिंदगी आखिरी मंजिल से गुजर जाती है  तब कहीं मौत की तस्‍वीर नजर आती है।

Prabhu Chawla के द्वारा
December 5, 2010

vajpayee ji congratulation for this true article of this life and i think our death is not death infact this is our dedicationto the God… We start, then, with nothing, pure zero. But this is not the nothing of negation. For not means other than, and other is merely a synonym of the ordinal numeral second. As such it implies a first; while the present pure zero is prior to every first. The nothing of negation is the nothing of death, which comes second to, or after, everything. But this pure zero is the nothing of not having been born. There is no individual thing, no compulsion, outward nor inward, no law. It is the germinal nothing, in which the whole universe is involved or foreshadowed. As such, it is absolutely undefined and unlimited possibility — boundless possibility. There is no compulsion and no law. It is boundless freedom.

    sdvajpayee के द्वारा
    December 6, 2010

     आदरणीय श्री प्रभु चावलाजी,   आपकी सार गर्भित प्रतिक्रिया कि मृत्‍यु ईश्‍वर को समपर्ण है यानी व्‍यष्टि का समष्टि में लय के सम्‍मान में महा प्राण सूर्य कांत त्रिपाठी निराला की एक कविता निवेदित है-  मन, बुद्धि और अहंकार का लय प्रलय है  ब्‍यष्टि और समष्टि में नहीं है भेद,  भेद उपजाता है भ्रम, माया जिसे कहते हैं जिस प्रकाश के बल से ,सौर ब्रह्मांड को  उदभासमान देखते हो उससे नहीं है वंचित एक भी मनुष्‍य भाई  व्‍यष्टि और समष्टि में समाया वही एक रूप    चिदघन आनंदकंद ! आती जिज्ञासा जिज्ञासु के मस्‍ितष्‍क में जब भ्रम से बच भागने की इच्‍छा जब होती है  चेतावनी जब देती चेतना कि छोडो खेल  जागता है जीव तब योग सीखता है वह योगियों के साथ रह  स्‍थूल से वह सूक्ष्‍म ,सूक्ष्‍मातिसूक्ष्‍म हो जाता है।  मन, बुद्धि और अहंकार से लडता है जब  समर में दिन दूनी शक्ति उसे मिलती है। क्रम क्रम से देखता है अपने ही भीतर वह  सूर्य, चंद्र ,ग्रह,तारे और अनगिनत ब्रह्मांड भाव   देखता है स्‍पष्‍ट तब उसके अहंकार में है समाया जीव जग  होता है निश्‍चय ज्ञान, ब्‍यष्टि तो समष्टि से अभिन्‍न है  देखता है सृष्टि, स्थिति प्रलय का  कारण कार्य भी है वही उसकी ही इच्‍ठा है रचना चातुर्य में  पालन संहार में  अस्‍तु भाई, हैं वे सब प्रकृति के गुण  सच है- तब प्रकृति उसे सर्व शक्ति देती है अष्‍ट सिद्धियां, वह सर्व शक्‍ितमान होता  इसे भी जब छोडता वह  पार करता रेखा जब समष्टि अहंकार की चढता है सप्‍तम सोपान पर प्रलय तभी होता है, मिलता है वह अपने सच्चिदानंद रूप से।

    Star के द्वारा
    July 12, 2016

    365Hey Beej! I’m really glad my “food without po8i1ics&#l22t; message resonates with you, and that’s awesome to hear you’ve got an open mind toward your gf’s way of eating. My boyfriend Matt was similar when we first started dating – i.e. more or less open, but skeptical. A year and a half later, he’d be the first to say he’s changed quite a bit – you might be interested in reading about it! The important thing, though, even if you never quit eating meat, is that you and your gf can find ways to enjoy food and cooking together. So bravo to you!

sdvajpayee के द्वारा
December 4, 2010

प्रिय श्री केएम मिश्र जी,   आपके प्रश्‍न हैं- 1 - जब जीव और ब्रहृम एक हैं तब माया को छोडने की बात संत जन क्‍यों कहते हैं ? 2- क्‍या भक्ति मार्ग से अपने आराध्‍य तक पहुंचने का रास्‍ता दूसरे धर्मों में भी देखा गया है  और , 3- क्‍या निर्गुण मार्ग पर चलने वाले भक्ति का मार्ग अपना सकते हैं , खास तौर पर जहां मूर्ति पूजा मना हो ?  निवेदन: –   उपनिषद का उद्घोष है – सर्वं खल्विदं ब्रह्म । यानी सब ब्रह्म ही है , जो नहीं है वह भी ब्रह्म है। ब्रह्म जब जगत पिता बनता है यानी संसार का सृजन करता है माया की सत्‍ता तभी होती है।  माया को छोडने का तात्‍पर्य उसमें  न फंसना है। माया अविद्या है। इससे निस्‍तरण की यात्रा \’ तमसो मा ज्‍योर्तिगमय\’ है। संत होने की आवश्‍यक योग्‍यता तक पहुंचने के लिए साधक को गुणों से ऊपर उठना होता है। माया त्रैगुणी है। गीता में भगवान अर्जुन से \’ निस्‍त्रैगुण्‍यो भवार्जुन\’ , तीनों गुणों से रहित होने को कहत हैं। भगवान राम कहते हैं कि माया दो तरह की होती है - विद्य और अविद्या।  तेहि कर ीोद सुनहु तुम सोऊ, विद्या अपर अविद्या दोऊ।  एक दुष्‍ट अतिसय दुख रूपा, जा बस जीव परा भव कूपा।  एक रचइ जग गुन बस जाके, प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताके।  श्री कृष्‍ण कहते हैं-   दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्‍यया, मामेव ये प्रपद्यन्‍ते मायामेतां तरन्ति ते।   मेरी यह माया बडी दुरत्‍यय है यानी इस को पार पाना बडा कठिन है। जो केवल मेरे ही शरणागत होते हैं वे इस माया को तर जाते हैं।  और –  न मां दुष्‍कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्‍ते नराधमा:, माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता:।   माया के द्वारा जिनका ज्ञान हरा गया है वे आसुर भाव का आश्रय लेने वाले और मनुष्‍यों में बडे नीच तथा पाप कर्म करने वाले मूढ मनुष्‍य मेरे शरण नहीं हैं।   माया छोडने का अर्थ संसार में ही फंसना नहीं है बल्कि संसार का निर्वहन करते हुए ईश्‍वरोन्‍मुख होना है। माया के शुभाशुभ कर्म त्‍याग ईश्‍वर में शुद्ध , सच्‍चा प्रेम करना है। गुण -सत्‍व , रज और तम - विद्या माया और अवगुण अविद्या माया कृत हैं। राम  भाई भरत से कहते हैं कि माया के रचे हुए अनेक गुण दोष हैं।  इन दोनों को न देखने में ही कल्‍याण है , देखे तो अज्ञान है।  सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक, गुन यह उभय न देखिअहिं  देखिय सो अविवेक।  रामायण कहती है कि माया की बडी भयंकर और बलिष्‍ठ सेना संसार भर में फैली हुई है।  काम , क्रोध और लोभ उसके सेना पति हैं। दंभ , कपट और पाखंड योद्धा हैं। वह माया राम की दासी है। वह उनके भृकुटि विलास पर नटी की तरह नाचती है। इस माया का विशल ,अपार परिवार है , पुत्रेष्‍णा, वित्‍त एषणा और लोक में प्रतिष्‍ठा की एषणा का। पुत्र हो, धन हो और लोक में प्रतिष्‍ठा हो प्राय: यही तीन अभिलाषायें हमें नचाती रहती हैं। इन्‍हीं के उपाय में मन लगा रहना मलिनता है। इस मलिनता को छोडना माया को छोडना है।   सुत वित लोक ईषना तीनी, केहि के मति इन्‍ह कृत न मलीनी  ब्‍यापि रहेउ संसार मंहु माया कटक प्रचंड , सेना पति कामादि भट दंभ कपट पाखंड।  सिव चतुरानन जाहि डेराहीं, अपर जीव केहि लेखे माहीं।  जो माया सब जगहि नचावा, जासु चरित लखि काहु न पावा।  सोइ प्रभु भ्रू विलास खगराजा, नाच नटी इव सहित समाजा।  संत को सब में  केवल ब्रहृम ही दीखता है।  ज्ञान मान जंह एकउ नाहीं, देख ब्रहृम समान सब माहीं।  कहिय तात सो परम विरागी, तृन सम सिद्धि तीन गुन त्‍यागी। यानी रामायण – गीता दोनों गुणों से ऊपर उइने को कहते हैं। गुणों -माया से बच कर ही ब्रहृमानुभूति की जा सकती है।  2- आराध्‍य तक पहुंचने का केवल और केवल एक रास्‍ता भक्‍ित का ही है। इस्‍लाम और ईसाइयत भी तत्‍वत: भक्ति प्रधान पंथ ही हैं। ये दोनों गीता के भावानुरूप पूर्ण समर्पण की ही बात करते हैं।  3- देखने – कहने का अंतर है। निर्गुण और सगुण दोनों एक हैं। ब्रहृम तीनों गुणों से परे है और तीनों उसमें समाहित भी हैं। रामायण कहती है – अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा ..।  अगुन अरूप अलख अज जोई, भगत प्रेम बस सगुन सो होई।  ईश्‍वर सगुन- निगुर्ण दोनों है और दोनों भी नहीं है। यही पूर्णत्‍व है। उपनिषद कहती है कि पूर्ण से पूर्ण निकालेंगे तो पूर्ण ही बचेगा। एक और कथन है- सगगुण निगुर्णा चैव द्विधा ब्रहृम व्‍यवस्थित:।  निगुर्ण के उपासक ज्ञान का आश्रय लेते हैं। ज्ञान अंतत: भक्ति द्वार पर ही ला छोडता है।  

shaileshasthana के द्वारा
December 4, 2010

सबसे पहले तो देर से ब्लाग पर आने के लिए क्षमा करें। दरअसल धर्म क्षेत्र में रुचि कम है। क्रांतिकारियों और देश की आजादी के दीवानों की बात होती है तो जरूर बहस में शामिल हो जाते हैं। देह और आत्मा के बारे में बाद में क्या होता है इसका तो अध्ययन वैज्ञानिक भी नहीं कर पाए हैं। हम जब छोटे थे तो मां ने गांव की किसी महिला की कहानी सुनाई थी। उनके अनुसार वह कहानी नहीं हकीकत थी और उन्होंने खुद उसे देखा था। दरअसल गांव में किसी जवान महिला की मौत हुई। लोग उसका अंतिम संस्कार करने को ले जा रहे थे तो वह रास्ते में उठ गई। लोग भूत कह कर भागे मगर उसने खुद लोगों को बुलाया और बताया कि उसकी मौत का समय नहीं हुआ था यमराज के दूत उसी नाम की किसी अन्य महिला को लेने आये थे और गलती से उसे ले गए। वहां यमराज ने उसे जलती लकड़ी से पीठ पर दाग दिया जिसका निशान उसने पूरे गांव को दिखाया। कुछ समय बाद उस महिला का क्या हुआ नहीं पता मगर वह कहानी हमारे जेहन में यदा कदा आती रहती है और लगता है कि शरीर बाद में भी साथ रहता है। कोई कितना भी जानकार हो जब कोई जन्म लेता है तो भले ही उतनी खुशी न होती हो लेकिन  चंद दिनों तक साथ रहने के बाद जब अपना कोई मरता है तो  दिल तो रोता ही है हम जिसे खो देते हैं जिंदगी भर उसकी पीड़ा को महसूस करते हैं। शायद यही सच है। 

    sdvajpayee के द्वारा
    December 4, 2010

    प्रिय भाई शैलेश , तुम्‍हारे देर से आने से नुकसान तो मेरा ही हुआ। तुम्‍हारी सम्‍मतियों ,सुझावों और समालोचनाओं से वंचित रहा। अपने सम्‍पर्की-संबंधी जुडे रहते हैं तो अच्‍छा लगता ही है। स्‍कूल-कालेज दिनों में मैं भी क्रांतिकारियों और आजादी के दीवानों का दीवाना था। तब उनसे संबंधित काफी साहित्‍य ढूंढ ढूंढ कर पढा था। विचार विनिमय तो पसंद करता हूं, बहस निरर्थक लगती है। वैज्ञानिक भी देह और आत्‍मा के बारे में अध्‍ययन नहीं कर पाये हैं, इसमें अप्रत्‍याशित कुछ नहीं है। वैज्ञानिक प्रमाण और मन-बुद्धि से करते हैं। दोनों की बडी छोटी सीमायें हैं। हम सीमित से असीमित के बारे में कैसे जान सकते हैं ? जुकाम से बचने तक का तो उपाय वैज्ञानिक खोज नहीं पाये हैं। एक नया तत्‍व तो बिना किसी का आश्रय लिए बना नहीं पाये हैं और न किसी को नष्‍ट कर पाये हैं। अध्‍यात्‍म तो विशुद्ध विज्ञान है। वैज्ञानिक ही कहते हैं कि पदार्थ विज्ञान जहां से खत्‍म होता है वहां से अध्‍यात्‍म की शुरुआत होती है। कहानी अच्‍छी और उद्देश्‍यपरक है। शरीर तीन तरह का बताया जाता है। स्‍थूल शरीर खत्‍म होने के बाद भी सूक्ष्‍म और कारण शरीर रहते हैं। मरना जीना और खोना पाना यावज्‍जीवन चलता रहता है।

    Bette के द्वारा
    July 12, 2016

    Im no expert, but I feel you just crafted an excellent point. You obviously fully unsrndtaed what youre speaking about, and I can really get behind that. Thanks for being so upfront and so genuine.

amit Kumar के द्वारा
December 2, 2010

आदरणीय सर आपके लेख हमेशा ही बहुत अच्छे और ज्ञानवर्धक होते हैं

    sdvajpayee के द्वारा
    December 4, 2010

      धन्‍यवाद अमित जी।

Mohammad.Khalid.Khan के द्वारा
December 2, 2010

भय्या जी, आपके लेख को पड़ने के बाद बहुत सारे प्रश्न उभर जाते है. सोचता हूँ कितना छोटा होता है प्रत्येक निमिष कितनी छोटी होती है तुम्हारी चितवन कितना छोटा होता है तुम्हारा आलिंगन फिर यह भी सोचता हूँ कि कितना छोटा होता है यह क्षण, पर यह विस्तरित न हो इस जगती में, इस विपुल व्योम में तब कैसे काँपेंगे अन्तराकुल मन, कैसे विहरेंगी साँसे कैसे ठहरेगा प्रेम जन्म-मृत्यु को लाँघ !

    sdvajpayee के द्वारा
    December 3, 2010

     प्रिय खालिद भाई, निराले अंदाज में अत्‍यंत भावपूर्ण प्रतिक्रिया।

    sdvajpayee के द्वारा
    December 3, 2010

      बालक खालिद, डा. शंभू नाथ सिंह की एक कविता कुछ लाइनें –  लगता यह सब सपना मृग जल  लगता जीवन सूना असफल लगता जीवन जाएगा, लघु हिम कण सा गल, जल कण सा ढल फिर फिर रंग रंग जाता मन को जाने किन सपनों का सावन बीतेगा क्‍या यों ही जीवन ।

    India के द्वारा
    July 12, 2016

    Ok, my Dad got me OUT of this mess!!If you are using Mozilla, goto Tonst/opsiool/privacy/show cookies, and search for "youtube". delete ANY cookie that looks suspicious (there WAS one that had the word "beta" in it. Refresh your video an VOILA, you are back to the working version. yea!

Rajiv Kumar Pal के द्वारा
December 1, 2010

भाई ,साहब प्रणाम thanks for providing such a wonderful insight of the life, I heard somewhere a quote which i want to share with you. The consciousness of life\’s unconsciousness is intelligence\’s oldest tax – Fernando Pessoa

    sdvajpayee के द्वारा
    December 2, 2010

      आपने अच्‍छा उद्धरण दिया भाई साहब। अचेतन में चेतन का योग, जड-चेतन का मिलन जीवन और  वियोग चेतन का जड से पृथककरण मृत्‍यु। दोनों क्रियायें सहज-स्‍व संचालित।

    Howdy के द्वारा
    July 12, 2016

    Poonam is the most outstanding of at least all the female contestants on sapgaamera.She has a strong voice and firm grip on all the songs she sings.Moreover she has a lovely mesmerising smile which shows the beautiful heart she has.I wish her all the best.May she achieve all that she desires.

sarbjeet pathak के द्वारा
December 1, 2010

आदरणीय सर आपके लेख के संबंद में बर्तमान पुरुषोतम श्री श्री ठाकुर अनुकुलचंद्र जी की एक वाणी है ” न मरो न मारो संभव हो तो मृत्यु को अवालुप्त करो “

    sdvajpayee के द्वारा
    December 2, 2010

     धन्‍यवाद श्री पाठक जी,  श्री श्री ठाकुर अनुकूल चंद जी विचार दंने के लिए।   ’संभव हो तो मृत्यु को अवालुप्त करो “ इसका तात्‍पर्य स्‍पष्‍ट करने का अनुग्रह करें। मैं सही ढंग से समझ नहीं पा रहाहूं।

    dineshaastik के द्वारा
    March 30, 2012

    संभवतः अवालुप्त का अर्थ मृत्यु की मृत्यु से हो, लेकिन मृत्यु तो अजर है, अमर है, निश्चित है। जबकि जीवन इसके विपरीत।  अफसोस हम निश्चितता को त्याग कर अनिश्चितता को अपनाते हैं। लेकिन अंत में निश्चितता को ही पाते हैं

Anuj के द्वारा
December 1, 2010

Dear Vajpayee ji We publish hindi news paper monthly in Austrlia, we like your article, please give us permission to publish your article. Please send me your phone number by email. Regards Anuj Editor http://www.hindigaurav.com

    sdvajpayee के द्वारा
    December 2, 2010

    धन्‍यवाद श्री अनुज जी, आस्‍टे्लिया में हिन्‍दी में मासिक अखबार निकाल कर हिन्‍दी सेवा का पुनीत कार्य कर रहे हैं। मैं आपकी एतदर्थ हृदय से सराहना करता हूं और बधाई देता हूं।  आप अपने अखबार में लेख छाप सकते हैं। आस्‍टे्लिया में जागरण जंक्‍शन के लेख पढे जाएं , यह अच्‍दा ही है।   शंभू दयाल वाजपेयी- 9927003000

Dr shiwaji rao के द्वारा
December 1, 2010

“Time is a drug. Too much of it kills you.”

    sdvajpayee के द्वारा
    December 2, 2010

     धन्‍यवाद डा. शिवाजी राव साहब,   आपने म़ृत्‍यु के बारे में बहुत अच्‍छी अभिव्‍यकित दी-”Time is a drug. Too much of it kills you.”    समय , काल परम शक्ति वह सशक्‍त पक्ष है जो सर्वग्रासी है। वह  सब कुद, सब को खाता रहता है ,लेकिन उसका पेट नहीं भरता। ताकतवर ,कमजोर , गरीब,अमीर , राजा प्रजा पेड-पहाड बडे नाम , साम्राज्‍य ,इतिहास सब कुछ उसका ग्रास बनता रहता है। ऐसी कोई दवा – उपाय नहां जो उसे पल भर रोक सके। ईश्‍वर के विभिन्‍न पक्षों में यह पक्ष उतना ही महत्‍वपूर्ण है जैसे उसका सर्जक पक्ष। शायद इसी वजह से कवियों ने परमेश्‍वर श्री राम  द्वारा काल-संहार के अधिष्‍ठाता शंकर को महादेव मानते हुए पूजित किये जाने की परिकल्‍पना की गयी ।

Nana Patekar के द्वारा
December 1, 2010

Death be not proud, though some have called thee Mighty and dreadful, for thou art not so, For those whom thou think’st thou dost overthrow Die not, poor death, nor yet canst thou kill me.”

    sdvajpayee के द्वारा
    December 2, 2010

     आद. नाना पाटेकर जी,  आपकी  सारगर्भित सम्‍मति के लिए हृदय से आभारी हूं। मृत्‍यु सुंदर-सुखद है  या डरावनी-भयावह, यह तो नहीं कह सकता । इतना तय है कि वह सर्वशक्तिमान है। अजेय है। उसके सामने कोई पल भी नहीं टिक सकता। दो ताजी घटनायें बार बार मेरे जेहन में आती हैं। श्री राजीव अविवाहित और ब्रह्मचर्यव्रती रह कर स्‍वामी राम देव के राजनीतिक एजेंडे के थिंक टैंक के रूप में काम देख रहे थे। अति सादा जीवन। रामदेव की राजनीतिक महात्‍वाकांक्षाओं के पूर्ति के लिए अपेक्षित जमीन तैयार करने के लिए वह घूम घूम कर दौरे -सभायें कर रहे थे। पीछे पीदे राम देव जाते और हाथो हाथो लिये जाते। 29 नवम्‍बर की रात भिलाई में 43-44 साल की उम्र में राजीव दीक्षित का भिलाई में अचानक निधन हो गया। वे पूरी तरह स्‍वस्‍थ -सकि्रय थे। नियमित -संयमित दिनचर्या थी। होटल में नहीं रुकते। अपने संगठन के किसी सदस्‍य के घर ही रुकत और अति सादा शाकाहारी भोजन करते। सारा एजेंडा धरा रह गया और वह बिना किसी से कुछ कहने बोलने मौका पाये सदा के लिए चले गये।   दूसरी घटना तीन दिन पहले पहले किच्‍छा , जिला ऊधमसिंहनगर( उत्‍तराखंड) में हुई । बस दुर्घटना में तीन लोगों की मृत्‍यु हुई । उनमें एक गर्भवती भी थी। महिला की तो मृत्‍यु हो गयी, लेकिन उसने एक बच्‍ची को जन्‍म दे दिया।  मृत्‍यु और जन्‍म साथ साथ। मृत्‍यु के इस रूप को कया कहा ?

tilak के द्वारा
December 1, 2010

“There is a good way to die, and a right time to do it. An odd thought for this time of year — this is the point where the world has meandered back into spring, back into life. The sun is pulling fresh green from the ground again. An odd time to think about death, but as good time as ever to die.”

    sdvajpayee के द्वारा
    December 2, 2010

       धन्‍यवाद श्री तिलक जी, अच्‍छी म़ृत्‍यु जीवन और अच्‍छे जीवन से भी अधिक महत्‍वपूर्ण होती है। मृत्‍यु जीवन की एक मंजिल है जहां से नयी यात्रा शुरू होती है। आगे का सफर अच्‍छा हो इसके लिए जरूरी है कि हमारी अच्‍छी हो और मृत्‍यु अच्‍छी हो इसके लिए जरूरी है कि जिंदगी भी अच्‍छी और सार्थक हो।

Amit kr Gupta के द्वारा
December 1, 2010

नमस्कार वाजपेयी जी ,आपका लेख पहली बार पढ़ा .आपने जिनगी के मायने को बहुत ही अच्छी तरीके से समझाया. बढ़िया पोस्ट. बधाई मैंने कुछ ब्लॉग लिखे हैं यदि कभी समय मिले तो मेरे लेख पढ़कर अपने विचारो से मुझे अवगत करावे. http://www.amitkrgupta.jagranjunction.com अमित कुमार गुप्ता हाजीपुर वैशाली बिहार

    sdvajpayee के द्वारा
    December 1, 2010

    धन्‍यवाद  भाई अमित जी, मैं समय मिलने पर आपके ब्‍लाग पढने का पूरा प्रयास करूंगा । कुछ देर हो तो क्षमा करना।

syeds के द्वारा
December 1, 2010

सर आपके लेख हमेशा ही बहुत अच्छे और ज्ञानवर्धक होते हैं,यह हमारा सौभाग्य है कि आपको पढ़ने का अवसर मिलता है.धन्यवाद. http://syeds.jagranjunction.com

    sdvajpayee के द्वारा
    December 1, 2010

     शुक्रिया भाई सैय्यद जी। लेकिन मेरा अनुरोध है कि आप  इस पर समालोचनात्‍मक टिप्‍पणी देने की मेहरबानी करें। आपके बौद्धिक जुडाव से लेख की सार्थकता बढेगी।

MADHU के द्वारा
November 30, 2010

रामचरित मानस मे तुलसीदास जी ने लिखा है कि- हानि-लाभ जीवन-मरन यश-अपयश विधि हाथ  जीवन और मृत्‍यु उतना ही सत्‍य है जितना शरीर मे शरीरी का होना 

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

    आपका यह कथन पूर्णतः सही है कि जीवन और मृत्यु उतना ही सत्य है जितना शरीर में शरीरी का होना। लेकिन इसके साथ ही मैं निवेदन करना चाहूंगा कि शरीरी शरीर में तो रहता है लेकिन शरीर के बाहर भी रहता है। उसका कहीं और कभी अभाव नहीं होता। दर असल शरीर और शरीरी दोनों अंततः एक ही हैं । दो नहीं हैं। एक ही सत्ता के नजारें हैं। आपके दोहे की पहली पंक्ति है- सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेहु मुनि नाथ …..। यह भाबी, भबितब्यता और बिधि प्रपंच ही तो समझ में नहीं आ रहा।

    sdvajpayee के द्वारा
    December 2, 2010

     धन्‍यवाद मधु जी, मैं आपके विचारों पर कोई प्रश्‍न नहीं किया सिर्फ आपके विचारों पर, संदर्भगत, अपनी शंका- सवाल जोडा है कि यह विधिगति ही तो मैं समझ नहीं सका हूं। वह ‘ अति बलवान’ विधिगति जो भगवान श्री राम को भी नचाती है।

Harish Bhatt के द्वारा
November 30, 2010

आदरणीय वाजपेयी जी, प्रणाम. जिन्दगी की सच्चाई बताते लेख के लिए हार्दिक बधाई.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

    धन्यवाद भाई हरीश जी।

    madhu के द्वारा
    December 2, 2010

     सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेहु मुनि नाथ हानि-लाभ जीवन-मरन यश-अपयश विधि हाथ- इस दोहे से बस इतना ही है कि सब विधि का विधान ‍है,  पहले जन्‍म हुआ या मृत्‍यु यह एक तर्क का विषय है शंकर जी पार्वती जी के विवाह में गणेश जी की पुजा हुई है  तो तुलसीदास जी ने कहा है कि इस पर बहस न करें  कारण वे भगवान है- शरीरी शरीर में अंतर इतना ही है कि शरीरी नश्‍वर है  अर्थात शरीरी आत्मा है तो रहता आपने बहुत अच्छा लिखा है  मैने पुरे लेख पर विचार दिया न कि टापिक पर

Javed Hasan के द्वारा
November 29, 2010

God saw you getting tired, and a cure was not to be. So he put his arms around you, and whispered, “Come with me.” With tearful eyes we watched you, and saw you pass away. Although we loved you dearly, we could not make you stay. A golden heart stopped beating. Hard working hands at rest. God broke our hearts, to prove to us, He only takes the best.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

    शुक्रिया जावेद हसन साहब, मृत्यु के बारे में आपके इन भाव-भक्तिपूर्ण विचारों से चिंतन के नये आयाम मिलेंगे और मृत्यु एक सुखद एहसास देगी।

Sandeep के द्वारा
November 29, 2010

When it seems like everything is wrong and will never be right again remember even the darkest nights must give way to day.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

      आपने सही कहा श्री संदीप जी, ऐसा व्यावहारिक जीवन में भी देखने को मिलता है।

Chanda kochhar के द्वारा
November 29, 2010

Heaven’s not a place that you go when you die it’s that moment in life when you actually feel alive.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूुं चंदा कोचर जी। लेकिन स्वर्ग को भी अंततः दुखदायी माना गया है। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदायी – रामायण। स्वर्ग भी तभी तक सुख देने वाला है जब तक हमारे खाते का पुण्य -धन समाप्त नहीं हो जाता। वह कभी दुख न आए और सुख कभी खत्म न हो ऐसा नहीं है। जैसे ही वहां रहने की अर्हता खत्म हुई फिर चैरासी लाख योनियों की चकर घिन्नी शुरू हो जाती है। यानी पुनरपि जन्मं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम्। फिर जन्म , फिर मरण और फिर मां की कोख में उल्टे पांव रहना। इस चक्र से बचने को मनुष्य जन्म में ही सामथ्र्य मानी गयी है।

Mahesh Bhatt के द्वारा
November 29, 2010

It’s hard to accept, but you can’t change the past. You can’t go back and manipulate things to the way you wanted them to happen. Because life’d be meaningless and boring and just not worth living. But you can change the future and that’s a beautiful thing about life. Yes, you will make mistakes. And yes, you will have bad days – but as long as you let the past go, you’ll have such a gorgeous and bright future ahead of you. Knowing that things were meant to happen. Knowing that each day you will learn something so that you keep growing to be a better person. Life is like a rope, twined in all its complexities and yet weaved into one marvelous stream that you have the chance you use something amazing from. So grab hold of it.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

    आपकी महत्वपूर्ण सम्मति के लिए आभारी हूं श्री महेश भट्ट जी। आपका कहना है कि हम अतीत में नहीं जा सकते और चीजों को अपनी इच्छानुसार नहीं बदल दे सकते ! लेकिन भविष्य को इच्छित मोड़ दे सकते हैं। मैं सोचता और मानता हूं कि काल प्रवाह इतना वेगवान होता है , मन की गति से भी ज्यादा तेज, कि इसे पकड़ पाना तो दूर ,छू पाना भी कदापि संभव नहीं लगता। हम सांस लेते हैं, कुछ भी कहते हैं, वह पलक झपकने से पहले ही अतीत हो जाता है। भविष्य कब वर्तमान हुआ और वर्तमान कब भूत हुआ सही अर्थों में हम इस के दृष्टा भी नहीं बन पाते। यह काल प्रवाह ही कठपुतली की तरह नचाता रहता है। हम को लगता जरूर है कि हम कर्ता और भविष्य को रंगीन बना सकते की सामथ्र्य रखते हैं लेकिन अैर चिार करन ेपर पाते हैं कि यह भ्रम है। चीजें तो जैसे सब पूर्वनिर्धारित हैं । वह उसी तरह होती रहती हैं। दूसरे हम सीख वीख भी नहीं पाते हैं। बचपन से, जवानी और फिर बुढापे तक कितनी बातें सीखते हैं। एक तरफ सीखते हैं दूसरी तरफ कई सीखी बातें डिलिट होती जाती हैं। हमारी आंख नाक सभी इंद्रियों और मन -बुद्धि तक सब की सीमा है। जब कि काल सीमातीत है। तो कैसे उसे मैनेज करना संभव है? रामायण का एक दोहा है- सुख सरूप रघुवंश मनि, मंगल मोद निधान सो सेावत कुस डारि महि ,बिधि गति अति बलवान। बिधि गति – काल शक्ति भगवान राम तक को वन कुस की चटाई पर सुला देती है।

    Buddy के द्वारा
    July 12, 2016

    Now we know who the seinlbse one is here. Great post!

Rahul Bose के द्वारा
November 29, 2010

Sometimes, no matter how much faith we have, we lose people. But you never forget them. And sometimes, it’s those memories that give us the strength to go on.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

       आपका कहना सही है श्री राहुल बोस जी, लेकिन लगता है कि जीवन यात्रा एक अंधेरी रात की यात्रा है जिसमें बिना मंजिल जाने हम चले जाते रहते हैं और अचानक एक दिन सब ठहर गया लगता है।

Ttapan के द्वारा
November 29, 2010

Die, v.: To stop sinning suddenly

    surendra bahadur singh के द्वारा
    November 29, 2010

    सर साथ रहते हुवे कभी नहीं सोचा था की आप इतने गंभीर विषयों पर इतना ज्यादा सोचते रहते हैं. जीवन मरण से सम्बंधित कोइ भी अन्गल अछूता नहीं रहा. आपको पढ़ने के बाद भी मैं इतना कह सकता हूँ की इस बारे में वही ज्यादा स्पस्ट बता सकता है जिसकी मौत के बाद फिरसे जिन्दगी में वापसी हुई हो. चूंकी आप बहुत ज्यादा इस बारे में गहराई से सोचते है इसलिए ढेर सरे ग्रंथों का अध्ययन भी किया है. हमतो आपको पढके बस समझने की कोशिश कर रहे हैं

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

    मृ्त्यु की संक्षिप्ततम परिभाषा। इसी के नजदीक यह शेर लगता है- वह और होंगे जिन्हें तोबा की मिल गयी फुर्सत , यहां तो हुनाह करने को जिंदगी कम है।

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

    हमें तो हुनाह को हमें तो गुनाह समझें

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

    प्रिय सुरेन्द्र भाई , आप ने पढ़ा अच्छा लगा। अधिक पढना तो नहीं हो पाता ,विचार म्ंाथन जरूर होता रहता है। एक मिलने वाले अक्सर कहा करते थे- वह जगह जहां कजा भी न जा सकी , मैं जिंदगी को अपनी बार बार ले गया।

RK SINGH के द्वारा
November 29, 2010

Life is something that happens to you while you’re making other plans.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

     धन्यवाद श्री आरके सिंह जी, मेरे विचार से जीवन नहीं मृत्यु , जब हम अन्य योजनायें बना रहे होते हैं, आती है।

vijay के द्वारा
November 29, 2010

I am prepared to meet my Maker. Whether my Maker is prepared for the ordeal of meeting me is another matter.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

      इस भक्ति -भाव को सादर नमन, श्री विजय जी।

Daya Nayak के द्वारा
November 29, 2010

I wanted a perfect ending. Now I’ve learned the hard way that some poems don’t rhyme, and some stories don’t have a clear beginning, middle, or end. Life is about not knowing, having to change, taking the moment and making the best of it, without knowing what’s to happen next.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

    धन्यवाद श्री दया नायक जी, यह जीवन- कथा ही आदि, मध्य और अवसान रहित है।

    Jesslyn के द्वारा
    July 12, 2016

    Il feticismo, anche quello delle spese in R&S, è una malattia psichiatrica.E il capitalismo non ha patria: la terra degli speculatori è morta, quella degli imprenditori vive (nonostante i governi e i loro ࢠsaggi” interventi).Ciao

jhonty के द्वारा
November 29, 2010

Tomorrow is a blank page, just waiting to be filled with your dreams… All you have to do is be yourself and live the story of your own unique life. Be proud. Be confident. And most of all be happy.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभारी हूं जाॅन्टी जी। लेकिन हम अपना विशिष्ट जीवन जीने , गर्वित और आत्म विश्वासी होने को कितना स्वत्रंत्र हैं? खुशी क्या प्रकृति प्रदत्त है या उद्यम से हासिल की जा सकती है? हमारी सांस हमारे वश में नहीं है। हम क्या हैं और कहां जाएंगे? जैसे सवालों को जाने बिना क्या वास्तविक रूप से खुश हुआ जा सकता है?

nitin के द्वारा
November 29, 2010

In your life, you meet people. Some you never think about again. Some, you wonder what happened to them. There are some that you wonder if they ever think about you. And then there are some you wish you never had to think about again. But you do.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

    जी नितिन जी, आपने सही कहा। जिंदगी के मेले में ऐसा होता है।

vinay के द्वारा
November 29, 2010

बहुत ही बढ़िया लेख पढने को मिला है..शुक्रिया भाईसाहब जिन्दगी क्या है ये जान्ने का मौका मिला आप के लेख के माध्यम से…

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

    धन्यवाद विनय जी, जिंदगी क्या है इस पर विचार किया जाना चाहिए, मेरा यह भाव-प्रयास जरूर रहा है।

pankaj panday के द्वारा
November 29, 2010

Take chances. Tell the truth. Date someone totally wrong for you. Say no. Spend all your cash! Fall in love. Get to know someone random. Be random. Say I love you. Sing out loud. Laugh at a stupid joke. Cry. Get revenge. Apologize. Tell someone how much they mean to you. Tell the asshole what you feel. Let someone know what they’re missing. Laugh til your stomach hurts. LIVE LIFE!

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

    धन्यवाद श्री पंकज पाण्डेय जी, आपने जीवन को समग्रता में समेटने का अच्छा प्रयास किया है।

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
November 29, 2010

आदरणीय वाजपेयी जी, प्रणाम आप ने बहुत ही गुण विषय पर बहुत ही सुन्‍दर विषलेशण किया है। आप ने जन्‍म एवं मृत्‍यु के आधुनिक विचारों एवं पुरातन विचारों का जो सम्‍मिश्रण किया है वह बहुत ही ज्ञान वर्धक है। हम आज के आधुनिक मानव इस जन्‍म एवं मृत्‍यु के फेर को जानते भी है किन्‍तु आज वह सासांरिक भोग विलासिता में इतना डूब चुका है कि वह उस कबूतर की तरह हो गया है कि वह बिल्‍ली को देख कर आंख बंद कर लेता है कि अब आंख बंद हो गई तो समझों बिल्‍ली चली गई। बहुत ही अच्‍छे शब्‍दों में सत्‍य से परिचय कराने के लिए बधाई। http://deepakjoshi63.jagranjunction.com

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

    आत्मीय श्री दीपक जोशी जी, इतना डूब चुका है कि वह उस कबूतर की तरह हो गया है कि वह बिल्‍ली को देख कर आंख बंद कर लेता है कि अब आंख बंद हो गई तो समझों बिल्‍ली चली गई आप ने सही कहा। और यह आत्म प्रवंचना ही तो है। खुद को धोखे में बहला कर रखना। इसके बावजूद हम अपने को बुद्धिमान समझते हैं। हम अपनी मंजिल के बारे में सोचना भी नहीं चाहते।जैसे सब कुछ यथावत बना रहेगा।

Ashutosh के द्वारा
November 28, 2010

प्रणाम सर आज मै आप से कुछ पूछना चाहता हूं। मै पूछना चाहता हूं कि आखिर आप की प्रेरणा का स्त्रोत क्या है ? आप इतने गूढ़ विषयों का चयन कैसे करते हैं ? न जन्म है न मृत्यु के इस विषय पर कई सज्जनों ने अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं मेरे जो विचार हैं उसके अनुसार यह एक सत्य है जिसे हम किसी भी दशा में नकार नहीं सकते हैं इसे तो स्वीकार करना ही होगा। ईश्वर के इस नाटक के मंच पर हमारी पहचान हमारा शरीर और हमारा रुप बनता है। पर जब हम इस मंच पर चल रहें नाटक को करने वाले शरीर रुपी वस्त्र से प्रेम कर बैठते हंै तब वह हमारी सबसे बड़ी भूल होती है और उस शरीर रुपी वस्त्र को छोड़ने में दुख होता है। हर वस्तु की अपनी एक आयु होती हैं उसी प्रकार इस शरीर की आयु पूर्ण होने पर हमें एक नवीन देह की आवश्यकता होती है तो दुख किस बात का है और वैसे भी परिर्वतन तो प्रकृति का नियम है। यह परिर्वतन तो निरंतर गतीशील रहेगा।

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

    प्रिय आशुतोष, प्रेेरणा तो आत्मा ही हो सकती है। किसी और बाह्य चीज में मुझे ऐसी प्रेरक षक्ति नहीं लगती। यह सही है कि इस नाट्य मंच पर हमारी पहचान हमरा शरीर व रुप ही बनता है लेकिन हम इससे प्रेम नहीं मोहाशक्त हो जाते हैं। जब इस के सही स्वरूप को पहचानते ही नहीं हैं तो इससे प्रेम कैसे करेंगे? रामायण की चैपाई है- जाने बिनु न होइ परतीती, बिनु परतीत होइ नहिं प्रीती। दूसरे प्रेम का एक अनिवार्य गुण होता सुख। प्रेम में दुख नहीं होता। प्रेम केवल सुखमय और सुखरूप है। दुख जब जहां हो समझिए अज्ञान-मोह ही उसके मूल में हैं

Vijay Vineet के द्वारा
November 28, 2010

A dying man needs to die, as a sleepy man needs to sleep, and there comes a time when it is wrong, as well as useless, to resist.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

    भाई विजय विनीत जी, आपने सूत्र वाक्य में जीवन सत्य के बारे में काफी कुछ कह दिया है। हम नींद तो जीत सकते हैं , मृत्यु को नहीं। मौत तो आने के लिए और जान तो जाने के लिए है। शायद इसी आधार पर संत-फकीर और वीर क्षत्रिय मौत से खेलने में सुख अनुभव करते हैं।

sumit के द्वारा
November 28, 2010

वाजपेयी जी नमस्कार आप ने इस समाज को एक संजीवनी दी है।

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

    पोस्ट पढने के लिए धन्यवाद सुमित जी । लेकिन आपकी प्रतिक्रिया पूरी विनम्रता अस्वीकार्य हैं । मुझ जैसे एक अति सामान्य ब्यक्ति पर यह बात उपयुक्त नहीं बैठती।

Dr Saleem Khan के द्वारा
November 28, 2010

Embalm, v.: To cheat vegetation by locking up the gases upon which it feeds. By embalming their dead and thereby deranging the natural balance between animal and vegetable life, the Egyptians made their once fertile and populous country barren and incapable of supporting more than a meagre crew. The modern metallic burial casket is a step in the same direction, and many a dead man who ought now to be ornamenting his neighbor’s lawn as a tree, or enriching his table as a bunch of radishes, is doomed to a long inutility. We shall get him after awhile if we are spared, but in the meantime the violet and the rose are languishing for a nibble at his glutaeus maximus.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

    डा. सलीम खां साहब , आपने रूपकों के जरिए जीवन-मृत्यु के बारे में बहु मूल्य बात कही हैं। संसार की हर वस्तु ,जड़-चेतन , अपने मूल उत्स-स्रोत से निकaलती और उसी में विलीन होती प्रतीत होती है। मूलतः तात्विक दृष्टि से जड़ कही जाने प्रकृति भी चेतन से – अंशी से आच्छादित है। भीतर भी , बाहर भी। इस तरह जन्म भी भ्रम है और मृत्यु भी भ्रम है।

dinesh oberoi के द्वारा
November 28, 2010

Death is for many of us the gate of hell; but we are inside on the way out, not outside on the way in.  sir please give me your cell number

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

    भाई श्री दिनेश ओबराय जी, मुझे लगता है दुख जनक अज्ञानता ,मोह, द्वेष-द्रोह ही नर्क है। 9927003000

chetan chauhan के द्वारा
November 28, 2010

We say that the hour of death cannot be forecast, but when we say this we imagine that hour as placed in an obscure and distant future. It never occurs to us that it has any connection with the day already begun or that death could arrive this same afternoon, this afternoon which is so certain and which has every hour filled in advance

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

    सही है श्री चेतन चैहान जी, मृत्यु का समय कोई नहीं जान पाता। इसी के साथ यह भी कहा जाता है कि वह किस हवाले से आएगी यह भी नहीं जानने में आता।

Jasveer sinh jassi के द्वारा
November 28, 2010

Years, following years, steal something every day; At last they steal us from ourselves away.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 30, 2010

    प्रिय श्री जसवीर जस्सी जी, आपने बहुत अच्छी बात कही- साल दर साल प्रतिदिन कुछ चुराते रहते हैं और अंत में हमसे हमें ही ले जाते हैं । यानी हम एक मजबूर खिलाड़ी ही बने रह जाते हैं। लायी हयात आए, ले चली कजा चले न अपनी खुशी से आए , न अपनी खुशी चले।

Altaf Hasan के द्वारा
November 28, 2010

If man were immortal he could be perfectly sure of seeing the day when everything in which he had trusted should betray his trust, and, in short, of coming eventually to hopeless misery. He would break down, at last, as every good fortune, as every dynasty, as every civilization does. In place of this we have death

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

    बहुत बहुत शुक्रिया अल्ताफ भाई। मृत्यु के बारे में आप ने अत्यंत महत्वपूर्ण विचार दिये हैं।

Jagmohan Dalmia के द्वारा
November 28, 2010

vajpayee ji i like your all article. Boy, when you’re dead, they really fix you up. I hope to hell when I do die somebody has sense enough to just dump me in the river or something. Anything except sticking me in a goddam cemetery. People coming and putting a bunch of flowers on your stomach on Sunday, and all that crap. Who wants flowers when you’re dead? Nobody.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

    आद. जग मोहन डालमिया जी, आपकी स्नेहिल सम्मति के लिए हार्दिक आभार। मृत हो जाने पर कोई फूल नहीं चाहता। पूरा शहर था उसके जनाजे में शरीक, तन्हाइयों के डर जो शख्स मर गया। यही बिडम्बना होती है।

Sachin mishra के द्वारा
November 28, 2010

People do not die for us immediately, but remain bathed in a sort of aura of life which bears no relation to true immortality but through which they continue to occupy our thoughts in the same way as when they were alive. It is as though they were traveling abroad.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

    धन्यवाद श्री सचिन मिश्र जी महत्वपूर्ण सम्मति देने के लिए।

Raj Kumar Santoshi के द्वारा
November 28, 2010

I’m not afraid of death. It’s the stake one puts up in order to play the game of life.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

     आप मृत्यु से भयभीत नहीं हैं श्री राज कुमार संतोषी जी, तो यह बड़ी सराहनीय बात है। यह संभव तभी है जब आप जन्म-जीवन की गुत्थी को समझ-सुलझा सके हों। लेकिन बात हम नहीं डरते , यहीं पर खत्म नहीं होती। यहां से तो नयी शुरुआत होती है। और लेाग भी इस खेल को समझें यह भी जरूरी है।

Amit verma के द्वारा
November 28, 2010

The fear of death follows from the fear of life. A man who lives fully is prepared to die at any time

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

       बिल्कुल सही कहा श्री अमित वर्मा जी, जीवन से डरने वालों को ही मृत्यु का भय सताता है।पूरी तरह से जीवन जीने वाला किसी क्षण मरने को तैयार रहता है। लेकिन यहां यह सवाल स्वाभाविक है कि पूरी तरह या सम्पूर्णता में जीवन जीना क्या मृत्यु को समझे बिना संभव है? और क्या जीवन अपने वश में है?

sonu के द्वारा
November 28, 2010

All say, \"How hard it is that we have to die\" – a strange complaint to come from the mouths of people who have had to live.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

    धन्यवाद श्री सोनू जी। बड़ा अजब खेल है जन्म और मृत्यु का।

R C gautam के द्वारा
November 28, 2010

We live our lives in denial, as if death will never come. But sooner or later, death comes to every body. And with it come a number of urgent questions. What is death? Is there life after death…or an afterlife? What\’s the point of life and death, and how can we make sense of it all? Most of us only begin to ask these questions at the end of life, when the certainty of death can no longer be ignored. By that time we\’re caught by surprise and ill-equipped to deal with the situation at hand. A perfectly natural and even beautiful stage of life becomes overcast with fear and confusion. Why wait \’til the end? Why not ask these questions now, while there\’s time to make a serious inquiry? We might discover something completely unexpected. What if our fear of death is unfounded? What if, as Walt Whitman says, \"to die is different from what any one supposed, and luckier\"?

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

    श्री आरसी गौतम साहब, आपने बहुत अच्छी बात कह कि आम तौर हम मृत्यु से जुड़े सवालों पर जीवन के अंतिम पड़ाव पर विचार करते हैं। जब कि मौत के सामने पूरी तरह असहाय होने के अलावा कुछ नहीं कर सकते । क्यों न अभी जीवन-शक्ति रहते हुए इन सवालोंको सुलझाया जाए? भारतीय ग्रंथों में कहा गया है कि जब तक कोई रोग नहीं लगा और बुढापा नहीं आया है, अपने परम कल्याण का उपाय कर लेना चाहिए। इसी आशय का श्री मदभागवत का एक श्लोक है। प्रख्यात ईरानी कवि शेख सादी ने भी इसी बात को इस तरह कहा था – जवान अगर तन्हाई में बैठ कर खुदा को याद करता है तो यह उसकी हिम्मत और सच्ची इबादत है। अगर बूढा किसी कोने में पड़ा पड़ा खुदा को याद करता है तो इसमें तारीफ की कोई बात नहीं है, क्यों कि उससे तो वैसे भी चला फिरा और उठा नहीं जाता।

Amitabh के द्वारा
November 28, 2010

A classical point of departure in defining death, seems to be life itself. Death is perceived either as a cessation of life – or as a “transit area”, on the way to a continuation of life by other means. While the former approach presents a disjunction, the latter is a continuum, death being nothing but a corridor into another plane of existence (the hereafter).

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

    धन्यवाद श्री अमिताभ जी, जीवन -मृत्यु का खेल शायद सांसों की डोर पर ही टिका है। सांस की आवृत्ति थमी नहीं कि सिक्का पलट गया। दूसरा पहलू आ गया। और यह संास की डोर अपनी पकड़ में नहीं है।

SK joshi के द्वारा
November 28, 2010

Christianity is the religion most obsessed with death and the afterlife, its alleged aftermath. While churches encompass inlaid graves and cemeteries, both Jews and Muslims regard the flesh of corpses as a source of ultimate contamination. In various belief systems, the dead are either holy or repugnant. But, what exactly is death?

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

    भाई श्री एस के जोशी जी, मैं मानता हूं जन्म-मृत्यु जीवन के दो रंग हैं। जड़ और चेतन से जीव होता है। जड़ यानी शरीर बनता है अन्न से , अन्न या अन्य खाद्य पदार्थ बनते हैं जल से। जल होता है पृथ्वी में । आग से अन्न पचता है। पृथ्वी -।मिट्टी ही जड़ का उत्स है। शरीर पंच् तत्वों का यौगिक है। इनसे मिल कर बना है। म्ृत्यु परिवर्तन का नाम है। न कोई जन्मता है और न कोई मरता है। सदा है। ज्ड़ भी , चेतन भी। रूपांतरण की प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है। मूल तत्वों का विघटन -अलग हो जाना – रूपांतरण की इस सतत प्रक्रिया को ही लाक में मृत्यु कहते हैं! ये पंचभूत अपने मूल उत्स में मिल जाते हैं। इन तत्वों और चेतन अंश का संयोग जीवन है। मृत्यु में चेतन का अंश अंशी से किमल जाता है। ये विचार मैंने करीब डेढ साल पहले लिखे थे।

pniki joshi के द्वारा
November 28, 2010

For God so loved the world that He gave His only Son, so that all those who believe in him should not perish but have eternal life.”

    manoj vajpayee के द्वारा
    November 28, 2010

    The dream (experience) is unreal in waking, whereas the waking (experience) is absent in dream. Both, however, are non-existent in deep sleep which, again, is not experienced in either. Thus all the three states are unreal inasmuch as they are the creation of the three Gunas (Sattwa, Rajas and Tamas); but their Witness (the Reality behind them) is beyond all Gunas, Eternal, One and is Consciousness itself.”

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

    पिंकी जोशी जी, ईश पुत्र पर आस्था रखने वाले अमर रहेंगे तो शेष अन्य का क्या होगा?

आर.एन. शाही के द्वारा
November 28, 2010

आदरणीय वाजपेयी सर, प्रणाम! जन्म-मरण जैसे गूढ़ विषय पर कोई विवेचन मेरे वश की बात नहीं है, अत: क्या टिप्पणी करूं, समझ नहीं पा रहा । वैसे भी सम्प्रति घोर सांसारिक वृत्तियों में लिप्त हूं, जिसके कारण अंदर झांक भी नहीं पा रहा हूं । इतने विशद विश्लेषण को पढ़ते-पढ़ते बीच में कहीं-कहीं विराग की स्थिति आई, परन्तु अधिक देर टिक नहीं पाई । सबकुछ जानते हुए भी, कि एकमात्र मृत्यु ही परम सत्य है, हम विधाता की विधि के आगे इतने लाचार होते हैं कि इस परम सत्य से नज़रें चुराते रहना ही हमें अपने लिये हितकारी लगता है । कदाचित विधाता को भी यही मंज़ूर है, कि हम इस सत्य से अधिक प्रीत न बढ़ाएं, अन्यथा जीवन की सार्थकता पर ही प्रश्नचिह्न लग जाने की संभावना बन जाएगी । जीवन जहां शून्य को प्राप्त होता है, मृत्यु की सत्ता वहीं से आरम्भ होती है । जबकि मृत्यु कभी शून्य नहीं बन सकती, यह भी एक तथ्य है । कविवर गुप्त ने भी ‘विचार लो कि मर्त्य हो’ से यही संदेश देने का प्रयास किया था, कि अवश्यंभावी कहलाने का अधिकार यदि किसी को है, तो वह एकमात्र मृत्यु ही है, शेष की संभावना हमेशा संदिग्ध ही होता है । आपकी विद्वता से ओतप्रोत इस कृति के लिये बधाइयां स्वीकार करें । कुछ दिनों तक नेट पर अनियमित रहूंगा, इसके लिये क्षमाप्रार्थी हूं ।

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

    प्रिय भाई शाही जी, जन्म-मरण गूढ बिषय तो है या हो सकता है, लेकिन हम जीते और मरते हैं। दोनों से बच नहीं पाते तो हमें इन पर सुचिंतित विचारण भी सहज आवश्यक है। जन्म-मृत्यु के रहस्य को जाने बिना कैसे जीवन जीना चाहिए , हम यह नहीं समझ पाएंगे। जीवन रूपी सिक्के के जन्म और मृत्यु दो पहलू हैं। फिर मृत्यु से प्रीत बढाने से जीवन की सार्थकता कैसे प्रभावित हो जाएगी। अभी हमंकौन कितना सार्थक जीवन जीते हैं? केवल येन केन प्रकारेण जीते चले जाना ही सार्थकता नहीं कही जा सकती। मुझे लगता है कि जन्म-मृत्यु को समझ कर ही हम जीवन को सार्थक मोड़ दे सकते हैं। शून्य अलग से विचार करने की सत्ता है। शून्य को भगवान लक्ष्मण ने परसुराम को बताने का प्रयास किया था – मूंदहु आंख कतउं कोउ नहीं। दृश्यमान से उपराम हो अदृश्य की ओर दृष्टि को मोड़ना ही आंख मूंदना है।

nachiketa vajpayee के द्वारा
November 28, 2010

Janm to Mrittyu ki shuruat hai.. Birth and death are not two different states, but they are different aspects of the same state. There is as little reason to deplore the one as there is to be pleased over the other. But just comig in this world doesnt leads to our birth.. CHIPMAN famously said- MAN\’S MAIN TASK IN LIFE IS TO GIVE BIRTH TO HIMSELF.. After your death you will be what you were before your birth.. Death is more universal than life; everyone dies but not everyone lives.. Death is a necessity.. Try to visualize a world without death! … Death is the essential condition of life, not an evil.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

    प्रिय नचिकेता, आपने सही कहा- जन्म और मृत्यु दो अलग अलग अवस्थायें नहीं, बल्कि एक ही अवस्था के दो भिन्न पक्ष हैं। एक पर प्रमुदित और दूसरे पर शोकाकुल होने का कोई तार्किक आधार नहीं है। मृत्यु जीवन से कहीं अधिक सार्वभैमिक है मरता तो हर कोई है लेकिन जीता हर कोई नहीं है। मृत्यु जीवन की अनिवार्यता है। बिना मृत्यु के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। यह अभिशाप नहीं जीवन का अनिवार्य अंग है।

ramesh khanna के द्वारा
November 28, 2010

Vajpayee ji.. aapne bilkul sahi kahe hai ki अस्तित्‍व का होना जीवन है और उस ‘होने’ का न रह जाना मृत्‍यु।

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

      बहुत बहुत धन्यवाद श्री रमेश खन्ना जी।

dr.satyendra के द्वारा
November 28, 2010

मुनिवर! आप इतना गूढ़ विषय चुन कर मरे जैसे निर्वुधि से टिपण्णी की अपेक्षा रखते हैं , धन्यवाद वज्ञानिक तथ्य ये कहते हैं की पूरे ब्रह्माण्ड में , पथार्थ और उर्जा एक निश्चित मात्र में हैं , और ये संतुलित रूप में एक दूसरे में परिवर्तित होते रहते हैं. इस अवधारणा के अनुसार अगर हम देखें तो न कुछ उत्पन्न हुआ न नष्ट. फिर भी प्रकृति में वस्तुएं , जीव उत्पन्न भी होते हैं और नष्ट भी सब कुछ नश्वर होते हुए भी परिवर्तनशील है लेकिन कोई भी पदार्थ अपने स्थिति में परिवर्तन नहीं चाहता ये भी सत्य है न्यूटन के नियम के अनुसार कोई भी वास्तु अपने स्थान को नहीं छोड़ना चाहती जब तक की उस पर कोई बाह्य बल न लगे . तूफ़ान की तरह बहती नदी से एक किनारा भी काटने से पूर्व कितना संघर्ष कटा है , छोटी सी बात है लेकिन म,अहत्वपूर्ण है विषय को समझने के लिए , ये प्रक्रितक जन्य मोह के कारन है , और अगर मोह न हो तो भी जीवन का आनंद नहीं है, परम पिता परमात्मा ने या प्रकृति ने ये सब क्यूँ उत्पन्न किया ? ये भी तो शोध का विषय है क्या इसका कोई उत्तर है किसी के पास ? मेरे पास तो निश्चित ही नहीं है:) महाभारत में यक्ष का युधिष्ठर से प्रश्न की हे युध्श्थर संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? और युधिष्ठर का कालजयी उत्तर – की हे प्रश्न करता हमारी आँखों के सामने हमारे सभी प्रियजन एक एक कर इस संसार से विदा हो जाते हैं फिर भी इस जीवन से प्राणियों का मोह नहीं छूटता , इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है ?:) मोह क्यूँ नहीं छूटता -क्यूंकि प्राणी मात्र केवल पृथ्वी जल आकाश, वायु, और सूर्य(तेज -उर्जा) से ही नहीं बना यदि मात्र इन्हीं से बना होता तो हम मन की गति भी नाप सकते थे यक्ष प्रश्न ये भी था की संसार में सबसे तेज गति किसकी है, उत्तर था मन की . यदि प्राणी मात्र केवल इतना ही होता तो निश्चित जानिये की आप ये विषय उठा ही नहीं रहे होते या फिर ये विषय विकार ही न होते और न ही मैं एहन बैठ कर , अपनी बुध्हिअनुसार कोई टिपण्णी ही लिख रहा होता इन मूल पञ्च तत्वों के साथ जब और तत्वों का प्रवेश हुआ तो , प्रकृति में मानवरूपी जानवर का विकास भी हुआ :) जिस प्रकार algae amoeba से होता हुआ जीवन मनुष्य तक पहुंचा , ८४ लाख परिवर्तनों के बाद ( ८४ लाख योनियों यानि परिवर्तनों के पश्चात मानव रुपी जीव की काया में आत्मा रुपी उर्जा पहुंची) विज्ञानं ने कितने रूप दिखाए हैं समुद्र से लेकर मानव योनी तक जीवन की उत्पत्ति के ये मैंने गिना नहीं . तो इन पञ्च तत्वों के साथ , रक्त कैसे बना, कोशिकाएं क्या है? इन सबकी जानकारी तो विज्ञानं को हुयी , लेकिन मन क्या है , कैसे बना इसका विज्ञानं के पास अभी भी कोई उत्तर नहीं है जब प्राणी शरीर के साथ सात्विक, राजसी, तामसी प्रव्रत्तियों का प्रवेस हुआ जब आकास से हमेर शब्द की और वायु तत्त्व से स्पर्श की शक्ति प्राप्त हुयी, त्वचा , नेत्र, नासिका, जिव्हा, एवं श्रवण इन शक्त्यिओन का प्राणियों में संचार हुआ , और साथ में मिलीं गुदा, लिंग, हाथ , पैर , और बोलने की शक्ति ये प्रकृति में स्थित शक्तिया प्रथक प्रथक होकर संसार रुपी माया जाल की रचना नहीं कर सकतीं इस्सेलिये एक दूसरे के आश्रित रहने वाली इन शक्तियों ने एक निश्चित दिशा में लक्ष्य लेकर, परस्पर मिल कर एक विशाल लक्ष्य की और इंगित , प्रथम एंड की रचना , समुद्र जल में की. और इस एंड का आवरण किस्से बना? तामस, अहंकारी महत्व से परस्पर मिलने के मोह से एवं प्रकृति जन्य विधंस से विषय थोडा भटका हुआ प्रतीत हो रहा होगा किनती जब तक विषय के मूल में नहीं जायेंगे इसकी विवेचना संभव नहीं है मुनिवर! आपकी बात तथ्यात्मक है की जब सब कुछ नश्वर है तो विलाप कैसा, ? येही माया है और माया ही मोह का कारन है विलाप के बिना प्रसन्नता का अहसास नहीं , प्रसन्नता के बिना विलाप का. आप तो रामायण के ज्ञाता हैं, प्रभु राम भी लुक्स्मन के शक्ति लग जाने पर कैसा प्रलाप करते हैं , आप जानते ही हैं आपकी अभिव्यक्ति पर सार्थक टिप्पणियां आयें इस मोह से \न आप बच सकते हैं न मैं , फिर जीवन के मोह से कैसे बचा जा सकता है ? ये भी तो यक्ष प्रश्न है?????? सादर डॉ. सत्येन्द्र सिंह

    dr.satyendra के द्वारा
    November 28, 2010

    अंड(अंड)^^^^^^^^^^^^^^

    dr.satyendra के द्वारा
    November 28, 2010

    ^^^^^^^^^^^^^^^तूफ़ान की तरह बहती नदी से एक किनारा भी कटने से पूर्व कितना संघर्ष करता है , (तूफ़ान की तरह बहती नदी से एक किनारा भी काटने से पूर्व कितना संघर्ष कटा है , )

    Rashid के द्वारा
    November 28, 2010

    सत्येन्द्र जी !! मैं अक्सर आप के कमेंट्स वाजपेयी सर के लेखो पर देखता हूँ !! मुझे इस बात में कोई शक नहीं है की आप एक विद्वान व्यक्ति है ( यह बात आप के कमेंट्स से साबित भी होती है ) तो कृपया करके आप भी जागरण junction पर ब्लॉग बनाये और हम अज्ञानियो के ज्ञान की राह दिखाएँ !! धन्यवाद राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    dr.satyendra के द्वारा
    November 29, 2010

    राशिद भाई , आपके अनुग्रह हेतु धन्यवाद , एक शेर पर गौर फरमाएं – कभी फुर्सत होगी , सुलझा दूंगा तेरे उलझे गेसू अभी हालात को सुलझा रहा हूँ

    sdvajpayee के द्वारा
    November 29, 2010

    प्रिय श्री डा. सत्येन्द्र सिंह जी, वैज्ञानिक तथ्य ये कहते हैं की पूरे ब्रह्माण्ड में ए पथार्थ और उर्जा एक निश्चित मात्र में हैं ए और ये संतुलित रूप में एक दूसरे में परिवर्तित होते रहते हैं – मैंने कहीं पढा था कि ब्रह्मांड में डार्क एनर्जी लगभग 70 प्रतिशत है। डार्क एनर्जी अदृश्य उूर्जा है और ब्रह्मांड में परिवर्तन का कारक मानी जाती है। आप की सम्मति से मुझे नई और बडी महत्वपूर्ण बात पता चली कि पदार्थ भी अपनी स्थििति में परिवर्तन नहीं चाहता। मैं अभी तक यह समझता था कि पदार्थ जड़ है और जीवित रहने की जद्दोजहद सिर्फ चेतन का गुण है। मोह को अज्ञान माना जाता है, इस लिए – मोह न हो तो जीवन का आनंद नहीं है- इस पर पुर्नविचार करना होगा। ग्रंथों में सृष्टि-सृजन का कोई स्पष्ट कारण वर्णित नहीं मिला। यही मिला कि – एकोहंबहुष्यामि …. मैं एक से बहुत होउूं। और ब्रह्म या परमात्मा बहुत हो गया। इतना तो तय है कि हम आप सभी, जो दीखता है और जो नहीं भी दीखता वह भी , सब सब उसी एक परमात्मा के रूप हैं। पंच तत्व – क्षिति जल पावक गगन और समीर – स्वतंत्र नहीं हैं। ये भी अंततः एक परम तत्व से निःशृत हैं। धरती, पानी, अग्नि और हवा ये सब आकाश के ही विभिन्न रूप हैं और आकाश ही इनका जनक माना जाता है। कुछ वैदिक ऋषियों ने आकाश को ईश्वर के शरीर का एक हिस्सा माना है। सभी तत्व और आकाश भी अनादि- अनंत है। हम किसी भी इंद्रिय या साधन-माध्यम से इनमें से किसी का ओर छोर नहीं पा सकते। विचारों से भी परे हैं। पानी में भी आग है। चेतन-अचेतन सब में न्यूनाधिक ये सभी तत्व व्याप्त हैं और हम सभी सर्व व्यापी आकाश के जरिए एक दूसरे से परस्पर जुड़े हैं। योग या ब्रह्म विद्या के जानने वालों ने कहा है कि मन की गति जानी जा सकती है, लेकिन मन को वश में कर के। पहले मन को साधना पड़ता है। अवतार और महापुरुष ऐसा लोक व्यवहार करते हैं जिससे लोग उनका अनुसरण कर व्यवस्थित सामाजिक जीवन जिएं। उनके सामने एक एजेंडा होता है। महाजनोयेन गतः स पंथाः और यद्याचरति श्रेष्ठः लोकः तदनुवर्तते…..! लोक के लिए व्यवस्था है कि महापुरुष जिस रास्ते से चले हों वही अनुसरणीय मार्ग है और महान लोग जिस मार्ग पर चलते हैं उसे ही आदर्श मान लोग अनुकरण करते हैं। तत्कालीन समाज के लिए यह उद्देश्य-एजेंडा पैगम्बर मोहम्मद के सामने भी था। राम तो नर शरीर में मानवोचित लीलायें कर रहे थे। वह लक्ष्मण के लिए ही विलाप कर रहे थे, पत्नी के लिए ऐसे शोकार्त रो रहे थे- मनहुं महा विरही अति कामी। कवि कहता है मानो कोई बहुत कामुक महा विरही हो। लेकिन वही राम रोते रोते पत्नी वियोग के बावजूद सुख पूर्वक भी बैठ जाते हैं और लक्ष्मण से तमाम गूए ज्ञान की बातें करने लगते हैं- . … बैठे प्रभु सुख आसीना …. और कहत अनुज सन कथा रसाला । राम तुम्हार चरित अगम अगोचर बुद्धि पर , अविगत अकथ अपार नेति नेति बेद कह। सार्थक टिप्पणियां आयें यह आकांक्षा है तो है लेकिन मकसद यही कि हम में सही गलत का विवके जगे और सही रास्ता क्या हम इसे समझें और तदनुरूप आचरण-व्यवहार करें। सात्विक इच्छा लोक कल्याण का भाव संभवतः मोह नहीं हैं। जीवन की नश्वरता को हृदयंगम कर हम मोह से बच सकते हैं। 84 लाख योनियों वाले बिंदु पर अभी मैं सम्यक रूपेण उतर नहीं पाया हूं। इस लिए इसे कभी आगे के लिए छोड़ रहा हूं।

    pankaj singh के द्वारा
    November 29, 2010

    Everything in life is temporary, because everything changes. That’s why it takes great courage to love, knowing it might end anytime but having the faith it will last forever.

    K M Mishra के द्वारा
    December 1, 2010

    बाजपेई जी सादर प्रणाम । आप दोनों मनीषियों की वार्ता सुन कर मन आनंदित हुआ । कुछ प्रश्न मन में हैं । माया और महामाया कौन हैं । क्या दोनों भिन्न हैं या एक । ब्रह्म और माया एक हैं या भिन्न । क्या माया से जीते जी अलग हुआ जा सकता है । सादर आपका

    dr.satyendra के द्वारा
    December 1, 2010

    as per science life origiated from sea — as per sahshtra also lefe originated from sea and after pralay life rests in sea — vishnu bhagvan ksheer sagar me shiya par vishram karte hain as per science first life in sea towarsds fish then amphibaians reptiles to gorilaa ape mabn and man From shashtra there seems to be a chain from sea to human being First Egg Hiranya garbha in sea Matasya avatar kachhap avtaar vaarah avtar ets to narsingh avtar And Vishnu Himself gave his form to human being So there seems to be a scitific link in between both But I think originality of scientific evolution lost in so called religious preachings anmd its the common saying in Shashtras that human being is after 84 lacs changes aur yoniyon me pravesh ke baad manav jeevan mila hai ye amulya hai So more work has to be done in this direction. In vishnu purana there is a topic on life where its written that five basic elements untiited in sea in a particular direction to form the first egg and embryo like structure which was called Hiranya Garbha , the base of all the creatures or life thanx

    sdvajpayee के द्वारा
    December 2, 2010

     प्रिय श्री केएम मिश्र जी, आपके प्रश्‍न   माया, महामाया कैन हैं , दोनों भिन्‍न हैं या एक ?  ब्रह्म और माया भिन्‍न हैं या एक ?  और क्‍या माया से जीत जी अलग हुआ जा सकता है ? – मेरी रुचि के हैं। मैं स्‍व मति अनुरूप  उत्‍तर निवेदन का प्रयास कर रहा हूं।        माया- महामाया दो नहीं एक हैं। जैसे ईश्‍वर और परमेश्‍वर तथा ब्रह्म और परब्रह्म ।   असीम शक्ति से प्रभावित हो कवि-दार्शनिक मन माया को ही महामाया कह देता है।  माया अज्ञान -अविद्या है। बौद्ध दार्शनिकों के बीच यह शून्‍यवाद बन जाती है। माया ईश्‍वर की अमोघ शक्ति और विशिष्‍ट है । इसकी मारक शक्ति के आगे ईश्‍वर के तीनों – स्रजन,पालन और संहार – पक्ष्‍ा- स्‍वरूपों के अधिष्‍ठाता – ब्रह्मा,विष्‍णु और शिव- लाचार व निरुपाय हैं। रामायण में माया की प्रबलता का विशद विवेचन है। कुछ दृष्‍टव्‍य उद्धरण-   (सुग्रीव राम से) अतिशय प्रबल देव तव माया,  छूटइ राम करहु जौं दाया।  (हनुमान राम से  ) नाथ जीव तव माया मोहा,  सोइ निस्‍तरइ तुम्‍हारेहि छोहा।            दोनों का कथन है कि हे भगवान तुम्‍हारी माया शक्ति इतनी प्रबल है कि आप जब कृपा कर किसी को छुडा दें तभी वह छूट सकता है। इस माया के वशीभूत ब्रह्माश्‍ विष्‍णु, महेश , छोटे-बडे सभी हैं-    जासु प्रबल मायाबस सिव बिसंचि बड छोट  , ताहि देखावइ निसिचर निज माया मति खोट।                सिव विरंचि कहुं मोहै को है बपुरा आन ,अस जिय जानि भजहिं मुनि माया पति भगवान।   सुनि नारदहि लागि अति दाया , अतिसय प्रबल राम कै माया।   जो ग्‍यानिन्‍ह कर चित अपहरई  , बरिआई विमोह मन करई।    जेहिं बहु बार नचावा मोही , सो ब्‍यापी विहंगपति तोही   ।       मन मंह करइ विचार विधाता ,  माया बस कवि कोविद ग्‍याता।  हरि माया कर अमित प्रभावा , विपुल बार जेहि मोहि नचावा।    यानी इस माया के असीम प्रभाव से देवर्षि नारद और स्‍वयं ब्रह्मा भी कई बार चकर घिन्‍नी खा चुके हैं। भगवान शंकर पार्वती से कहते हैं-    प्रभु माया बलवंत भवानी ,   जाहि न मोह कवन अस प्रानी।  ग्‍यानी भगत सिरोमनि ,त्रिभुवन पति कर जान , ताहि मोह माया , नर पांवर करहिं गुमान।  सुर मुनि कोउ नाहिं जाहि  न मोह माया प्रबल , अस विचारि मन मांहि  भजिअ महामाया पतिहि।  ( यहां माया और महा माया का एकत्‍व प्रदर्शित है)     उपर्युक्‍त पंक्तियों से माया का कार्य-ब्‍यापार भी स्‍पष्‍ट होता है। यानी माया मोह उत्‍पन्‍न करती है।  बडे बडे ज्ञानियों के चित्‍त को भी बलात विमोहित कर देती है। और मोह सभी मुसीबतों की जड है- मोह सकल बयाधिन्‍ह कर मूला, जाते उपजत हैं बहु सूला।  मोह क्‍या है ?  ईश्‍वर के नाम , रूप , चरित्र, गुण,धाम इत्‍यादि में संदेह होना मोह है। इसे महा मोह भी कहा जाता है। अपने स्‍वरूप की विस्‍मृति ,  देह और देह संबंधियों में ही ममत्‍व और सांसारिक पदार्थों में ही सुख मान लेना, मैं ही सब कुछ हूं का भाव होना  वगैरह मोह के लक्षण हैं।  माया-मोह से ईश्‍वर परे है। - ग्‍यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार                                              सोइ सच्चिदानंद घन कर पर चरित उदार।  वह परमेश्‍वर बौद्धिक ज्ञान, वाणी ,इंद्रियों और मन, माया , गुणों से परे है।   माया भ्रम है। ब्रहम के अतिरिक्‍त जो दीखता है सब असत्‍य और भ्रम है। इसी को भगवान आदि शंकर ने कहा था- ब्रह्म सत्‍यं , जगत मिथ्‍या। यह जगत एक ऐसा परदा है जो हमें अपने स्‍वरूप , ब्रह्म से अलग रखता है। इसी को किसी सूफी संत ने यूं कहा है-  दिया हमने जो अपनी खुदी को मिटा  वह जो परदा था बीच में अब न रहा रहा परदे में अब न वह परदा नशीं कोई दूसरा उसके सिवा न रहा।  भगवान श्री राम भक्‍ितयोग में लक्ष्‍मण से कहते हैं कि यह जगत ही माया है। मैं,मेरा, तू और तेरा यह विचार-सोच ही माया है। यहां क्‍या मेरा ,क्‍या तेरा ?   मैं अरु मोर तोर तैं माया ,जेहि बस कीन्‍हें जीव निकाया।  गो गोचर जंह लगि मन जाई , सो सब माया जानेहु भाई।  जो स्‍वयं को या ईश्‍वर को न जाने वह जीव है। और जो सब से परे माया का मालिक है वह ईश्‍वर है।    माया ईस न आपु कहुं जान कहिय सो जीव, ईश्‍वर बंध मोक्षप्रद , माया प्रेरक सीव।   जाते बेगि द्रवउं मैं भाई, सो मम भगति सदा सुखदाई। जिससे मैं तुरंत खुश होता हूं वह सदा सुखदायिनी भक्ति है।  महात्‍मा कबीर ने माया को महा ठगिनी कहा था- माया महा ठगिनि हम जानी् ;;;।  उनहों ने कहा था-  आसा तजि माया तजै, मोह तजै अरु मान , हरस  शोक निंदा तजै , कहै कबीर संत जान।   कह सकते हैं कि माया और ब्रहृम एक हैं। ईश्‍वर से परे या समकक्षी तो कोई हो ही नहीं सकता। माया से जीते जी अलग हुआ जा सकता है भक्‍ित से। अगर जीते जी अलग न हुआ जा सके तो फिर साधन का क्‍या अर्थ ?

    kmmishra के द्वारा
    December 3, 2010

    बाजपेयी जी सादर प्रणाम । निसंदेह रामायण और दूसरे धर्मग्रंथों पर आपका अध्ययन अद्भुत है । तमाम उद्धृरणों से बहुत कुछ साफ हुआ पर एक प्रश्न मन में उठता है कि जब माया और ब्रह्म एक ही हैं तब माया को छोड़ने की बात संतजन क्यों कहते हैं ।

    kmmishra के द्वारा
    December 4, 2010

    निसंदेह भक्ति ईश्वर तक पहुंचे का सबसे सरलतम मार्ग है । क्या भक्ति मार्ग से अपने आराध्य तक पहुंचने का रास्ता दूसरे धर्मों में भी देखा गया है और क्या निगुर्ण मार्ग पर चलने वाले भक्ति का मार्ग अपना सकते हैं । खास तौर पर वहां जहां मूर्तिपूजा मना हो । आपसे वार्ता करता हूं तो मानस का यह दोहा याद आता है . तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।। . सादर आपका ।

    sdvajpayee के द्वारा
    December 4, 2010

     प्रिय श्री केएम मिश्र जी, माया और भक्ति , अन्‍य धर्मों के संदर्भ में, संबंधी आपके प्रश्‍नों के उत्‍तर आज रात या कल तक, थोडा मौका पाते ही देने का प्रयास करूंगा। तब तक गोस्‍वामी जी का एक दोहा जो मुझे बहुत अच्‍छा लगता है निवेदित है-   नर विविध कर्म अधर्म बहुमत सोकप्रद सब त्‍यागहू  विश्‍वास करि कह तुलसी दास रामपद अनुरागहू। पुनश्‍च  :   सत्‍संग संबंधी आपके उल्लिखित दोहे से याद आया कि रामायाण का तो एकमात्र उद्देश्‍य ही सत्‍संग महिमा वर्णन है। रामायए आद्योपांत केवल सत्‍संग को ही लेकर चलती है। कह सकते हें कि साखात सत्‍संग है। गोस्‍वामी तो सत्‍संग को ही साधन और साध्‍य दोनों मानते हैं। रामायण में जब जिसको अवसर मिलता है सत्‍संग में लग जाता है। हनुमान -विभीषण, जामवंत-अंगद, भगवान लक्ष्‍मण-गुह, अनुसुइया-सीता , तमाम संत-साधु सब सत्‍संग करते दिखते हैं। कुभकर्ण तो युद्ध को जाते बीच मार्ग में ही अनुज विभीषण से सत्‍संग करने लगता है। राम तो पूरे वनवास सत्‍संग करते चलते -रहते हैं। राज्‍याभिषेक के बाद राजा राम चंद्र का महा सत्‍संग दर्शन- अध्‍यात्‍म का सार है। जैसे ही वन को चले गंगा मैया को देखते ही उनका हृदय उमउ पडा और वह सत्‍संग करने लग गए।  बडी राचक लाइनें हैं- उतरे राम देव सरि देखी, कीनह दंउवत हरषु विशेषी  लखन सचिव सिय किये प्रनामा, सबहि सहित सुख पाएहु रामा गंग सकल मुद मंगल मूला, सब सुख करनि हरनि सब सूला  कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा ,राम विलोकहिं गंग तरंगा।

    satyendrasingh के द्वारा
    December 6, 2010

    आदरणीय बाजपाई जी , जब हम ऊंचाई पर खड़े होकर नीचे आते जाते प्राणियों की भीड़ को देखते हैं तो कई बार माँ में ये प्रश्न उठता है इ ये कहाँ जा रहे हैं ? क्यूँ जा रहे हैं??????? इनके इतने भागने दोड़ने का उद्देश्य क्या है?? लेकिन ऊँचाई पर खड़े होकर देखते रहना ही जीवन होता तो हम इस आती जाती भीड़ में कभी शामिल नहीं होते . लेकिन अजीब बात तो ये है की हम दूर से खड़े देखते भी हैं और उस भीड़ में शामिल भी होते हैं हम अध्यात्म में भी जीते हैं और दुनियां की संगीन हकीकत से भी रूबरू होते हैं मेरे पिताश्री कहा करते थे की संगीन हकीकत है दुनियां ये एक सुनहरी ख्वाब नहीं , और मानव योनी में आने के वाद इस सत्य को राम ने भी जिया , कृष्ण , मोहम्मद , नानक ने भी , बुद्ध ने भी . जहाँ तक राम के विलाप और ज्ञान का प्रश्न है तो ये आम घटना आज भी किसी भी शमशान भूमि में जाकर ,साक्षात देखि जा सकती है . ये ही आश्चर्य है और ये ही माया है , जब माया मोह से राम , कृष्ण अछोते नहीं हैं मानव योनी में आने के बाद तो , हम लोग तो साधारण व्यक्ति हैं . मैं जो कह रहा हूँ वो ही सत्य दूसरा जो करह वो मिथ्या ये ही मोह है . सब जानते हैं की जगत मिथ्या है फिर भी जीने की कामना रखते हैं सब जानते की ये धन मिथ्या है फिर भी महाधनी होने की इच्छा से विरत नहीं हो पाते , मैं अपवादों की नहीं दुनियां के अरबों व्यक्तियों की बात कर रहा हूँ . (आप की सम्मति से मुझे नई और बडी महत्वपूर्ण बात पता चली कि पदार्थ भी अपनी स्थििति में परिवर्तन नहीं चाहता। मैं अभी तक यह समझता था कि पदार्थ जड़ है और जीवित रहने की जद्दोजहद सिर्फ चेतन का गुण है)— प्रत्येक पदार्थ गतिमान अदू पर्मदुओं और उनसे भी छोटे एलेक्ट्रोंस प्रोतोंस , नुत्रोंस से बना है जो हर समय गतिमान रहते हैं . (योग या ब्रह्म विद्या के जानने वालों ने कहा है कि मन की गति जानी जा सकती है, लेकिन मन को वश में कर के। पहले मन को साधना पड़ता है।)—अभी तक किसी ज्ञानी ने मन की अधिकारिक गति का ज्ञान नहीं दिया . [जीवन की नश्वरता को हृदयंगम कर हम मोह से बच सकते हैं।}—ये बात सच है , मैं सहमत हूँ l लेकिन जीवन नश्वर नहीं है , नश्वर तो केवल ईश्वरीय उर्जा है ,जो जीवन हम जी रहे हैं वो तो एक दिन जाएगा ही , सुख , दुःख विवाद अवसाद , रुदन क्रंदन , स्वस्थ , अस्वस्थ , ये जीवन के आवश्यक अंग हैं , हम किसी भी मरीज को ये नहीं समझा सकते की जीवन तो आना जाना है इसका मोह न करो , कष्ट जीवन के अंग हैं आत्मा तो अजर अमर है , दुःख को महसूस न करो, कई बार हम जानते हैं की ये मरीज नहीं बचेगा फिर भी घर वालों से ये नहीं कह सकते की इसका इलाज न कराओ , बड़े बड़े अध्यात्मिक लोगों को मैंने अपने च्कितासक जीवन में अंतिम पदो पर भी जीवन के कुछ क्षण और देदेने की याचना करते हुए देखा है . एक जगद गुरु को भी चोटों से कराहते हुए और जीवन की और अभिलाषा में याचना करते देखा है ये कैसी माया है जो जानने के बाद भी की सब मिथ्या है इस मिथ्या जगत को हम छोड़ना नहीं चाहते . कहना जितना आसान है , करना उतना ही कठिन . क्यूंकि ये संसार तामोगुड प्रधान है और इस श्रृष्टि की रचना भी तमोगुड से ही हुयी है , तनोगुड श्रृष्टि की रचना में प्रमुख कारन है .ऐसा शास्त्र भी कहते है और , जीवन में भी परिलक्षित होता है , तनोगुद ही माया मोह का कारन है , और ये श्रृष्टि ही तमोगुड प्रधान है , फिर मोह से अलग होना इस श्रृष्टि से अलग होने के सामान ही है, और ये तो मृत्यु के पश्चात ही हो सकता है , इस श्रृष्टि को जिसमे हम मानव और जीव सभी वास कहते हैं , नाम ही मृत्युलोक दिया गया है , तो jeevan और मृत्यु आभासी होते हुए भी सत्य ही हैं . जो दिखता है वोही सत्य , और वोही साक्ष भी माना जाता है , न्यायालय में भी . जितना जीवन सत्य है उतना ही मोह और उतनी ही मृत्यु सादर आपका डॉ. सत्येन्द्र

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
November 27, 2010

आदरणीय श्री वाजपेयी जी, सादर नमस्‍कार, जीवन व मृत्‍यु के भेद को इतने सहज व सरल शब्‍दों में व्‍यक्‍त कर पाना आपकी ही बुते की बात थी । मैं यहां भी यही कहूँगा कि इतनी विस्‍तृत व्‍याख्‍या सभी प्रश्‍नों का समाधान कर देती है । मिट्टी का मिट्टी में मिल जाना अर्थात रूपांतरित हो जाना – कितनी सुंदर व्‍याख्‍या है। हम व्‍यर्थ ही दु:खी होते है। लेकिन किसी शरीर से मोह हो जाना भी तो इस शरीर और शरीर में बसे मन का ही धर्म है। इसलिए दु:ख तो होगा ही। लेकिन स्‍वयं के चले जाने का दु:ख नहीं होगा क्‍योंकि जन्‍म-मृत्यु का मजा जो लेना है। अरविन्‍द पारीक

    sdvajpayee के द्वारा
    November 27, 2010

    ब्हुत बहुत आभारी हूं भाई अरविंद जी। शरीर जब जर्जर -कमजोर और रेगग्रस्त हो जाता है तब शायद शरीर से तो मोह नहीं रह जाता इस के बावजूद हम मृत्यु से घबड़ाते और भागते हैं। मुझे लगता है कि यदि हम जन्म की तरह ही मृत्यु को भी लें ,उसे मातम की बात न मानें तो मरने पर भी हमें खुशी हो सकतीहै।

Rashid के द्वारा
November 27, 2010

वाजपेयी सर,, जीवन / मृत्य का शानदार विश्लेषण !! सही है की आत्मा या रूह तो मरती नहीं है बस यह शरीर नष्ट हो जाता है ,, फिर शुरू होता है दूसरा जीवन जहाँ अपने किये का हिसाब देना पड़ता है हकीकत तो यह है की दुनिया की ज़िन्दगी तो बस एक ख्वाब है और इम्तेहान है, यह ख्वाब कभी भी टूट सकता है और फिर हकीकी ज़िन्दगी शुरू होती है !! शायद यही वजह है की पीर फ़कीर सारी ज़िन्दगी बस यूँ ही गुज़ार देते है !! किसी ने सही कहा है ” ज़िन्दगी को जो समझा है ज़िन्दगी पे रोता है ” राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    sdvajpayee के द्वारा
    November 27, 2010

    बहुत बहुत शुक्रिया राशिद भाई! आपने बहुत अच्छी बात कही कि – जिन्दगी को जो समझा है जिंदगी पे रोता है। और कहा जा सकता कि जिसने मौत को समझ लिया वह मौत को देख कर स्वागत में मुस्कराता है।

Alka Gupta के द्वारा
November 27, 2010

श्री बाजपेयी जी,  अभिवादन  इस नश्वर संसार में  जन्म - मरण एक शाश्वत सत्य है जीवन के इस  मेले में आना जाना तो लगा ही रहेगा  विषय  का विश्लेषण करता हुआ श्रेष्ठ लेख है   धन्यवाद

    sdvajpayee के द्वारा
    November 27, 2010

    धन्यवाद अलका जी, भूख, भय और मृत्यु में सब बंधे हुए हैं। हम सब जानते हैं कि सब को मरना है। मनुष्य, पेड़- पौधे सभी। इसके बावजूद जीते रहने की जद्दोजहद जारी रहती है। ऐसे जैसे कभी मरेंगे ही नहीं। मौत के सोचना भी नहीं चाहते। यही हमस ब को बनाने वाले की बड़ी बाजीगरी है।

Shakti Joshi के द्वारा
November 26, 2010

“Death is not the greatest loss in life. The greatest loss is what dies inside us while we live.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 27, 2010

     जी। शक्ति जी, आपने बहुत अच्छी बात कही कि मृत्यु जीवन में सबसे बड़ी क्षति नहीं है। सब से बड़ी क्षति जीवित रहते हुए हमारे अभ्यंतर में जो मरता है वह है।

Rohan के द्वारा
November 26, 2010

“Love is stronger than death even though it can’t stop death from happening, but no matter how hard death tries it can’t separate people from love. It can’t take away our memories either. In the end, life is stronger than death.”

    sdvajpayee के द्वारा
    November 27, 2010

    लेकिन रोहन जी, मौत तो नए जीवन की शुरुआत है और पूरे जीवन मौत साया बन कर चलती रहती है। दोनों में कौन ज्यादा ताकतवर है कहा नहीं जा सकता।

    joshi के द्वारा
    December 21, 2010

    “वो लेटा था जमीन पर लोग कहते मर गया , वो विचारा था सफर में आज अपने घर गया ” ऐसा विचार हमारा होना चाहिए ,परन्तु ऐसा होता नहीं कोइ ऐसा उपाय हो तो कृपया बताएं धन्य वाद

sam के द्वारा
November 26, 2010

My mother always said that every time you do a good deed here on Earth, you’re storing up a treasure in heaven. Which means Mother Teresa’s probably got some beachfront property up there and I’m up to a box of Milk Duds and a Pez dispenser.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 27, 2010

    धन्यवाद सैम भाई, आप की मां बहुत अच्छी सीख देती थीं। बच्चों में अच्छे संस्कार डालने के लिए हम लोगों के मां बाप ऐसा कहते रहे हैं। वैसे कुरान का भी संदेश यही है। लेकिन हमें जीवन-मृत्यु के रहस्य को समझने का प्रयास करना चाहिए।

Ramesh lal के द्वारा
November 26, 2010

भाईसाहब आपका का लेख हमारे जीवन का सच बताने वाला और जीवन के प्रति जो ज्ञान है हमारे उस ज्ञान को बढ़ाने वाला एक महत्व पूर्ण लेख है।

    sdvajpayee के द्वारा
    November 27, 2010

    धन्यवाद भाई रमेश लाल जी, जीवन को समझना है तो हमें मृत्यु को भी जानना-समझना होगा।

Prasoon Joshi के द्वारा
November 26, 2010

The self-existent Brahma created the senses with outgoing tendencies; therefore man beholds the external universe and not the internal Self. But some wise men with their senses turned away from the objects, desirous of immortality, turn their gaze inwards and behold the Self within

    sdvajpayee के द्वारा
    November 27, 2010

    धन्यवाद भाई श्री प्रसून जोशी जी, इंद्रियों से बाह्य जगत को भी सम्यक रूपेण नहीं देखा जा सकता। चेतना-ज्ञान की विशेष दृष्टि विकसित होने पर ही अंदर बाहर समान रूप से देखा जा सकता है। चूंकि तब भ्रम हट जाएगा। द्वैत नहीं रहेगा। अंदर बाहर सब एक ही लगेगा, दिखेगा।

Rahul Bose के द्वारा
November 26, 2010

An eternal portion of Myself having become a living soul in the world of life, draws to itself the five senses with the mind for the sixth, abiding in Nature.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 27, 2010

     many many thanks Bhai Shri Rahul Bose ji !

Moh Ajam Khan के द्वारा
November 26, 2010

یااون جی ہم سب تو اس خدا کے خمیاند ہے اس کی اس دنیا کے خوب صورت کھیںل کے کردار ہیں اور ہم اس کھیںل کو حقیقت سمجھ لیتے ہیں…. بھول جاتے ہیں ہمیں اس کردار کو الوداع بھی کہنا ہے.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 27, 2010

    ब्हुत बहुत शुक्रिया आजम भाई। हम इस खेल को हकीकत समझ लेते हैं, शायद हमारी सब से बड़ी भूल यही है। इसी को तुलसी दास जी ने लिखा है- जग पेखनि तुम देखनि हारा …. संसार एक नाटयशाला है और हे परमेश्वर तुम देखने वाले हो! शेक्सपीयर ने भी इसी बात को लिखा था कि जीवन एक रंगमंच है ।

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 26, 2010

आदरणीय बाजपेयी जी………. जीवन के बारे मे कुछ भी ठीक ठीक कहना बहुत ही आसान है………. पर मृत्यु के बारे मे केवल अंदाजे लगाए जाते है………. जो देखा ही नहीं जिसको महसूस ही नहीं किया…….. उसके बारे मे अगर कुछ कहा जाए तो वो असत्य ही होगा………. जिन लोगों ने मृत्यु को जाना वो फिर बताने वापस नहीं आ सके………………….. तो ये बहस का कोई परिणाम ही नहीं है…………… हाँ जीवन के संबंध मे जो कहा जाए वो निजी अनुभव के आधार पर जाना सत्य माना जा सकता है….. अच्छी कोशिश के लिए बधाई………..

    sdvajpayee के द्वारा
    November 27, 2010

    प्रिय श्री पीयूष भाई, जीवन- मृत्यु के बारे में जो मानता हूं उसके अनुसा।।र जीवन के बारे में भी कुछ ठीक ठीक कह पाना आसान नहीं है। हमारे देखने और महशूश करने की शक्ति बहुत सीमित है, जब कि जीवन के ओर छोर का पता नहीं है। मुझे लगता है कि मृत्यु के बारे में जानने के लिए मरना जरूरी नहीं है। जीवित अवस्था में ही मृत्यु के बारे भी जाना समझा जा सकता है। वैसे जीवित रहते हुए जीवन के बारे में ही कितने लोग जान पाते हैं? हम समुद्र को देख, छू और उसमें जाकर भी उसके बारे में क्या समग्रता में जान सकते हैं?

ashok choudhary के द्वारा
November 26, 2010

जीवन और मृत्‍यु पर बहस अनादि है। दर्शन में ही यह बहस नहीं है। चिकित्‍साविज्ञान अब भी अमरत्‍व की तलाश में है। जीवन के बाद क्‍या है। मरता कौन है शरीर या आत्‍मा। आत्‍मा कौन है। मृत्‍योपरान्‍त उसकी गति क्‍या है। हजारो बर्ष से मनुष्‍य इससे जूझ रहा है। आपने इस अनादि बहस में हस्‍तक्षेप किया। इसके लिए आपकी हिम्‍मत की दाद देता हूं।

    sdvajpayee के द्वारा
    November 27, 2010

    अशोक भाई, जीवन-मृत्यु अनादि है तो इन पर बहस भी अनादि होगी ही। चिकित्सा विज्ञान अभी तक सीमित ही है।मृत्यु रोकना तो दूर की बात है वह सांस की एक कड़ी भी नहीं बढ़ा पाया है। जो दिखता है उसके अनुसार इतना तो तय है कि मरता शरीर है, आत्मा के बारे में अनुसंधान करने की जरूरत है। मौत को समझे बिना जीवन को कैसे समझा जा सकता है?

Tufail A. Siddequi के द्वारा
November 26, 2010

आदरणीय वाजपेयी जी अभिवादन, “आ रहे और अपना पार्ट अदा कर जा रहे हैं।” “न हम कभी जन्‍मते हैं और न कभी मरते हैं। केवल रूपांतरित होते रहते हैं। शरीर मिट्टी से आता और मिट्टी में मिल जाता है। हर प्राणी पृथ्‍वी से ही उत्‍पन्‍न चीजों को खाता-पीता है। आहार के लिए सभी प्राणी एक दूसरे पर निर्भर हैं। मनुष्‍य समेत सभी प्राणी आकाश तत्‍व से परस्‍पर जुडे-बंधे हैं।सागर के बुलबुले की तरह। बुलबुला अलग दिख कर क्‍या सागर से सम्‍पृक्‍त नहीं है ? आइए, एक नया जन्‍म लें। अपने नये जन्‍म -मृत्‍यु का मजा लें। अहं का मिटना ही मृत्‍यु और समता-असंगता आने को जन्‍म मान कर।” अपनी अल्पबुद्धि से इस लेख पर टिपण्णी कर चिराग तो उजाला कैसे दिखाऊँ ? बधाई कबूल कीजिये.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 26, 2010

     प्रिय भाई तुफैल जी, आपने पोस्‍ट पढी अच्‍छा लगा लेकिन यह कहना पूरी विनम्रता से अस्‍वीकार  है –  अपनी अल्पबुद्धि से इस लेख पर टिपण्णी कर चिराग तो उजाला कैसे दिखाऊँ ?  आप खुले मन से टिप्‍पणी करें मुझे खुशी होगी।

R K KHURANA के द्वारा
November 26, 2010

प्रिय श्री बाजपाई जी, जीवन और म्रत्यु का सुंदर विश्लेषण करता लेख ! बहुत खूब ! आपके इस लेख के लिए : हर स्वप्न है रो रो के सुलाने के लिए, हर याद है घुल घुल के भुलाने के लिए ! जाती हुई डोली को न आवाज लगा, इस गाँव में सब आये हैं जाने के लिए !! राम कृष्ण खुराना

    sdvajpayee के द्वारा
    November 26, 2010

     बहुत बहुत आभारी हूं आद. खुराना जी। हमारे सहयोगी श्री राजेश सिंह बशर का एक शेर  मुझे अच्‍छा और प्रासांगिक लगता है-            अलविदा की नजर से न देखो मुझे, लौट कर फिर यहीं आने वालों में हूं ।

shiv nath Bhatt के द्वारा
November 26, 2010

  वाजपेयी जी, मुझे लगता कि आपका लेख पढ कर मृत्‍यु के बारे में डर कम हुआ है  वाकई कितनी विचित्र बात है के मौत के बारे में हम कभी सोचना भी नहीं चाहते। कुछ समाजों में  मौत पर खुशियां मनाने की परंपरा है।

    sdvajpayee के द्वारा
    November 26, 2010

     धन्‍यवाद श्री भट्ट जी,  जिसने मृत्‍यु पर खुशियां मनाने की परंपरा शुरू की होगी निश्चित रूप से वह जन्‍म- मृत्‍यु के रहस्‍य को समझ गया होगा।

Manoj Narain tripathi के द्वारा
November 26, 2010

 जीवन और मृत्‍यु की यह कहानी भी कितनी विचित्र है। आना और जाना बीच में कुद समझ में आना।

    sdvajpayee के द्वारा
    November 26, 2010

     धन्‍यवाद मनोज जी। आपने सही कहा कि जीवन और मृत्‍यु की यह कहानी भी कितनी विचित्र है। आना और जाना बीच में कुद समझ में आना।

ss shivastava के द्वारा
November 26, 2010

  जन्‍म क्‍या है और मौत क्‍या है मैंने इस के पहले तो इस गहराई से सोचा नहीं था। सोचने का दायरा बढा देने वाला लेख।

    sdvajpayee के द्वारा
    November 26, 2010

     आभार श्री श्रीवास्‍तव जी

prem kumar dwivedi के द्वारा
November 26, 2010

 हमें मृत्‍यु के बारे में खुले मन से विचार करना चाहिए। इस लेख यह सीख मिलती है।

dharmendra के द्वारा
November 26, 2010

  वाजपेयी जी     आपने यह कह कर मृत्‍यु के बारे में बडी महत्‍वपूर्ण बात कह दी है। हम केवल रूपांतरित होते रहते हैं। मौत होती नहीं है। फिर मौत से क्‍यों डरना। ”विचार करने पर हम पाते हैं कि न हम कभी जन्‍मते हैं और न कभी मरते हैं। केवल रूपांतरित होते रहते हैं। शरीर मिट्टी से आता और मिट्टी में मिल जाता है। हर प्राणी पृथ्‍वी से ही उत्‍पन्‍न चीजों को खाता-पीता है। ”

    sdvajpayee के द्वारा
    November 26, 2010

      बहुत बहुत धन्यवाद धर्मेन्‍द्र भाई

Dharmesh Tiwari के द्वारा
November 26, 2010

आदरणीय बाजपेयी जी सादर प्रणाम,जन्म प्राप्त होने पर मोह रूपी माया जाल में इन्शान इस कदर गहराई में बधता चला जाता है जो अंत में दुःख को उत्पन्न करती है,जबकि हकीकत तो यही है की हर नयी चीज एक दिन पुरानी जरुर होती है,ये तो प्रकृति का नियम ही है,और संभवतः इस सच्चाई को इन्शान हर पल बिना किसी संदेह मानाने को तैयार भी रहता है लेकिन बस मोह रूपी जाल में फंशा इन्शान इसे समझने में थोड़ी देरी कर देता है,धन्यवाद!

    sdvajpayee के द्वारा
    November 26, 2010

     धन्‍यवाद धर्मेश जी,  आपकी बात सही है । मैं मानता हं कि हम जैसे जन्‍म को लेकर उत्‍साहित रहते हैं वैसे ही मृत्‍यु के बारे में रहना चाहिए। मृत्‍यु को ध्‍यान में रखेंग तो मायामोह स्‍वयमेव घटेगा।

राकेश सारस्‍वत के द्वारा
November 26, 2010

आदरणीय वाजपेयी जी, जीवन और मृत्‍यु के आपका विद्वतापूर्ण सवाल एकाएक नचिकेता के उन तीन सवालों की याद दिलाता, जिसे कठोपनिषद के अनुसार, उसने यम से पूछा था। लेकिन सच कहूं तो यम भी यह रहस्‍य समझा न सके। शायद इसी कारण हम सभी आज तक इसे जानने को इच्‍छुक हैं। वास्‍तविकता तो यह है कि यह सवाल हर युग में हर समय उठा है। लगभग सभी उपनिषद इससे भरे पडे हैं। महाभारत के पात्र भी इसकी तलाश में भटकते दिखते हैं। पाण्‍डवों के अज्ञातवास के समय यक्ष धर्मराज युधिष्ठिर से पूछता है- संसार का सबसे बडा आश्‍चर्य क्‍या है ? युधिष्ठिर का जवाब था- हम रोज लोगों को मरते हुए देखते हैं लेकिन इसके बाद भी खुद के अमर होने की कामना करते हैं। कुछ ऐसा ही प्रश्‍न शाक्‍य वंश के राजकुमार और राजा शुद्धोधन के पुत्र सिद्धार्थ ने अपने सारथी छन्‍दक से उस समय पूछा था जब उन्‍होंने पहली बार एक शव देखा। सारथी द्वारा यह कहने पर कि एक दिन सबको मर जाना है, सिद्धार्थ का माथा ठनका और सब कुछ त्‍याग कर हो गये हो गये बुद्ध। तो आदरणीय वाजपेयी जी, आपने जो सवाल उठाया है वह जितना सोचो उतना ही जटिल होने वाला है लेकिन जिसने इसे समझ लिया उसके लिए जीवन परमानन्‍द हो जाती है। जैन धर्म के पहुंचे हुए उपासक अन्‍न-जल को त्‍याग कर शरीर छोड देते हैं। इसे सल्‍लेखना कहते हैं। जरा सोचिए, आज के दौर में जब हर आदमी अपने जीवन को लम्‍बा रखने के लिए दूसरों की जान तक लेने को तैयार रहता है, कोई सल्‍लेखना कैसे कर सकता है। लेकिन इतिहास साक्षी है कि मौर्य सम्राट चन्‍द्रगुप्‍त मौर्य समेत तमाम लोगों ने ऐसा किया। यानी इनके लिए जीवन-मरण के बीच भिन्‍नता खत्‍म हो गयी। बुद्ध ने कुशनारा (वर्तमान कुशीनगर का अनुरूधवा गांव) में महापरिनिर्वाण से पहले अपने शिष्‍यों को सख्‍त हिदायत दी थी कि हुसते हुए बिदा करें लेकिन उनके प्रिय शिष्‍य से ऐसा न हो सका और वह इतना रोया कि बुद्ध का शरीर भीग गया जिसके लिए उसे सार्वजनिक रूप से सजा भुगतनी पडी। आनंद मौत का रहस्‍य न समझ सका इसलिए बुद्ध के सबसे करीब रहते हुए भी खत्‍म हो गया जबकि जिसने समझा वह बुद्ध जैसा हो गया। शायद इसी बात को समझते हुए महावीर के पावा में निर्वाण के समय उनके शिष्‍यों ने रोने की बजाय घी के दीपक जला कर खुशी का इजहार किया।- – - – लेकिन क्‍या यह सब इतना आसान है। मुझे तो बश यही लगता है- निर्भय स्‍वागत करो मृत्‍यु का, मृत्‍यु एक विश्राम स्‍थल- – - – बहरहाल, एक बेहतरीन लेख के लिए हार्दिक बधाई

    sdvajpayee के द्वारा
    November 26, 2010

     बहुत बहुत आभारी हूं राकेश भाई। आपकी प्रतिक्रिया से दर्शनशस्‍त्र के विद्यार्थियों को भी लाभ होगा।  मैं इसी निष्‍कर्ष पर पहुंचा हूं कि जन्‍म से ज्‍यादा मृत्‍यु का उत्‍सव मनाया जाना चाहिए।जीवन में पूरा प्रयास होना चाहिए कि मृत्‍यु उत्‍सव-समारोह मनाने लायक हो। मृत्‍यु नया चोला , नया कपढा मिलने का मौका। एक नयी भूमिका निभाने का सुअवसर।

Preeti Mishra के द्वारा
November 26, 2010

बाजपेयीजी आपने दिल की बात के माध्यम से सबके दिल की बात कह दी. बहुत उत्कृष्ट रचना है. बधाई स्वीकार करें. मेरा मानना है प्रत्येक व्यक्ति इस संसार में किसी न किसी विशिष्ट कार्य के लिए आता है परन्तु इस दुनिया में आने के बाद उस विशिष्ट कार्य को भूलकर इस संसार में रम जाता है.जनम मरण का यह चक्र तो चलता ही रहता है और इस जनम के कर्मों के हिसाब से ही हमें अगला जनम मिलता है.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 26, 2010

     धन्‍यवाद प्रीति मिश्रा जी, मैं तो मानता हूं कि संसार के चक्र व्‍यूह को समझ लेना और उसे तोड  सकना ही सब से बडा कार्य है। परम विशिष्‍ट कार्य , परम पुरुषार्थ। कौन हैं, कहां से आए और कहां  जाएंगे, इसे समझ सके तो सब ब्‍यर्थ ही गया।

nishamittal के द्वारा
November 26, 2010

एक बार पुनः ज्ञानदायिनी प्रस्तुति.जन्म मरण का चक्र मानव के लिए अबूझ पहेली है.आपने विस्तृत उद्धरण सहित लेख में यही सब स्पष्ट किया है.गीता ज्ञान व्यवहारिक ,शिक्षाप्रद है.लेकिन हम विविध मतमतान्तरों में उलझ भटकते रहते हैंआपने इन समस्त उलझाव को दूर करने का प्रयास किया है.धन्यवाद

    sdvajpayee के द्वारा
    November 26, 2010

    धन्‍यवाद निशा जी, गीता तो सब गंथों का सार है और पश्‍चातवर्ती सभी ग्रंथों की मां है। इसे आत्‍म सात कर लेने पर और कुछ पढने की जरूरत नहीं रहती है। वैसे तो ज्ञान व्यवहारिक ,शिक्षाप्रद ही होता  है चाहे गीता से मिले कुरान- बाइबिल से ।उसे हृदय में उतरने की बात है। सब एक ही परम सत्‍ता को  विभिन्‍न तरीके से वर्णन करते हैं। एकं सद् विप्रा बहुणा वदंति।

Dr sanjay shukhani के द्वारा
November 26, 2010

on the time scale of the history of the Earth an individual human lifetime is a mere blink of an eye. We\’re born, we live, and we die–and then we are \"heard no more.\" Death is like a dreamless sleep from which we will never awake, our consciousness snuffed out forever. If this life is all there is, what is the point of living? If we\’re all going to be dead in the end anyway, what difference does it make what we do with our lives? We may influence the lives of others, but they too are doomed to death. In a few generations most of our accomplishments will be totally forgotten, the memories of our lives reduced to a mere name etched on a tombstone or written on a genealogy chart. In a few centuries even our tombstones will be unreadable due to weathering; our skeletal remains will be all that is left of us. Barring fossilization, these too will be disintegrated into the earth and no trace of us will remain. The matter from which we were made will be absorbed into other organisms–plants, animals, even other human beings. New species will appear, flourish, and disappear, soon to be replaced by others filling in the niche left by their extinction. Human beings too will succumb to extinction. All life on Earth will be wiped out when our dying sun expands into a red giant, finally engulfing the Earth. Ultimately the universe will be incapable of supporting any life as it expands forever, leaving only residual heat and evaporating black holes, or contracts back on itself, fusing all matter and energy into a final Big Crunch. Either way, all life in the universe will disappear forever. Such considerations once led Bertrand Russell to conclude that any philosophy worth taking seriously would have to be built upon a \"firm foundation of unyielding despair\" . Does the finality of death make life meaningless? Although many people feel that it does, a moment\’s reflection will show that death is irrelevant to the question of the meaning of life: If human beings were naturally immortal–that is, if there were no such thing as death–there would still be a question about whether or not our lives had meaning. The underlying assumption behind the claim that life is meaningless because it ends in death is that for something to be meaningful or worthwhile it must last forever. The fact that many of the things we value (such as relationships with others) and activities that we find worthwhile (such as working on a political campaign or raising a child) do not last forever shows that life does not need to be everlasting to be meaningful. We can also show that everlasting life may not be meaningful by providing examples of lives which last forever yet are meaningless. In Greek mythology Sisyphus is punished by the gods for cheating death by being forced to roll a heavy stone to the top of a hill. Just as the stone is about to reach the top of the hill, it rolls back down to the plain. Sisyphus is doomed to repeat this meaningless activity for eternity. The duration of our lives has nothing to do with their meaningfulness. It is ironic that so many people have missed this point given that Albert Camus presents Sisyphus\’ eternal punishment as the archetype of meaningless existence. Death appears to render life meaningless for many people because they feel that there is no point in developing character or increasing knowledge if our progress is ultimately going to be thwarted by death. However, there is a point in developing character and increasing knowledge before death overtakes us: to provide peace of mind and intellectual satisfaction to our lives and to the lives of those we care about for their own sake because pursuing these goals enriches our lives. From the fact that death is inevitable it does not follow that nothing we do matters now. On the contrary, our lives matter a great deal to us. If they did not, we would not find the idea of our own death so distressing–it wouldn\’t matter that our lives will come to an end. The fact that we\’re all eventually going to die has no relevance to whether our activities are worthwhile in the here and now: For an ill patient in a hospital a doctor\’s efforts to alleviate pain certainly does matter despite the fact that \’in the end\’ both the doctor and the patient (and ultimately all life in the universe) will be dead. What is it about our lives that makes so many people feel that life is ultimately meaningless? The fact that we all will eventually die is one reason for this feeling, but it is not the only reason. The other main reason why many people feel that life is ultimately meaningless is that, as far as science can tell, there is no greater purpose for our lives. A scientific picture of the world portrays the origin of human beings as \"the outcome of accidental collocations of atoms\" . Both individually and collectively, human beings came into existence due to accidents of chance. As individuals our existence was made possible by the reproductive success of our ancestors; as a species our existence was predicated by chance mutations which happened to confer an adaptive advantage to our evolutionary ancestors in the environments in which they found themselves. Because we cannot discern any indications that we were put on this Earth to fulfill a purpose given to us by an intelligent being, our existence does not appear to be part of some greater plan. If the absence of a higher purpose is what makes life ultimately meaningless, our lives would be just as meaningless if they were eternal. Conversely, if being part of a higher purpose gives our lives meaning, then our lives would be meaningful even if death ended them forever. Is it really the case, however, that the absence of a greater plan for our lives renders life meaningless? Here too, a moment\’s reflection will show that a lack of greater purpose in life is irrelevant to the meaning of our lives. How would a greater purpose for our lives give meaning to our lives for us? Suppose, for example, that we found out that millions of years ago extraterrestrials genetically manipulated the hominid line in order to produce a species of greater intelligence suited to their needs for slave labor and have not yet returned to the Earth to enslave us. In such a case our existence would be part of a greater plan and would confer meaning to our lives for the extraterrestrials, but it would not give meaning to our lives for us. Our being part of a divine plan can only confer meaning on our lives if we accept our role in that plan as meaningful to us; but, as in the case of extraterrestrial enslavement, what is meaningful to God may not be meaningful to human beings. Furthermore, so long as we are ignorant of a greater plan for our lives–which we certainly are–we cannot know what our role in such a plan is and thus it cannot make life meaningful to us. Our activities are worthwhilefor their own sake, not because they fulfill some unknowable transcendental purpose. These considerations show that we must create our own meaning for our lives regardless of whether or not our lives serve some higher purpose. Whether our lives are meaningful to us depends on how we judge them. The absence or presence of greater purpose is as irrelevant as the finality of death. The claim that our lives are \’ultimately\’ meaningless does not make sense because there is no sense in which they could be meaningful or meaningless outside of how we regard them. Questions about the meaning of life are questions about values. We attribute values to things in life rather than discovering them. There can be no meaning of life outside of the meaning we create for ourselves because the universe is not a sentient being that can attribute values to things. Even if a sentient God existed, the value that he would attribute to our lives would not be the same as the value that we find in living and thus would be irrelevant. What makes our lives meaningful is that we find the activities we engage in to be worthwhile. Our determination to carry out projects we have created for ourselves gives our lives meaning. We feel that life is meaningless when most of our desires which we regard as important are frustrated. Whether we regard life as meaningful or meaningless depends on the degree to which our important desires are frustrated. The judgments that we make about our lives on these points are the same regardless of whether one\’s life is eternal or not or whether it is part of a greater purpose or not. Perhaps the secret to a meaningful life is to focus on those desires which we can fulfill and diminish those which we cannot–provided that we know the difference between the two.

    sdvajpayee के द्वारा
    November 26, 2010

     प्रिय श्री डा. सुखानी जी,  जन्‍म-मृत्‍यु के बारे में आपकी कृपापूर्ण विस्‍तृत- गहन सम्‍मति के बारे में आभारी हूं। मेरा मानना है कि जीवन-मृत्‍यु के रहस्‍य संधान में लगे मनीषी आपके निष्‍कर्ष-बिंदुओं पर निश्चित रूप से चर्चा करेंगे और कई लोगों को इससे मार्ग दर्शन मिलेगा।

shyamendra kushwaha के द्वारा
November 26, 2010

सर प्रणाम, शरीर तो सराय हैं। धर्मग्रंथ हमें बराबर यह बताते हैं कि जैसा कर्म होगा, वैसा ही फल मिलेगा। लेकिन सांसरिक मोह-माया में फंसकर हम सब भूल जाते हैं और वही करते हैं, जो नहीं करना चाहिए। काश भगवान सभी शरीरी को शरीर में सत्‍कर्म के लिए ही भेजते। आपकी बहुत ज्ञानवर्धक पोस्‍ट।

    sdvajpayee के द्वारा
    November 26, 2010

     प्रिय भाई श्‍यामेन्‍द्र भाई,  रामायण का एक दोहा है जिस की दूसरी लाइन याद नहीं आ रही-   व्‍यापि रहेउ संसार मंह माया मोह प्रचंड। भाई जी, सत्‍कर्म से मनुष्‍य को मतलब होता है। भगवान तो सत्‍कर्म- दुष्‍कर्म दोनों से निरपेक्ष है। उन्‍हें फल भी नहीं भोगना है

sanjay rustagi के द्वारा
November 26, 2010

सर आपकी पोस्ट पढ़कर सदैव की तरह कई नई जानकारियां भी मिलीं हैं। आपने जन्म व मृत्यु को बेहतर तरीके से परिभाषित कर मनुष्य को खुद में सुधार लाने की भी सीख दी है। इसके लिए बधाई।

    शंभू दयाल के द्वारा
    November 26, 2010

     संजय भाई, सबसे पहले प्रतिक्रिया देने का क्रम एक व्‍यतिक्रम के बाद पुन: शुरू हुआ, अच्‍छा लगा। बालक मुझे भगवान श्री राम कथन की यह चौपाई बडी सजग करने वाली लगती है-   यह तनु कर फल बिषय न भाई, स्‍वर्गउ अल्‍प अंत दुखदाई।  नर तनु पाइ बिषय मन देहीं, पलटि सुधा से सठ बिष लेहीं।


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